लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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-मनमोहन कुमार आर्य-

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कुछ दिन पूर्व हम वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून में सत्संग में बैठे हुए आर्य विद्वान श्री उमेश चन्द्र कुलश्रेष्ठ जी का ईश्वर द्वारा चार आदि ऋ़षियों को वेद ज्ञान प्रदान करने का वर्णन सुन रहे थे। इसी बीच हमारे मन में अचानक एक विचार आया। हम सुनते व पढ़ते आयें हैं कि यह ऋषि सबसे अधिक पवित्र आत्मा थे। सृष्टि उत्पत्ति होने पर यह आत्मायें मोक्ष से सीधी इस पृथिवी लोक पर आईं थीं और परमात्मा ने इनको अमैथुनी सृष्टि में जन्म दिया था। अतः मन में यह विचार आया कि मोक्ष में तो इन्हें ईश्वर का सान्निध्य और वेदों का ज्ञान भी सुलभ रहा ही होगा। इसका कारण यह है कि मोक्ष में जीवात्मा जो भी इच्छा करती है वह ईश्वर की कृपा से तत्काल पूरी हो जाती है। फिर उनके सृष्टि के आरम्भ में जन्म लेने पर वह सारा ज्ञान अचानक समाप्त हो गया और परमात्मा को उन्हें पुनः ज्ञान देना पड़ा, इस पर हमें यह शंका हुई। हमें लगा कि मोक्ष से आने वाली आत्माओं को तो वेदों का ज्ञान पहले से ही होना चाहिये क्योंकि वहां तो वह आनन्द की स्थिति में रहते हैं। आनन्द ज्ञान में है और अज्ञान में दुःख ही दुःख होता है। मोक्ष भी विद्यामृतमश्नुते के अनुसार वेदों के ज्ञान व तदनुसार आचरण से ही मिलता है। हमें लगा कि इस प्रश्न व इसके कुछ पहलुओं पर विचार किया जाना उचित है। हमने उन विद्वान वक्ता से भी अपने मन की इन बातों को बताया और उन्होंने कहा कि मोक्ष की अवस्था में जीवात्माओं को वेदों का ज्ञान नहीं होता। बाद में हमने भी विचार किया तो विदित हुआ कि उन्हें 36000 कल्प पूर्व जब मोक्ष हुआ होगा, उसके बाद मोक्ष की अवधि में वेदज्ञान की आवश्यकता ही नहीं होगी। दर्शन पढ़ने से यह ज्ञात होता है कि मोक्ष की शर्त है कि साधक में विवेक ज्ञान का उत्पन्न हो। इसके लिए जीवात्मा को ईश्वर के साक्षात्कार की आवश्यकता होती है जो कि समाधि अवस्था में होता है। असम्प्रज्ञात समाधि में जीवात्मा को ईश्वर का प्रत्यक्ष होता है और जीवात्मा अपने अस्तित्व को विस्मरण कर ईश्वर के स्वरूप में निमग्न होता है। अपने अस्तित्व को असम्प्रज्ञात समाधि में जीवात्मा भूल जाता है। यह समाधि ही मनुष्य जीवन की सफलता की अन्तिम सीढ़ी है। इसके बाद मनुष्य को अन्य किसी साधना की आवश्यकता नहीं पड़ती। शेष जीवन में इसी प्रकार समाधि को प्राप्त होकर ईश्वर का साक्षात् करना और निष्काम कर्म करना ही उद्देश्य रहता है। इससे उसके बचे हुए अभुक्त कर्म दग्धबीज हो जाते हैं। मृत्यु आने पर समाधि प्राप्त विवेकी मनुष्य की मुक्ति हो जाती है। उदाहरण के रूप में हमें महर्षि दयानन्द का उदाहरण विदित है। हो सकता है कि आचार्य चाणक्य को भी यह स्थिति प्राप्त हुई हो। वह भी धर्म ज्ञानी थे। ईश्वर व वेदभक्त थे। स्वाभाविक है कि वह सन्ध्या व योग की सभी क्रियायें अवश्य करते होंगे। इसी कारण उन्होंने देश हित में अपने समय में अपूर्व कार्य किया था। महर्षि दयानन्द जी ने भी उनके अनुरूप ही किया है। चाणक्य कौटील्य का कार्य वैदिक धर्म व संस्कृति की स्थापना सहित मातृभूमि के शत्रुओं का विरोध व उनकी अवनति एवं सुदृण, सशक्त व संगठित स्वदेशी राज्य की स्थापना था। ऐसा व्यक्ति विषयों में अलिप्त या निर्लिप्त ही रहता है और उसके सम्मुख ईश्वर की आज्ञा व कर्तव्य ही प्रमुख होता है। इतने ज्ञानी होने पर भी उन्होंने किसी कर्म व कर्तव्य की उपेक्षा नहीं की और अन्तिम समय तक वह कर्मशील रहे। यही कर्मयोग वा सच्चा अध्यात्मवाद है जिसमें अविद्या व विद्या अर्थात् कर्म व ज्ञान का भलीभांति समन्वय हो। उनके योगदान से ही आज हम स्वतन्त्रता की श्वांस ले रहे हैं अन्यथा आज हमारा धर्म व संस्कृति जीवित होते या न होते, कहा नहीं जा सकता।

 

