लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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baburhumayunअकबर की महानता और भारतीय परंपरा में राजा के गुण
राकेश कुमार आर्य

भारत के विषय में बाबर के विचार
भारत के विषय में बाबर ने लिखा है-‘‘हिन्दुस्थान में बहुत कम आकर्षण है। यहां के निवासी न तो रूपवान होते हैं, और न ही सामाजिक व्यवहार में कुशल होते हैं। ये न तो किसी से मिलने जाते हैं, और न उनसे कोई मिलने आता है। न इनमें प्रतिभा होती है, और न कार्यक्षमता। न इनमें शिष्टाचार होता है और न उदारता। कला कौशल में न तो ये किसी अनुपात पर ध्यान देते हैं, और न नियम और गुण पर। इनके पास न अच्छे घोड़े होते हैं न अच्छे कुत्ते, न अंगूर, न खरबूजा और न उत्तम मेवे। यहां न तो बर्फ मिलती है, और न ठण्डा जल। यहां के बाजारों में न तो अच्छी रोटी ही मिलती है और न अच्छा भोजन ही प्राप्त होता है, यहां न हमाम है न मदरसे, न शमां, न मकान और न शमादान।’’
(संदर्भ : ‘बाबर नामा’ अनु. रिजवी पृष्ठ 171)

मुगल वंश के संस्थापक बाबर के भारत के विषय में ये विचार स्पष्ट करते हैं कि बाबर भारत को न तो देख पाया और न समझ पाया। इसलिए उसने अपनी अज्ञानता के आधार पर जितना कुछ भारत को समझा, जाना, और देखा, उतने के आधार पर ही उसने अपने उक्त विचार स्पष्ट कर दिये।

‘हरामजादा या हरामजादी’ कहने की परंपरा इस प्रकार चली
मुगलकाल में बादशाह व्याभिचारी होते थे। जिससे उनकी बेगमों की स्थिति बड़ी दयनीय हो जाती थी। उनके शामियाने और बाग-बगीचे उनके लिए व्यभिचार के केन्द्र बन जाते थे। जबकि भारतवर्ष में बाग-बगीचों को ईश्वरीय आराधना के लिए और योगादि के अभ्यास के लिए उपयुक्त स्थान माना जाता था। इसके साथ-साथ अनेकों स्त्रियों को अपने हरम में रखना हमारे यहां ‘पाप’ माना जाता था। इसके विपरीत मुस्लिम बादशाहों ने अपने यहां हजारों की संख्या में स्त्रियों को अपने हरमों में रखा। इनसे उत्पन्न होने वाली संतान ‘हरामजादा’ या ‘हरामजादी’ (शाहजादा, या शाहजादी नही) कहा जाता था। ये शब्द अब तक एक गाली के रूप में हमारे यहां प्रयोग किये जाते हैं। वस्तुत: ये बादशाही युग की देन हैं। ‘भारत को बादशाही काल की देन’ के रूप में इन शब्दों को देखा जा सकता है, जिन्हें एक गाली के रूप में हम अक्सर अपनी संतानों के लिए बिना इन शब्दों के अर्थ को समझे, प्रयोग कर लेते हैं। कभी-कभी पति-पत्नी एक दूसरे के लिए भी क्रोध में इन शब्दों को प्रयोग करते देखे जाते हैं। इनका प्रचलन कहां से क्यों और किस प्रकार हुआ और इनका अभिप्राय क्या है, इस बात पर कोई ध्यान नही देता।

यह कैसा उपकार
जिस भारत में लोग अपनी संतान को ‘आर्यपुत्र या आर्यपुत्री’ कहते थे और पति-पत्नी का पारस्परिक संबोधन भी ‘देवी’ या ‘स्वामी’ का हुआ करता था, उसमें ‘हरामजादा’ या ‘हरामजादी’ जैसे शब्द व्यवहार में आ जायें तो कितना भयंकर परिवर्तन हुआ है, हमारे सांस्कृतिक मूल्यों में? क्या आप इसे ‘गंगा-जमुनी संस्कृति की देन’ कहेंगे, या हम पर इस गंगा-जमुनी का उपकार कहेंगे?

