लेखक परिचय

अरुण कान्त शुक्ला

अरुण कान्त शुक्ला

भारतीय जीवन बीमा निगम से सेवानिवृत्त। ट्रेड यूनियन में तीन दशक से अधिक कार्य करता रहा। अध्ययन व लेखन में रुचि। रायपुर से प्रकाशित स्थानीय दैनिक अख़बारों में नियमित लेखन। सामाजिक कार्यों में रुचि। सामाजिक एवं नागरिक संस्थाओं में कार्यरत। जागरण जंक्शन में दबंग आवाज़ के नाम से अपना स्वयं का ब्लॉग। कार्ल मार्क्स से प्रभावित। प्रिय कोट " नदी के बहाव के साथ तो शव भी दूर तक तेज़ी के साथ बह जाता है , इसका अर्थ यह तो नहीं होता कि शव एक अच्छा तैराक है।"

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aapहर तरफ, हर जगह, हर नुक्कड़ पर, कॉफ़ी हाउस या फिर चाय ठेले पर चुस्कियों के साथ चर्चा सिर्फ आम आदमी पार्टी की| आखिर क्या है इसमें जो दूसरे को बिन डोर खींचे चला जा रहा है| ज़रा सोचिये और  अपने मानस पटल पर ज़ोर दीजिये, कहीं मैं कोई सुबह का सपना तो नहीं देख रहा  हूं ? कृपया नोट करें  सुबह का सपना सत्य माना जाता है| कांग्रेस ने दिल्ली में इनकी सरकार के गठन को सहमति देकर अपने 1950 मॉडल के रोल्स रायस कार को कुछ वक़्त के लिए रिन्यू करा लिया| वहीँ भारतीय जनता पार्टी अपने रथ के अश्व को कौन सा चना खिलाये, राजसी वैद्यों से सलाह मशविरा के दौर में है| क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टिया सहमी हुई है| आम आदमी का फैक्टर और इसका बढ़ता ग्राफ अपनी कहानी खुद कह रहा है|
अब ऐसा  हाल है कि प्रमुख विश्लेषक, इकोनॉमिस्ट और दार्शनिक आम आदमी पार्टी की  सफलता की बात तो करते हैं, लेकिन अपनी बौद्धिक क्षमता की वकालत करने से भी नहीं चूकते| मिसाल के तौर पर दिल्ली में पॉवर और पानी पर राजकीय सहायता और उससे भविष्य में उत्पन्न राजकोषीय घाटा के आंकड़ों पर अपनी ज्यामिति के प्रमेय को सिद्ध करने में तुले हैं| शिक्षा, स्वास्थय, सुरक्षा, भ्रष्टाचार (नैतिक और मौद्रिक) न जाने कितने सब्जेक्ट हैं जिसे देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियां पंचवर्षीय योजनाओं की तरह पांच साल में एक बार लाकर आम आदमी को सालों गुमराह करती रहीं, अब वही आम आदमी अपनी मूलभूत सुविधाओं के लिए अपनी पसंद की ज़िन्दगी को अपने मत के अनुसार सोचने का दुस्साहस कर रहा है तो इन्हें ख़राब लग रहा है|
वीआईपी  कल्चर, आरामपसंद ज़िन्दगी जीना किसे  ख़राब लगता है, अपने घर में नहीं पड़ोसी के घर भगत सिंह पैदा हो तो उसको मुद्दा बनाकर राजनीति की जा सकती है, लेकिन सड़क की लड़ाई हो या फिर जंग का  मैदान, जीत उसकी होगी जिसकी नीतिया पारदर्शी है, जो भय और प्रलोभन के मकड़जाल का खात्मा करने का जुनून रखता है| लोकतंत्र में उसे ही पूछा और पूजा जाना चाहिए| आम आदमी पार्टी ने उसी की शुरुआत की है| इसीलिये आज आम लोगों की जुबान और जहन से मोदी और राहुल गायब हैं और आम आदमी पार्टी पूछी और पूजी जा रही है|
पहली बार पढ़े-लिखे, विद्वान, शिक्षाविद, मीडिया के प्रमुख अधिकारियों, प्रशासनिक सेवाओं में कार्यरत अधिकारियों और विदेशों से नौकरी छोड़कर आये लोगों की आम आदमी पार्टी के साथ जुड़ने की खबरें जनता-जनार्दन के लिए सुबह की चाय-बिस्कुट के साथ  मीडिया और अखबारों की  ब्रेकिंग न्यूज़ बनती जा रही हैं| लोकसभा चुनाव 2014 पर तेज़ी से बनते संभावित  रुझान और भविष्य की सरकार और उसकी कार्यशैली कैसी होनी चाहिए, पहली बार आम लोग उसकी कल्पनाओं को कर पा रहे हैं और चर्चा कर रहे हैं| गरीबों और गरीबी की बात की जाए तो 500 करोड़ के अनुमानित खर्च से छवि निखारने की बात को छोड़कर क्या साबित किया जा रहा है? यदि इतनी ही रकम संसदीय क्षेत्र में लगाई जाए तो हर संसदीय/विधानसभा क्षेत्र अन्ना हजारे का रालेगन-सिद्धि गांव बन सकता है|
भारतीय अर्थव्यवस्था जब वैश्विक मंदी के झटके को झेल रही थी, तब इकोनॉमिस्ट और सरकार शेयर बाज़ार के औंधे मुंह गिरने पर राष्ट्रीय बयानबाजी कर रहे थे| निवेशकों की डूबती  रकम, शेयर दलालों के अरबपति होने के तरीके कोई आम जनता को भी सिखाये तो जाने?  कम्बल ओढ़कर घी पीना इसी को कहते है| अब तक प्रमुख राजनीतिक पार्टियां अपने फायदे के लिए आम आदमी को बलि का बकरा बनाकर हर पांच साल में कुर्बान करती रहीं, अब फिर चुनावी त्यौहार का वक़्त नज़दीक दिख रहा  है तो आम आदमी के स्वास्थ्य के लिए सीजनल च्यवनप्राश का नया अवलेह बनाना शुरू कर रही हैं|राहुल के पीछे 500 करोड़ का खर्च हो, या टिकिट लगाकर मोदी का भाषण सुनवाना, सब उसी कवायद का नतीजा है| पर, उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि ‘आम आदमी’ अब आम नहीं रहा है, एक नजरिया बन चुका है और नजरिये जल्द नहीं मरते|

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