लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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संदंर्भ:अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन ने उजागर की करतूत

प्रमोद भार्गव

 

आखिरकार अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन यह मानने को तैयार हो गया है कि पाकिस्तान सेना की बजाय आतंकवादियों के जरिए भारत से छद्म युद्ध लड़ रहा है। अमेरिकी कांग्रेस के समक्ष पाकिस्तान का सौ पेजी काला चिट्ठा खोलते हुए कहा कि पाकिस्तान उेसा इसलिए कर रहा है,क्योंकि उसकी सेनाएं बेहतर भारतीय सेनाओं से प्रत्यक्ष मुकाबला करने में कमजोर है। लिहाजा पाक आतंकी संगठनों का लड़ाई में परोक्ष रूप से इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि भारत के लिए यह खुलासा कोई नई बात नहीं है,क्योंकि भारत तो पिछले 30 साल से इस छाया युद्ध से सामना कर रहा है। इसकी शुरूआत पंजाब में पाकिस्तानी शह से शुरू किए गए उग्रवाद से हुई थी। बावजूद अमेरिका का यह खुलासा इसलिए महत्वपूर्ण है,क्योंकि पाक के चेहरे से नकाब को अमेरिका ने हटाया है,इसलिए इस हकीकत को अंतरराष्ट्रिय स्तर पर देर सबेर मान्यता मिल जाएगी।

पीवी नरसिंह राव जब देश के प्रधानमंत्री थे, तब कश्मीर घाटी से तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह की गलतियों के चलते अलगाववादी कश्मीरी पंडितों को विस्थापित कर चुके थे और पंजाब में खालिस्तानी उग्रवाद चरम पर था। नरसिंह राव ने सत्ता पर काबिज होने के बाद आंतकवाद की इस नब्ज को समझा और पत्रकारों से पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने कहा कि यह आतंकवाद पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित छाया-युद्ध ;प्राॅक्सी बार है। इसके बाद राव ने पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री और सेना को आतंकवाद से निपटने की खुली छूट देकर पंजाब में चल रहे इस छाया युद्ध को जड़ से नेस्तनाबूद कर दिया था। तब से अब तक इन ढाई दशकों में पंजाब में आतंकवाद सिर नहीं उठा पाया है।

पेंटागन द्वारा दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ किया गया यह खुलासा भारत के लिए एक ऐसा अवसर है कि वह इसे कश्मीर मुद्दे पर भुनाकर अंतरराष्ट्रिय सहमति हासिल कर सकता है। क्योंकि पाक कश्मीर में आतंक निर्यात करके फिलहाल उल्टा चोर कोतवाल को डांटे की भूमिका मे है। इसलिए वह इस मुद्दे को बार-बार संयुक्त राष्ट्र में उठाकर जम्मू-कश्मीर में जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार का राग अलाप रहा है। जबकि वर्तमान में इस क्षेत्र में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला खुद यह स्वीकार कर रहे है कि नरेंद्र मोदी लहर के चलते भाजपा मिशन 44 के लक्ष्य को पूरा कर सकती है। इस तथ्य से साफ होता है कि भारत में सरकार किसी भी दल की रहे वह संविधान के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत का पूरा ख्याल रखती है। जबकि पाक आतंकवादियों को प्रोत्साहित करके भारत में आतंकवाद को विस्तार देने का नापाक मंसूबा पाले हुए है। इस तथ्य की पुष्टि भारतीय खुफिया एंजेसीयों द्वारा कोलकाता में आतंकी हरकतों का खुलासा करने से हुई है। इन हरकतों को इतने बड़े पैमाने पर अंजाम देने का इरादा था कि भारत सरकार को 7 नबंवर को होने वाले नौ सेना दिवस पर आयोजित कार्यक्रमों को संक्ष्प्ति करना पड़ा है।

कश्मीर के परिप्रेक्ष्य में मोदी और उनकी सरकार की क्या रणनीति और दूरदृष्टि है, यह तो अभी साफ नहीं हुआ है,लेकिन पिछले दिनों मोदी ने जो सियाचिन, श्रीनगर,लेह और कारगिल की यात्राएं की थीं उनसे इतना जरुर साफ हुआ है कि वे घाटी में सामरिक रणनीति के साथ-साथ विकास के बहाने राजनीतिक अजेंडे को भी आगे बढ़ाना चाहते हैं। शायद मोदी ने इसीलिए लेह एवं कारगिल में सेना की ताकत बढ़ाने की बजाय, मानवतावादी शक्तियों को मजबूत करने की बात कही थी। साथ ही कहा था कि यदि दुनिया की सभी मानवतावादी ताकतें एकजुट हो जाएं तो हिंसा में शामिल लोगों की मानसिकता बदली जा सकती है। यदि शांति के प्रयासों से कश्मीर या दुनिया में शांति बहाल होती है तो इससे अच्छा दूसरा कोई उपाय नहीं है ? लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अटलबिहारी वाजपेयी जब पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री परवेज मुशर्रफ से आगरा में शांति वार्ता कर रहे थे, तभी पाक ने कारगिल की दुर्गम पर्हािड़यों पर सेना और आतंकवादियों की घुसपैठ कराकर कारगिल पर अवैध कब्जा कर लिया था। विभाजन के बाद यह सबसे बड़े छद्म युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार थी। जम्मू-कश्मीर के बाद आतंकी छाया का यही विस्तार वर्धमान कांड के उजागार होने के बाद अब पश्चिम बंगाल में दिखाई दे रहा है। मोदी को इस पाठ से सबक लेने की जरूरत है,अन्यथा वे भी वाजपेयी की तरह छले जाएंगे।

