लेखक परिचय

सुनील अमर

सुनील अमर

लगभग 20 साल तक कई पत्र-पत्रिकाओं में नौकरी करने के बाद पिछले कुछ वर्षों से स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन| कृषि, शिक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा महिला सशक्तिकरण व राजनीतिक विश्लेषण जैसे विषयों से लगाव|लोकमत, राष्ट्रीय सहारा, हरिभूमि, स्वतंत्र वार्ता, इकोनोमिक टाईम्स,ट्रिब्यून,जनमोर्चा जैसे कई अख़बारों व पत्रिकाओं तथा दो फीचर एजेंसियों के लिए नियमित लेखन| दूरदर्शन और आकाशवाणी पर भी वार्ताएं प्रसारित|

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सुनील अमर

आदरणीय सुधीश पचौरी जी,

जितनी मेरी उम्र है, उससे कहीं ज्यादा आपको लिखने का तजुर्बा है, इसलिए आपके लिखे पर सवाल उठाने की धृष्टता से पहले मैं आपसे क्षमा मांग लेता हॅूं। कई स्थितियां हो सकती हैं, मसलन – मेरे आपके बीच पीढ़ी का अंतराल, योग्यता और अनुभव की मेरी कमी, देश के किसी कोने-अतरे में रहने वाला मैं और शासन-सत्ता के चरम बिंदु यानी दिल्ली के रहवासी आप। गाँव व जल-जंगल-जमीन से जुड़ा मैं और ठंढ़ी-दूधिया रोशनी की चमकदार फिसलन पर भी शातिराना ढ़ॅंग से तेज-धीम चल सकने वाले नागर समाज के एक आधार स्तम्भ आप। इसलिए हो सकता है कि आपके लिखे का मर्म और मंतव्य मेरी संकरी सोच में समा ही न सका हो। यह भी हो सकता है कि वरिष्ठता के चरम पर सिर्फ सूत्र रुप में बोलने और लिखने के आदी हो चले महापुरुषों की तरह आप भी मेरे लिखे को पढ़ने योग्य ही न समझें। फिर भी अगर मैं कुछ कहने-लिखने का हौसला कर रहा हॅूं तो यह सिर्फ इस विश्वास पर कि सुख की तो कई भाषाऐं और लिखावटें हो सकती हैं पचौरी जी लेकिन सारी दुनिया में दुःख की इबारत हमेशा एक जैसी होती है। अपने एक लेख द्वारा आपने मुझे और मेरे जैसे उन करोड़ों लोगों को दुःखी कर दिया है जो दुर्भाग्यवश खेती-किसानी से अपनी आजीविका चलाते हैं और आप जैसे भाषा-शिल्पी उन्हें किसान कहते हैं! तो मेरे आलेख को तो नहीं, लेकिन मेरे दुःख को आप चाहें तो महसूस कर सकते हैं।

देश के एक हिन्दी दैनिक में आप रविवारीय स्तम्भ लिखते हैं। लिखते तो बहुत में हैं आप लेकिन मैंने पढ़ा वहीं। इसलिए उसी का खास जिक्र कर रहा हूँ । आपके लेख का उपसंहार ही मेरे इस आपत्ति पत्र की प्रस्तावना है। तथाकथित विकास की मायावी आंकड़ेबाजी को अगर जरा किनारे कर दें तो आज भी इस देश की 70 प्रतिशत जनता गांवों में ही बसती है और इसी गरज से इसे किसान और गाॅवों का देश कहा जाता है। आप को बहुत अफसोस है कि आज का किसान प्रेमचंद युगीन होरी सरीखा न रहकर ‘‘हरित क्रांति के बाद का ” बाजारी किसान’’ हो गया है! यहाँ जगह तो ख्वाह-म-ख्वाह घिरेगी लेकिन आप के लिखे हुए कुछ अंशों का उद्धरण देना जरुरी है -‘‘…..नये किसानों को आपातकाल से पहले वाला नोयडा चाहिए। बसाये शहर उजाड़कर आप उसकी जमीन लौटाइए या उसके नये मांगे दाम दीजिए। उसे वे सब शहर चाहिए जिनके नीचे उसके पुरखों की जमीन दबी है। उसे पूरा नोयडा चाहिए। उसे दिल्ली चाहिए, उसे रायसीना की पुरानी पहाड़ी चाहिए। …….नये बाजारी किसान की इस अति पर न मीडिया विचार करता है, न विद्वान विचार करते हैं। कारण कि उनके लिए किसान अब तक प्रेमचंद के गोदान का होरी है। ‘‘दो बीघा जमीन’’ का दयनीय किसान है।’’ ….और भी काफी विष वमन किया है आपने किसान पर कि वह सौदा करना जानता है, वह इंजेक्शन लगाकर अधिक दूध काढ़ने वाला है। अधिक मुनाफा कमाने वाला है, सब्जी में रंग लगाकर सबके स्वास्थ्य से खेलने वाला है और दूध में यूरिया मिलाकर बेचने वाला भी है, आदि-आदि।

ये ‘बाजारी किसान’ क्या होता है पचौरी जी? और क्या किसान को बाजारी नहीं होना चाहिए? किसान की बाजार आप जैसे ‘शीत-ताप नियंत्रित’ लोगों के ही हाथ में रहे तभी ठीक रहेगा ताकि खेतों में हांड-मांस तो वो गलाए, प्राकृतिक आपदाऐं वो झेले और कीमत आप तय करें? किसान आज भी अगर बाजार के रहमोकरम पर है तो वह आप जैसे दुरभिसंधिकर्ताओं के कारण ही। क्या आपकी जानकारी में है कि बीते दो साल में देश में मॅहगाई के कारण पचासों लाख करोड़ रुपया इसी बाजार की जेब में चला गया है। यह न तो किसान की जेब में गया है और न सरकार की तिजोरी में, और इसी बाजार को किसानों से बचाने की आपकी यह वकालत! यह आपकी वही मानसिकता है कि कार मंहगी हो तो कोई बात नहीं, हवाई यात्रा मंहगी हो तो कोई फिक्र नहीं लेकिन अगर चावल या गेंहूँ एक रुपया किलो मंहगा हो जाय तो आप जैसों को लगता है कि किसान डाकू हो गया है !

