लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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-डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री-   dodia

मकरसंक्रांति का उत्सव देशभर में किसी न किसी रूप में बहुत ही उत्साह से मनाया जाता है, लेकिन ओड़िशा में इस दिन का चयन मुस्लिम कट्टरपं​थियों ने वहां के सांस्कृतिक गौरव और अस्मिता के प्रतीक उत्कलमणी गोपबंधु की मुर्ति तोड़ने के लिए किया। कटक में गोपबंधु की मूर्ति तोड़कर ही वे शांत नहीं हुए, बल्कि प्रदेश के कुछ दूसरे शहरों में भी उन्होंने हिंसक प्रदर्शन किए और एक जाने माने मीडिया समूह को निशाना बनाते हुए उसके कार्यालय को आग के हवाले कर दिया। इन आक्रमणों में लोगों ने भागकर अपनी जान बचाई। ओड़िशा में सांप्रदायिक धृणा या तनाव का कोई इतिहास नहीं है। प्रदेश के मुसलमान भी कभी मुस्लमानी सत्ताकाल में हिंदुओं से ही मतांतरित हुए हैं, इसलिए ईश्वर की इबाददत का तरीका बदल लेने के बावजूद उन्होंने बहुत बड़ी हद तक अपनी पूरानी परंपराएं और तौर तरीके बदले नहीं है। ओड़िशा वैसे भी जगन्नाथ संस्कृति का क्षेत्र है। इसी कारण ओड़िशा में जाति या मजहब को लेकर भेदभाव या आपसी तनाव के उदहारण बहुत ही कम हैं। ओड़िशा के मुसलमानों के बारे में प्रसिद्ध है कि वे सालबेगी परंपरा को मानने वाले हैं। मुस्लिम संत कभी सालबेग ने भगवान जगन्नाथ की स्तुति में अनेक पदों की रचना की थी और आज भी मंदिर में वे पद गाए जाते हैं। वहां के मुसलमान गोपबंधु को उसी प्रकार अपनी सांस्कृतिक परंपरा का स्लाका पुरुष मानते रहे हैं, जिस प्रकार वे सालबेग को मानते हैं।

तब प्रश्न होता है कि ऐसी स्थिति में वहां के मुसलमानों ने गोपबंधु की मुर्ति तोड़कर, अप्रत्यक्ष रूप से ओड़िशा की सांस्कृतिक पहचान को, हिंसक चुनौती क्यों दी?  इस प्रश्न पर माथापच्ची करने से पहले इस घटना की पृष्टभूमि जान लेना भी  आवश्यक होगा। इसे संयोग ही कहना चाहिए कि इस बार मकरसंक्रांति और ईद-मिलादु-नवी एक ही दिन आए। ओड़िया भाषी एक समाचार पत्र में मकरसंक्रांति की सांस्कृतिक महत्ता बताने के साथ साथ इस्लाम पंथ के संस्थापक हजरत मुहम्मद के मानवता के लिए किए गए योगदान का सकारात्मक उल्लेख किया। इसमें कुछ अनोखापन भी नहीं था। विचार भिन्नता रहते हुए भी सभी महापुरूषों  के प्रति श्रद्धा अर्पित करना भारतीय परंपरा है। समाचार पत्र में एक छोटा सा चित्र भी प्रकाशित हुआ जिसके बारे में स्थानीय मुस्लमानों के एक गुट ने यह कहना शुरू कर दिया कि यह चित्र हजरत मुहम्मद का ही है। रिकॉर्ड के लिए बता दिया जाए कि दूनिया भर में हजरत मुहम्मद का कोई भी चित्र उपलब्ध नहीं है। इसलिए जिस चित्र को उपद्रवियों ने हजरत मुहम्मद का चित्र बताना शुरू किया, जरूर उनके मन में कोई न कोई बड़ी साजिश रही होगी। राज्य का गुप्तचर विभाग पिछले कुछ अरसे से प्रदेश सरकार को, यह खबर पहुंचाता रहा है कि राज्य में कुछ उग्रवादी समूह मुसलमानों को भेड़काने के काम में लगे हुए हैं। लेकिन जैसा कि अपने यहां रिवाज बन चुका है कि मुसलमानों के संबंध में कोई भी इस प्रकार की सूचना प्राप्त करने के बाद सरकारें आंख, कान, नाक बंद कर लेन ही श्रेयकर मानती हैं। इस मामले में भी ओड़िशा सरकार ने शायद यही किया। कट्रपंथियों को जो बहाना चाहिए था, वह उन्होंने किसी चित्र को हजरत मुहम्मद का चित्र बताकर स्वयं ही प्राप्त कर लिया और उसके बाद उन्होंने पिछले कुछ अरसे से की गई तैयारियों के बलबूते, ओड़िशा में अपनी आगे की रणनीति का खुलास भी कर दिया। मीडिया समूह की करोड़ों की संपत्ति नष्ट कर दी गई, पत्रकारों को धमकियां दी गई और बहुत से लोगों को चोटे आईं। इतना तो जरूर है कि  सरकार के चुप्पी साध लेने के कारण भय का वातावरण बना।