बेईमान’ शब्द भी हमें मुगल संस्कृति से मिला है
ऐसा ही एक शब्द और है-‘बेईमान’ इसे एक मुस्लिम महिला अपने उस पति के लिए व्यंग्य और क्रोध में अथवा ईष्र्या और डाह के कारण जलती हुई उस समय प्रयोग करती थी जब वह उसके प्रति ‘ईमान’ वाला न होकर अन्य महिला पर ‘ईमान’ रखता था। तब वह कहती थी-‘बेईमान कहीं का?’

यह शब्द हिंदू महिलाओं ने भी अपनाया, और पुराने समय की महिलाएं अपने प्रति ईमानदार पति के लिए भी इसे यूं ही प्रयोग कर लिया करती थीं, वे इसके अर्थ को जानती या न जानती हों, पर इसका प्रयोग अवश्य कर लेती थीं। यह भी एक देन है-मुगल काल की भारतीय समाज को।

इस देन का एक इतिहास है, जो हमारे सांस्कृतिक मूल्यों को मिटाने के लिए एक आक्रमण के रूप में यहां देखा जा रहा था। जब यह इतिहास रचा जा रहा था-तब हमारे पूर्वज इसी बात के लिए अपना बलिदान दे रहे थे कि यदि इस आक्रमण का समुचित और यथोचित प्रतिरोध नही किया गया तो अनर्थ हो जाएगा।

हुमायूं का शामियाना और उसकी बेगम की वेदना
बाबर का पुत्र हुमायूं एक बार एक स्थान पर एक बगीचे में ठहरा हुआ था। बगीचे में अनेकों शामियाने उसके हरम के रूप में लगे हुए थे। वह अनेकों महिलाओं के साथ वासना का खेल-खेल रहा था। पर अपनी बेगा बेगम (मुख्य बेगम) का कुशल क्षेम पूछने का उसके पास समय नही था। तब उस बेगम ने जो कुछ कहा-उससे पता चलता है कि कितनी वेदना से वह उस समय निकल रही थी और यह भी कि उसके लिए हुमायूं कितना ‘बेईमान’ था? उसने कहा था-‘‘आप कई दिन से इस बाग में ठहरे हुए हो। एक दिन भी हमारे शामियाने में नही आये। हमारे घर के मार्ग में कांटे नही बोये हैं। आशा है आप हमारे घर भी पधारेंगे और आमोद-प्रमोद का प्रबंध तथा सभा आयोजित कराएंगे। इस दुखिया के प्रति यह उपेक्षा आप कब तक करेंगे? हमारे भी दिल है। आप अन्य स्थानों पर तीन बार पधारे और रात दिन आनंद मनाते रहे हैं।’’ (गुलबदन बेगम : ‘हुमायंू नामा,’ अनु. रिजवी पृष्ठ 521)

युवा पीढ़ी समझे पूर्वजों के बलिदान का अर्थ
वर्तमान भारत की युवा पीढ़ी को समझना होगा कि हमारे पूर्वजों ने अपने बलिदानों को किन मूल्यों की रक्षार्थ यहां जारी रखा था और उनके लिए स्वतंत्रता के गंभीर अर्थ केवल स्वसंस्कृति की रक्षा करने तक सीमित थे।

हुमायूं का पुत्र अकबर
जिस बाबर ने भारत के विषय में अपने पूर्वोल्लिखित विचार व्यक्त किये और जिसके पुत्र हुमायूं का चरित्र इतना पतित और दयनीय था कि उसकी पत्नी ही मारे क्रोध के जली जाती थी-उन्हीं का वंशज अकबर था। जिसे भारत के लिए मुगलवंश की एक अनुपम और अद्वितीय देन के रूप में वर्तमान इतिहास में स्थापित किया गया है। अकबर का जन्म 1542 ई. में एक हिंदू राजा के दुर्ग में अमरकोट में हुआ था। उस समय हुमायूं अपने दुर्दिनों से जूझ रहा था, और वह ईरान की ओर चला गया था, तब अकबर का लालन-पालन उसके चाचा कामरान ने किया था।

