लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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-डॉ मयंक चतुर्वेदी-

BlackMoney_SL_16_7_2011कल तक जो अपने आप में किसी प्रकार के परिवर्तन को तैयार नहीं था, चलो देर से ही सही उसने इस वैश्विक चिंता को समझा तो सही कि किसी के भी धन को बेमानी तरीके से रखना नैतिक मूल्यों के खिलाफ है। ऐसा इसीलिए कहा जा रहा है, क्योंकि स्विस बैंक का नया अवतार देखने में आया है। वह है सहयोग के लिए काले धन के मुद्दे पर भारत को आगे से सहयोग के लिए प्रतिबद्ध होना। देश की आजादी के बाद से जब-जब ब्लैक मनी का जिक्र आया है, अमूमन हर भारतीय इस विषय को लेकर संवेदनशीलता महसूस करता रहा है। उसका मूल कारण जो समझ में आता है, वह यही है कि सामाजिक परिवेश में आर्थिक स्तर पर असमानता अधिक है। देश की जनता को लगता रहा है कि एक तरफ विकास के लिए भारत बार-बार विश्व बैंक, एशियन बैंक या अमेरिका जैसे विकसित देशों से आर्थिक मदद लेता है, वहीं दूसरी ओर देश का धन जिससे कि भारत का संपूर्ण विकास संभव है, विदेशी बैंकों में काले धन के रूप में कैद पड़ा हुआ है। स्विस बैंक तो एक बानगीभर है, पता नहीं दुनिया के कितने देशों में और कितनी विदेशी बैंकों में भारतीयों का काला धन रखा होगा।

विदेश में जमा काले धन को लेकर भारत के लिए बड़ी राहत की खबर है। स्विस बैंक ने आश्वासन देते हुए कहा कि काले धन के मुद्दे पर हम भारत के साथ सहयोग के लिए प्रतिबद्ध हैं। स्विट्जरलैंड सरकार ने जानकारी देते हुए बताया कि चुराए हुए आंकड़ों को लेकर हम नियमों में तकनीकी सुधार करेंगे। संसद में इस मसले पर चर्चा भी होगी।

भाजपानीत एनडीए और मोदी सरकार के लिए यह खबर जरूर राहतभरी है, क्योंकि केंद्र में सरकार बनाए उसे एक वर्ष पूरा होने जा रहा है। मीडिया के साथ तमाम संचार माध्यमों में यह चर्चा शुरू हो गई है कि ब्लैक मनी को देश में वापस लाने का वायदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने से पहले अच्छे दिन आयेंगे का सपना दिखाकर किया था, आखिर उसका क्या हुआ ? तो यह जो स्विस सरकार का निर्णय है, इससे जरूर अब भाजपा को राहत मिलेगी। इस राजनीतिक पार्टी से जुड़े लोगों के पास भी कहने को रहेगा कि देखो, जो हमने कहा, उस दिशा में आगे बढ़कर अपने वायदे को पूरा करने में हम सफल रहे हैं।

पिछले साल स्विट्जरलैंड में भारतीयों द्वारा जमा कराए गए काले धन को देश लाने के लिए उत्सुक मोदी सरकार के लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं थी, जिसमें स्विट्जरलैंड के वित्त मंत्रालय ने कहा था कि भारतीयों के स्विस बैंक अकाउंट की कोई लिस्ट नहीं बनाई जा रही है और हाल-फिलहाल में भारत के साथ काले धन के मुद्दे पर कोई बात भी नहीं हुई है। सरकार ने भारतीयों के खाते के बारे में जानकारी के लिए जब विदेशी बैंकों से संपर्क और सघन किया, तो वे अपने देश से जुड़ें कानूनों की दुहाई देने में जुट गए थे।

