लेखक परिचय

शिवदेव आर्य

शिवदेव आर्य

आर्ष-ज्योतिः मासिक द्विभाषीय शोधपत्रिका के सम्पादक

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शिवदेव आर्य

भारत एक शान्तिप्रिय व सद्व्यवहार को बढ़ावा देने वाला देश है। जो प्रति क्षण प्रत्येक की उन्नति में स्वयं की उन्नति को स्वीकार करता है। शायद इसी कारण से भारत की ओर से पाकिस्तान के साथ दोनों देशों में शान्ति बनायें रखने के लिए वार्ता करने की कोशिश की जाती रही है। लिखित रूप से भी कई बार वार्तायें हो चुकी हैं किन्तु कोई ठोस हल नहीं निकल पा रहा है। पाकिस्तान अपना छद्म भरा चहरा कुछ काल के लिए तो छुपा लेता है किन्तु अत्यल्प काल में ही अपने असली विषैले रूप में आ जाता है।

जैसे अभी पाकिस्तान  के वजीर-ए-आजम नवाज शरीफ ने कुछ दिनों पहले हमारे प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के साथ रूस में बैठ कर कुछ खास ऐलानों पर हस्ताक्षर किये। जिस ऐलान में कहा गया था कि दहशदगर्दी को खत्म करने के लिए दोनों मुल्क उद्यत हैं और इसका कोई रंग नहीं होता, किन्तु नवाज़ शरीफ ने अपने देश पहुचते ही अपना बयान बदल कर खूनी कलम चला दी। ऐसे अविश्वनीय देश के लिखे या कहे वादों पर जो यकीन या विश्वास करता है तो वह खुद ही एक तमाशा बनने लग जाता है। क्या जनवरी २॰॰४ में अटल बिहारी वाजपेयी को पकड़ाये गये उस कागज का कोई वजूद नहीं है, जिसमें परवेज मुशर्रफ ने लिखा था कि पाकिस्तान के जेरे साया वाली जमीन का प्रयोग भारत के खिलाफ दहशदगर्दी के लिए किसी कीमत पर नहीं होगा? क्या सन् १९७२ में शिमला समझौते में लिखे गये वो वाक्यांश जिनमें जुल्फिकार अली भुट्टो ने इंदिरा गांधी को लिख कर दिया था कि कश्मीर मसले के हल के लिए दोनों देश के नीति-नियन्ता सही वक्त पर बातचीत की मेज पर बैठेंगे? और तो और २00६ में डाॅ. मनमोहन सिंह को परवेश मुशर्रफ ने यहा तक लिख कर दे दिया था कि दोनों मुल्क दहशदगर्दी के खात्मे के लिए मिलकर साथ देंगे और इसके लिए एक नया नेटवर्क तैयार करेंगे? किन्तु प्रत्येक बार भारत  को धोखेबाजी के सिवाए और मिला ही क्या है?

nawazअब हमारे प्रधानमन्त्री पर दबाव बनाया जा रहा है कि पाकिस्तान से बात करें। अरे कोई समझता क्यों  नहीं? अब भी कोई कसर शेष रह गयी है? जिस देश ने अपना इमान बेच दिया हो, उससे किस मुख से बात की जाए। हमेशा की तरह वह अपनी बात से मुकर जाता है। जिस देश को बात ही करनी नहीं आती उससे बात करके क्या लाभ?  जैसे जुलाई मास में कहा गया था कि पाकिस्तान की ओर से कोई संघर्ष विराम का उल्लंघन नहीं किया जायेगा। किन्तु पाकिस्तानी सेना ईद-उल -फितर जैसे सुख-समृध्दि के पर्व पर भी खूनी जंग करने और शान्ति के माहौल को और बिगाड़ने से बाज नहीं आता।