जब हुमायूं की मृत्यु हुई तो उस समय अकबर कलानौर (पंजाब) में था, और उसकी अवस्था लगभग सवा तेरह वर्ष की थी। कलानौर में ही एक अल्पव्यस्क बच्चे को हुमायूं का उत्तराधिकारी घोषित कर सिंहासनारूढ़ कर दिया गया था।

अकबर का पालन पोषण
डा. ए.एल. श्रीवास्तव लिखते हैं-‘‘एक को बदलकर दूसरा, इस प्रकार कई शिक्षक नियुक्त किये गये, किंतु वे सभी उसे पढ़ाने में असमर्थ रहे क्योंकि वह तो पढऩे-लिखने की अपेक्षा खेल-कूद की ओर तथा ऊंट, घोड़े, कुत्ते और कबूतर इत्यादि जानवरों के प्रेम में अधिक निमग्न रहता था।’’

अकबर के अशिक्षित होने के दुर्गुण को भी सदगुण के रूप में स्थापित करने का प्रयास करते हुए अबुल फजल ने कहा है-‘‘उसका पवित्र हृदय और पवित्रता कभी बाह्य ज्ञान की ओर उन्मुख नही हुई।’’

इस प्रकार स्पष्ट है कि अकबर पढऩे लिखने से वंचित रहा। यदि वह पढऩे-लिखने में रूचि नही रखता था तो इसका अभिप्राय है कि वह पूर्णत: एक आवारा बच्चा था, जिसका मन ज्ञान-विज्ञान में न लगकर दूसरी सांसारिक बातों में लगता था। उसके अज्ञान को छिपाने के लिए इतिहासकारों ने अपनी बात को सीधे न कहकर कुछ अनावश्यक लाग लपेट करने का प्रयास किया है।

अकबर का राज्यारोहण
14 फरवरी 1556 को अकबर का राज्यारोहण हुआ था। अहमद यादगार ने लिखा है-‘‘बैरम खां ने बहुत बड़ा जलसा किया और एक बहुत बड़ा शामियाना रेशम से सजाया गया। जो ऐसा मालूम होता था कि मानो स्वर्ग में बसंत के प्रारंभ होने पर वाटिका में सुंदर फूल खिले हुए हैं।’’

इस समय अकबर के अल्पव्यस्क होने के कारण उसका संरक्षक बैरम खां को ही बनाया गया था।

जिस समय अकबर को बादशाह घोषित किया गया उस समय यद्यपि उसका पिता हुमायूं भारत में आकर अपने राज्य की बागडोर संभालने में सफल हो गया था, परंतु यह ऐसा समय था जब हिंदू प्रतिरोध के कारण किसी भी सुल्तान या बादशाह के राज्य की सीमाएं कभी भी निश्चित नही रह पाती थीं। अधिकांशत: ऐसा होता था कि सुल्तान या बादशाह किसी स्थान को विजयी कर हटता था और हिंदुओं के द्वारा उसके वहां से हटते ही स्वतंत्रता की घोषणा हो जाती थी।

बाबर के द्वारा निर्मित एक ‘तूफानी राज्य’ को (जो तूफान की भांति जितनी शीघ्रता से बना उतनी ही शीघ्रता से समाप्त भी हो गया था) हुमायूं संभाल नही पाया था। इसलिए बाबर के पश्चात जब हुमायूं ने जुलाई 1555 ई. में पुन: अपना राज्य भारत में स्थापित किया तो उसके द्वारा तो उसके द्वारा पुन: अर्जित इस राज्य की सीमाएं भी अनिश्चित थीं।

