लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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hindiइस प्रश्न का उत्तर सीधे साधे एक शब्द मे देना हो तो मै कहूँगी – नहीं। हर भाषा के कई स्तर होते हैं 1. बोलना 2. समझना 3. पढना 4. लिखना, फिर सही बोलना, सही समझना, सही पढ़ना, सही लिखना। सही होने के भी कई स्तर होते हैं। अशुद्धियाँ उच्चारण की, व्याकरण की, शब्दों के चुनाव की और वर्तनी की भी हो सकती हैं। कुछ लोग जो हिन्दी से बहुत प्रेम करते हैं उन्हे हिन्दी के विलुप्त होने का ख़तरा दिखने लगा है। कुछ लोग घबराये हुए हैं कि भारत के पढ़े लिखे संभ्रात वर्ग की भाषा हिन्दी रह ही नहीं गई है।

स्वतन्त्रता के पैसंठ वर्ष बाद हिन्दी की जो स्थिति होनी चाहिये थी, वैसी बिलकुल नहीं हैं, फिर भी हिन्दी की जड़े बहुत मज़बूत हैं। यह पेड़ तो वटवृक्ष है, हम खाद पानी न भी डाले, खर पतवार से घिरा रहने दें, तो भी कुछ कमज़ोर पड़ सकता है, पर गिर नहीं सकता, उसकी जड़े जमी ही रहेंगी। आने वाले कई सौ साल तक हिन्दी के विलुप्त होने का कोई ख़तरा भारत मे नहीं है। जब तुलू, कोंकणी व मैथिली जैसी बोलियाँ जो बहुत छोटे भूभाग मे थोडे से ही लोग बोलते हैं, वो ज़िन्दा हैं, तो हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के विलुप्त होने की बात तो सोचना ही बेमानी है। हिन्दी के उत्थान और प्रसार के लिये हम क्या कर सकते हैं, इस पर विचार करने के लियें ये लेख नहीं लिख रही हूँ। हमारे देश मे विभिन्न स्तरों पर वस्तुस्थिति क्या है, इस का विवरण देना इस लेख का उद्देश्य है।

औपाचारिक वार्तालाप मे खड़ी बोली का ही प्रयोग वाँछनीय है। खड़ी बोली को हिन्दी के विद्वानो ने हिन्दी के मानक रूप मे स्वीकार किया है।शिक्षा का माध्यम हो या किसी भी विषय पर कोई पुस्तक हो या समाचार पत्र हों, हिन्दी है, तो खड़ी बोली के व्याकरण और वर्तनी का प्रयोग ही लेखन मे होना चाहिये। किसी अन्य स्थानीय भाषा का प्रभाव भी लेखन की त्रुटि ही माना जायेगा। यह बात साहित्य की कुछ विधाओं जैसे कविता, कहानी या नाटक आदि पर लागू नहीं होती। बोलचाल की हिन्दी को भी खड़ी बोली की शुद्धता के स्तर पर नहीं तोला जा सकता।

भाषा विकासशील होती है, अन्य भाषाओं के शब्द कालांतर मे अपनी भाषा मे विलीन होकर उसका अंग बन जाते हैं। हिन्दी मे भी क्षेत्रीय भाषाओं, उर्दू और इंगलिश के बहुत से शब्द समा चुके हैं। समय के साथ वर्णमाला और वर्तनी मे भी संशोधन होते है, जैसे अब देवनागरी लिपी के साथ रोमन अंक लिखने को पूरी मान्यता प्राप्त है। ‘ञ’ अक्षर का भी प्रयोग समाप्त सा हो चुका है मृत्युञ्जय को मृत्युजँय लिखना वर्तनी के नियमानुसार अब सही माना जाता है।

उपर्युक्त विवरण के संदर्भ मे मैं अब भारत मे हिन्दी बोलने, समझने, पढने और लिखने की क्षमताओं की वस्तुस्थिति पर चर्चा करूँगी। –

