लेखक परिचय

संजय कुमार

संजय कुमार

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा।समाचार संपादक, आकाशवाणी, पटना पत्रकारिता : शुरूआत वर्ष 1989 से। राष्ट्रीय व स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में, विविध विषयों पर ढेरों आलेख, रिपोर्ट-समाचार, फीचर आदि प्रकाशित। आकाशवाणी: वार्ता /रेडियो नाटकों में भागीदारी। पत्रिकाओं में कई कहानी/ कविताएं प्रकाशित। चर्चित साहित्यिक पत्रिका वर्तमान साहित्य द्वारा आयोजित कमलेश्‍वर कहानी प्रतियोगिता में कहानी ''आकाश पर मत थूको'' चयनित व प्रकाशित। कई पुस्‍तकें प्रकाशित। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् द्वारा ''नवोदित साहित्य सम्मानसहित विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा कई सम्मानों से सम्मानित। सम्प्रति: आकाशवाणी पटना के प्रादेशिक समाचार एकांश, पटना में समाचार संपादक के पद पर कार्यरत।

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tribeहाल ही में उच्चतम न्यायालय ने बाल अधिकार संरक्षण आयोग गठित नहीं करने वाले राज्यों को कड़ी फटकार लगाई है। कई राज्यों में अभी तक बाल आयोगों का गठन नहीं होने के कारण बच्चों के अधिकारों की निगरानी एवं उनका संरक्षण नहीं हो पा रहा है। परिणामस्वरूप राज्यों में बच्चों के शोषण की घटनाएं निरंतर बढ़ रही हैं। अगर आंकड़ों को देखें तो पाएंगे कि जिन राज्यों में बाल अधिकार संरक्षण आयोगों का गठन हो चुका है वहां भी बच्चों के शोषण की घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। खासतौर पर अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के बच्चे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। विद्यालयों को बच्चों के लिए सुरक्षित स्थान माना जाता है। यह हमारी सबसे बड़ी जीत है कि हमने मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार कानून के द्वारा सभी बच्चों को पढ़ने का अधिकार दे दिया है, पर यह हमारी सबसे बड़ी हार है कि हम विद्यालयों में, यहां तक कि आवासीय विद्यालयों में भी, बच्चों को सुरक्षित माहौल नहीं दे पा रहे हैं। केंद्र सरकार द्वारा देश के कई राज्यों में अनुसूचित जनजाति वर्ग के बच्चों के लिए आवासीय विद्यालय एवं छात्रावास स्थापित किए गए हैं। अभिभावक अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए इनमें उनका दाखिला कराते हैं। लेकिन इनमें पढ़ने वाले सभी बच्चों का जीवन ही सुरक्षित नहीं रह पाता है, तो उनका भविष्य कैसे सुरक्षित रह पाएगा। मात्र आयोग गठित करने से बाल अधिकारों का संरक्षण संभव नहीं है। मसलन महाराष्ट्र में 24 जुलाई, 2007 को बाल अधिकार संरक्षण आयोग का गठन हुआ था, फिर भी पिछले दस वर्षों में आवासीय विद्यालयों में करीब आठ सौ आदिवासी बच्चों की असमय मौतें हो चुकी हैं। यानी प्रतिमाह 80 आदिवासी बच्चों को जान गंवानी पड़ी। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2001 से 2012 के दौरान महाराष्ट्र में आदिवासियों की हत्याओं के 114 मामले दर्ज हुए, प्रतिमाह करीब 10 आदिवासियों की हत्याएं हुई। यानी कि आदिवासियों की हत्याओं से आठ गुना अधिक आदिवासी बच्चों की मौतें हो चुकी हैं। उक्त आंकड़ों के आधार पर हम कह सकते हैं कि आदिवासियों की आने वाली पीढ़ी जानलेवा खतरों से गुजर रही है। सरकार की तरफ से बताया गया है कि उक्त बच्चों की मौतें बुखार से पीड़ित होने, आत्महत्याएं करने, आकस्मिक दुर्घटनाओं एवं सांप-बिच्छुओं के काटने के कारण हुई हैं। अधिकांशत: उक्त आवासीय विद्यालय आबाद बस्तियों, खासतौर से कस्बों, शहरों एवं महानगरों से काफी दूर होते हैं जहां स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव होता है। बच्चों को देश का भविष्य माना जाता है। इस मान्यता को महत्व देते हुए आज के जिस दौर में स्कूली बच्चों को डांटने पर शिक्षकों को दंड दिए जाने तक का प्रावधान है, उसी दौर में आदिवासी बच्चों को आवासीय विद्यालयों