वी.ए. स्मिथ का कहना है-‘‘अकबर के राज्याभिषेक के समय भारत में राजनीतिक एकता का अभाव था। उस समय तो उसे किसी अनिश्चित राज्य का स्वामी ही कहा जा सकता था। उसकी छोटी सी सेना का पंजाब के केवल कुछ जिलों पर शिथिल सा अधिकार था, (इसलिए बाबर-हुमायूं और अकबर को उसके राज्याभिषेक के समय तक मुगल सम्राट कहना कितनी निर्मूल धारणा है। यह तथ्य स्मिथ की इस उक्ति से स्पष्ट हो जाता है-लेखक) और दुर्भाग्य से इस सेना पर भी पूर्ण विश्वास नही किया जा सकता था। वास्तविक राज्य में सम्राट बनने के लिए अकबर को अपने आपको राज्य के दूसरे दावेदारों से अधिक बलवान सिद्घ करना था और अपने पिता द्वारा छोड़े गये राज्य को पुन: अधिकार में लाना था।’’

उस समय के भारत में जिन प्रमुख शक्तियों की राजसत्ताएं थीं उनके विषय में अहमद यादगार लिखता है-‘‘आगरा से मालवा तक के देश तथा जौनपुर की सीमाओं पर आदिलशाह का शासन था, दिल्ली से छोटे रोहताश तक का क्षेत्र जो काबुल के मार्ग पर था शाह सिकंदर के हाथों में था तथा पहाडिय़ों के किनारे से गुजरात की सीमा तक इब्राहीम खां का अधिकार था।’’

अकबर की चुनौतियां
इस प्रकार अकबर के लिए राज्यसिंहासन एक चुनौती था। वह ईंटों के चबूतरे को सिंहासन मानकर राजा बना था, जो इस बात का संकेत कर रहा था कि राज्य निर्माण के लिए तो अभी बहुत सी ‘ईंटों’ को सुव्यवस्थित करना पड़ेगा।

भारत के लिए अकबर एक विदेशी शासक था। वह स्वयं भी भारत को अपना देश नही मानता था। उसके विषय में इतिहासकार विन्सेन्ट स्मिथ का कथन है कि-‘‘अकबर भारत में एक विदेशी था। उसकी धमनियों में भारतीय रक्त की एक बूंद भी नही थी।’’

विन्सेन्ट स्मिथ के इस कथन में बल है। यह अलग बात है कि हमें अकबर के विषय में यह बताया जाता है कि वह प्रारंभ से ही भारत के प्रति उदार था और उसने हिंदुओं के प्रति उदारता का व्यवहार किया था।

यह बात विचारणीय है कि जब अकबर राज्यसिंहासन पर आरूढ़ हुआ था तो उस समय उसकी अवस्था मात्र तेरह वर्ष 4 माह थी।

इसके अतिरिक्त ‘राज्य’ नाम की कोई चीज उसके पास नही थी, इसलिए एक अनुभव शून्य और राजनीति के दांव पेंचों से अनभिज्ञ बच्चे से यह आशा करना अनुचित है कि वह पहले दिन से ही भारतीयों के प्रति उदार था। भारत में अपना राज्य स्थापित करने के लिए तथा उस पर शासन करने हेतु अकबर को अनुदार ही होना था, क्योंकि जब हर पल और हर पग पर उसके मनोरथ में व्यवधान पढऩा निश्चित था तो उससे उदारता की अपेक्षा करना अतार्किक है। उदार वह तब तो हो सकता था जबकि भारत में अपने साम्राज्य की स्थापना करने से पूर्व वह यह घोषित करता कि उसका उद्देश्य भारत को भारतीय लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप शासन प्रदान करना है।

अकबर विजय अभियानों पर निकलता और भारत के लोग और भारत के शासक मौन रहकर उसे अपना सम्राट मानते चले जाते, तब अकबर यदि उपकारवश और उन भारतीय राजाओं के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए उनके प्रति उदार होता, तो कहा जा सकता था कि अकबर उदार था। पर ऐसा हुआ ही नही, भारत में भारत के लोगों द्वारा अकबर को चुनौती माना भी गया और उसे चुनौती दी भी गयी।

इसका कारण यह था कि अकबर का पिता और पितामह दोनों ही भारत के लोगों के लिए अपने निंदनीय कृत्यों के कारण घृणा के पात्र थे। इसलिए अकबर से यह अपेक्षा नही की जा सकती थी कि वह अपने पिता और पितामह से अलग जाकर भारतीयों के प्रति कोई उदारता प्रदर्शन करेगा।