आपने तो अपने इस एक लेख से ही किसानों के प्रति अपनी सदियों की चिढ़, घृणा और कुत्सित सोच का खुलासा कर दिया। कितने छुपे रुस्तम हैं आप कि जिस किसान के पसीने से पैदा हुए अनाज को खाकर आपने स्वयं को वेदव्यास के आसन पर आसीन कर लिया, उसी किसान की खुशहाली के विरुद्ध ऐसी षडयंत्रपूर्ण सोच? असल में मठाधीशी का खास ऐब ही यही है कि अपने बुद्धि-विवेक के आगे बाकी सारी दुनिया मूर्ख लगने लगती है। विनम्रतापूर्वक आपसे पूछना चाहता हॅूं कि लिखने के धंधे में आने के बाद से क्या आप कभी किसी ऐसे गाँव में गये हैं जो दिल्ली से 100-200 किमी दूर कहीं कोने अतरे में हो? या नोएडा, ग्रेटर नोयडा और गुड़गाँव के राक्षसी विस्तार द्वारा अपने जहरीले उदर में समाहित कर लिए गए गांवों को ही आप गाँव समझकर अपनी कुत्सित धारणा बना लिए हैं?

आपने सरकारी दूरदर्शन की बात की है कि एक समय में, यानी निश्चित ही आप 80 के दशक की बात कर रहे होंगें, दूरदर्शन के संवाददाता गांवों में जाते थे, किसानों के पास जाते थे। दूरदर्शन का जन्म आपने किसानों के लिए ही हुआ बताया है और बहुत अफसोस प्रकट किया है कि अब दूरदर्शन पर खेती-किसानी की बातें नहीं होती। आप मीडिया पर खूब लिखते हैं लेकिन आश्चर्य यह जानकर हुआ कि आप मीडिया को देखे-पढ़े बिना ही ऐसा करते हैं! आपको पता ही नहीं है कि दूरदर्शन के केन्द्रीय चैनल के अलावा क्षेत्रीय चैनल भी खेती-किसानी का प्रसारण अब अपने-अपने क्षेत्रों में करने लगे हैं। लेकिन आप कैसे जानेंगे इसे! आप तो दिल्ली में रहते हैं और इस मत के लगते हैं कि जो दिल्ली का आप जैसा विद्वान जाने वही सर्वकालिक सच होता है!

किसान अगर इंजेक्शन लगाकर ज्यादा दूध काढ़ रहा है और रंग लगाकर सब्जियों को हरा बना रहा है तो उसने गाँव में यह सब खोज करने की क्या कोई प्रयोगशाला खोल रखी है? आपके शहरों से ही तो आती हैं ये सब जानकारियाँ और अभिप्रेरण उसके पास। चर्चा हो रही है तो आप जान ही लीजिए कि गाँव से कई गुना ज्यादा दूध की खपत शहरों में है। गांवों में तो दूध इस्तेमाल करने की आर्थिक स्थिति ही नहीं है अधिकांश की। आप जानिए कि गरीबी का आलम यह है कि अगर किसी की गाय-भैंस दो-चार लीटर दूध देती भी है तो चार पैसे के लालच में वह सब का सब दूध बेच देता है! क्यों नहीं लगाते आप जैसे लोग अपनी लिप्साओं पर लगाम? आप को तो हर हाल में दूध चाहिए और वह सूई लगाकर निकले या यूरिया और वाशिंग पावडर से बनाकर, यह आप सरीखे बुद्धिजीवी ही उसे सिखाते हैं। किसान को अपनी ‘धात्री जमीन’ के बदले ‘धात्री धन’ चाहिए। जिसे किसानों की जमीन हर हाल में चाहिए वो करें उसकी व्यवस्था। आपको अफसोस हैं कि इस नये बाजारी किसान की ‘अति’ पर मीडिया विचार नहीं कर रहा है। मैं आपसे जानना चाहता हॅू कि आपके यह उत्कट विचार किस रास्ते से आये हैं? क्या यह मीडिया नहीं है? या आप किसानों के विरुद्ध मीडिया को कोई आन्दोलन खड़ा करने को उकसा रहे हैं?

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2 Comments on "’……..फिर भी किसान अन्नदाता है पचौरी जी ! ”"

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sandhya
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में आपके विचारो से शत प्रतिशत सहमत हु .भारतीय किसान की हर राज्य में लगभग यही स्तिथी हे .वह कर्ज़ में डूबा हुआ आत्महत्या करने के लिए मजबूर हे.पर ये उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर उनसे जमीन ले कर उसका मुवाज़ा भी नहीं देते हे .अपने पद का फायदा उठाकर उन्हें डराते हे. हमारे कर्णाटक राज्ये में रोज़ किसान न्याए के लिए दर दर भटक रहा हे . पर क्या सत्ता पक्ष क्या विपक्ष कोई नहीं सुनता हे.जब जमीने खा ली होंगी आनाज का एक दाना न होगा तब शायद सब इनका मोल जानेगे.

santosh kumar
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सर मैं गाँव की एक कहावत कह देता हूँ ,..भैंसी नौ नौ लागे- मट्ठा मांग मांग पियें …. ये है किसान की हालत ,….सदर आभार

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