लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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मयंक चतुर्वेदी

देश की राजधानी में आतंवादी जिस तरह एक के बाद एक बम विस्फोट करने में कामयाब हो रहे हैं। उससे साफ झलकता है कि आतंकवाद जैसे गंभीर विषय के प्रति केन्द्र की संप्रग सरकार पूरी तरह उदासीन है।

संसद चल रही थी और देश का खूफिया तंत्र, केन्द्र सरकार गृह मंत्रालय, दिल्ली पुलिस लाख दावा कर रहे थे कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता है, परिंदा भी पर नहीं मार सकता, लेकिन हुआ क्या ? हमेशा कि तरह सरकार और प्रशासन की लापरवाही का खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ा। संसद से डेढ़ किलोमीटर दूर सबसे अचूक सुरक्षा जोन में हुए इस जबरदस्त धमाके ने न केवल दिल्ली वासियों को बल्कि आम भारतीय को भी यही संदेश दिया भारत का नागरिक देश के किसी भी कोने में सुरक्षित नहीं है। केन्द्र सरकार की लापरवाही तथा आतंकवादियों को कोर्ट से मृत्युदंड की सजा सुनाए जाने के बाद फैसले पर वक्त रहते अमल नहीं करने का परिणाम आखिर क्या होता है ? इस बम बिस्फोट के बाद यह हम सभी ने देखा। अफजल गुरू को छोड़ने के लिए ली गईं यह जाने इस बात का प्रमाण है कि जिन फैसलों पर शीघ्र निर्णय लिया जाना चाहिए, उनमें देरी का हश्र क्या होता है।

वास्तव में यह तो हद है कि एक तरफ हम आतंकवादियों को पहले पकड़ नहीं पाते और किसी तरह पकड़ भी लेते हैं तो अदालत की लंबी उलझी कानूनी प्रक्रिया में उन्हें जल्द सजा नहीं दे पाते। इसके बाद भी यदि निर्णय उन्हें सजा देने के पक्ष में आता है, तब देश में वोट बैंक की राजनीति शुरू कर दी जाती है।

आज पूरा देश आतंकवादियों के निशाने पर है वह जब चाहें, जहाँ चाहे विस्फोट कर आम भारतीयों की जाने ले रहे हैं। उस पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का यह कथन की हमारी सुरक्षा व्यवस्था कमजोर है, गृहमंत्री पी. चिदमबरम् का बयान कि देश में होने वाली ऐसी वारदातों को रोका जाना अभी सरकार के बस की बात नहीं। ऐसे सभी वक्तव्य यही सिद्ध करते हैं कि आतंकवाद से लड़ने के लिये जो संकल्प और इच्छाशक्ति चाहिए वह इस कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के पास नहीं है। ऐसे नकारात्मक तथा हतोत्साहित करने वाले जिम्मेदार लोगों के अविवेक और अजिम्मेदारी पूर्ण वक्तव्यों ने भारत के लोगों को आतंकवाद से लड़ने की हिम्मत देने के स्थान पर कमजोर करने का प्रयास ही किया है।

आज दिल्ली में लगातार हो रहे आतंकी हमले इसलिए विचलित और उद्वेलित करने वाले हैं, क्योंकि भारत सरकार की नाक के नीचे यह आतंकी अपनी मंशा पूरी करने और निर्दोष-निहत्थे भारतीयों को निशाना बनाने में सफल हो रहे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर 25 मई को भी बम बिस्फोट हुआ था जिसे अभी 4 माह भी पूरे नहीं हुए हैं। आजादी के बाद से दिल्ली पर हुए आतंकी हमलों की बात करें तो पिछले 14 वर्षों में लगातार दिल्ली आतंकवादियों के निशाने पर है। 9 जनवरी 1997 से शुरू हुआ यह सिलसिला लगातार जारी है। अभी तक दिल्ली में 28 बड़े धमाके हुए जिनमें सैकड़ों लोगों की जाने जा चुकी है, किन्तु इसके बाद सरकारी या राजनैतिक स्तर पर भारत ने कोई सीख नहीं ली। पश्चिम की होड़ में व्यस्त विकास के लिये आधुनिकता को आवश्यक मानने वाले हमारे देश को कम से कम इस मामले में अमेरिका से ही कुछ सीख ले लेनी चाहिए, जिसे केवल भारत ही नहीं आज पूरा विश्व सबसे ज्यादा ताकतवर देश के रूप में ही स्वीकार करता है।

मुम्बई हमले के बाद स्वयं प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और सुरक्षा एजेंसियों की ओर से बड़े-बड़े बयान आये थे कि भविष्य में ऐसी घटनाएँ नहीं घटेंगी इसके लिए सरकार एवं गुप्तचर संस्थायें अब पूरी तरह मुस्तैद रहेंगी लेकिन अभी तक हमारी सभी खूफिया एजेंसियों तथा सरकार के ऐसे सभी दावे असत्य सिद्ध हो रहे हैं, अभी हमें झूठे बयानों के अलावा कुछ नहीं मिला है। यह सरकार जब देश की राजधानी को सुरक्षित रखने के प्रति गंभीर नहीं तब यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि उसे सम्पूर्ण भारत की कितनी चिंता होगी।

भारत की आजादी और संविधान निर्माण के बाद से यह बात बिल्कुल साफ है कि देश की सम्प्रभुता और सुरक्षा को चुनौती देने वाले विषय सदैव केन्द्र के रहे हैं। भारत के गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् यह कहकर अपनी कमियों पर पर्दा नहीं डाल सकते कि सुरक्षा राज्य का मामला है। केन्द्र सरकार की कोरी बयानबाजी से देश की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं होने वाली, न ही बार-बार असफल होने पर आरोप-प्रत्यारोपों से आतंकवादियों को आगे इस प्रकार के किसी बड़े हादसे को अंजाम देने से रोका जा सकता है।

आज जरूरत बिना किसी राजनैतिक दाव पेच के देश हित में सख्त कानून बनाने की है। पोटा जैसे महत्वपूर्ण कानून को कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने देश पर लागू करने से सिर्फ इसलिये इंकार कर दिया था कि इसे उसके पहले केन्द्र में रही भाजपा नीत एन.डी.ए. सरकार ने बनाया था। कम से कम सुरक्षा जैसे गंभीर मामलों में तो सियासत नहीं होनी चाहिए। आज इस देश को पोटा की आवश्यकता है। सरकार को चाहिए कि वह इसे या ऐसे ही सख्त कानून को आतंकवाद की समाप्ति के लिये देश में शीघ्र लागू करे ताकि भविष्य में कोई भी भारत की सम्प्रभुता को जब चाहे तब चोट पहुँचाने की हिम्मत न कर सके।

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