हमारा विचार व चिन्तन यहां आकर टिकता है कि अमैथुनी सृष्टि में इन चार ऋषियों के जन्म से कुछ ही समय पूर्व यह आत्मायें मोक्ष का आनन्द भोग रही थी। अब कुछ अवस्था परिवर्तन अर्थात् पृथिवी पर आदि सृष्टि में जन्म लेकर क्या इन्हें पूर्व ज्ञान की विस्मृति हो गई थी? हमें यह भी लगता है कि मृत्यु के बाद वा मोक्ष के बाद जन्म लेते हुए जीवात्मा को अपना पूर्व ज्ञान प्रायः विस्मृत ही हो जाता है। यदि कुछ स्मृति हो भी हो, तब भी परमात्मा द्वारा ज्ञान दिया जाना आवश्यक एवं उचित ही है, अन्यथा भ्रान्तियां रहेंगी। ऐसा लगता है कि इन चारों आत्माओं के आदि सृष्टि में जन्म लेने पर मोक्ष के आनन्द व स्थितियों का पूरा ज्ञान स्मरण नहीं रहा होगा। अतः इनकी पात्रता को जानते हुए परमात्मा इन्हें अन्तर्यामी स्वरूप से इन चारों ऋषियों को एक-एक वेद का ज्ञान देता है। यह चारों ऋषि ब्रह्माजी को एक-एक वेद का ज्ञान कराते हैं और इस प्रकार ब्रह्मा जी चारों वेदों के ज्ञान से सम्पन्न हो जाते हैं। यहां हमें लगता है कि यह चारों ऋषि भी चारों वेदों के ज्ञान से ब्रह्माजी की ही तरह व एक साथ ज्ञान सम्पन्न हुए थे। कारण यह है कि जब यह चारों ऋषियों ने एक एक करके ब्रह्माजी को एक एक वेद का ज्ञान दिया व समझाया होगा तो वहां साथ में उपस्थित अन्य तीन ऋषियों ने भी ब्रह्माजी के साथ अन्य तीन वेदों का ज्ञान प्राप्त व धारण कर लिया होगा। हमें यह ज्ञान व मान्यता निभ्र्रान्त लगती है। हम आर्यसमाज के विद्वानों को अपने विचार सूचित करने का अनुरोध करते हैं।

हम यह भी अनुभव कर रहे हैं कि आर्य विद्वान श्री उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी का प्रवचन सुनते हुए हमारे मन में जो विचार आया था कि आदि चार ऋषियों के मोक्ष से आने के कारण उनको वेदों का ज्ञान रहा होगा और ईश्वर को ज्ञान देने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिये थी, वह भ्रान्तिपूर्ण विचार था। जब जीवात्मा अमैथुनी वा मैथुनी शरीर व गर्भ में प्रविष्ट होती है तो शरीर में जो इन्द्रियां व अन्य अवयव हैं उनकी ट्यूनिंग ईश्वर को करनी होती है। ऐसा होने पर शरीर कार्य करने लगता है। हम सबका यह अनुभव है कि जब हम बात कर रहे होते हैं तो 15 मिनट ही बोलने के बाद यदि हमें उन्हीं शब्दों व वाक्यों को दुबारा उसी क्रम से बोलने को कहा जाये तो हम नहीं बोल पाते यद्यपि हमारा शरीर व सभी इन्द्रियां व शरीरांग वहीं हैं। जिन वाक्यों को दोहराना है, वह भी मात्र कुछ मिनट पहले ही बोले गये हैं। परन्तु उन्हें किसी के भी द्वारा दोहराया नहीं जा सकता। इसका कारण विस्मृति के सिवा अन्य नहीं होता। अतः एक मोक्ष व प्रलय के बाद जन्म लेने वाली आत्माओं से यदि हम यह अपेक्षा करें कि उनको पूर्व अवस्था वा जन्म आदि का ज्ञान हो तो यह स्यात् उचित नहीं है। कुछ को अपवादस्वरूप कुछ-कुछ हो भी सकता है और नहीं भी। सिद्धान्त के अपवाद हो सकते हैं परन्तु अपवाद सिद्धान्त नहीं हो सकता। इन विषयों का पूरा ज्ञान तो ईश्वर को है जिसे हम उनसे पूछने की योग्यता नहीं रखते। हां, यदि पहली पीढ़ी के ऋषियों ने उन चारों ऋषियों व अन्य ऋषि व ज्ञानी पुरूषों से उनके पूर्व जन्म वा मोक्ष अवस्था के बारे में प्रश्न पूछ कर उसे ब्राह्मण ग्रन्थों में लिख दिया होता तो आज यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि हो सकती थी। यह बात इस लिए सम्भव कोटि में हैं क्योंकि शतपथ ब्राह्मण में यह बताया गया है कि परमात्मा ने आदि चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद का ज्ञान दिया था। इसी प्रकार वह मोक्ष की अवस्था व जन्म से पूर्व की अवस्था के बारे में उनसे प्रश्न कर उसका उल्लेख भी कर सकते थे। जो भी हो, हमारी शंका कि मोक्ष अवस्था के व्यक्ति को जन्म लेने पर वेदों का ज्ञान होना चाहिये, उचित नहीं लग रही है और हम अनुभव कर रहें हैं कि हमारे मन में आया यह विचार मात्र एक भ्रान्ति थी। हम समझते हैं कि प्रायः सभी सुधी पाठकों में इस प्रकार के प्रश्न यदा-कदा उठते होंगे और वह उनका समाधान भी स्वयं ही कर लेते होंगे।

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