बोलने का स्तर

बच्चा वही भाषा बोलना सीखता है जो मां उससे बोलती है, इसलियें ही वह मातृभाषा कहलाती है। मां बच्चे से कहती है, ‘’देखो वो क्या है? ‘’डौगी’’ ‘’ये तुम्हारी नोज़ी है’’ ‘’वो ऊपर देखो इत्ता बड़ा राउंड राउंड मून।‘’ इस भाषा मे इंगलिश के चाहें जितने शब्द हों पर वाक्य विन्यास तो हिन्दी मे ही है। बच्चा स्कूल जाने लायक होने लगता है तो उसे और इंगलिश सिखाने की कोशिश की जाती है, क्योंकि थोड़े से भी संपन्न माता पिता इंगलिश माध्यम के स्कूल मे ही भेजना चाहते हैं। कक्षा मे इंगलिश बोलना उनकी मजबूरी होती है परन्तु खेल के मैदान मे उनकी भाषा कुछ इस प्रकार की होती है। ‘’तू कल क्यो नहीं आया था ?’’ ‘’मुझे फीवर था आज वीकनैस लग रही है मम्मी तो एलाउ ही नहीं कर रहीं थी खेलने को।‘’ ‘’कल ज़रूर आ जइयो।‘’

इस वार्तालाप मे ‘फीवर’, ‘वीकनैस’ और ‘एलाउ’ इंगलिश के शब्द हैं, फिर भी ये हिन्दी ही है। ‘आ जइयो’ वाक्याँश दिल्ली क्षेत्र की विशेषता है, खड़ी बोली की नहीं, इसके बावजूद भी ये हिन्दी ही है। हाँ बच्चे पाठ्यपुस्तकों के अलावा बहुत कम किताबें पढ़ते हैं। हिन्दी क्या इंगलिश की भी नहीं पढ़ते, इसलियें शब्दावली का विकास कम हो पाता है। ये विश्व भर मे हो ही रहा है।

हिन्दी भाषी क्षेत्रों मे अनौपचारिक वार्तालाप अधिकतर इंगलिश मिश्रित हिन्दी मे ही होता है। आज भी हम हिन्दी मे सोचते है, मस्तिष्क मे स्वतः उसका अनुवाद होता है, कोशिश नहीं करनी पड़ती। सोचने की भाषा मे बोलने और समझने मे सहजता आती है। मेरा कहने का यह तात्पर्य बिलकुल नहीं है कि ये पढ़े लिखे लोग इंगलिश मे बात नहीं कर सकते, पर आम तौर पर करते नहीं है।

कुछ उदाहरण-

अस्पताल मे डाक्टर नर्स से पूछते है ‘’बैड न .4 के पेशैंट का बी.पी. स्टेबल हुआ या नहीं?’’

या

‘’आप अब ठीक हैं कल डिस्चार्ज कर देंगे पर घर पर भी केयर की ज़रूरत होगी।‘’

समझने का स्तर

समझने के स्तर पर भी कोई संकल्पना (concept) अपनी भाषा मे बहतर समझ मे आती है इसके लियें मै आपको एक अर्थशास्त्र की कोचिंग कक्षा मे ले जाती हूँ। यहाँ के सभी छात्र इंगलिश माध्यम के स्कूल और कौलिज ही पढते हैं।यहाँ की शिक्षिका का मानना है परिभाषायें और फारमुले वगैरह सब किताबों मे हैं, संकल्पना को उदाहरण सहित यदि बोल चाल की भाषा मे समझाया जाय तो ज्यादा अच्छी तरह समझ मे आता है। परीक्षा मे चाहे जितना घुमा फिरा कर प्रश्न पूँछा जाय संकल्पना स्पष्ट होगी तो उत्तर देना सरल होगा, यदि किताबों से या नोट्स से पूरी तरह समझे बिना याद कर लिया तो कुछ प्रश्नो का उत्तर दे पाना छात्रों के लियें संभव ही नहीं होगा। इसी कक्षा मे बोले जाने वाली भाषा की एक झलक-

‘‘इसे मौर्डन एप्रोच कहते हैं’’

या

‘’इक्विलिब्रियम पर मैक्सिमम सैटिस्फैक्शन होता है।‘’

या

‘’सैटिस्फैक्शन को यूनिट मे मेजर (measure) करने के लियें…..’’

