लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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sami chakrapaniराकेश कुमार आर्य

महाभारत में संन्यासी के विषय में कहा गया है कि-‘‘जो युक्त चित्त होकर मोक्षोपयोगी कर्म श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि के द्वारा समय व्यतीत करता हुआ निराधार और रूठे काठ की भांति स्थिर रहता है उसको मोक्षरूप सनातन धर्म प्राप्त होता है।’’

‘‘संन्यासी किसी एक स्थान में आसक्ति न रखे, एक ही ग्राम में न रहे तथा नदी के किसी एक ही किनारे पर सर्वदा शयन न करे। उसे सब प्रकार की आसक्तियों से मुक्त होकर स्वच्छंद विचरना चाहिए।’’

‘‘वह धर्मत: प्राप्त अन्न का ही भोजन करे। कामनापूर्वक कुछ भी न खाये। रास्ता चलते समय वह दो हाथ आगे तक की भूमि पर ही दृष्टि रखे और एक दिन में एक कोस से अधिक न चले।’’

‘‘शीत-उष्ण आदि द्वंद्वों से निर्विकार रहे किसी के आगे गिड़गिड़ाये नही, सांसारिक सुख और परिग्रह से दूर रहे। ममता और अहंकार को त्याग दे, किसी प्राणी के भी आश्रित न रहो।’’

हमारे देश में ऐसे अनेकों ऋषि हुए हैं जिन्होंने संन्यासी की इस जीवन चर्या का कठोरता से पालन किया और समय आने पर राजा को भी पथभ्रष्ट होने से बचाया। उन ऋषियों के चिंतन की पवित्रता, आत्मबल और नैतिक साहस के समक्ष राजसत्ताएं भी हिल जाती थीं। सर्वथा न्यायी और चरित्रबल में अति पवित्र आत्मा के समक्ष कठोर से कठोर व्यक्ति भी ढीला हो जाता है। ऋषि जीवन की कठोर जीवन चर्या और उनके आत्मबल के कारण ही भारतीय समाज ने संन्यासियों को सदा ही सम्मान दिया है। हम यह स्वीकार करते हैं कि आज भी बहुत से संत संन्यासी ऐसे हैं जो अत्यंत श्रद्घा के पात्र हैं। पर कैराना में सपा के शिवपाल सिंह यादव द्वारा जिन पांच संतों को वहां का दौरा करने के लिए भेजा गया है, और उन्होंने जिस प्रकार अपनी रिपोर्ट देकर यह कहा है कि कैराना में कोई साम्प्रदायिक समस्या नही है, वहां कुछ गुण्डों ने समस्या खड़ी की है और उन्हीं के कारण कुछ हिंदू परिवार वहां से पलायन कर गये हैं उसे देखकर तो इनके संतत्व से भी घृणा सी होती है। समझ नही आता कि आखिर क्यों पांच संतों में से एक की भी आत्मा कराहती नही है और सच को सच कहने का साहस नही जुटा पाती है?

हमारे देश में लोकप्रियता प्राप्त करने का सबसे अच्छा ढंग है कि असभ्यता करो और नकारात्मक बातें करते हुए अपने नंगेपन की ओर समाज का ध्यान आकृष्ट करो। कई लोग उल्टे सीधे बयान समाचार पत्रों में देकर रातों रात नेता बन गये। गांधीजी को गाली देकर या किसी अन्य महान व्यक्ति को अपशब्द बोलकर आगे बढ़ गये। इन पांच संतों में से एक चक्रपाणि हैं जो कि उल्टे सीधे और नकारात्मक बयान देकर आगे बढऩे की राह पर चले। इस व्यक्ति ने जानबूझकर यह रास्ता चुना और चुनते चुनते शिवपालसिंह जैसे लोगों के संपर्क में आ गया। हिंदू महासभा की जिस कुर्सी पर कभी वीर सावरकर बैठा करते थे उस पर बैठकर स्वामी चक्रपाणि यह नही समझ पाये कि इस पीठिका की गरिमा क्या है? इसके लिए कितने ऊंचे, निष्पक्ष और पवित्र चिंतन की आवश्यकता होती है। कुछ लोगों ने उनमें स्वामी विवेकानंद के चरित्र का पुट देखा और उन्होंने स्वामी विवेकानंदजी की शैली में फोटो भी खिंचवाये पर फोटो खिंचवाने से काम नही चलता लोगों को तो स्वामी विवेकानंद जैसे उच्च और स्पष्टवादी चिंतन की उनसे अपेक्षा थी। उनका हिंदुत्व दोगला हो गया और धर्म निरपेक्ष तोतों की जमात में पहुंचे चक्रपाणि हिंदुत्व की आत्मा का ही उपहास उड़ाने लगे। इस काम में उन्हें अधिक सहायता ‘प्रमोद कृष्णम’ ने पहुंचायी जो कि गंगा जमुनी संस्कृति के गीतकार हैं। यही वह संस्कृति है जो भारत की आत्मा को खाती जा रही है और ये गीतकार कहे जा रहे हैं कि भारत का निर्माण हो रहा है।

साथ ही आवश्यकता है कि ये संत निर्भीक होकर कैराना की नही सारे देश की रिपोर्ट तैयार करते और उन सामाजिक विसंगतियों पर गहन अध्ययन करते जिनके कारण स्वतंत्र भारत में साम्प्रदायिक समस्या बढ़ी। इन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि कश्मीर से हिंदुओं का पलायन एक साम्प्रदायिक समस्या है, मेवात से हिंदुओं का पलायन एक साम्प्रदायिक समस्या है, मेरठ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उन शहरों में जहां मुस्लिम जनसंख्या अधिक है वहां से एक षडय़ंत्र के अंतर्गत हिंदू को पलायन करने पर विवश किया जा रहा है। यह सब भी साम्प्रदायिक समस्या है। मैं दिल्ली के एक ऐसे प्रतिष्ठित पुस्तक प्रकाशक को जानता हूं जो 1947 में पाकिस्तान से दिल्ली आकर बसे और वहां दरियागंज में अपना पुस्तक प्रकाशन का कार्य आरंभ किया पर मुस्लिमों की संख्या दिल्ली के उस क्षेत्र बढ़ते ही पुस्तक प्रकाशक महोदय को वहां से पलायन करने पर विवश कर दिया गया। उनके साथ नित्यप्रति क्या हेाता था? इसे बताते हुए उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं। इसी प्रकार मेरे पास एक गांव का जाटव भाई आया कि हमारे मौहल्ले में एक मुस्लिम परिवार है जिसका मुखिया हमारे मंदिर में मांस या हड्डी फेंक देता है, पर हम विरोध नही कर पाते। उसका कहना था कि वह मुस्लिम सपा का है। हम उसका प्रतिकार नही कर सकते। नोएडा में रहने वाले एक कश्मीरी प्रोफेसर को भी मैं जानता हूं जिनके कश्मीर पलायन के लिए विवश तो किया ही गया था, साथ ही उनकी जवान बेटी को भी एक वर्ग ने रख लिया था। ये सारे के सारे उदाहरण साम्प्रदायिकता को ही स्पष्ट करते हैं, पर हमारे संतों को इनमें साम्प्रदायिकता नही दिखती।

जिनका धर्म मर जाता है, उनका धर्म ही नाश करता है। जो आत्मा का सौदा करके उसे गिरवी रखकर संत धर्म को बेचने का काम करते हैं वे निश्चय ही भारत के धर्म के हत्यारे हैं। यह ठीक है कि भारत की संस्कृति सर्वसमन्वयी है, पर इसका अभिप्राय केवल यह है कि हर वर्ग दूध में शक्कर की भांति मिलकर रहे, जैसे देश में जैन रहता है, बौद्घ रहता है, सिख रहता है, आर्य समाजी रहता है, वैष्णव रहता है, पारसी रहता है। दूध में ‘नीबू’ की तरह रहने वाले से सर्वसमन्वय काम नही आता पर उसे कुछ लोगा गंगा जमुनी संस्कृति के नाम पर पचाने की सीख देते रहते हैं। ऐसे मूर्खों को कौन बताये कि यह दूध पचने वाला नही है, उल्टे हमें बीमार और करेगा।

यदि कोई संत ‘नीबू’ को शक्कर धर्मग्रहण करा दे और उसे फिर गंगा जमुनी संस्कृति कहे तो कुछ समझ में आ सकता है। क्या इन पांचों संतों को यह बताना पड़ेगा कि यह ‘नीबू’ जहां भी है वहीं दूध को फाड़ रहा है। संत राजनीति में आये यह तो अच्छी बात है पर राजनीति संतों में आ जाए यह बुरी बात है। स्वामी चक्रपाणि प्रसिद्घि के लिए उल्टे सीधे काम करें या बयान दें यह गलत है-पर वह विदुर बन जायें और अंधे धृतराष्ट्र को सच सच बतायें कि ‘महाराज हस्तिनापुर (उत्तर प्रदेश) में जो कुछ भी उपद्रव हो रहा है उसके लिए आपकी नीतियां उत्तरदायी हैं।’ पर जो व्यक्ति विवेकानंद बनने चला था और बन गया ‘सैक्युलर’ उससे यह अपेक्षा नही की जा सकती कि वह विदुर जैसे महात्मापन का प्रदर्शन कर पाएगा। देश की विघटनकारी शक्तियों के सामने इस प्रकार का तुष्टिकरण वाला खेल संतों की ओर से होना सचमुच निराशाजनक है और यह प्रवृत्ति भविष्य के लिए एक खतरे का संकेत भी है। भविष्य में हम संतों का राजनीतिकरण होते देखेंगे जिससे समस्याओं पर इनके विचार किसी पूर्वाग्रह से बंधे हुए दिखायी दिया करें तो उन पर कोई आश्चर्य नही होना चाहिए। अभी तक तो संत का अभिप्राय इस देश में यही माना जाता था कि ये लोग बिना लाग लपेट के सत्य और न्याय पर आधारित धर्माचरण को स्थापित करने वाले आप्त वचन बोलेंगे और वैसा ही करेंगे। इनसे किसी प्रकार के दोगलेपन की अपेक्षा नही थी, पर चक्रपाणि और उनके आका ‘प्रमोद कृष्णम्’ ने इस धारणा को बदल दिया है।

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