तर्क के लिए मान भी लिया जाए कि जिस चित्र को ये कटरपंथी हजरत मुहम्मद का बता रहे हैं, उसे भी समाचार को छापना नहीं चाहिए था। इन कटरपंथी समूहों का कहना है कि इस चित्र के छपने से उनकी मजहबी भावना को ठेस पहुंची है। तर्क के लिए हम इसे भी स्वीकार कर लेते हैं। इसके बाद प्रश्न पैदा होता है कि भावना को ठेस पहुंचने की प्रतिक्रिया में मुसलमानों को क्या करना चाहिए था? यदि यह सारा हंगामा खड़े करने वाले कटरपंथी मुसलमानों के तर्क का ही सहारा लिया जाए तो कहा जा सकता है कि उन्हें ओड़िशा के विभिन्न शहरों में इसके खिलाफ प्रदर्शन करने का अधिकार था और वह उन्होंने किए भी। इससे भी आगे जाकर कहा जा सकता है कि उन्हें हिंसक प्रदर्शन करने का भी अधिकार था और वह भी उन्होंने किया। उन्हें अखबार के दफ्तर पर हमला करने, वहां के लोगों से मार-पीट करने और अखबार के दफ्तर को जलाने का भी अधिकार था और वह भी उन्होंने किया।

लेकिन इस सब के अतिरिक्त इन कटरपंथी मुस्लिम समूहों ने एक और काम किया, जिसका उन्हें किसी भी दृष्टि से अधिकार नहीं था। उन्होंने ओड़िशा की सामरस्य संस्कृति के प्रतीक पुरूष उत्कलमणी गोपबंधु की प्रतिमा को तोड़ दिया। इसका सीधा-सीधा अर्थ यही है कि ओड़िशा के इन कटरपंथी मुस्लिम समूहों का सीधा-सीधा कहना है कि ओड़िशा के लोगों ने हमारे अराध्य हजरत मुहम्मद का तथाकथित अपमान किया है। इस लिए उसका बदला हमनें आप की संस्कृति और विरासत के प्रतीक गोपबंधु की मुर्ति को तोड़ कर ले लिया है। परोक्ष रूप से ओड़िशा के इन कटरवादी मुसलमानों ने अपने आप को ओड़िशा की संस्कृति, विरासत और इतिहास से तोड़ दिया है अब वे ओडिशा की विरासत को अस्वीकार करते हैं। अभी यह कहना मुश्किल है कि इन कटरपंथी समूहों के पीछे प्रदेश के आम मुसलमान हैं या नहीं? लेकिन एक बात निश्चित है कि पिछले दो दशकों से अरब का बहावी आंदोलन यहां के स्थानीय मुस्लमानों को ओड़िशा की विरासत से तोड़ने का जो आंदोलन चला रहा था उसकी पहली झलक देखने को मिल गई है। गोपबंधु की मुर्ति का तोड़ा जाना उसका पुख्ता प्रमाण है। सरकार को अभी से इन राष्ट्र विरोधी तत्वों की शिनाख्त करनी चाहिए नहीं तो यह कैंसर फैलता ही जाएगा।

सबसे आश्चर्य की बात यह है कि ओड़िशा सरकार ने कटरपंथियों के निशाने पर आयी अखबार के एक उपसंपादक को इस मामले में गिरफ्तार कर लिया है । अखबार ने भी उस बेचारे को नौकरी से निकालने में एक क्षण की देरी नहीं की। यदि सरकार को सचमुच यह लगता है कि कटरपंथियों के एक समूह द्वारा किसी भी चित्र को हजरत मुहम्मद का चित्र घोषित कर दिए जाने मात्र से ही मुसलमानों की भावनाएं घायल हो जाती हैं तो फिर गिरफ्तार अखबार के संपादक को किया जाना चाहिए था ना कि उप संपादक को। लेकिन सरकार ने भी शायद ईद की परंपरा का ही निर्वाह किया है। खुदा के रास्ते में अपनी सबसे प्यारी चीज का बलिदान देना चाहिए। लेकिन किसी भी व्यक्ति के जीवन में सबसे प्यारी चीज कौन होती है। इस्लाम का इतिहास ही कहता है कि यह सबसे प्यारी चीज उसका अपना बेटा ही होता है। लेकिन बेटे को बलिदान में देना शायद सचमुच मुम्किन नहीं होता इसलिए बकरी का बलिदान दे कर ही काम चला लिया जाता है। खुदा इस चालबाजी को कितना समझ पाते हैं या कितना नहीं ये तो वही जानते होंगे लेकिन लगता है नवीन पटनायक की सरकार अपने प्रिय संपादक को बचाकर कटरपंथियों के आगे, उपसंपादक नाम की बकरी का बलिदान देकर ही काम चला लेना चाहती है। लेकिन सरकार को ध्यान रखना चाहिए कि यदि इन मुस्लिम कटरपंथियों को एकबार बली के लहू की गंध लग गई तो वे केवल ये छोटी सी बली लेकर ही चुप नहीं बैठेंगे। इसलिए जरूरी है कि बलि मांगने वाले इन कटरपंथी तालिबानी मुसलमानों की भी शिनाख्त कर ली जाए और उन्हें इस देश के कानून के अनुसार दंड दिया जाए। बीजू पटनायक होते तो शायद यह कर पाते। नवीन पटनायक कितना कर पाएंगे, यह भी खुदा ही जानता होगा। लेकिन एक बात ध्यान रखनी चाहिए ओड़िशा में कटरपंथियों को पहले लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के मामले में और अब गोपबंधु की (यदि मूर्ति तोड़ने को भी प्रतिकात्मक हत्या कहा जा सकता है तो) हत्या के मामले में अपनाई जा रही तुष्टीकरण की नीति भविष्य में बहुत ही घातक सिद्ध हो सकती है।

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