इसका जीता जागता उदाहरण हमें जम्मू-कश्मीर के राजौरी और पुंछ सैक्टर में मिला, जहा पाकिस्तानी सेना और रेंजरों ने छोटे-छोटे आग्नेयास्त्रों के जरिये कई  भारतीय चैकियों को निशाना बना कर  १८ जुलाई शनिवार को फिर से संघर्ष विराम का उल्लंघन किया गया।  अमृतसर के पास वाघा-अटारी सीमा पर त्यौहारों के दौरान एक-दूसरे को मिठाई देने की परम्परा का पाकिस्तानी रेंजरों ने निर्वाह करने से मना कर दिया अर्थात् उन्होंने सीमा सुरक्षा बल द्वारा भेंट की गई मिठाई लेने से मना कर दिया। इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि पाकिस्तान शान्ति के वातावरण की इच्छा नहीं रखता, अब शठ्ये शाठ्यं समाचरेत् इस सूक्ति को साकार करने का अवसर आ गया है।

पाकिस्तान ने भारत को अस्थिर व कमजोर करने के लिए एक और कदम शुरु किया है, जो आतंकवाद है। आतंकवाद की भारत में फैली विष बेल का जन्मदाता और कोई नहीं बल्कि यही पाकिस्तान है। अब यह बात तो निश्चित हो चुकी है कि पाकिस्तान के अस्तित्व को खतरा है। पाक के नापाक दिन शुरू हो गये हैं। उसे सबक सिखाने के लिए  ५६ इंच के सीने वाला अनोखा व्यक्तित्व आ चुका है। जब पाप की अति हो जाती है तब पापों के विध्वंस करने के लिए कोई भगवान् थोडे़ ही आते हैं बल्कि हममें से ही किसी एक को सामना करना पडता है।

शायद पाकिस्तान भारत को भूल गया है, जिस दिन पाकिस्तान के छक्के छुडा दिये थे। सन् १९७१ में हमारे भारतीय  नौजवान फौजी भाईयों ने कमाल ही कर दिया था। बांग्लादेश विभाजन के दौरान उनके ९०  हजार फौजियों को बंधक बना लिया था, यह देख उस देश के होश उड़ गये थे, और वह हमारे पैरों में गिड़गिड़ा कर नाक रगड़ रहा था। हम भी बड़े दयावान् हैं, हमे उनकी दशा को देखकर दया आ गयी और उन सब बन्दी बनाये गये सैनिकों को मुक्त कर दिया। यह देख सम्पूर्ण विश्व आश्चर्यचकित रह गया।

सीमा पर बढ़े तनाव और उसके चलते दोनों आरे के कुछ लोगों के मारे जाने के बीच भारत की ओर से केन्दीय गृह मन्त्री श्री राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी दी कि बिना उकसावे के फायरिंग और सीमा पार आतंकवाद का ‘असरदार और ताकतवर ढंग से’ जवाब दिया जाएगा।

दहशदगर्दी को अपना हथियार बनाने वाली पाकिस्तानी फौजों को उनकी सही यथार्थता (औकात)  बताने की जरूरत पड़ सकती है। इन फौजों को हम किसी मुल्क की फौज कैसे कह सकते हैं, जो सिर्फ मजहब पर ईमान लाकर लड़ाईयाॅं लडती हो? हमें ध्यान रखना होगा कि सीरिया की इस्लामी स्टेट (आईएस) के दहशदगर्दों और पाकिस्तान की फौजों में ज्यादा अन्तर नहीं है। इसलिए बातचीत के नतीजे कुछ भी  हो नहीं सकते। कितनी बार हम पाक के नापाक इरादों से भरे कागजी पन्नों को पढ़ चुके हैं, काजगों में तो कुछ भी लिख देते हैं, किन्तु आज भारत को सावधान होना  पडे़गा, पाकिस्तान को करारा वाचिक जवाब न देकर   सीधा कार्यान्वयन हो तो ज्यादा उचित रहेगा। एक ऐसे ही क्षण की प्रतिक्षा प्रत्येक देशवासी काफी लम्बे समय से कर रहें हैं।

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