भारत और पाक के बीच मई-जुलाई 1999 में कारगिल युद्ध लड़ा गया था। पाक के लिए यह छद्म या छाया युद्ध इसलिए था, क्यांेकि उसने वास्तविक नियंत्रण रेखा पार कराकर सैनिक और आतंकवादियों को कारगिल में गोला-बारुद व अन्य घातक हथियारों के साथ तैनात कर दिया था। हालांकि पाक इस सच्चाई से मुकर गया था कि पाक सेना के जवान भी कारगिल में थे। पाक ने दावा किया था कि लड़ने वाले सभी कश्मीरी उग्रवादी हैं। लेकिन बाद में सामने आए युद्ध के दस्तावेजों और पाकिस्तानी नेताओं के बयानों से साफ हो गया था कि उग्रवादियों के साथ-साथ पाक सेना भी इस छाया युद्ध में शामिल थी।

पाक की युद्ध विराम संबंधी हरकतों को हम छाया युद्ध की संज्ञा देकर उसकी उलाहना भले ही करते रहें,किंतु इसकी कीमत हम इतनी बड़ी तादात में चुका रहे हैं कि मात्र उलाहनाओं से इसकी पूर्ति होने वाली नहीं है। इस अपरोक्ष युद्ध में हमारे 527 सैनिक शहीद हुए थे और 1363 घायल हुए थे । यह युद्ध 30 हजार भारतीय सैनिकों और 5000 घुसपैठियों के बीच लड़ा गया था। पाक घुसपैठिये कारगिल की चोटियों से हमला बोल रहे थे और हमारे जाबांज सैनिक इन चोटियों को खाली कराने के लिए नीचे से ऊपर चढ़ रहे थे, इसलिए घुसपैठियों के आसान षिकार होते चले गए। जाहिर है, इस कथित छाया युद्ध में हमने जो कीमत चुकाई है, उसकी भरपाई महज उलाहनाओं अथवा खुलासों से संभव नहीं है। इसे निर्णायक मुकाम तक पहुंचाना होगा।

अमेरिकी रक्षा विभाग ने तो इस परोक्ष युद्ध का खुलासा अब किया है,लेकिन पाकिस्तान के ही पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एवं पाक गुप्तचर संस्था आईएसआई के अधिकारी शाहिद अजीज बहुत पहले कर चुके है। अजीज ने ‘द नशनल डेली‘ में एक लेख में कहा था कि ‘कारगिल युद्ध में पाक आतंकवादी नहीं,बल्कि उनकी वर्दी में पाकिस्तानी सेना के नियमित सैनिक ही लड़ रहे थे। इस लड़ाई का मकसद सियाचिन पर कब्जा करना था। चूंकि यह लड़ाई बिना किसी योजना और अंतरराष्ट्रिय हालातों का जायजा लिए बिना लड़ी गई थी। इसलिए तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ ने पूरे मसले को रफादफा कर दिया था। क्योंकि यदि इस परोक्ष युद्ध की हकीकत सामने आ जाती तो संघर्ष के लिए मुशर्रफ को ही जिम्मेबार ठहराया जाता‘।

अब जब पेंटागन ने यह मान ही लिया है कि भारत और अफगानिस्तान को निशाने पर लेने के नजरिए से आतंकी संगठन और पाकिस्तान मिलकर काम कर रहे है तो इस परिप्रेक्ष्य में अमेरिका की भविष्य में पाकिस्तान के खिलाफ क्या भूमिका रहने वाली है ? क्योंकि पाक की यह नापाक मंशा अफगनिस्तान में अपने प्रभाव में आई कमी को बहाल करना है,वहीं भारत की सेना से मुकाबला करने के लिए कर रहा है। ये दोनों ही कोशिशें नापाक और अंतरराष्ट्रिय नैतिकता के मानदण्डों के विरूद्ध हैं,इसलिए अमेरिका का दायित्व बनता है कि वह भी पाकिस्तान की नकेल कसने में अपनी जिम्मेबारी निभाएं।

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