लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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-विजय कुमार

भारत में स्वाधीनता के बाद भी अंग्रेजी कानून और मानसिकता जारी है। इसीलिए इस्लामी, ईसाई और वामपंथी आतंकवाद के सामने ‘भगवा आतंक’ का शिगूफा कांग्रेसी नेता छेड़ रहे हैं। इसकी आड़ में वे उन हिन्दू संगठनों को लपेटने के चक्कर में हैं, जिनकी देशभक्ति तथा सेवा भावना पर विरोधी भी संदेह नहीं करते। किसी समय इस झूठ मंडली की नेता सुभद्रा जोशी हुआ करती थीं; पर अब लगता है इसका भार चिदम्बरम और दिग्विजय सिंह ने उठा लिया है।

ये लोग हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबेल्स के चेले हैं। उसके दो सिद्धांत थे। एक – किसी भी झूठ को सौ बार बोलने से वह सच हो जाता है। दो – यदि झूठ ही बोलना है, तो सौ गुना बड़ा बोलो। इससे सबको लगेगा कि बात भले ही पूरी सच न हो; पर कुछ है जरूर। इसी सिद्धांत पर चलकर ये लोग अजमेर, हैदराबाद, मालेगांव या गोवा आदि के बम विस्फोटों के तार हिन्दू संस्थाओं से जोड़ रहे हैं। उन्हें लगता है कि दुनिया भर में फैले इस्लामी आतंकवाद के सामने इसे खड़ाकर भारत में मुसलमान वोटों की फसल काटी जा सकती है। सच्चर, रंगनाथ मिश्र और सगीर अहमद रिपोर्टों की कवायद के बाद यह उनका अगला कदम है।

सच तो यह है कि आतंकवाद का हिन्दुओं के संस्कार और व्यवहार से कोई तालमेल नहीं है। वैदिक, रामायण या महाभारत काल में ऐसे लोगों को असुर या राक्षस कहते थे। वे निरपराध लोगों को मारते और गुलाम बनाते थे। इसे ही साहित्य की भाषा में कह दिया गया कि वे लोगों को खा लेते थे; पर वर्तमान आतंकवादी उनसे भी बढ़कर हैं। ये विधर्मियों को ही नहीं, स्वधर्मियों और स्वयं को भी मार देते हैं।

हिन्दू चिंतन में ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ की भावना और भोजन से पूर्व गाय, कुत्तो और कौए के लिए भी अंश निकालने का प्रावधान है। ‘अतिथि देवो भव’ का सूत्र तो शासन ने भी अपना लिया है। अपनी रोटी खाना प्रकृति, दूसरे की रोटी खाना विकृति और अपनी रोटी दूसरे को खिला देना संस्कृति है। यह संस्कृति हर हिन्दू के स्वभाव में है। ऐसे लोग आतंकवादी नहीं हो सकते; पर मुसलमान वोटों के लिए एक-दो दुर्घटनाओं के बाद कुछ सिरफिरों को पकड़कर उसे ‘भगवा आतंक’ कहा जा रहा है।

कांग्रेस वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या विश्व हिन्दू परिषद और लश्कर, सिमी या हजारों नामों से काम करने वाले इन आतंकी गिरोहों को न जानते हों, यह भी असंभव है; पर आखों पर जब काला चश्मा लगा हो, तो फिर सब काला दिखेगा ही।

संघ को समझने के लिए बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं होती। देश भर में हर दिन सुबह-शाम संघ की लगभग 50,000 शाखाएं सार्वजनिक स्थानों पर लगती हैं। इनमें से किसी में भी जाकर संघ को समझ सकते हैं। शाखा में प्रारम्भ के 40 मिनट शारीरिक कार्यक्रम होते हैं। बुजुर्ग लोग आसन करते हैं, तो नवयुवक और बालक खेल व व्यायाम। इसके बाद वे कोई देशभक्तिपूर्ण गीत बोलते हैं। किसी महामानव के जीवन का कोई प्रसंग स्मरण करते हैं और फिर भगवा ध्वज के सामने पंक्तियों में खड़े होकर भारत माता की वंदना के साथ एक घंटे की शाखा सम्पन्न हो जाती है।

मई-जून मास में देश भर में संघ के एक सप्ताह से 30 दिन तक के प्रशिक्षण वर्ग होते हैं। प्रत्येक में 100 से लेकर 1,000 तक शिक्षार्थी भाग लेते हैं। इनके समापन कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में जनता तथा पत्रकार आते हैं। प्रतिदिन समाज के प्रबुध्द एवं प्रभावी लोगों को भी बुलाया जाता है। आज तक किसी शिक्षार्थी, शिक्षक या नागरिक ने नहीं कहा कि उसे इन शिविरों में हिंसक गतिविधि दिखाई दी है।

