लेखक परिचय

तनवीर जाफरी

तनवीर जाफरी

पत्र-पत्रिकाओं व वेब पत्रिकाओं में बहुत ही सक्रिय लेखन,

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kashmirतनवीर जाफ़री
मुसलमानों का सबसे प्रमुख त्यौहार ईद-उल-फितर पिछले दिनों वैसे तो पूरे देश में सामान्तय: हर्षोल्लास,शांति एवं सद्भावना के वातावरण में मनाया गया। पंरतु जम्मु-कश्मीर राज्य एक बार फिर ईद ही के दिन हिंसा की चपेट में आ गया। खबरों के अनुसार राज्य के किश्तवाड़ क्षेत्र में ईद की नमाज़ के बाद जम्मु-कश्मीर में सक्रिय अलगाववादी शक्तियां पाकिस्तान ज़िनदाबाद के नारे लगाते हुए तथा पाकिस्तानी झंडा लहराते हुए बड़ी संख्या में सडक़ों पर उतर आईं। बताया जाता है कि जब सुरक्षाकर्मियों व स्थानीय राष्ट्रभक्त लोगों ने इन हिंसक,सांप्रदायिक व अलगाववादी तत्वों का विरोध करने की कोशिश की उस समय यह बेक़ाबू भीड़ शहर के बाज़ार में दुकानों को आग लगाने लगी। इस बेकाबू हिंसा में 3 लोगों को अपनी जानें गंवानी पड़ीं जबकि लगभग 50 दुकानें दंगाईयों ने अग्रि की भेंट चढ़ा दीं। इन हिंसक तत्वों के हौसले इतने बुलंद थे कि किश्तवाड़ के बाद राज्य के कुछ अन्य भागों में फैली हिंसा के दौरान रामबन में इन राष्ट्रविरोधियों ने भारतीय सुरक्षा बलों पर भी हमला बोल दिया। इस हिंसक भीड़ द्वारा किए जा रहे तांडव को तत्काल नियंत्रित कर पाने में राज्य की उमर अब्दुल्ला सरकार भी नाकाम रही जिसके कारण किश्तवाड़ की आग राज्य के कई और शहरों में तनाव का रूप धारण करती गई।
एक ओर जहां उमर अब्दुल्ला स्थिति को फौरन नियंत्रित कर पाने में नाकाम रहे अथवा यह कहा जाए कि वे पूरी सख्ती व कुशलता का परिचय देते हुए अपने राजधर्म का पालन ठीक ढंग से नहीं कर सके वहीं इस हिंसक घटना को राजनैतिक रंग देने व इसे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनाए जाने के प्रयास में भारतीय जनता पार्टी ने भी अपनी ओर से कोई कसर बाक़ी नहीं रखी। निश्चित रूप से किश्तवाड़ दंगों में तीन व्यक्तियों का ईद के दिन भडक़ी हिंसा में मारा जाना बेहद निंदनीय व अमानवीय है। इस हिंसा के जि़म्मेदार लोगों के विरुद्ध सख्त से सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए तथा इस हिंसा में शामिल पाक परस्त नापाक तत्वों पर राष्ट्रद्रोह का मुक़द्दमा भी चलाया जाना चाहिए। परंतु देश के अधिकांश सांप्रदायिक दंगों में प्राय: संदिग्ध रहने वालों को कम से कम इन घटनाओं का राजनैतिक लाभ उठाने की कोशिश हरगिज़ नहीं करनी चाहिए। किश्तवाड़ हिंसा के बाद तत्काल अरुण जेटली तथा जम्मु-कश्मीर में विपक्ष की नेता महबूबा मुफ़ती ने घटनास्थल का दौरा करने की कोशिश की। नरेंद्र मोदी हैदराबाद में अपने भाषण में इस घटना की निंदा करते दिखाई दिए। किश्तवाड़ पीडि़तों के साथ यह इनके घडिय़ाली आंसू हमदर्दी वश नहीं निकल रहे बल्कि 2014 चुनाव से पूर्व यह दक्षिणपंथी शक्तियां इस हिंसा को राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार का विषय बनाकर हिंदू वोट बैंक की राजनीति करने की कोशिश मात्र कर रही हैं। हालांकि इनके इन प्रयासों का परिणाम देश के किसी अन्य राज्यों में फिलहाल कहीं नज़र नहीं आया। परंतु जम्मु-कश्मीर राज्य में स्थिति कई जगहों पर तनावपूर्ण अवश्य हो गई। जम्मुक्षेत्र के राजौरी में हिंसा की आशंका को देखते हुए सेना तैनात कर दी गई है तो ऊधमपुर में शांति मार्च निकाल कर स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया। श्रीनगर से बंद कराए जाने की खबरें आईं तो जम्मु में कफ्र्यू लगाकर स्थिति को काबू में रखने की कोशिश की गई। इस पूरे प्रकरण में जहां अलगाववादी तत्व सीमा पार के प्रोत्साहन के चलते बेखौफ होकर राष्ट्र विरोधी हरकतें अंजाम देने की कोशिश करते रहे वहीं इनका विरोध करने में भाजपाई सबसे अधिक आक्रामक होते नज़र आए। यहां तक कि कई जगह भाजपा समर्थक उग्र भीड़ से राज्य पुलिस के गुत्थमगुत्था होने की खबरें भी आईं।
