लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव
पहले लोकपाल विधेयक लाने के लिए सिविल सोसाइटी और संसद के बीच टकराव के हालात बने तो अब लोकपाल कानून बन जाने के बाद, इसकी नियुक्ति को लेकर केंद्र सरकार और शीर्ष न्यायालय के बीच टकराव की स्थिति के आसार बनते नजर आ रहे हैं। लोकपाल की नियुक्ति को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीष टीएस ठाकुर ने बेहद कड़े लहजे में कहा है कि ‘न्यायपालिका लोकपाल कानून को व्यर्थ नहीं होने देगी।‘ इस कथन को सरकार और विधायिका अपने अधिकार क्षेत्र में न्यायपालिका का हस्तक्षेप मान सकती हैं, लेकिन यहां स्वाभाविक रूप से यह सवाल खड़ा होता है कि लोकपाल विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित होने के 3 साल बीत जाने के बावजूद लोकपाल की नियुक्ति क्यों नहीं की गई ? जाहिर है, इस संस्था का अब तक गठन न होना, यह जताता है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की प्राथमिकता में इस संस्था को वजूद में लाना नहीं है। अन्यथा ढाई साल के कार्यकाल में लोकपाल की नियुक्ति की जा सकती थी। हालांकि सरकार की मंशा पर एकाएक शक करना इसलिए उचित नहीं है, क्योंकि इस सरकार ने सत्ता संभालते ही कालाधन वापिसी के लिए एसआईटी का गठन किया और अब भ्रष्टाचार पर लगाम के लिए बड़े नोट बंद कर दिए।
लोकपाल की नियुक्ति बावत न्यायलय में जनहित याचिका गैर सरकारी संगठन काॅमन काॅज ने लगाई हुई है। अदालत ने जब लोकपाल की नियुक्ति नहीं किए जाने बावत सरकार से जवाब-तलब किया तो सरकार की ओर से महाधिवक्ता ने उत्तर दिया कि ‘इस समय लोकसभा में विपक्ष का कोई नेता नहीं है, इसलिए लोकपाल का चयन संभव नहीं हो पा रहा है।‘ दरअसल विधेयक के प्रारूप में प्रावधान है कि लोकपाल का चयन करने वाली समिति के सदस्यों में प्रधानमंत्री, सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीष या उनके द्वारा नामांकित कोई जज, लोकसभा अध्यक्ष, एक प्रतिष्ठित न्यायविद् और नेता प्रतिपक्ष का होना जरूरी है। वर्तमान लोकसभा का यह दुर्भाग्य है कि विपक्ष का कोई नेता नहीं है। इस कारण लोकपान की नियुक्ति केंद्र सरकार टालती चली आ रही है। जबकि काॅमन काॅज के वकील ने अदालत को ध्यान दिलाया कि विपक्ष का नेता नहीं होने के बावजूद केंद्रीय सूचना आयाुक्त, सीबीआई निदेशक और केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्तियों का ता निकाला गया और इनके लिए संबंधित कानूनों में संशोधन भी किए गए। जबकि इन नियुक्तियों से संबंधित समितियों में नेता-प्रतिपक्ष सदस्य हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे द्वारा रामलीला मैदान और जंतर-मंतर पर किए गए आंदोलनों के फलस्वरूप लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक 2013 में लोकसभा और राज्यसभा से पारित हुए थे। 1 जनवरी 2014 को इसे राष्ट्रपति की भी मंजूरी मिल गई थी। यह सही है की लोकपाल की नियुक्ति नहीं होने की वजह कानूनी तकनीक है। लेकिन जिस तरह से केंद्रीय संस्थाओं के पदाधिकारियों की नियुक्तियों के लिए रास्ता निकाला गया, उसी तर्ज पर सरकार लोकपाल के लिए भी रास्ता निकाल सकती है। हालांकि लोकपाल कानून में संशोधन का विधेयक प्रस्तावित है, लेकिन यह अभी पारित नहीं हो सका है। सरकार चाहती तो आध्यादेश लाकर भी लोकपाल की नियुक्ति कर सकती थी। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने भी अध्यादेश के जरिए लोकपाल की नियुक्ति क्यों नहीं की गई यह प्रश्न सरकार से पूछा था। लेकिन सरकार ने इसका कोई सीधा उत्तर नहीं दिया। सरकार को अब तक चयनसमिति में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष या विपक्ष में सबसे बड़ी पार्टी के नेता को सदस्य बनाए जाने के रूप में संशोधन कर लेना चाहिए था। लेकिन ऐसा न तो सरकार ने किया और न ही विपक्षी दलों ने सरकार पर नियुक्ति के लिए दबाव बनाया।