संघ के स्वयंसेवक देश में हजारों संगठन तथा संस्थाएं चलाते हैं। इनके प्रशिक्षण वर्ग भी वर्ष भर चलते रहते हैं। इनमें भी लाखों लोग भाग ले चुके हैं। विश्व हिन्दू परिषद वाले सत्संग और सेवा कार्यों का प्रशिक्षण देते हैं। बजरंग दल और दुर्गा वाहिनी वाले नियुद्ध ि‍(जूडो, कराटे) तथा एयर गन से निशानेबाजी भी सिखाते हैं। इससे मन में साहस का संचार होकर आत्मविश्वास बढ़ता है। इन शिविरों के समापन कार्यक्रम भी सार्वजनिक होते हैं। संघ और संघ प्रेरित संगठनों का व्यापक साहित्य प्राय: हर बड़े नगर के कार्यालय पर उपलब्ध है। अब तक हजारों पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं तथा करोड़ों पुस्तकें बिकी होंगी। किसी पाठक ने यह नहीं कहा कि उसे इस पुस्तक में से हिंसा की गंध आती है।

सच तो यह है कि जिस व्यक्ति, संस्था या संगठन का व्यापक उद्देश्य हो, जिसे हर जाति, वर्ग, नगर और ग्राम के लाखों लोगों को अपने साथ जोड़ना हो, वह हिंसक हो ही नहीं सकता। हिंसावादी होने के लिए गुप्तता अनिवार्य है और संघ का सारा काम खुला, सार्वजनिक और संविधान की मर्यादा में होता है। संघ पर 1947 के बाद तीन बार प्रतिबंध लग चुका है। उस समय कार्यालय पुलिस के कब्जे में थे। तब भी उन्हें वहां से कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली।

दूसरी ओर आतंकी गिरोह गुप्त रूप से काम करते हैं। वे इस्लामी हों या ईसाई, नक्सली हों या माओवादी कम्यूनिस्ट; सब भूमिगत रहकर काम करते हैं। उनके पर्चे किसी बम विस्फोट या नरसंहार के बाद ही मिलते हैं। उनके प्रशिक्षण शिविर पुलिस, प्रशासन या जनता की नजरों से दूर घने जंगलों में होते हैं। ये गिरोह जनता, व्यापारी तथा सरकारी अधिकारियों से जबरन धन वसूली करते हैं। न देने वाले की हत्या इनके बायें हाथ का खेल है। ऐसे सब गिरोहों को बड़ी मात्रा में विदेशों से भी धन तथा हथियार मिलते हैं।

हिन्दू संगठनों की प्रेरणा हिन्दू धर्मग्रन्थ ही होते हैं; और किसी धर्मग्रन्थ में निरपराध लोगों की हत्या करने को नहीं कहा गया हैं। हां, अत्याचारी का वध जरूर होना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता का तो यही संदेश है; लेकिन दूसरी ओर इस्लाम, ईसाई या कम्युनिस्टों के मजहबी ग्रन्थों में अपने विरोधी को किसी भी तरह से मारना उचित कहा गया है। विश्‍व भर में फैली मजहबी हिंसा का कारण यही किताबें हैं। अधिकांश लोग इन्हें गलती से धर्मग्रन्थ कह देते हैं, जबकि ये मजहबी किताबें हैं।

संघ और वि.हि.परिषद का जन्म हिन्दू समाज को संगठित करने के लिए हुआ है; और हिंसा से विघटन पैदा होता है, संगठन नहीं। संघ मुस्लिम और ईसाई तुष्टीकरण का विरोधी है। वह उस मनोवृति का भी विरोधी है, जिसने देश को बांटा और अब अगले बंटवारे के षडयन्त्र रच रहे हैं। इसके बाद भी संघ का हिंसा में विश्वास नहीं है। वह मुसलमान तथा ईसाइयों में से भी अच्छे लोगों को खोज रहा है। संघ किसी को अछूत नहीं मानता। उसे सबके बीच काम करना है और सबको जोड़ना है। ऐसे में वह किसी वर्ग, मजहब या पंथ के सब लोगों के प्रति विद्वेष रखकर नहीं चल सकता।

इसलिए भगवा आतंक का शिगूफा केवल और केवल एक षड्यंत्र है। यह खिसियानी बिल्ली के खंभा नोचने का प्रयास मात्र है। दिग्विजय सिंह हों या उनकी महारानी, वे आज तक किसी इस्लामी आतंकवादी को फांसी नहीं चढ़ा सके हैं। अब भगवा आतंक का नाम लेकर वे इस तराजू को बराबर करना चाहते हैं। उनका यह षड्यंत्र हर बार की तरह इस बार भी विफल होगा।

