लेखक परिचय

शंकर शरण

शंकर शरण

मूलत: जमालपुर, बिहार के रहनेवाले। डॉक्टरेट तक की शिक्षा। राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर अग्रलेख प्रकाशित होते रहते हैं। 'मार्क्सवाद और भारतीय इतिहास लेखन' जैसी गंभीर पुस्‍तक लिखकर बौद्धिक जगत में हलचल मचाने वाले शंकर जी की लगभग दर्जन भर पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

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muslim education शंकर शरण

 

सोल्झेनित्सिन ने लिखा है कि किसी समाज में यदि कानून का शासन न हो, तो वह बुरा है। जैसे कम्युनिस्ट देशों में देश का संविधान, कानून, आदि सब कुछ पार्टी के नौकर थे। लेकिन आगे सोल्झेनित्सन यह भी जोड़ते हैं कि, पर यदि किसी समाज में कानून के सिवा कोई और मानदंड न हो, तो वह भी मनुष्य के योग्य नहीं है।

यह दूसरी बात अरब देशों पर बहुत हद तक लागू होती है। इस संबंधित प्रसिद्ध सीरियाई लेखिका डॉ. वफा सुलतान की पुस्तक ‘एक गॉड हू हेट्स’ (2009) रोचक विवरणों से भरी है। अरब देशों में इस्लाम से पहले के सभी ज्ञान, नियम और परंपराएं पूरी तरह मिटा दी गई। पर इंडोनेशिया, मलयेशिया, पाकिस्तान, आदि देशों में यह नहीं हो सका है।

अनेक एसियाई देशों में मुसलमानों के बीच पारंपरिक मूल्य और नैतिकता के कुछ नियम बचे हुए हैं। जैसे, इंडोनेशिया में मुसलमानों के बीच राम-कथा का व्यापक सम्मान है। भारत-पाकिस्तान-बंगलादेश में पीरों के मजारों पर मेले लगते हैं। यह सब इस्लामी नजरिए से ‘कुफ्र’ यानी अनुचित है, क्योंकि यह इस्लाम से पहले की यानी हिन्दू-परंपरा के प्रभाव की चीजें हैं।

इसी स्थिति को वफा सुलतान ने एसियाई देशों के मुसलमानों का ‘लेस डैमेज्ड’ होना बताया है। चूँकि अरब देशों में इस्लाम से भिन्न कोई परंपरा, नीति या नियम नहीं रहने दिया गया, इसलिए वे पूरी तरह चौपट हो गए हैं। यह इस्लाम के सिवा किसी अन्य मानदंड को कठोरतापूर्वक ठुकराने से हुआ है। जिस हद तक गैर-अरब मुसलमानों के बीच भी शरीयत को पूरी तरह लागू किया जा सका, उस हद तक वहाँ भी वही संकट दिखता है।

उदाहरणार्थ, भारत में शाह बानो, गुड़िया, इमराना, जैसे मामले; ‘वन्दे मातरम’ गाने या न गाने; गीत-संगीत सीखने; लड़कियों के बिना पर्दा घूमने-फिरने; होली-दीवाली मनाने या न मनाने;  दूसरे देशों के ईमाम, अयातुल्ला के आवाहनों को मानने न मानने, आदि प्रसंगों में वही संकट प्रकट होते रहते हैं। ऐसे बिन्दुओं पर भारतीय मुसलमानों में एक राय नहीं। क्योंकि मानवीयता या नैतिकता उन्हें एक रुख लेने कहती है। जबकि शरीयत पर उलेमा उन्हें दूसरा रुख लेने को मजबूर करते हैं।

लेकिन अरब देशों में इस्लामी कानून के सिवा कोई मानदंड नहीं। पर केवल कानून किसी समाज को स्वस्थ नहीं रख सकता! उस के लिए नैतिकता जरूरी है, जो स्वभाव से ही कानून, मजहब, राष्ट्रीयता, आदि से परे होती है। जहाँ नैतिकता का आदर हो, वही सभ्य समाज होता है।