इस पूरे प्रकरण में सुखद समाचार यह रहा कि पी चिदंबरम ने भारत सरकार की ओर से किश्तवाड़ हिंसा पर तत्काल संज्ञान लेते हुए दो टूक शब्दों में जम्मु-कश्मीर सरकार,समूचे राष्ट्र तथा अलगाववादी तत्वों के लिए यह संदेश जारी कर दिया कि जम्मु-कश्मीर में हिंसा के भय से होने वाला पलायन रोका जाएगा तथा 1990 वाले हालात दोहराए नहीं जाएंगे। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि जम्मु-कश्मीर में पाक समर्थक मौजूद हैं जो पाकिस्तान ज़िनदाबाद के नारे लगाते हैं। चिदंबरम ने अपने इस वक्तव्य से राज्य सरकार के लिए भी स्पष्ट संदेश छोड़ दिया कि राज्य सरकार हिंसा पीडि़तों की रक्षा करे तथा उपद्रवी अलगाववादी तत्वों से सख़ती से निपटे। बहरहाल राज्य में तनावपूर्ण वातावरण होने के बावजूद स्थिति अब नियंत्रण में है। पंरतु यह घटना अपने-आप में कई सवाल पीछे छोड़ रही है। एक तो यह कि सीमा पार की शह पर हिंसा पर उतारू अलगाववादी तत्व कब तक विदेशी ताकतों के हाथों की कठपुतली बनकर अपने ही कश्मीरी सभ्यता व संस्कार रखने वाले कश्मीरी हिंदू भाईयों को हिंसा का शिकार बनाते रहेंगे? और यह भी कि सांप्रदायिकता की राजनीति पर अपनी रोटियां सेंकने वाले संगठन किस मुंह से और क्योंकर कश्मीर में समय-समय पर होने वाली हिंसा का राजनीतिकरण करते रहते हैं? यदि यह कहा जाए कि कश्मीर में सीमा पार की शह पर हिंसा फैलाने वाले अलगाववादी पाकिस्तान के बहकावे में आकर देश में अस्थिरता फैलाना चाह रहे हैं तो इस हिंसा को राजनैतिक रंग देकर जम्मु-कश्मीर राज्य तथा देश के अन्य हिस्सों में इस हिंसा के लिए घडिय़ाली आंसू बहाने वाले तथा इस का राजनैतिक लाभ उठाने की कोशिश करने वाले भी इस घटना को लेकर देश का वातावरण बिगाडऩे की कोशिशों के कम जि़म्मेदार नहीं हैं।
कश्मीर में सक्रिय अलगाववादी ताक़तें जोकि पाकिस्तान के हाथों की कठपुतली बनी हुई हैं उन्हें भी भलीभांति यह समझ लेना चाहिए कि कश्मीर में रहने वाले अल्पसंख्यकों तथा कश्मीरी पंडितों के विरुद्ध अपने पाकिस्तान में बैठे आक़ाओं के इशारे पर हिंसा करना तथा उन्हें अपनी जन्मभूमि छोडक़र जाने के लिए मजबूर करना अथवा उनके समक्ष दहशत का ऐसा वातावरण बनाना जिससे कि वे अपने परिवार व अपने जान-माल को कश्मीर में असुरक्षित महसूस करते हुए इन अलगाववादियों के भयवश अपने गृहनगर व जन्मभूमि को छोडक़र अन्यत्र पलायन करने को मजबूर हो जाएं। ऐसे सभी प्रयास मानवता विरोधी,गैर इस्लामी और यहां तक उस कश्मीरियत के भी विरुद्ध हैं जिस कश्मीरियत की रक्षा के नाम पर यह अलगाववादी अपनी आवाज़ें बुलंद करते रहते हैं। कश्मीर भारत की सांझी गंगा-यमुनी तहज़ीब का केंद्र है। कश्मीरी हिंदू व मुसलमान मिलजुल कर राज्य के कई मंदिरों व गुरुद्वारों तथा दरगाहों में धार्मिक आयोजनों में शरीक होते हैं। राज्य में कई ऐसे क्षेत्रीय मेले व समागम आयोजित होते हैं जिसमें बिना किसी धार्मिक व सांप्रदायिक भेदभाव के सभी कश्मीरी शरीक होते हैं। मोहर्रम से लेकर ईद तक के सभी अवसरों पर कश्मीरी हिंदू भाईयों को अपने मुस्लिम बंधुओं के साथ मिलजुल कर मोहर्रम में ग़म मनाते व ईद