स्मिथ का कथन है…..
स्मिथ के ये शब्द ध्यान रखने योग्य हैं-‘‘कलिंग विजय पर हुई दीनावस्था के कारण अशोक को मनस्ताप अनुभव हुआ था उस पर अकबर खुलकर हंसा होगा और उसने अपने पूर्ववर्ती के निर्णय की पूर्ण भत्र्सना की होगी कि अतिक्रमण के लिए की जाने वाली भावी लड़ाईयों से दूर रहा जाए।’’
(संदर्भ : महान मुगल-अकबर)

अकबर के शरीर व रंग रूप का वर्णन
स्मिथ से ही हमें अकबर के शरीर की आकृति, व रंगरूप का ज्ञान होता है। वह लिखता है :-‘‘अकबर एक सामान्य डील-डौल का व्यक्ति था, उसकी ऊंचाई लगभग 5 फीट 7 इंच चौड़ी छाती पतली कमर और लंबे-लंबे हाथ थे। उसके पैर भीतर की ओर झुके हुए थे। चलते समय वह अपने बांये पैर को कुछ घसीटकर चलता था जिसे देखकर लगता था कि वह लंगड़ा है। उसका सिर दांयें कंधे की ओर कुछ झुका हुआ था। नाक कुछ छोटी थी, बीच की हड्डी कुछ उभरी हुई थी। नथुने ऐसे लगते थे मानो क्रोध से फूले हुए हों। मटर के आधे दाने के आकार का एक मस्सा उसके ऊपरी ओंठ को नथुने से जोड़ता था उसका रंग श्यामल था।’’

अकबर शराबी था
अकबर कितना बड़ा शराबी था इसकी जानकारी हमें एक ईसाई पादरी अक्वाबीबा से मिलती है, वह कहता है-‘‘अकबर इतनी अधिक शराब पीने लगा था कि प्राय: (वह दरबार में भी) सो जाया करता था। इसका कारण यही था कि वह कई बार तो ताड़ी पीता था। वह अत्यंत मादक ताड़ की शराब होती थी और कई बार वह पोस्त की शराब पीता था जो उसी प्रकार अफीम में अनेक वस्तुएं मिलाकर बनायी जाती थी।’’

अकबर के पूर्वजों में भी शराब का दुव्र्यसन था
विन्सेन्ट स्मिथ इस विषय में कहता है-‘‘तैमूरलंग के राज परिवार के लिए मद्यपान उसी प्रकार जन्मजात था जिस प्रकार यह अन्य मुस्लिम राजघरानों की नैतिक दुर्बलता थी। बाबर गहरे पियक्कड़ स्वभाव का था। हुमायूं स्वयं को अफीम से धुत रखकर जड़ बुद्घि बन चुका था। अकबर ने अपने आप में इन दोनों अवगुणों को आने दिया। अकबर के दो छोटे लडक़े पुरानी मद्यपानता के कारण मर गये थे और उनका बड़ा भाई अपनी दृढ़ शारीरिक संरचना के कारण बच गया था न कि किसी गुण के कारण।’’

अकबर का चरित्र
अब अकबर के चरित्र के विषय पर आइए। स्मिथ हमें बताता है-‘‘पुनीत ईसाई धर्म प्रचारक अक्वाबीबा ने अकबर को स्त्रियों से उसके कामुक संबंधों के लिए बुरी तरह फटकार लगाने का अत्यंत साहस किया था।’’

अबुल फजल का कहना है-‘‘शहंशाह ने अपने आराम के लिए विशाल चारदीवारी बनायी है, जिसमें अत्यंत भव्य भवन है।
यद्यपि (बादशाह के हरम में) 5000 से अधिक महिलाएं हैँ फिर भी शहंशाह ने उनमें से प्रत्येक को पृथक-पृथक निवास गृह दे रखा है।’’