इस दृष्टि से मुस्लिम समाजों में घोर संकट है। यह गरीबी या राजनीति से जुड़ी नहीं। बल्कि मजहबी कानून की सर्वाधिकारी सत्ता से बनी समस्या है। यह सर्वसत्तावादी कानून स्वयं को बलपूर्वक लागू करता है, और लोगों में भय के सिवा अपने अनुपालन का कोई कारण नहीं जानता। परंतु जब कोई मजहब मानव जीवन पर संपूर्ण अधिकार की प्रवृत्ति रखे, तो इस में कोई आध्यात्मिकता नहीं रहती। वह तानाशाही, राजनीतिक सत्ता मात्र हो जाता है, जो बदलते समय और लोगों की जरूरतों के साथ सामंजस्य भी रखने में असमर्थ हो जाता है। उस की पूरी ताकत अपना सर्वाधिकार बनाए रखने में लग जाती है।

सोवियत तथा अन्य कम्युनिस्ट देशों की मुख्य विडंबना कुछ इसी प्रकार की थी। वही कुछ भिन्न रूप में अरब देशों में भी है। जिस हद तक वे केवल इस्लाम को संपूर्ण जगत् और हर विषय में अपना एक मात्र दिशा-निर्देशक बनाते हैं, उस हद तक उनका जीवन विकृत है। वह दुनिया के बदलावों के समक्ष निरुपाय, हास्यास्पद और क्षुब्ध होता रहता है। यही सब कट्टरता, चिड़चिड़ेपन, शिकायत और हिंसा आदि रूपों में व्यक्त होता है।

टेलीविजन पर इस्लामी नेताओं, उलेमा या विशेषज्ञों को ध्यान से सुनें। उनमें कोई यह कहते शायद ही मिले कि उसे कोई बात नहीं मालूम। अथवा, इस्लामी किताबों में हर चीज का उत्तर नहीं हो सकता। सभी मौलाना पुरातत्व, जेनेटिक्स, बैंकिग, परमाणु बम, कला, खान-पान आदि से लेकर पोलियो के टीके, स्त्रियों के रजस्त्राव, जानवरों के वर्गीकरण, तक हर चीज पर अधिकार पूर्वक जायज-नाजायज और हलाल-हराम के निर्णय देते नजर आते हैं।

यह मुस्लिम जनता में नैतिकता को हानि पहुँचाने के उदाहरण हैं। यदि यहाँ कोई कहे कि ‘मौलानाओं की बातें मानता कौन है’, तो दो बातें स्मरणीय हैं। एक तो यह कि कुरान, हदीस अरबी में होने के कारण गैर-अरब मुस्लिम इस्लामी निर्देशों को प्रायः बहुत कम जानते हैं। दूसरे, गैर-मुस्लिमों के साथ रहते वे अनेक पारंपरिक, नैतिक रीति-नीतियाँ मानते रहे हैं। यानी, उलेमा की ताकत वैचारिक और राजनैतिक, दोनों रूप से सीमित होने के कारण ही वे उनकी उपेक्षा कर पाते हैं। लेकिन, जैसे-जैसे पूर्ण इस्लाम का दबाव उन पर पड़ता है या उलेमा की राजनीतिक बढ़त होती है, वैसे-वैसे मुसलमानों के लिए बाध्यकारी होता जाता है कि वे किसी ईमाम, शेख या अयातुल्ला की बात मानें या कठोर सजा भुगतने के लिए तैयार रहें।

इसीलिए अरब देशों में जो बहुत पहले हो चुका, वही पाकिस्तान, अफगानिस्तान में इधर हो रहा है। कि इस्लाम से पहले की सारे नियमों, रिवाजों, आदि समेत पूरी नैतिकता को खत्म कर दिया जाए। पूर्ण इस्लाम या विशुद्ध इस्लाम की यही माँग है। भारत में तबलीगी आंदोलन, अफगानिस्तान-पाकिस्तान में तालिबान, तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अल कायदा से लेकर इस्लामी स्टेट ऑफ ईराक एंड सीरिया (आईसिस) तक यही करते रहे हैं। अभी-अभी येल विश्वविद्यालय के प्रो. ग्रेइम वुड के शोध-पत्र ‘ह्वाट आईसिस रियली वान्ट्स’ (द आटलांटिक, मार्च 2015) से इस का प्रमाणिक विवरण मिलता है।

अतः, गैर-अरब मुस्लिमों का सौभाग्य रहा कि उन्हें वास्तविक, अरबी इस्लामी सिद्धांत-व्यवहार से पूर्ण परिचय हाल तक नहीं था। तभी वे अपने-अपने देशों की प्राचीन ज्ञान-परंपरा, नैतिकता, संस्कृति, भाषा और मानवीय मूल्यों से जुड़े रहे थे। यह सचाई (या मलाल) स्वयं इस्लामी विद्वानों से सुन सकते हैं। भारत में बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक तक मुस्लिम उन्हीं सामाजिक, कानूनी, पारिवारिक रीतियों का पालन करते थे, जो हिन्दू मानते थे। यह तो अरब जाकर इस्लाम की पक्की पढ़ाई करने वाले मौलाना थे, जिन्होंने वापस आकर यहाँ मुसलमानों को ‘सच्चा मुसलमान’ बनाने का अभियान छेड़ा। यही तबलीग आंदोलन था, जो मुसलमानों को संपूर्ण जीवन-पद्धतिः भाषा, संस्कृति, त्योहार, पोशाक, बाल-दाढ़ी, टीका-बिंदी, खान-पान, आदि हर चीज में हिन्दुओं से अलग करने का सचेत अभियान था। उसी नक्शे पर देवबंदी आंदोलन ने अफगानिस्तान में तालिबानों को पैदा किया और सभी गैर-इस्लामी चीजों, रीतियों, चिन्हों तक को नष्ट करने का सिद्धांत-व्यवहार सिखाया। बामियान-विध्वंस तो उस का एक बाहरी लक्षण भर था।

यह सब पिछले तीस-चालीस में तीव्र हुआ। इसमें 1960-70 के दशक में अरब में तेल की अकूत आमद से मिली नई ताकत भी है। जिस से सऊदी बहावियों ने पूरी दुनिया में ‘सच्चे इस्लाम’ का प्रसार करने की नीति अपनाई। जो अपने जन्म से ही दूसरों पर हमले, लूट, उन्हें मुसलमान बनने का ‘निमंत्रण’ देना और न मानने पर खत्म कर देना, तथा मुसलमानों में उस लूट के बँटवारे से जुड़ा है। सरसरी नजर भी इस्लामी मूल किताबों के पन्ने उलटें, या मुहम्मद की आधिकारिक जीवनियाँ पढ़ें, तो उनमें सबसे अधिक स्थान इसी प्रक्रिया और इस्लाम के प्रसार को दिया गया है। पूरे किस्से में किसी मानवीयता का कोई स्थान नहीं मिलता।

यहाँ तक कि अपनी स्त्रियों, परिवार और बच्चों के लिए भी किसी सम्मानजनक अर्थ की कोई चिंता इस्लामी सिद्धांत में नहीं है। सब कुछ मूलतः और अंततः अल्लाह के स्वघोषित पैगंबर की ताकत, उसकी हुक्मबंदी तथा राज्य-विस्तार को समर्पित है। शेष सभी चीजें इस के अधीन हैं। उस से भिन्न किसी नैतिकता या आध्यात्मिक, चारित्रिक उत्थान, आदि की कोई फिक्र इस्लाम में सिरे से ही नहीं है।

इसीलिए, मुस्लिम देशों, समाजों में अंतहीन विवाद, उत्तेजना, आक्रोश, कटु-हिंसक शब्दावली और मार-काट की पद्धति का प्रचलन कोई अनायास नहीं। न केवल गैर-मुस्लिमों से, बल्कि आपसी बर्ताव में भी वही चलन है। यह इस्लामी सिद्धांत-व्यवहार की मूल विशेषताओं से जुड़ा है। जिस में किसी नैतिक मानदंड की कभी चिंता ही नहीं रही है। सब कुछ सदा से बल-प्रयोग, दबाव और भय से जुड़ा माना गया। लोग स्वभावतः कुछ स्वीकार करें, या कर सकते हैं, इस विचार का इस्लाम में पूर्ण अभाव है।

यही मुस्लिम समाज का आम नैतिक संकट और उस की सबसे बुनियादी समस्या है। मुसलमान जब तक इस्लाम की सत्ता को सर्वोच्च मूल्य मानते रहेंगे, उन के साथ यह संकट बना रहेगा। जब वे इस्लाम से ऊपर मानवीयता को रखना आरंभ करेंगे (या जो, जहाँ, अभी भी ऐसा रखते हैं), तभी उनके बीच नैतिक मूल्य प्रतिष्ठित होंगे (या प्रतिष्ठित मिलते हैं)। यानी ऐसे मूल्य, जिन का पालन लोग बिना भय के दबाव से और प्रसन्नता पूर्वक करें।

एक अरब कहावत हैः तुम किसी आदमी को कीचड़ से निकाल सकते हो, मगर जिस आदमी में अंदर कीचड़ भर गई हो उसे निकालना नामुमकिन है। इस्लामी विश्व में कुछ ऐसी ही वैचारिक दुर्गति है। वे अपनी मूढ़ता समझने तक की स्थिति में नहीं। वे बचपन से ही इस्लामी किताबों से ही मुख्य शिक्षा पाते हैं। और लोग जो कुछ भी बनते हैं, अपनी शिक्षा से ही।

इन बातों पर ध्यान न देने से ही आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई विफल रही है। अरब देशों की स्कूली किताबें खोल कर पन्ने-दर-पन्ने, किताब-दर-किताब, पढ़ना शुरु करें – तब समझ आएगा कि मानवता का संहार करने की सामर्थ्य रखने वाले हथियारों का जखीरा वही किताबें हैं! वफा के अनुसार, “मुसलमानों में आतंकी मानसिकता पैदा करने वाले स्कूल पूरी पृथ्वी पर मौजूद किसी भी हथियार फैक्टरी से अधिक खतरनाक हैं।”

वफा यह भी कहती हैं कि बाहरी लोगों को उस नैतिक विघटन का अंदाजा नहीं है जो मुस्लिम समाजों के जीवन के हर पक्ष को प्रभावित करता रहता है। ये लोग अपनी किसी गलती को महसूस करने में भी असमर्थ हैं। वे इसे अंतिम सत्य मानकर चलते हैं कि नमाज पढ़ने, रोजा रखने और कुरान पढ़ने के सिवा उन की कोई जिम्मेदारी नहीं। उन्हें इस्लाम ने यही सिखाया है। जिसमें एक मात्र ईनाम केवल मरने के बाद जन्नत ही है। उसके सिवा अपने लिए कोई लक्ष्य या आदर्श खोजना बेकार है।

ठीक इसीलिए, कोई मुस्लिम शासक यदि वे तीन काम (नमाज-रोजा-कुरान पढ़ना) करता है, तो वह अपने दूसरे कार्यों – लूट, भष्टाचार, हिंसा, बलात्कार, जन-संहार, क्रूरतम तानाशाही, आदि – के लिए जबावदेह नहीं माना जाता। वह सब तो अल्लाह की मर्जी है, या दुश्मनों की बदमाशी या दुष्प्रचार है। मुस्लिम जनता और शासक प्रायः यही मानते हैं। यह नैतिक खालीपन पूरे अरब और मुस्लिम समाजों में देखा जा सकता है। सद्दाम, खुमैनी, बिन लादेन या बगदादी – ऐसे लोगों की निंदा यदि कोई मुसलमान करता है, तो मात्र दूसरे फिरके का। उस के अपने फिरके वाले उसे ‘महान’ या ‘शहीद’ मानते हैं। इस के सिवा कुछ नहीं।

मुसलमान अपनी कोई गलती यदि मानते हैं तो यही कि इस्लाम के उसूल, मुहम्मद के आदेश, शरीयत, आदि को ठीक से लागू नहीं कर रहे। तलवार चला कर पूरी धरती को मुहम्मदी मतवाद के तले नहीं ला रहे। अल्लामा इकबाल की मशहूर किताब ‘शिकवा’ और  ‘जबावे शिकवा’ (1909) से भी इसे देख सकते हैं। यह तो एक गैर-अरब मुस्लिम की समझ है। फिर भी, उस नैतिक खालीपन को पूरी तरह दिखाती है, जिस से मुस्लिम जगत स्थाई रूप से ग्रस्त है।

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पैगंबर मोहम्मद साहब ने मक्का विजय के बाद एक नीग्रो गुलाम बिलाल को पवित्र काबा की छत पर चढ़कर नमाज के लिए अजान देने का हुक्म दिया। बिलाल ने कुछ ही समय पहले इस्लाम अपनाया था। जब वह पवित्र काबा की छत पर चढ़ा तो कुछ कुलीन अरब नागरिक चिल्लाकर बोले, �ओह! बुरा हो उसका, वह काला हब्शी अजान के लिए पाक काबा की छत पर चढ़ गया।� अश्वेतों के प्रति यह पूर्वाग्रह देख पैगंबर मोहम्मद साहब परेशान हो गए। उन्होंने कहा, �ऐ लोगो! यह याद रखो कि सारी मानव जाति केवल दो श्रेणियों में बंटी है। पहली धर्मनिष्ठ, खुदा… Read more »
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