या

पढ़ने और लिखने का स्तर

हिन्दी कक्षा 1 से 10 तक हिन्दी भाषी राज्यों मे अनिवार्य विषय है। दिल्ली विश्वविद्यालय के कला और वाणिज्य संकाय के स्नातक कार्यक्रमों मे भी एक पर्चा हिन्दी का अनिवार्य है। पाठ्यक्रम मे जाने माने लेखकों के गद्य और पद्य रचनाओं के साथ व्याकरण, पर्यायवाची शब्द, विलोम शब्द, मुहावरे, लोकोत्तियाँ और निबन्ध लेखन के साथ कुछ भाषाविज्ञान (linguistics) भी पढ़ा दिया जाता है। अधिकांश छात्र उत्तीर्ण भी होते है, कुछ के बहुत अच्छे अंक भी आते हैं। ज़ाहिर सी बात है कि ये हिन्दी पढना और लिखना जानते हैं, पर मै यह नहीं कह सकती कि ये छात्र सही हिन्दी बोलकर या लिखकर स्वयं के विचारों को ठीक से अभिव्यक्त कर सकते हैं। मेरा अवलोकन है कि ये छात्र इतने तैयार नहीं हैं कि इन्हे उच्च शिक्षा हिन्दी माध्यम से दी जा सके। दिल्ली के मुक़ाबले बिहार, राजस्थान, उ.प्र. और म.प्र. के छात्रों की हिन्दी का स्तर अधिक अच्छा है।

हिन्दी माध्यम

भारत की जनसंख्या का एक बुहत बड़ा हिस्सा अभी भी हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाऔं मे शिक्षा प्राप्त कर रहा है, जिनका इंगलिश का ज्ञान बहुत सीमित है। हिन्दी माध्यम या क्षेत्रीय भाषाओं के माध्यम से बारहवीं पास छात्रों के लियें देश मे बहुत से महाविद्यालय और विश्वविद्यालय हैं जो कला और वाणिज्य संकायों मे भारतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षा दे रहे है पर यह सुविधा विज्ञान, इंजीनियरिंग, चिकित्सा और प्रबन्धन पढ़ने के लियें स्नातक स्तर पर उपलबध नहीं है।

अंतर्राष्ट्रीय स्कूल और सिर्फ इंगलिश जानने वाले लोग

जनसंख्या का मुठ्ठी भर हिस्सा ऐसा है जिनके बच्चे इंटरनैशनल बोर्ड की परीक्षा देते हैं और सही मायने मे अतंर्राष्ट्रीय स्कूलो मे पढ़ते हैं। यहाँ अधिकाँशतः बच्चे उन लोगों के पढते हैं, जिन्हे बीच बीच मे कुछ साल विदेश मे जाकर रहना पडता है या जो बहुत अमीर हैं या फिर विदेश से आये हुए राजनैयिकों के बच्चे भी इन स्कूलों मे जाते हैं, इन्हे हिन्दी पढने की आवश्यकता नहीं होती।कुछ गिनती के परिवारों मे रोज़ की बोलचाल की भाषा इंगलिश हो इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता, फिर भी उन्हे हिन्दी आती अवश्य है।

हिन्दी की छवि भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों के मन मे

अब सवाल यह उठता है कि भारत मे आने वाले भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों को ऐसा क्यों लगता है कि भारत के बच्चे इंगलिश ही बोलते हैं, हिन्दी मे बात ही नहीं करते। पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात तो ये है कि ये लोग दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों को पूरे भारत का प्रतिबिम्ब समझ लेते हैं जबकि ये शहर जनसंख्या के बहुत कम भाग का प्रतिनिधित्व करते हैं । दूसरी बात ये कि हमारे बच्चे समझते कि ये अतिथि विदेश से आये हैं शायद इन्हे हिन्दी नहीं आती हो या कम आती हो। तीसरी बात कि हमारे बच्चों को औपचारिक संबधो मे इंगलिश बोलने की आदत होती है। चौथा और अंतिम कारण यह है कि भारतीयों मे इंगलिश के प्रति एक मोह, आकर्षण (glamour) होता है, वह विदेशी महमानो को दिखाना चाहते हैं कि वे इंगलिश मे अच्छी तरह बात करने मे सक्षम हैं।

