लेखक परिचय

शंकर शरण

शंकर शरण

मूलत: जमालपुर, बिहार के रहनेवाले। डॉक्टरेट तक की शिक्षा। राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर अग्रलेख प्रकाशित होते रहते हैं। 'मार्क्सवाद और भारतीय इतिहास लेखन' जैसी गंभीर पुस्‍तक लिखकर बौद्धिक जगत में हलचल मचाने वाले शंकर जी की लगभग दर्जन भर पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

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the-gandhi_familyअभिनेता ऋषि कपूर ने देश में महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थानों को नेहरू परिवार के नाम से बाँधने के अन्याय पर ऊँगली उठाई है। सारी जगहों को नेहरू, इंदिरा, राजीव, आदि मय कर देने पर उन का सवाल हैः इस देश को ‘बाप का माल समझ रखा था?’ देश की स्मृति पर ऐसे पारिवारिक कब्जे पर पहले भी आवाज उठी है। कार्टूनिस्ट लक्ष्मण का एक कार्टून था, जिस में राहगीर किसी से रास्ता पूछता है। उत्तर मिलाः ‘सामने राजीव भवन से दाएं राजीव मार्ग पर चले जाओ। थोड़ा बढ़ने पर राजीव चौराहा आएगा, वहाँ से बाएं राजीव अस्पताल है, उसके बगल वाली सड़क से कुछ दूर जाने पर राजीव स्टेडियम के साथ वह ऑफिस …’ । यहाँ जोड़ने की जरूरत नहीं कि राजीव गाँधी का नाम हर जगह स्थापित करने की प्रवृत्ति नेहरू परिवार के कई लोगों के लिए यथावत रही है। मगर, देश के सर्वोच्च न्यायाधीश इस दलीय जबरदस्ती और शर्मनाक अन्याय की अनदेखी क्या सोच कर करते रहे? इस पर न्यायपालिका की चुप्पी विशेष दुःखद है, जो मामूली मुद्दों पर भी खुद सक्रिय होती रहती है। लेकिन उसे इस एकाधिकारी नामकरण, दलीय जबरदस्ती और इससे हुई राष्ट्रीय हानियों की कोई समझ नहीं।

कांग्रेसी शासन में कोई महीना नहीं बीतता, जब किसी न किसी सड़क, पुल, संगठन, भवन या कार्यक्रम को नेहरू-गाँधी नाम से कब्जाया न जाता हो। एक आकलन के अनुसार, केवल 1991 से 2013 के बीच, यानी मात्र बीस वर्षों में 450 से अधिक केंद्रीय और प्रांतीय योजनाओं, कार्यक्रमों, सड़कों, पुलों, भवनों, रंगशालाओं, संस्थानों, हवाई अड्डों, बस टर्मिनलों, आदि के नाम केवल इंदिरा, राजीव, नेहरू पर रखे गए। यदि इसमें महात्मा गाँधी, संजय और सोनिया के नाम भी जोड़ लें, तथा पिछले साठ वर्ष का हिसाब जोड़ें – तो यह संख्या हजार पार कर सकती है। उन की पूरी सूची बनाना एक असंभव-सा कार्य है। यह क्या और किस सिद्धांत पर होता रहा है?

केवल दिल्ली में एक नेहरू के नाम पर भवन, सड़क, चौराहा, पार्क, पुरस्कार, अवार्ड, अकादमी, विश्वविद्यालय, कॉलेज, पुस्तकालय, सभागार, स्टेडियम, उद्यान, कॉलोनी, उत्सव, परियोजनाएं, आदि की संख्या सौ को पार कर सकती है। एक ही नगर में कई ‘नेहरू भवन’ हैं।

यह राष्ट्रीय स्मृति बनाने का कौन सा मॉडल है? भारतीय तो यह कदापि नहीं। यहाँ देवी-देवताओं के सिवा किसी को पूजनीय, स्मरणीय, आख्यनीय, चित्रणीय या रचनीय कभी नहीं माना गया। मुगलों से पहले भारत में कभी किसी के पोर्ट्रेट तक नहीं बनते थे। यहाँ चक्रवर्ती सम्राटों या महानतम मनीषियों तक की कोई आकृति या आख्यान कहीं नहीं सहेजे गए। कोणार्क, अजंता, मदुराई जैसी महान कलाकृतियाँ गढ़ने वाले कलाकारों अथवा उन्हें बनवाने वालों के विवरण तक नहीं मिलते। उन की विरुदावली गाना तो दूर रहा!