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25 Comments on "भगवा आतंक का नया शिगूफा"

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Ashwani Garg
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Sadhuvad to Shree Vijay Kumar for this article. Actually the current home minister Chidambaram also knows that Hindu sangathans are patriotic. But to keep his chair he seems to be under too much pressure from managers of Congress to compete for the minority votes. Now that Arjun Singh has retired this responsibility of condemning Hindu organizations has fallen on his shoulders. This whole fight is about 20% votes and all he is doing by issuing such statements is trying to take credit for increasing share of congress in these 20% votes. Comptition is fierce – Lalu Prasad, Paswan, Mayavati, JDU,… Read more »
श्रीराम तिवारी
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अंकिता पोकरियाल की टिप्पणी सही है .न केवल bombey बल्कि अहेमदबाद ;कानपूर ;सूरत और इंदौर में जहाँ -जहाँ aituc की लाल झंडा श्रमिक union थी ;वहां -वहां गाँधी जी ने मजदूरों को लाल झंडे से दूर रखने की तरकीब यह निकालीकी गुलजारीलाल नंदा के नेतृत्व में intuc नामक समानांतर श्रमिक संघ की स्थापना कर पूंजीपतियों के समर्थन वाली union का आगाज किया .दूसरी और देश के संगठित किसानो से घबराकर भूतपूर्व राजे रजवाड़े भी पह्य्ले तो कांग्रेस की शरण में गए किन्तु जब इंदिरा गाँधी ने भूमि सीलिंग कानून बनाने और उनके प्रीवी पर्स छीने तो देश के अधिकांस रजवाड़े… Read more »
Indian
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हरी किशनजी, हमारे देश का तो एक ही ध्वज है , और वो है तिरंगा. विश्व-विजयी तिरंगा प्यारा झंडा ऊंचा रहे हमारा. बाकी तो सभी राजनीतिक विचारधाराओं के ध्वज हैं जो लोगों को अलग अलग हुज़ूमों में बाँटने का काम करते हैं. कुछ ऐसे ख्वाब दिखाते हैं जो आज …तक ना तो पूरे हुए हैं और ना ही कभी होंगे क्यूंकि ये ऐसे ख्वाब हैं जो सच्चे मन से नहीं देखे गए हैं. ये ऐसे ख्वाब हैं जो भेदभाव के साथ देखे गए हैं. ये ऐसे ख्वाब हैं जो कुछ स्वार्थी लोगों के द्वारा देखे गए हैं. ये ऐसे ख्वाब… Read more »
GOPAL K ARORA
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राष्ट्र ध्वज के साथ साथ सेना में हर रेजिमेंट के अलग अलग ध्वज होतें हैं और उनको भी पूरा महत्त्व दिया जाता है , आपके विचार से तो ऐसा लगता है कि वे भी हटा देने चाहिएं ,

लोकेन्द्र सिंह राजपूत
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संघ को जितना मैंने देखा है वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के निर्माण में संलग्र है। मेरे कॉलोनी में संघ के स्वयं सेवकों का बड़ा सम्मान है। इस क्षेत्र के सभी रहवासी चाहे वे किसी भी धर्म, जाति, पार्टी को मानने वाले हो संघ के स्वयं सेवकों को बड़ा मान देते हैं और उन पर अगाध विश्वास करते हैं। अब बात करें दिग्विजय की तो ये महाशय महाधूर्त राजनीतिज्ञ हैं। लोगों में भ्रम फैलाने के अलावा इन्हें और कुछ नहीं आता। मप्र को सालों पीछे धकेलने में इनका अभूतपूर्व योगदान है। गायेबगाये ये संघ और उसके अनुसांगिक संगठनों को लांक्षित करते रहते… Read more »
Ankita Pokhariyal
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आज चिदंबरम जी को भगवा आतंकवाद लग रहा है कांग्रेस ने क्या कम आतंकवाद फैलाया है ये भगवा आतंकवाद कांग्रेस की बोयी हुई फसल है जो कांग्रेस आज बाल ठाकरे की कारगुजारियों पर सख्त एतराज जता रही है, उसी के वसंतराव नाइक ने1960 और 70 के दशक में वामदलों के वर्चस्व वाली मुंबई की ट्रेड यूनियनों और वाम दलों को कमजोर करने के लिए शिवसेना को जमकर प्रोत्साहन दिया था. जब शिवसेना की महत्वाकांक्षाएं मुंबई और थाणे से बाहर का रुख करने लगीं तो कांग्रेस को उसमें अपना सबसे बड़ा दुश्मन दिखाई देने लगा. बाद में इसी कांग्रेस ने शिवसेना… Read more »
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