महानगर पूरे भारत का प्रतिबिम्ब नहीं हैं

कई पत्रिकायें ऐसी हैं जिनके हिन्दी और इंगलिश दोनो संस्करण निकलते हैं।ऐसी ही पत्रिकाओं मे से एक है My Mobile इसमे मोबाइल और उससे सम्बधित चीज़ों, कम्प्यूटर, लैपटौप तथा कुछ अन्य उपकरणों की तकनीकी जानकारी, उनका आँकलन और बाज़ार मे उतरने वाले नये से ये गैजट की जानारी होती है। इस पत्रिका से प्राप्त जानकारी के अनुसार महानगरों, दक्षिण भारत और पूर्वी भारत मे इंगलिश के संस्करण का वितरण अधिक है, जबकि उत्तर भारत के अन्य छोटे बड़े शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों मे हिन्दी संस्करण भी काफी लोकप्रिय है। यह उदाहरण देने का मक़सद सिर्फ भौगौलिक आधार पर भाषा के रुझान की छवि प्रस्तुत करना है। यह भी स्पष्ठ हो जाता है कि केवल दिल्ली मुंबई ही को देखकर भारत की किसी चीज़ पर कोई राय बना लेना सही नहीं है।

विलुप्त होने का खतरा नहीं

कुछ लोगों का मानना है कि जो भाषा रोज़गार नहीं दे सकती वह विलुप्त हो जाती है।यदि यह सही है तो अब तक संसकृत और लैटिन का तो लोप हो गया होता, अब भी संसकृत भारत मे प्राथमिक कक्षाओं से लेकर स्नातक, स्नातकोत्तर और पी.एच.डी. के स्तर तक पढ़ी और पढाई जाती है।शिक्षा और अनुवाद के क्षेत्र मे हिन्दी की अपेक्षा संसकृत मे तो रोज़गार के अवसर बहुत ही कम हैं, फिर भी संसकृत जीवित है, उसका साहित्य भी जीवित है, फिर इतने बड़े भूभाग मे, इतनी बड़ी जनसंख्या की बोलचाल की भाषा हिन्दी के लुप्त होने की तो तनिक भी आशंका नहीं की जा सकती।

हिन्दी मे रोज़गार के अवसर

मैं कई वर्षों से टाइम्स आफ इंडिया के सोमवार परिशिष्ठ एजुकेशन टाइम्स मे विख्यात कैरियर काउंसेलर सुश्री प्रवीन मल्होत्रा का कौलम पढ़ती आ रही हूँ। उसी के आधार पर अपनी जानकारी प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूँ।

इस बात की चर्चा दो भागों मे करने की आवश्यकता है। –

1. हिन्दी भाषा, साहित्य और हिन्दी के भाषाविज्ञान की शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों के लिये रोज़गार के अवसर-

1हिन्दी मे बी.ए आनर्स या प्रोग्राम और बी.एड. करने के बाद सरकारी और निजी स्कूलों मे अध्यापक बनने के अवसर बहुत हैं। सरकार के वेतनमान अब शिक्षकों के लियें काफी अच्छे हो गये हैं। महानगरों के निजी स्कूल भी अब सरकारी वेतनमान देने के लियें प्रतिबद्ध हैं। हिन्दी मे एम. फिल. या पी.एच.डी. करने के बाद एक प्रतियोगी परीक्षा से पार होने के बाद किसी भी महाविद्यालय मे या विश्वविद्यालय मे व्याख्याता का पद मिल सकता है। UGC के वेतनमान बहुत आकर्षक हैं। सभी स्कूलों मे हिन्दी अनिवार्य विषय है। अहिन्दी प्रदेशों मे भी हिन्दी अनिवार्य या वैकल्पिक विषय के रूप मे सभी स्कूलों मे पढ़ाई जाती है।

2 शिक्षा के अतिरिक्त हिन्दी पत्रकारिता मे भी रोज़गार के काफी अवसर हैं।हिन्दी पत्रकारिता मे स्नातक व्यक्तियों को इलैक्ट्रौनिक और प्रिंट मीडिया मे काम मिल सकता है।हिन्दी मे छोटे बड़े बहुत से समाचार पत्र हैं। राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्रों के अतिरिक्त छोटे शहरों से भी स्थानीय समाचार पत्र निकलते हैं।हिन्दी समाचारों की अनेक टी.वी..चैनल भी सातों दिन चौबीसों घन्टे समाचार प्रसारित करती रहती हैं, इन्हे भी मानव संसाधन की बहुत आवश्यकता होती है।