अबुल फजल ही कहता है-‘‘शहंशाह ने महल के पास ही एक शराब की दुकान स्थापित की है दुकान पर इतनी अधिक वेश्याएं राज्यभर से आकर एकत्र हो गयीं कि उनकी गणना करना भी कठिन कार्य हो गया…दरबारी लोग नचनियों को अपने घर ले जाया करते थे। यदि कोई प्रसिद्घ दरबारी गण किसी असम्भुक्ता को ले जाना चाहता तो उसे शहंशाह की पूर्वानुमति लेनी अवश्य थी।’’

अकबरनामा’ में अबुल फजल ही कहता है-‘‘जब भी कभी बेगमें अथवा उमरावों की पत्नियां या ब्रह्मचारिणियां उपहृत होने की इच्छा करती हैं, तब उनको अपनी इच्छा की सूचना सबसे पहले वासनालय के सेवकों को देनी होती है, और फिर उत्तर की प्रतीक्षा करनी होती है, वहां से उनकी प्रार्थना महल के अधिकारियों के पास भेज दी जाती है। जिसके पश्चात उनमें से उपयुक्तों को हरम में प्रविष्ट होने की अनुमति दे दी जाती है। उच्च वर्ग की महिलाएं वहां एक मास तक रहने की अनुमति प्राप्त कर लेती हैं।’’

अकबर में शासक का एक गुण भी नही था
हमने यहां पर जो कुछ उद्घरण दिये हैं वह केवल अकबर की वास्तविकता को समकालीन लेखकों या अन्य मतावलंबी लेखकों के मतों के अनुसार दिया है। जिन पर अधिक संशय की आवश्यकता नही है। इन उद्घरणों को देने का हमारा उद्देश्य अकबर के विषय में उत्पन्न की गयी उन मिथ्या धारणाओं को निर्मूल सिद्घ करना था, जिनके अनुसार उसे राजाओं में सर्वगुण संपन्न माना जाता है और इस प्रकार दिखाया जाता है कि जैसे अकबर ना होता तो भारत में संभवत: कुछ भी ना होता।

भारत अकबर जैसे गुणों से युक्त किसी शासक को सम्राट नही मानता। भारत में शासक में जिन गुणों की अपेक्षा की गयी है उन पर अकबर कहीं से भी खरा नही उतरता। इसलिए उसे सम्राट की उपाधि भारत ने नही दी, अपितु भारत पर उसे सम्राट के रूप में थोपा गया।

भारत में शासक के गुण
अब देखें भारत में शासक के किन गुणों को अनिवार्य माना गया है?

डा. उदयशंकर पाण्डेय अपनी पुस्तक प्राचीन भारत की राज्य व्यवस्था’ में विभिन्न नीतिकारों, विद्वानों, ग्रंथों और स्मृतियों का उद्घरण दे देकर हमें बताते हैं कि उन सबमें राजा में किन गुणों की आवश्यक माना गया है-

याज्ञवल्क्य : याज्ञवल्क्य ने राजा के गुणों की गणना के क्रम में कहा है कि-राजा को शक्ति संपन्न, दयावान, दानी, दूसरों के कर्मों को जानने वाला, तपस्वी, ज्ञानी एवं अनुभवी लोगों के विचारों को सुनकर निर्णय लेने वाला, मन एवं इंद्रियों को अनुशासित रखने वाला, अच्छे एवं बुरे भाग्य में समान स्वभाव वाला कुलीन, सत्यवादी, मनसा एवं कर्मणा पवित्र, शासन कार्य में दक्ष, शारीरिक, मानसिक एवं बौद्घिक दृष्टि से सबल व्यवहार एवं वाणी में मृदुल आचार्यादि प्रतिपादित वर्णधर्म एवं आश्रमधर्मों का पोषक, अकृत्य कर्मों से अलग रहने वाला, मेधावी, साहसी, गंभीर, गुप्त बातों तथा दूतों के संदेशों एवं अपनी कमी की गोपनीयता की रक्षा करने वाला, शत्रुओं पर दृष्टि रखने वाला, भेदनीति का ज्ञाता, दुर्बलों का रक्षक, तर्कशास्त्र, अर्थशास्त्र एवं शासन शास्त्र में प्रवीण होना चाहिए।