क्योंकि हिन्दू पंरपरा ऐसे कार्य – मरणशील मनुष्य की छवि, नाम, आदि याद रखना – निरर्थक मानती है। भारत में मनुष्यों के नाम तक सदैव देवी-देवताओं के स्मरण, प्रसाद, दास, चरण, कुमार आदि रूप में रखे जाते रहे हैं। अतः स्थानों, भवनों के नाम साधारण नेताओं के नाम पर रखकर उन्हें ‘अमर’ बनाने का धंधा भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है। चौराहों पर प्रशासकों की मूर्तियाँ लगना या उन से नामकरण, आदि कार्य ब्रिटिश काल में शुरू हुए हैं।

तब क्या सार्वजनिक नामकरण में यह गाँधी, नेहरू, इंदिरा, राजीव की सनक यूरोपीय परंपरा है? जी नहीं। यूरोप-अमेरिका में महानतम नेताओं के नाम पर भी दो-चार चीज मिल जाए तो बहुत। दरअसल, इसी में गरिमा भी है। पश्चिमी देशों में वाशिंगटन, नेपोलियन, पीटर, बिस्मार्क, गैरीबाल्डी या चर्चिल जैसे महान राजनेताओं के भी इने-गिने ही स्मारक हैं।

अतः यहाँ जो लज्जास्पद नेहरू-गाँधी पूजा है, उस के पीछे न यूरोपीय अनुकरण, न कोई कृतज्ञता-ज्ञापन है। उस का उद्देश्य हर पत्रकार या राजनीतिक कार्यकर्ता जानता है। केवल हमारे न्यायाधीश नहीं जानते! या केवल इसी को कार्यपालिका का काम समझ कर कभी हस्तक्षेप नहीं करते। दूसरी ओर, गैर-कांग्रेसी दल विरोध के बजाए इसी का अंधानुकरण करने की कोशिश में लग गए। जब और जितना मौका मिला, वे अपने नेताओं के नाम भवनों, सड़कों, विश्वविद्यालयों, आदि को देने लगते हैं।

मगर ध्यान दें, सैकड़ों बार एक ही नामकरण करना दिमागी दिवालियापन, सुरुचि का अभाव तथा आत्मसम्मान-हीनता है। ऐसी व्यक्ति-पूजा केवल कम्युनिस्ट देशों से तुलनीय है। पूर्व सोवियत संघ या लाल चीन में लेनिन, स्तालिन, माओ नाम से हजारों भवन, सड़क, चौराहे, शहर आदि नामित हुए। उसी नकल में यहाँ नेहरू, राजीव आदि के जन्म-दिन, मरण-दिन पर अखबारों में उन की तस्वीर छापने और पार्टी प्रचार करने में सरकारी करोड़ों रूपया बर्बाद किया जाता है। वही काम भाजपाई शासक अपने नेताओं के लिए करने लगे। यह सब किसी गैर-कम्युनिस्ट देश में नहीं होता। राजकीय धन से लोगों पर जबरन किसी पार्टी नेता की ‘महानता’ थोपना एक कम्युनिस्ट बीमारी है।

स्वतंत्र भारत का शासन-तंत्र ब्रिटिश अनुकरण है। पर नेहरू जी के कम्युनिज्म-मोह के कारण इस की आत्मा सोवियत तौर-तरीकों की गुलाम हो गई। उसी से हमारी शिक्षा और बौद्धिकता भी संक्रमित हुई। इस मानसिक रोग पर हमारा ध्यान नहीं गया है। आखिर जिस चश्मे से हमारी दृष्टि प्रभावित है, उसी का दोष हमें कैसे दिखे!

हमारी शिक्षा एवं नीति-निर्माण में नेहरूवाद बहुत गहरे जमा हुआ है। भाजपा भी उसी ढर्रे पर चलती है। नेहरू को अटल बिहारी वाजपेई अपना आदर्श मानते थे, इस में बहुत गहरा अर्थ है। हर मामले में योग्यता को दरकिनार कर ‘अपने’ आदमी समितियों में रखना ब्रिटिश नहीं, सोवियत परंपरा है। सभी भवनों, योजनाओं के नाम पार्टी-परिवार पर रखना वही मानसिक दासता और राजनीतिक तकनीक है जो कम्युनिस्ट देशों का नियम था। वह नामकरण तक सीमित न था। जीवन का हरेक पक्ष नेताओं की अंध-भक्ति को समर्पित था। दर्शन, इतिहास, अंतरिक्ष विज्ञान अथवा खेल-कूद, सिनेमा – कहीं भी लेनिन, स्तालिन या माओ के उद्धरणों के ‘मार्गदर्शन’ बिना कोई कार्य संभव न था। वही दासता यहाँ गाँधी-नेहरू की रही है। भारतीय बुद्धिजीवियों का ‘प्रगतिवाद’ उसी का दूसरा नाम है। जो काम उधर कम्युनिस्ट कमिसार करते थे, वह यहाँ कांग्रेस नेता और उस के अनुचर अफसर, प्रोफेसर, पत्रकार करते रहे। यह परंपरा स्वयं नेहरूजी के शासन काल में आरंभ होकर पूरी ठसक से स्थापित की गई।