3 प्रकाशन संस्थानो मे प्रूफ रीडर तथा पाँडुलिपियों का चयन करने के हिन्दी के अच्छे ज्ञान वाले लोगों की आवश्यकता होती है।

3हिन्दी वैब साइट बनानी हो या हिन्दी का कोई सौफ्टवेयर विकसित करना तब भी कम्प्यूटर विशेषज्ञों को हिन्दी भाषा और भाषावैज्ञानिकों के साथ मिलर काम करना पड़ा है।

3 किसी व्यक्ति मे रचनात्मक लेखन की प्रतिभा हो तो उसके प्रशिक्षण के लियें हिन्दी रचनात्मक लेखन का 6 महीने से लेकर 1 वर्ष के कार्यक्रम लेना चाहिये, यद्यपि यह जरूरी नहीं है। कई संस्थान ऐसे कार्यक्रम चला रहे है।

टी.वी. की बहुत सारी चैनल, बहुत सारे धारावाहिक , छोटे बड़े बजट की सैंकड़ो फिल्मो मे कहानी, पटकथा ,संवाद और गीत लिखने के लिये लेखन से जुड़े लोगों की ज़रूरत होती है। हास्यकवियों और अन्य हास्य कलाकारों के लयें अवसरों की कमी नहीं है।

4भारत सरकार और हिन्दी भाषी प्रदेशों की सरकारों की सभी अधिसूचनायें हिन्दी और इंगलिश मे जारी करना ज़रूरी होता है,अतः अनुवादकों की आवशयकता होती है।अच्छे अनुवादक दूसरी भाषाओं से हिन्दी मे या हिन्दी से किसी अन्यभाषा मे अनुवाद करके पुस्तकें प्रकाशित करवाते हैं।

5भारत सरकार हिन्दी विभाग भी है, हिन्दी अकादमी है जहाँ हिन्दी के जानकारों को काम मिलता है।

6हिन्दी के साथ यदि कोई विदेशी भाषा सीखली जाय तो दुभाषिये बन सकते हैं।

2-हिन्दी माध्यम से विभिन्न विषय पढ़े हुए लोगों के लियें रोज़गार के अवसर-

1भारत सरकार या हिन्दी भाषी राज्य सरकारों की ओर से किसी नौकरी के लियें हिन्दी माध्यम से पढ़कर आये लोगों के लियें कोई प्रतिबन्ध नहीं है। UPSC की ,रेलवे रिक्यूटमैट बोर्ड की और राज्य सरकारों की पबलिक सर्विस कमीशन की सभी परीक्षाये हिन्दी या कुछ अन्य भारतीय भाषाओं मे भी होती है। सिविल सर्विस की परीक्षा हिन्दी मे दी जा सकती है।

3 सरकारी बैंकों मे, पब्लिक सैक्टर मे हिंदी माध्यम से पढ़े लोग नौकरी पा सकते हैं।

4 हिन्दी माध्यम से शिक्षा देने वाले संस्थानो मे शिक्षक भी बन सकते हैं।

हिन्दी मे रोज़गार के अवसर जितने होने चाहियें उतने तो नहीं हैं, फिर भी मै कहूँगी कि इतने कम भी नहीं हैं ,कि हिन्दी का अस्तित्व ही ख़तरे मे पड़ जाय। इंगलिश भारतियों को चाहें जितना लुभा ले, आकर्षित कर ले, उसकी जगह कभी भी नहीं ले सकती ।

 

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7 Comments on "क्या हिन्दी भाषा विलुप्त होने के कगार पर है ?"