स्विस बैंक में भारतीय धन के जमा की स्थिति यह है कि जब गत वर्ष स्विट्जरलैंड की सेंट्रल बैंक एसएनबी द्वारा जानकारी निकाली गई, तो उस रिपोर्ट में पता चला था कि वर्ष 2013 में स्विस बैंक में जमा भारतीयों के धन में 43 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी। हालांकि, आज इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि जब भारतीय जनता पार्टी ने केंद्र में सत्तासीन होने के लिए देश की जनता को आशाभरे स्वप्न दिखाए थे, उनमें से एक यह भी था कि विदेश में जमा काले धन को वापस लाया जाएगा। वस्तुत: उसके बाद जो स्थिति बनी, उसे देखते हुए यह संभावना व्यक्त की जा सकती है कि कई लोगों ने अपना काला धन अन्य देशों से भले ही न निकाला हो, किंतु स्विस बैंकों से जरूर बहुतायत में निकाल लिया होगा।

एक अनुमान है कि अभी भी स्विस बैंकों में जितना भारतीय धन जमा है, उसे वापस देश के विकास में लगाया जाए, तो हिन्दुस्थान को जल्द विकसित होने से कोई नहीं रोक सकता है। स्विस बैंक की तिजोरियों में कैद पैसे का अंदाजा इसी बात से चलता है कि वहां सबसे अधिक धन भारतीयों का है। भारतीयों के कुल 65,223 अरब से अधिक रुपए स्विस बैंकों में जमा हैं। दूसरे नंबर पर रूस का स्थान है, जिसका लगभग 21,235 अरब रुपए जमा हैं तथा तीसरे नंबर पर हमारे पड़ोसी देश चीन के केवल 2154 अरब रुपए ही यहां जमा किए गए हैं। यदि इसे देश की जीडीपी से जोड़कर देखें तो यह राशि कुल जीडीपी से छह गुना अधिक बैठती है। तथ्य तो यह भी बताते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए 3 लाख करोड़ रुपए का कर्ज प्रतिवर्ष लेना पड़ता है।

यदि स्विस बैंक में कैद ब्लैक मनी का एक हिस्सा ही देश में वापस आ जाए, तो देश को आईएमएफ व विश्व बैंक के सामने बार-बार हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि यदि स्विस बैंक में जमा ब्लैक मनी देश वापस आ जाए, तो भारत का बजट 30 साल तक के लिए बिना किसी टैक्स लगाए बनाया जा सकता है। देश की आम जनता को किसी भी चीज के लिए किसी भी प्रकार का टैक्स देने से सीधे 30 वर्षों तक राहत प्रदान की जा सकती है, और यदि टैक्स लेना ही है, तो यह धन विकास के उन तमाम कार्यों और परियोजनाओं में अपनी सहभागिता निभा सकता है, जो धनाभाव के कारण लंबित होती हैं या फिर उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।

स्विस बैंकों में जमा भारतीय धन को लेकर आंकड़े केवल इतना ही नहीं कहते हैं, इसे लेकर और भी अहम पक्ष हैं। इस धन के भारत में वापस आने का एक अर्थ यह भी है कि इससे भारत की पूरी गरीबी दूर हो जाएगी। कोई उसके बाद फुटपाथ पर सोने और अनजाने में गाड़ी की चपेट मेें आ जाने से अपनी मौत के लिए विवश नहीं हो सकता है। देश से उन कई कुपोषण, अशिक्षा, बीमारी जैसी कमियों को अलविदा कह दिया जा सकता है, जिनके कारण आए दिन भारत की किरकिरी दुनियाभर में होती रहती है। ग्लोबल फाइनेंशल इंटेग्रिटी आर्थिक मामलों की अमेरिकी संस्था का सर्वे, जिसमें विकासशील देशों की सूची में विश्व के 160 देश सम् िमलित किए गए थे, भ्रष्टाचार करने के मामलों में भारत को पाँचवें पायदान पर रखता है।