विष्णु स्मृति

विष्णु स्मृति में राजा के लिए कुलीन, धर्मपरायण, प्रसन्नचित, विनोदी स्वभाव वाला, वृद्घों से सम्मान सहित विचार विनिमय करने वाला, सदाचारी, सत्यवादी, वचनबद्घ, कृतज्ञ, विशालचित, उत्साही, अप्रमादी, दृढ़-संकल्पी, स्वानुशासन प्रिय और अच्छे चरित्रवान मंत्रियों का चयन करने वाला होना माना गया है। कौटिल्य के अनुसार राजा को वाग्मी, प्रशल्य स्मरणशक्ति, बलवान, उन्नतमन, संयमी, निपुण, विपत्तिग्रस्त शत्रु पर आक्रमण न करने वाला, किसी के उपकार या अपकार का यथोचित प्रतिकार करने वाला, लज्जावान, दीर्घदर्शी, दूरदर्शी प्रजा को बिना कष्ट दिये कोष बढ़ाने वाला, दूसरों का उपहास न करने वाला, काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईष्र्या, पशुता से दूर रहने वाला, प्रियभाषी, हंसमुख होना चाहिए।

आचार्य भीष्म

आचार्य भीष्म ने शांतिपर्व में अन्य गुणों का वर्णन करने के अतिरिक्त राजा के लिए कहा है कि-वह सत्य का रक्षक, व्यवहार में सरल दूसरों का धन एवं धर्म नष्ट न करने वाला, वेदत्रयी (ज्ञान, कर्म, उपासना) का ज्ञाता, संकरता से बचाने वाला, इत्यादि श्रेष्ठ गुणों से युक्त होना चाहिए।

आचार्य शुक्र

आचार्य शुक्र ने अच्छे राजा के भीतर 8 गुण आवश्यक माने हैं-दुष्ट निग्रह, दान देना, प्रजापालन, राजसूयादि यज्ञ करना, न्यायपूर्वक कोषवृद्घि, कर-वसूलना, शत्रु मानमर्दन, एवं राज्य की सीमा का विस्तार करना।

महात्मा विदुर

विदुर ने राजा के लिए लोकप्रिय होना अति आवश्यक माना है।

इस प्रकार के राजधर्म में जो राजा अपनी प्रजा का हित संवद्र्घक होता है और प्रत्येक प्रकार से राज्य की प्रजा का कल्याण करने में तत्पर रहता है, अध्ययन यजन और दान में निमग्न रहता है, सदा त्यागमय जीवन यापन करना ही उचित समझता है वही राजा उत्तम होता है।

इन सारे गुणों में राजा के लिए व्यसनी, व्यभिचारी, कामी, अनपढ़, अशिक्षित, मद्यपान करने वाला और अपने प्रति निष्ठावान लोगों को ही समय आने पर कठोर दण्ड देने वाला कहीं नही लिखा है। जैसा कि अकबर ने अपने जीवन काल में किया।

अत: अकबर को भारतीय राजनीति शास्त्र के मनीषियों की परिभाषा के अनुसार एक ‘योग्य राजा’ मानना पूर्णत: संदिग्ध है। हम मानते हैं कि जिस समय की चर्चा हम कर रहे हैं, उस समय के कितने ही हिंदू राजाओं का भी चारित्रिक पतन हो चुका था। पर यह ध्यान रखना चाहिए कि राजकीय गुणों की उपेक्षा करने और राजधर्म के निर्वाह में चूक करने या प्रमाद बरतने के कारण ही उनका पतन हुआ था। इसलिए उनके दुर्गुणों का बचाव करना हमारा उद्देश्य नही है। इसका अभिप्राय यह तो कदापि नही कि उनकी दुर्बलता पर अकबर की पशुता को ही ‘सम्राट’ बना दिया जाए, लेखनी के धनी को तो किसी व्यक्ति को इस प्रकार की उपाधियों के देने से अवश्य ही बचना चाहिए।

क्रमश:

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