में खुशियां बांटते देखा जा सकता है। परंतु इन सब बुनियादी सच्चाईयों की अनदेखी करते हुए पाकपरस्त अलगाववादी राज्य में सक्रिय आतंकी ताकतों के साथ मिलकर देश का स्वर्ग समझे जाने वाले कश्मीर को नरक बनाए जाने के प्रयास में लगे रहते हैं। और इन अलगाववादियों द्वारा फैलाई जा रही हिंसा,आगज़नी, व तोडफ़ोड़ के बाद जब कभी सुरक्षाबल जवाबी कार्रवाई करते हैं और उसमें किसी प्रदर्शनकारी की मौत हो जाती है उस समय इन्हीं अलगाववादियों को सुरक्षा बलों के विरुद्ध आक्रोशित होने का खुला अवसर मिल जाता है।
कश्मीरी अलगाववादियों को तथा इनका साथ देने वाले राज्य के आतंकी संगठनों को यह समझ लेना चाहिए कि पाकिस्तान की दिलचस्पी न तो कश्मीर की आज़ादी में है न ही वह कश्मीरी मुसलमानों का हमदर्द है। पाकिस्तान केवल भारत से 1971 के पाक-बंगला देश विभाजन का बदला लेने की गरज़ से स्वर्ग जैसे राज्य को नरक बनाने की कोशिश में लगा हुआ है। इन अलगाववादियों को पाकिस्तान का झंडा कश्मीर में लहराने से पहले इन बातों पर ज़रूर ग़ौर करना चाहिए। एक तो यह कि भारत सरकार कश्मीर की तरक्की व कश्मीरियों के हितों के लिए क्या कुछ नहीं करती? क्या इन अलगाववादियों का धर्म और ईमान इस बात की इजाज़त देता है कि वे जिस देश में रहें उसी देश के साथ ग़द्दारी करें और भेदभाव बरतें तथा भारत के दुश्मन देश का झंडा भारतीय राज्य में लहराएं? और उसके बाद यह भी उम्मीद करें कि भारतीय सुरक्षा बल उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई न करें? दूसरी बात यह भी सोचने की ज़रूरत है कि भारत सरकार के विरोध स्वरूप जिस पाकिस्तान का परचम यह लोग भारतीय क्षेत्र में अक्सर लहराते रहते हैं तथा जिस पाकिस्तान के जि़ंदाबाद के नारे भी यह शक्तियां समय-समय पर लगाती रहती हैं आज उस पाकिसतान की दुनिया की नज़रों में क्या इज़्ज़त है? आज यही पाकिस्तान दुनिया का सबसे खतरनाक तथा आतंकवादियों को पनाह देने वाला दुनिया का सबसे प्रमुख देश बन चुका है। ओसामा बिन लाडेन का पाकिस्तान में पाया जना तथा अब एमन-अल जवाहिरी के भी वहां होने के समाचार तथा तालिबानों का पाकिस्तान पर कसता शिकंजा इस बात के प्रमाण हैं। और एक बात यह भी कि कश्मीर व कश्मीरियत की आन-बान और शान वहां की सांझी संस्कृति और तहज़ीब में ही निहित है जिसकी रक्षा करना कश्मीरियों का ही दायित्व है। लिहाज़ा कश्मीरी अल्पसंख्यकों को पलायन करने के लिए मजबूर करने के बजाए जो कश्मीरी अल्पसंख्यक 1990 में या उसके बाद भयवश घाटी से पलायन कर गए हैं उन्हें सस्म्मान उनके अपने घरों में वापस बुलाना चाहिए तथा इनकी सुरक्षा की जि़म्मेदारी खुद लेनी चाहिए। साथ-साथ मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को भी ऐसी हिंसक घटनाओं को दबाने व अलगाववादियों के हौसले पस्त करने के लिए पूरी सख्ती करनी चाहिए तथा अपने राजधर्म का पूरी तरह पालन करना चाहिए।

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1 Comment on "कश्मीर की शान वहां की सांझी तहज़ीब में ही निहित"

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shivesh
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कल्हण की राजतरंगिणी का कश्मीर ही धरती का स्वर्ग था |
दुर्भाग्य की बात यही है की इस्लाम सह अस्तित्व में विश्वास नहीं करता ……..यही पूर्ण अस्तित्व की संकल्पना संसार में अशांति की जड़ है |
क्या सुन्दर हो की विश्व इस्लाम आप की विचारधारा से प्रेरित हो ……

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