हालांकि, इस संस्था का सर्वे बताता है कि चीन, सऊदी अरब, मेस्सिको और रूस के बाद भारत का नंबर काली कमाई को अपने देश से सबसे अधिक बाहर भेजने की सूची में है, किन्तु 27 अरब डालर का काला धन हर साल भारत से बाहर जाना अत्यधिक चिंता का विषय जरूर है। जीएफआई के आंकड़ों के अनुसार गैर कानूनी तरीके से औसतन 22.7 अरब अमेकिरी डालर और अधिकतम 27.3 अरब अमेरिकी डालर प्रतिवर्ष भारत के बाहर भेजा जा रहा है। जब काले धन को लेकर गहन अध्ययन किया गया, तो यह भी बात निकलकर आई कि स्विस बैंकों के अलावा पूरी दुनिया में अन्य 77 स्थान हैं, जो टैक्स हैवन माने जाने जाते हैं। जहाँ चोरी की पूँजी जमा की जाती है। इसके कारण भारत जैसे विकासशील देशों को प्रतिवर्ष अरबों-खरबों का नुकसान होता है। अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि भारत की कुल जीडीपी का 40 फीसदी धन ब्लैक मनी के तौर पर इस्तेमाल होता है। सरकारी आंकड़े भी इस बात को पुष्ट करते हैं कि आज जो जीडीपी में सीधे टैक्स का प्रतिशत 5.5 फीसदी है, यदि काले धन पर काबू पा लिया जाए तो यह प्रतिशत 15 से 18 पर पहुँच जाएगा।

राजनीतिक पार्टियों के स्तर पर देखें तो कांग्रेस पार्टी को देश की 32 फीसदी जनता भ्रष्ट मानती है, 21 प्रतिशत लोग बहुजन समाज पार्टी को तथा 19 प्रतिशत समाजवादी पार्टी को भ्रष्ट मानते हैं। भारतीय जनता पार्टी को कम भ्रष्ट यानि देश में 16 प्रतिशत लोग उसे भी भ्रष्ट मानते ही हैं। ऐसे वक्त में केंद्र में मोदी सरकार की इस स्कीम की सराहना की जा सकती है कि उसने कम से कम इस बात को पूर्व सरकारों की तुलना में बहुत गंभीरता से लिया है। सरकार ने काले धन की रोकथाम के लिए विदेशी खातों का ब्यौरा सार्वजनिक करने वाले लोगों को विशेष स्कीम की सुविधा मुहैया कराने का वायदा किया है, इसके जरिये ऐसे लोग जिनके पास विदेश में अघोषित खाते हैं, कम से कम वे 30 फीसद टैक्स व तीस फीसद पेनाल्टी देकर खुद को काला धन कानून के दायरे में आने से बचा तो सकते हैं। फिर भारतीय संसद ने काला धन (अघोषित विदेशी आय और संपत्ति) विधेयक को मंजूरी भी मिल गई है। विदेश में जमा काले धन को लेकर बनाया गया यह कानून राजग सरकार की बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। इसलिए जो लोग इस सुविधा का मौका नहीं उठाएंगे, उन्हें बाद में 30 फीसद टैक्स और 90 फीसद जुर्माना देना होगा। इसके अलावा उन पर मुकदमा भी दर्ज किया जा सकेगा, जिसमें दस साल तक की सजा का प्रावधान है।

इससे इतर, वित्त मंत्री अरुण जेटली की बात भी मानी जा सकती है कि जिनके पास ब्लैक मनी है, उनके लिए यह सुनहरा मौका है। यह टैक्स संबंधी एक स्कीम है, जिसका फायदा लोगों को उठाना चाहिए, लेकिन यक्ष प्रश्न अभी भी यही बना हुआ है कि केवल स्विस बैंकों से ही नहीं दुनिया के अन्य देशों में भी जो भ्रष्टाचार का भारतीय धन जमा किया हुआ है, आखिर यह पैसा कैसे और कब तक देश में वापस आएगा? सरकार को अभी इस दिशा में और विचार करना चाहिए, साथ ही उसे न केवल स्विस बैंकों के भरोसे रहना चाहिए, बल्कि अन्य देशों में जमा भारतीय धन को जल्द भारत में लाने के लिए भी प्रयास करने होंगे। वास्तव में तभी माना जाएगा कि मोदी सरकार अपने वायदे को पूरा करने में संपूर्णता के साथ सफल रही है। अन्यथा सरकारें तो आती रहेंगी, लेकिन इस मुद्दे पर देश का कभी भला नहीं हो सकेगा।

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