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डॉ. मधुसूदन
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विलम्ब से प्रतिक्रिया के लिए क्षमस्व। (१) स्थूल रूप से हिंदी जैसी, समृद्ध भाषाएँ अकस्मात मरती नहीं है। पर, वे धीरे धीरे दीर्घ काल तक र्‍हास होते होते समाप्त हो सकती है। देवेन्द्र नाथ शर्मा की “भाषा विज्ञान की भूमिका” के अनुसार, भाषाओं का र्‍हास कुछ ऐसे ही होता है। (२)स्पर्धाएँ गतिशील (Dynamic) होती है,और स्पर्धा में जो बढना त्यज दे, वह पीछे रह जाता है। (३)हिंदी की अंग्रेज़ी से स्पर्धा है।मानता हूँ, अंग्रेज़ी के कारण, हिंदी को उसका अधिकार प्राप्त नहीं है। (४) हिंदी भारत की सर्वाधिक बोली जानेवाली भाषा है।वह हुकम का एक्का है।मैं उसे उसी प्रकार देखता… Read more »
बीनू भटनागर
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बीनू भटनागर

आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लियें धन्यवाद।इस लेख मे मैने वर्तमान मे हिन्दी की जो स्थिति उसका एक आंकलन
करने का प्रयास किया था,जो स्थिति है वह संतोषजनक तो कदापि नहीं है, तथापि मेरा मानना है कि अगले कई सौ साल तक उसके लुप्त होने का कोई ख़तरा नहीं है।हिन्दी की स्पर्धा इंगलिश से है,इसके लियें हमे क्या करना
 चाहिये इस विषय पर पहले मै कुछ लेख लिख चुकी हूँ।

बीनू भटनागर
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बीनू भटनागर

जनसाधारण की भाषा जनसाधारण से दूर कभी नहीं हो सकती,122 करोड़ की जनसंख्या मे से अगर 5-10करोड़
लोग इंगलिश के मोह जाल मे फंसकर हिन्दी से दूर भी चले जायें तो बाकी के 110 करोड़ हिन्दी और अन्य
भारतीय भाषाओं के साथ ही रहेंगें। इंगलिश पढ़ने का अर्थ हिन्दी छोड़ना भी नहीं है, साथ साथ भी चल सकते हैं।

विजय निकोर
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विजय निकोर

हिन्दी को अपना उचित स्थान प्राप्त करने के लिए यह
अनिवार्य है कि जनसाधारण इसका प्रयोग करें। स्कूल के बच्चे
अन्ग्रेज़ी में बोलने को अधिक मान देते हैं, कार्यालयों में अन्ग्रेज़ी
का प्रयोग हिन्दी से अधिक हो रहा है… ऐसे हिन्दी को अपना उच्च
स्थान नहीं मिल सकता।

इस अच्छे लेख के लिए बीनू जी को बधाई।
विजय निकोर

BINU BHATNAGAR
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हिन्दी के उत्थान प्रचार और प्रसार के लियें बहुत से लोग प्रयत्नशील हैं,भारत मे बहुत सी क्षेत्रीय भाषायें भी है
इंगलिश से प्रभाविक मानसिकता है, फिर भी उसके विलुप्त होने की कोई आशंका नहीं है, सभी की प्रतिक्रिया
के लियें धन्यवाद।

राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'
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बीनू जी बेहरतीन लेख आप ने सत्य ही कहा है की हिंदी एक वट वृक्ष है जिसकी छाया आज समाज का हर व्यक्ति लेना चाहता है मगर उसकी देखभाल प्रकृति करती है…………..आपका ये एक प्रेरंदायक शोध है जो हिंदी की जड़ों को और भी मजबूत करेगा आधुनिक समय में लोग इसकी छाया पर ही निर्भर हैं लेकिन समाज के अधिकांश वर्ग को नहीं मालूम की ये वृक्ष अपनी जड़ों को लगातार दिशा दे रहा है, यदि हिंदी वट वृक्ष के सामान नहीं होती तो आज अन्या भाषाओँ के पहलु में विलीन हो चुकी होती जब की देखने में उल्टा नजर… Read more »
PRAN SHARMA
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हिन्दी की अस्मिता के प्रति जैसा विश्वास बीनू जी का है ,काश वैसा विश्वास भारत के हर व्यक्ति का हो .लेख
विचारनीय है . मेरे विेचार मे हिन्दी समर्थ भाशा है , उस मे वे सभी विशेशताये है जो अन्गरेजी मे है लेकिन
जब तक वह रोजी की भाशा नही बनती है तब तक उसका विकास सम्भव नही है . वह जन साधारन से दूर ही
होती जायेगी धीरे – धीरे .

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