लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के परिणाम जहां देश की आगामी राजनीति को बदलने की कुव्वत रखते हैं तो इन चुनाव परिणामों के बाद प्रदेश से जुड़े कारपोरेट घरानों के हित भी प्रभावित होना तय है| इस लिहाज़ से देखें तो बदलते सत्ता समीकरणों पर कारपोरेट दिग्गजों की पैनी नज़र टिकी है| कोई मुनाफा कमाना चाहता है तो कोई पुराने केसों की फाईलें बंद करा पुनः प्रदेश में कारपोरेट लॉबी तैयार करना चाहता है| एक दशक से माया-मुलायम राज में जहां कई दिग्गजों की किस्मत चमकी तो कई अर्श से फर्श तक पहुंचा दिए गए| अब जबकि सत्ता का हस्तानांतरण होता दिख रहा है, तब इन घरानों की नज़रें भी आगामी रणनीति तय करने का सपना बुनने लगी हैं| वैसे भी प्रदेश में निवेश करने वाले दिग्गज राजनीति से कभी अछूते नहीं रहे; फिर चाहे वो जे.पी. ग्रुप के गौड़ बंधु हों या ए.डी.ए.जी ग्रुप के मुखिया अनिल अंबानी| वित्तीय क्षेत्र से मीडिया सहित तमाम क्षेत्रों में अपने पैर जमा चुके सुब्रत राय सहारा तथा बजाज हिन्दुस्तान के कुशाग्र; सभी लखनऊ की गद्दी पर पड़ने वाले आगामी प्रभाव का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं|

 

उल्लेखनीय है कि आर्थिक सुधारों के साथ जैसे-जैसे कार्पोरेट्स का बिजनेस दायरा बढ़ा है; वैसे ही राजनीतिक दलों तथा सत्ता के शीर्ष पर काबिज दल के साथ उनका गठजोड़ भी मजबूत होता गया है| केंद्र तथा प्रदेशों में क्षेत्रीय दलों की बढ़ती भूमिका के मद्देनज़र कार्पोरेट्स घरानों का दायरा चुनावी फंडिंग तथा लाम्बिंग से बढ़ते हुए सत्ता समीकरण बनाने तथा बिगाड़ने तक पहुँच गया है| यहाँ यह भी मानना होगा कि राजनीतिक दलों का कुछ ख़ास बिजनेस ग्रुप्स के साथ गठजोड़ बनने लगा है, जिनके लिए ये दल सत्ता में आने पर इनके अनुकूल नीतियाँ तय करने से भी परहेज नहीं करते| टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला सभी के सामने है जिसमें कार्पोरेट्स घरानों ने संयुक्त तौर पर तमिलनाडू की क्षेत्रीय पार्टी द्रमुक को निशाना बनाते हुए पार्टी के नेताओं को चुनाव जिताने से लेकर केंद्र में मंत्री बनवाने तक में अपनी भूमिका साबित की|

 

उत्तरप्रदेश में भी यही हाल है| मुलायम शासनकाल में जहां अनिल अंबानी, सुब्रत राय सहारा, कुशाग्र बजाज जैसे कार्पोरेट्स दिग्गजों की तूती बोलती थी तो माया राज में गौड़ बंधु, पोंटी चड्ढा जैसे दिग्गजों के वारे-न्यारे हुए| मुलायम सरकार के समय गौड़ बंधु के जे.पी. ग्रुप का प्रदेश में राजस्व मुनाफा जहां ६ फ़ीसदी के आसपास था; मायाराज में यह बढ़कर ३३ फ़ीसदी को पार कर गया| एन.सी.आर के सबसे बड़े लैंड डेवलपर का ओहदा पा चुके इस ग्रुप का राज्य में मुख्य निवेश इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में हैं| १६५ कि.मी. लंबा यमुना एक्सप्रेस वे, १०४७ कि.मी. लंबा गंगा एक्सप्रेस वे, फार्मूला वन रेसिंग ट्रैक और ३३०० मेगावाट का बाड़ा थर्मल पावर प्लांट जैसे प्रोजेक्ट्स पर कंपनी का काफी धन लगा है| यदि लखनऊ में सत्ता परिवर्तन होता है तो ग्रुप के राजस्व में कमी आना संभावित है| कुछ ऐसा ही हाल माया के करीबी शराब व्यवसायी पोंटी चड्ढा का है| चड्ढा की कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए माया सरकार ने शराब ठेका नीतियों को ही बदल डाला था ताकि पोंटी की कंपनी शराब व्यवसाय पर कब्ज़ा जमा सके| इससे निश्चित रूप से माया सरकार के हितों की पूर्ति होती| हाल ही में सी.बी.आई ने भी पोंटी चड्ढा के मॉल पर छापेमार कार्रवाई कर बड़ी मात्रा में बेनामी संपत्ति जब्त करने का दावा किया था| यदि लखनऊ का सिंहासन डोलता है तो पोंटी चड्ढा पर लगाम लगना तय है|

 

यह तो बात हुई माया के करीबियों की| अब यदि मुलायम सिंह सत्ता में वापसी करते हैं तो उनके करीबियों के दिन फिरना तय हैं| कभी सपा में नंबर दो की हैसियत से रहे अमर सिंह की वजह से मुलायम के करीब आए अनिल अंबानी ने सपा शासनकाल में प्रदेश में व्यावसायिक हित देखने शुरू कर दिए थे| इस हेतु ग्रुप को पावर प्लांट लगाने के लिए दिल्ली से सटे दादरी में ज़मीन तक मुहैया करवाई गई थी मगर २००७ में मायावती की सरकार ने अनिल अंबानी के सपनों को रौंद डाला| हालांकि अनिल अंबानी की मुसीबतें सपा शासनकाल में ही शुरू हो गई थीं मगर माया सरकार ने उन्हें बढ़ाने का ही काम किया| इसी तरह सहारा ग्रुप को भी मायावती की कृपा नहीं मिल पाई| सपा से नजदीकियों के चलते ग्रुप ने राज्य में ११ टाउनशिप के प्रोजेक्ट का बीड़ा उठाया मगर मायावती ने २७० एकड़ क्षेत्र में फैले सहारा शहर को लखनऊ डेवलपमेंट अथौरिटी का नोटिस भिजवा सहारा के तमाम बड़े प्रोजेक्ट्स पर रोक लगा दी| सहारा श्री अब तक इस झटके से उबर नहीं पाए हैं और बेसब्री से लखनऊ की गद्दी पर सपा की वापसी की राह तक रहे हैं| कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सत्ता समीकरणों ने कार्पोरेट्स दिग्गजों की आँखों को भी सपने देखने का अवसर तो दे ही दिया है| यह तो भविष्य ही बताया कि किसकी किस्मत चमकती है तो किसकी किस्मत में अभी भी अँधेरा लिखा हुआ है|

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