लेखक परिचय

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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सुरेश हिंदुस्थानी

कहते हैं जो संस्कार बचपन में पिरोए जाते हैं, वह आजीवन जीवित रहते हैं। इतना ही नहीं बचपन के संस्कार व्यक्ति की प्रगति का निर्धारण भी करते हैं। व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन इन्हीं संस्कारों के दायरे में रहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस प्रकार से विद्यालयीन छात्र छात्राओं से संपर्क बनाया है, वैसा आज तक किसी भी प्रधानमंत्री ने नहीं सोचा। नरेंद्र मोदी की मन की बात के कार्यक्रम का असर फिलहाल भले ही दिखाई न दे, लेकिन इसके कारण भविष्य की जो आधारशिला बनेगी, वह निश्चित ही भारत के मजबूत भविष्य का ताना बाना बुनती हुई दिखाई दे रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक शिक्षक की भूमिका के बारे में कहा कि एक शिक्षक की पहचान उसके छात्र होते हैं। शिक्षक के चरित्र का प्रतिबिम्ब छात्रों के जीवन में कृति रूप दिखाई देता है। एक शिक्षक अपनी नौकरी से भले ही निवृत हो जाये। लेकिन वह अपनी शिक्षा प्रदान करने वाली शैली से कभी निवृत नहीं होता। सेवानिवृत होने के बाद भी सारा समाज उसे शिक्षक के रूप में ही देखता है।

modiप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक शिक्षक की तरह व्यवहार करते हुए कहा कि डॉ. अब्‍दुल कलाम को हम सभी ने देखा, वह बच्‍चों को बहुत प्‍यार करते थे। उनसे जब पूछा गया कि आपको लोग कैसे याद रखें, तो उन्‍होंने कहा था कि लोग मुझे शिक्षक के तौर पर याद रखें। ये उनके केवल शब्‍द नहीं थे बल्कि एक भारत के भविष्य के प्रति उनका मजबूत दृष्टिकोण था। वे भारत के हर विद्यार्थी के अंदर 2020 के विजन को उतारना चाहते थे। उनका विजन था कि 2020 तक भारत तकनीकी क्षेत्र में बहुत मजबूत बनकर उभरकर विश्व के सामने उपस्थिति हो। जिस प्रकार अब्दुल कलाम के मन में भारत के भविष्य को दिशा देने की ललक थी, उसी प्रकार का चिंतन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आंतरिक मन से प्रवाहित होता दिखाई देता है।
राष्‍ट्रपति पद से मुक्‍त होने के बाद वे बच्‍चों को पढ़ाने लगे। जीवन के अंतिम काल में भी उन्‍होंने विद्यार्थियों के साथ बातचीत की। वे जीवन में कभी भी विद्या के मार्ग से अलग नहीं हो पाए।  विद्यार्थी और शिक्षक के जीवन में अपनत्‍व का भाव हमें जीवन जीने की कला भी सिखाती है। व्यक्ति जीवन भर विद्यार्थी रहता है, किसी भी आयु में सीखा जा सकता है।

किसी भी देश का भविष्य संवारने के लिए उसकी भावी पीढी में वह बात प्रवाहित करनी होती है, जैसी देश की आवश्यकता है। इसके लिए एक उदाहरण देना समीचीन होगा, वर्तमान में हमारे देश की युवा पीढ़ी के समक्ष देशहित तिरोहित सा हो गया है। जिन कंधों पर भारत का भविष्य टिका है। वह युवा पीढ़ी केवल अपने बारे में ही सोच रही है। एक बार की बात है अलग अलग देशों के पांच बच्चों से पूछा गया कि तुम बढ़े होकर क्या बनना चाहते हो, तो भारत के बच्चे ने जवाब दिया कि में धन कमाना चाहता हूँ, इसलिए व्यापारी बनूँगा, लेकिन अन्य बच्चों का जवाब था, कि हम सबसे पहले देशभक्त बनेंगे, नौकरी के माध्यम से भी देश की सेवा करेंगे। इस प्रकार के भाव से आज की पीढ़ी वंचित हो रही है, वह केवल अपने खुद के लिए ही सोच रहा है। युवा पीढ़ी के मन में यह भाव पनपना चाहिए कि देश की सेवा किसी भी रूप में की जा सकती है। इसके लिए यह भाव होना चाहिए कि यह मेरा अपना देश है।

राष्ट्रीय भाव को जागृत करने के लिए सरकारों के सहारे नहीं रहना चाहिए, सरकारें केवल कानून बनाती है, पालन हम सभी को करना है। सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान का सूत्रपात किया, लेकिन हम बारीकी से चिंतन करें तो ज्ञात होगा कि इस बुराई के लिए कहीं न कहीं हम सभी दोषी हैं, सरकार ने हमें जगाने का काम किया है, लेकिन जागकर भी सोने का नाटक कर रहे हैं। वास्तव में यह समय आँखें खोलने का है, अगर हम सरकार के अच्छे उद्देश्यों के साथ कदम मिलाकर समर्थन करें तो वह दिन दूर नहीं होगा जब भारत सभी दृष्टि से विश्व का सबसे सम्पन्न राष्ट्र बन जाएगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारम्भ किए गए मन की बात कार्यक्रम के माध्यम से बच्चों से जिस प्रकार सीधा संवाद किया गया, उसका असर भले ही अभी दिखाई नहीं दे रहा, लेकिन ऐसे कार्यक्रम से जो दिशादर्शन होता है। जो राह दिखाई जाती है उस पर चलकर लाखों युवा देश के भविष्य निर्माता बनेंगे, यह तय है।

मन की बात के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरे कागज पर शब्दों की अनुकरणीय शृंखला को स्थापित करने का सूत्रपात किया है। यह कार्यक्रम एक प्रकार से प्रतिभा का प्रदर्शन करने के समान है। इसके साथ ही प्रतिभा का विकास करने का एक माध्यम भी है। हम यह अच्छी तरह से जानते हैं कि हर बालक के अंदर कुछ प्रतिभाएं जन्मजात होती हैं, लेकिन बालक के परिजन उस प्रतिभा के विपरीत बालक का भविष्य बनाने की कवायद करते हैं, जिस कारण वह बालक अपनी प्रगति और विकास की स्वाभाविक गति के साथ काम नहीं कर पाता है। यही स्थिति उसके पीछे रहने का मूल कारण है। अगर बालक की स्वाभाविक रुचि के हिसाब से उसे काम में लगाया जाए तो वह चमत्कारिक परिणाम दे सकता है। रुचि के काम में व्यक्ति हमेशा ही नए तरीके की तलाश करता है।

संकल्प हमेशा तब ही पूरे होते हैं, जब उनके प्रति समर्पण का भाव हो, अपने आप में उसे पूरा करने की शक्ति हो। इससे हमारे अंदर सामर्थ्य का निर्माण होता है। आज हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो संकल्प लिया है, उसे पूरा करने के लिए हम सभी जुट जाएं।

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