सब जानते हैं कि लोकपाल विधेयक सिविल सोसाइटी के लंबे संघर्श और अन्ना हजारे की भूख हड़ताल के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आया, तब केंद्र में सप्रंग सरकार थी और डाॅ मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। 2011 में लोकपाल के लिए इतना बड़ा आंदोलन हुआ था कि पूरे देश में जनता अन्ना हजारे के साथ खड़ी थी। भ्रष्टाचार के खिलाफ इस लड़ाई में मीडिया भी अन्ना के साथ खड़ा दिखाई दिया था। केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा और उसके सहयोगी दल भी आंदोलन के साथ थे। अरुण जेटली और सुशमा स्वराज ने लोकसभा और राज्यसभा में हुई लोकपाल के लिए हुई बहसों में लोकपाल विधेयक लाने की जबरदस्त तार्किक पैरवी की थी। तब गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने सुशमा और जेटली को बधाई देकर पीठ थपथपाई थी और जब विधेयक संसद से पारित हुआ तो मोदी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ इस कानून के लिए सभी संसद सदस्यों को बधाई दी थी। लेकिन अब वही मोदी खमोष हैं। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अपेक्षित तो यह था कि वे लोकपाल की नियुक्ति में आ रही बाधाओं को तत्परता से दूर करते और देश को लोकपाल देते। किंतु ऐसा कुछ हुआ नहीं। नतीजतन काॅमन काॅज को अदालत का दरवाजा खटकाना पड़ा।
हालांकि भ्रष्टाचार की व्यापकता और उसकी स्वीकार्यता की महिमा जिस अनुपात में समाज में व्याप्त हो चुकी है, उसका निर्मूलन इस अकेले कानून से संभव नहीं है। लोकपाल से संबंद्ध जो पूरक विधेयक लंबित हैं, उनके प्रारुप को भी वैधानिक दर्जा मिलना जरुरी है। तभी, लोकपाल जैसे सशक्त प्रहरी की वास्तविक सार्थकता सामने आएगी। लोकसेवकों की कार्यप्रणाली में पारदर्षिता और उत्तरदायित्व के समावेष भी तभी परिलक्षित होंगे। इस नाते नागरिक अधिकार-पत्र को कार्यरुप देने और गड़बड़ियों की सूचना देने वालों ;व्हिसलब्लोअर्स को संरक्षण देने संबंधी कानूनों को विधायी स्वरुप देना जरुरी है। इसी क्रम में भारतीय विधि आयोग की उस 166 वीं रिपोर्ट को क्रियान्वित करने की जरुरत भी है, जिसमें भ्रष्टाचारियों की संपत्ति जब्त करने के कानूनी उपाय सुझाए गए हैं। आयोग ने 1999 के सुझावों को विधेयक के रुप में तब्दील कर इसे कानूनी स्वरुप देने की सिफारिश की थी। लेकिन संसद से अभी तक यह कानून पारित नहीं हो सका है। अगर विपक्ष या सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा जन हस्तक्षेप कालांतर में जारी नहीं रहता तो स्वतंत्र भारत में भ्रष्टाचार का सुरसामुख लगातार फैलता रहा है। उसने सरकारी विभागों से लेकर सामाजिक सरोकारों से जुड़ी सभी संस्थाओं को अपनी चपेट में ले लिया है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मानवीय मूल्यों से जुड़ी संस्थाएं भी अछूती नहीं रहीं। नौकरशाही को तो छोड़िए, देश व लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था संसद की संवैधानिक गरिमा बनाए रखने वाले संासद भी सवाल पूछने और चिट्ठी लिखने के ऐवज में रिश्वत लेने से नहीं हिचकिचाते। जाहिर है, भ्रष्टाचार लोकसेवकों के जीवन का एक तथ्य मात्र नहीं, बल्कि शिष्टाचार के मिथक में बदल गया है। जनतंत्र में भ्रष्टाचार की मिथकीय प्रतिष्ठा उसकी हकीकत में उपस्थिति से कहीं ज्यादा घातक इसलिए है, क्योंकि मिथ हमारे लोक-व्यवहार में आदर्श स्थिति के नायक-प्रतिनायक बन जाते हैं। राजनीतिक व प्रशासनिक संस्कृति का ऐसा क्षरण राष्ट्र को पतन की ओर ही ले जाएगा ?
राजनीति परिणामूलक रहे, इसके लिए जरुरी है कि राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था लोक की निगरानी में रहे। जरुरत पड़ने पर आंदोलित भी होते रहें। इसी के समानांतर विधायिका और कार्यपालिका का दायित्व बनता है कि जनतंत्र से उपजने वाली असहमतियों का वह सम्मान करे और उसके अनुरुप चले। क्योंकि भारतीय प्रजातंत्र में अब तक बड़े समुदायों को लोकतंत्रिक प्रक्रियाओं से जुदा रखा गया है। कानून बनाने में उनकी सलाह या साझेदारी को स्वीकार नहीं किया गया। लिहाजा कानूनों को जन समूदायों पर ऊपर से थोप दिया जाता है। पंचायती राज प्रणाली का भी यही हश्र हुआ। कुछ ऐसी ही वजहें रहीं कि लोकतंत्र का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ ‘संविधान’ और सर्वोच्च संस्था ‘संसद’ वास्तविक व्यवहार में जनता से दूरी बनाते चले गए और इनसे प्रदत्त अधिकार विशेषधिकार प्राप्त सांसदों व विधायकों में सिमटते चले गए। इन पर निगरानी के लिए लोकपाल की नियुक्ति जरूरी है। फिलहाल राज्यों में भी लोकायुक्त की नियुक्ति और अधिकार संबंधी कानूनों में भिन्नता है। इसमें भी एकरूपता की जरूरत है। केंद्र में लोकपाल नियुक्त हो जाता है तो संभव है, इसी विधेयक के प्रारूप को राज्य भी स्वीकार लें। लिहाजा भ्रष्टाचार और कालाधन के खिलाफ नरेंद्र मोदी ने जिस तरह की मुहिम चलाई हुई है, उसका हिस्सा यदि लोकपाल भी बनता है तो मोदी इस श्रेय के भी हकदार हो जाएंगे। लिहाजा उन्हें बस्ते में बंद पड़े लोकपाल की बहाली के उपाय करना चाहिए।
प्रमोद भार्गव

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