लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

Posted On by &filed under विविधा.


India as golden birdडा. राधेश्याम द्विवेदी

भारत का अतीत स्वर्णिम रहा है। आज से 100-150 साल पहले मैकाले के समय की बात है। उससे भी लगभग 1000 साल पहले भारत के इतिहास को देखने से पता चलता है कि इसकी महत्ता और गौरव को विदेशी विद्वानों ने भी सराहा है। इस पर अनेक शोध तथा रिसर्च भी हुए है। भारत के बाहर से आये इन विद्वानों में अंग्रेज,स्काटिश, अमेरिकन, जर्मन, फ्रेंच आदि रहे हैं। इन लोगों ने भारत के साहित्य इतिहास धर्म तथा दर्शन को पढ़ा हैं इसे समझा है तथा फिर इस पर अमना मत व्यक्त किया है। हमारी सरकारें कहने को धर्म निरपेक्ष कहलाने का दम्भ भरती हैं परन्तु भारत के बारे में व्यक्त किये गये विदेशी विद्वानों के विचारों को छुपाती भी हैं और अपने शिक्षा का आगे बढ़ने की बात को  भी घोषित करने से कतराती है।

हमें भारत के विषय में सत्य छिपाने वाले इस नीति के कारणों को खाोजना पड़ेगा। हमारे पाठ्य पुस्तकें भी हमारी अपनी नहीं हैं अपितु यह भी व्रिटिश अधिकारियों के द्वारा चलाये गये ही हैं जिसे हम अंधानुकरण करते चले आ रहे हैं। इस पद्धति में हम गर्व तो कर ही नहीं सकते अपितु अपने ज्ञान की अज्ञानता के कारण खुद को शर्म ही महशूस करते चले आ रहे हैं।

अंग्रेज विद्वान  थामस बैबिंगटन मैकाले एक वहुत ही प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री था। यह जब भारत आया तो लगभग 17 साल भारत में रहा था। इन दिनों वह भारत के प्रायः सभी भागों की यात्रा किया था। उसका जन्म 25 अक्तूबर 1800 में रोथले टैंपिल में हुआ था। उसका पिता जकारी मैकाले व्यापारी था। उसने 1826 में वकालत शुरू किया था। अपनी विद्वता और विचारपूर्ण लेखों से वह लंदन के शिष्ट तथा विज्ञ मण्डल में अपना स्थान बना लिया था। उसे 1830 में लार्ड लेंसडाउन के सौजन्य से पार्लियामेंट में स्थान मिला था। 1832 के रिफार्म विल के अवसर पर वह तत्कालीन अग्रिम राजनीतिज्ञों में स्थान बना लिया था। 1833 के बाद वह प्रायः पार्लियामेंट का सदस्य रहा। पार्लियामेंट में कुछ समय तक इसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बोर्ड आफ कंट्रोल का सचिव, पेमास्टर जनरल और बाद में सेके्रटरी आव दी फोर्सेज पदों पर काम किया था।

वह 1834 से 1838 तक भारत के सुप्रिम काउंसिल का ला मेम्बर था। इसी ने भारत का भारतीय दण्ड संहिता की पाण्डुलिपि को तैयार किया था। अंग्रेजों को भारत की सरकारी भाषा तथा शिक्षा का माध्यम और यूरोपीय साहित्य दर्शन तथा विज्ञान को भारतीय शिक्षा का लक्ष्य बनाने में इसका वड़ा हाथ था। साहित्य के क्षेत्र में भी इसने बड़ा महत्वपूर्ण काम किया था। इसने अनेक एतिहासिक और राजनीतिक निवंध तथा कविताएं लिखी है। इसकीेे क्लाइव, हेस्टिंग्ज, मिरावो, मैकिआवली के लेख तथा कविताएं वड़ी चाव से पढ़ी जाती है। इसकी  प्रमुख कृति ‘‘हिस्ट्री आव इंग्लैंड ’’ है। अधूरी होते हुए भी यह अनपम ग्रंथ है। वह विद्वान, मेधावी और वाक्चतुर था। उसके विचार उदार, वुद्धि प्रखर, स्मरण शक्ति विलक्षण और चरित्र उज्वल था। 28 दिसम्बर 1859 को इसका देहान्त हो गया था।

मैकाले के नीति के तहत अंग्रेजों ने भारतीयों विशेषकर हिन्दुओं के मन में उनकी संस्कृति , उनके आचार विचार, उनके रहन सहन, असदि के बारे में हीन भावना भरने की शुरूवात की। इसमें वह कुछ सफल भी रहा । भारतीय इतिहास को तोड़ मरोड़कर पेश करना, हिन्दुओं के भगवानों, उनके चिन्हों का माखौल उड़ाना तथा हिन्दू राजाओं को नकारा बताना आदि इसी कड़ी का हिस्सा था। उसने राम जन्म भूमि पर प्रश्न उठाना, भारत व श्रीलंका के बीच स्थित रामसेतु को तोडना तथा क्रास के चिन्ह वाले सिक्कों का प्रचलन करवाना आदि कई महतवपूर्ण व विवादित कदम उसने उठाये थे। अंग्रेजो के वाम पंथी मानसपुत्रों को उसने ही शह दिया था। भारतीय संस्कृति, हिन्दूत्व के बारे में दुष्प्रचार करने में वह आजीवन लगा रहा।

मैकाले ने पूर्व, पश्चिम ,उत्तर तथा दक्षिण भारत की विशद यात्रायें किया था। मैकाले की शिक्षा नीति आज भी पढ़ाई तथा दिखाई जाती है। जब उसका 17 साल का प्रवास पूरा हुआ तो वह व्रिटेन की संसद में हाउस आफ कामन में 2 फरवरी 1835 को कुछ इस प्रकार एक लम्बा भाषण दिया था। उसके प्रमुख अंश इस प्रकार हैं –

I have travelled across the length and breadth of India and have not seen one person who is a beggar, who is a thief, such wealth i~ have seen in this country, such high moral values, people of such caliber, that i~ do not think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and cultural heritage, and, therefore, i~ propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self esteem, their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation’

 

इसी भाषण के अन्त में वह कहता है – ‘‘ भारत में जिस व्यक्ति के घर में मैं कभी भी गया तो मैंने देखा कि वहां सोनों के सिक्को का ढ़ेर एसे लगा रहता है जैसे कि चने या गेहूं का ढ़ेर किसानों के घरों में लगा रहता है।’’ वह कहता है कि भारतवासी कभी इन सिक्कों को गिन नहीं पाते, क्योकि उन्हें गिनने की फुर्सत नहीं होती है। इसलिए वे इसे तराजू पर तौलकर रखते हैं। किसी के घर पर 100 किसी के 200 तो किसी के यहां 500 किलो सोना रहता है। इस तरह भारत के घरों में सोने का भंडार भरा हुआ था।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz