कसौटी पर मुस्लिम मतदाता

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-रमेश पाण्डेय-
muslim

आज देश का मुस्लिम मतदाता कसौटी पर है। 16वीं लोकसभा के चुनाव में कहीं मोदी के नाम पर मुसलमानों को डराया जा रहा है तो कहीं उन्हें वोट बैंक के रुप में इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है। मुसलमान भी इस देश को अपनी मातृभूमि मानता है। समाज में अन्य सभी धर्म के लोगों के साथ सहिष्णु भाव से रहता है। सामाजिक परंपराओं, वैवाहिक कार्यक्रमों जैसे आयोजनों में वह भी अन्य धर्म के लोगों के साथ शरीक होता है। पर जैसे ही चुनाव आता है, उसे किसी न किसी का भय दिखाया जाने लगता है। देश में संचार सुविधाएं बढ़ गयी हैं, लोग जागरुक हो गए हैं। धार्मिक वैमनस्यता की खाईं कम हुई है, बावजूद इसके भी चुनाव के समय में मुसलमानों को कसौटी पर आखिर क्यों खड़ा कर दिया जाता है। एक घटनाक्रम पर नजर डालें तो वर्ष 1952 में मौलाना अबुल कलाम आजाद को जब पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उत्तर प्रदेश के रामपुर से चुनाव लड़ने को कहा, तो उन्होंने नेहरू से कहा था कि उन्हें मुसलिम बहुल रामपुर से चुनाव नहीं लड़ना चाहिए। क्योंकि वह हिंदुस्तान के पक्ष में है और रामपुर से चुनाव लड़ने पर लोग यही समझेंगे कि वह हिंदुस्तान में पाकिस्तान नहीं जानेवाले मुसलमानों के नुमाइंदे भर हैं। लेकिन पंडित जवाहर लाल नेहरू माने नहीं। आजादी के बाद का वह पहला चुनाव था और उस वक्त कुल 17 करोड़ वोटर देश में थे।

संयोग देखिये कि 2014 के चुनाव के वक्त देश में लगभग 17 करोड़ मुस्लिम वोटर हैं। 1952 में देश के मुसलमानों को साबित करना था कि वे नेहरू के साथ हैं, और 2014 में पहली बार खुले तौर पर मुस्लिम धर्म गुरु यह कहने में हिचक नहीं रहे कि नरेंद्र मोदी से उन्हें डर लगता है या फिर मोदी पीएम बने तो फिरकापरस्त ताकतें हावी हो जाएंगी। तो क्या आजादी के बाद पहली बार देश का मुस्लिम समाज खौफजदा है? या फिर पहली बार भारतीय समाज में इतनी मोटी लकीर मोदी के नाम पर खींची जा चुकी है, जहां चुनाव लोकतंत्र से इतर सत्ता का ऐसा प्रतीक बन चुका है, जिसमें जीतना पीएम की कुर्सी को है और हारना देश को है। देश में मोदी को लेकर मुस्लिम समाज में एकजुटता यदि जातीय समीकरण को तोड़ हिंदू वोटरों का ध्रुवीकरण कर रहा है। 2014 के चुनाव का नतीजा कुछ भी हो देश का रास्ता तो लोकतंत्र से इतर जाता हुआ लगता है। कहीं न कहीं, मुस्लिम समाज की इस स्थिति के लिए मुस्लिम समाज के धर्मगुरु ही जिम्मेदार हैं। हम बात चाहे दिल्ली स्थिति जामा मस्जिद के मौलाना अब्दुल्ला बुखारी की करें या फिर देववंद के मदनी साहब की। इन लोगों ने जिस तरह से चुनाव के समय में मुसलमानों को किसी एक की झोली में डालने की कोशिश की है, उससे ऐसा लगता है कि समाज में विभाजन की नींव पड़नी शुरू हो गयी है। आज मुसलमान को ऐसी स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया गया है कि वह देश की मुख्यधारा में चाहकर भी शामिल नहीं हो पा रहा है। ऐसी परिस्थियों से उबरने की सबसे अधिक जिम्मेदारी मुस्लिम समाज के नौजवानों पर है। अगर वह भी इस दकियानूसी फरमानों के चक्कर में फंस गए तो परिस्थितियां ज्यों की त्यों बनी रहेंगी और इसका लाभ रानीतिक दल के लोग ध्रुवीकरण करके लेते रहेंगे।

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