यहाँ मार्क्सवादी-नेहरूवादी प्रगतिवाद की विष-बेल स्वतः नहीं फली-फूली। उसे सप्रयास फैलाया और मूल भारतीय परंपरा को नष्ट किया गया। यह इतनी हालिया बात है कि प्रमाणिक देखी जा सकती है। नापसंद विद्वानों, पत्रकारों को ब्लैक-लिस्ट करना और विश्वस्त अनुचरों को बढ़ाना, पुरस्कृत करना – यह प्रवृत्ति नेहरूजी ने आरंभ की। यह सोवियत कम्युनिज्म का ही भारतीय रूप था। स्वतंत्र विचार के लेखकों, विशेषकर हिन्दू चेतना को प्रताड़ित करना; वैसे लेखन को लांछित करना, जैसे घातक कार्य तभी शुरू हुए थे।

नेहरू युग में ही सत्ता के दुरूपयोग, सेंशरशिप, प्रलोभन-प्रोत्साहन तथा अवैध-अनैतिक दमन से यहाँ कम्युनिज्म के बारे में आलोचनात्मक विमर्श को रोका गया। उदाहरण के लिए, 1950 के दशक में ही राम स्वरूप और सीताराम गोयल के ‘प्राची प्रकाशन’ (कलकत्ता) तथा उन के वैचारिक प्रयासों को सत्ता की जोर-जबरदस्ती से ध्वस्त किया गया। वैसी कुटिल तकनीकों से ही ‘प्रगतिवाद’ भारत के बौद्धिक जीवन को अपने अधीन कर सका।

नेहरूवाद केवल नामकरण की बीमारी नहीं है। बल्कि उस बीमारी का एक रूप भर है, जिस में स्वतंत्र चिंतन और भारतीय सभ्यता की विरासत को बेदखल कर दिया गया। इस के बदले बौने लोगों, क्षुद्र विचारों की पूजा चलाई गई। स्वतंत्र भारत में अनेक ऊट-पटांग, हानिकारक शैक्षिक, राजनीतिक कामों का मूल उसी बीमारी में है। इस ने हमें मानसिक रूप से कुंद बनाए रखा है। हर सार्वजनिक कार्यक्रम या स्थान के नामकरण में नेहरू, गाँधी का उपयोग सकारी धन से दलीय प्रचार तो है ही। साथ ही, यह हमारी मानसिक जड़ता और आत्मसम्मान-हीनता भी दर्शाता है।

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3 Comments on "‘बाप का माल’ में ही नेहरू-गांधी के नाम!"

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इंसान
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वृद्धावस्था में जाने क्यों कांग्रेस का ध्यान आते उसके लिए तीव्र भर्त्सना में मन विचलित हो उठता है कि फिरंगी भारतीय उप महाद्वीप के मूल निवासियों को छूए बिना राजे-रजवाड़ों के माध्यम से सैकड़ों वर्ष राज करते रहे लेकिन तथाकथित स्वतंत्रता के पश्चात कांग्रेस ने तो भारतीय नागरिकों के तन के कपड़े तक बिकवा दिए| बाप का माल होता तो कोई अपने लिए संभाल कर रखता लेकिन देश में तो “सर्व सृष्टि” ही कांग्रेस का माल रही है! सर्वोच्च न्यायाधीश व नौकरशाह और उनके अधीन हाथ-जोड़ कर काम करते लोग उसी सृष्टि में से हैं| भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों एवं… Read more »
बिनय यादव
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बिनय यादव

थोथा चना बाजे घणा. सोनिया और राहुल द्वारा नेहरू, इंदिरा और राजीव का नाम भुनाने के चक्कर में लोगो के मन में वितृषणा पैदा कर दी. वैसे इंदिरा गांधी एक बेहतरीन प्रधान मंत्री थी.

रघुवीर जैफ ,जयपुर
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रघुवीर जैफ ,जयपुर

सचाई यह है कि जो सत्ता में होता है वो अपनी माफिक चहेतों के नाम पर ही सरकारी इमारतों और सडकों का नामाकिंत कर रहे है |उदाहरण :आज हर जगह अटल बिहारी बाजपाई के नाम हो रहा है ,राजस्थान के दौसा में हर जगह नवल किशोर शर्मा के नाम पर सरकारी इमारते है, साहित्यों और सिनेमाओ में “शर्मा ,तिवारी ,चोबे आदि के सरनामे होते है | ये क्या है ? अत : बवाल करना मानसिक सोच पर निर्भर है |

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