में आत्महत्याएं करने को मजबूर होना, हमारे सिस्टम की संवेदनहीनता को दर्शाता है। ऐसी संवेदनहीनताओं के बावजूद अक्सर यह कहने का रिवाज बन गया है कि कानून अपना काम करेगा, किसी को बख्शा नहीं जाएगा और दोषियों को दंडित किया जाएगा। और फिर सिक्कों से तुलने के आदी हमारे राजनेता मुआवजा राशि की थैलियां लेकर मानवीय संवेदनाओं की बोली लगाने निकल पड़ते हैं। आवासीय विद्यालयों में आदिवासी बच्चों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले किसी दोषी व्यक्ति को अभी तक कोई सजा नहीं दी गई है। महाराष्ट्र में आदिवासी बच्चों की मौत के मामले में न्यायालय के हस्तक्षेप के बावजूद राज्य सरकार ने कुछ खास कदम भी नहीं उठाए, न ही उन घटनाओं से कोई सबक ही लिया। सितम्बर, 2010 में महाराष्ट्र में नंदूरबार के टेंभली गांव में यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी एवं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक आदिवासी महिला रजना सोनावाने को पहला विशेष पहचान पत्र ‘आधार कार्ड’ देते हुए कहा था कि ‘इस कार्ड से अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों को सम्मानजनक जीवन जीने के अवसर मिलेंगे।’ विभिन्न समाचार पत्रों में यह खबर इस तरह से प्रकाशित हुई थी कि मानो महाराष्ट के आदिवासियों के जीवन में कोई क्रांतिकारी बदलाव होने जा रहा है। लेकिन सच यह है कि ऐसे सियासी टोटके भी आवासीय विद्यालयों में पढ़ रहे आदिवासी बच्चों की जिंदगियों को नहीं बचा पा रहे हैं। आजादी के बाद आदिवासियों के विकास के नाम पर किए गए ऐसे अनेक टोटके लगभग बेअसर साबित हुए हैं। इसलिए अब इनका दौर समाप्त होना चाहिए। ओड़िशा सरकार ने सभी जिला कलेक्टरों को अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के छात्रों हेतु चलाए जा रहे आवासीय विद्यालयों की सुरक्षा के सख्त निर्देश दिए हैं। ओड़िशा में अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण विभाग द्वारा चलाए जा रहे 16 सौ आवासीय विद्यालयों में चार हजार बच्चे पढ़ रहे हैं और कुल चार हजार छात्रावासों में से एक हजार छात्रावास निर्माणाधीन हैं। ऐसी भी खबरें हैं कि इन सेवाश्रम विद्यालयों में अनुसूचित जनजाति वर्ग के बच्चों का उत्पीड़न कर उन्हें बीच में ही पढ़ाई छोड़ने को बाध्य किया जाता है। आवासीय विद्यालयों की स्थिति से अन्य सरकारी विद्यालयों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। पिछले दिनों ओडिशा में एक बालिका आवासीय विद्यालय की करीब 70 आदिवासी लड़कियों ने शिक्षा विभाग से संपर्क कर शिकायत दर्ज कराई थी कि उनके अध्यापक उन्हें जाति के नाम पर तरह-तरह से अपमानित करते हैं ताकि वे बीच में ही पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाएं। समय- समय पर विभिन्न राज्यों के आवासीय विद्यालयों एवं छात्रावासों में भी आदिवासी लड़कियों के यौन शोषण की खबरें सुर्खियों में रही हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार केंद्र सरकार ने अनुसूचित जनजाति वर्ग के विकास के लिए अप्रैल, 2010 से अगस्त, 2013 तक 16 राज्यों को 2904 करोड़ की राशि जारी की है। केंद्र सरकार ने विभिन्न राज्यों में आदिवासी क्षेत्रों के लिए 158 एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय स्वीकृत किए थे। इनमें से 111 आवासीय विद्यालयों में शिक्षण कार्य शुरू हो चुका है। लेकिन इन आवासीय विद्यालयों में आदिवासी बच्चों को अपनी जान देकर शिक्षा की कीमत चुकानी पड़ रही हैं। आदिवासियों बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आवासीय विद्यालय एवं छात्रावास योजनाएं चलाई जा रही हैं, पर आदिवासी बच्चों की जीवनधारा मृत्युधारा में विलीन हो रही है। बेहतर होगा कि हमारे सत्ताधीश व्यस्त सियासती समय से कुछ वक्त निकाल कर उक्त आवासीय विद्यालयों में आदिवासी बच्चों का हाल जानने की जहमत उठाएं।

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