लेखक परिचय

अनिल द्विवेदी

अनिल द्विवेदी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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-अनिल द्विवेदी-

narendra modi abhinav bindra-संदर्भ : आइएएस अमित कटारिया का ड्रेस कोड विवाद-

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बस्तर-यात्रा के दौरान दो बड़े हादसे हुए। एक तो रायपुर में जो उनकी सभा होनी थी, उसका मंच बनते-बनते धराशायी हो गया जिसमें एक काल-कलवित हो गया और बाकी अभी अस्पताल में ईलाज करवा रहे हैं। दूसरा ‘हादसा’ यह रहा कि प्रधानमंत्री के समक्ष आइएएस अमित कटारिया पैंट, शर्ट और चश्मे के साथ मुखातिब हुए जिस पर प्रधानमंत्री ने कुछ टिप्पणी की और उसके बाद यह बहस आग पकड़ चुकी है कि एक आइएएस को वीआईपी के समक्ष किस कदर पेश होना चाहिए? अफसोस कि घटना के एक सप्ताह बाद भी हम उस गले की पकड़ से दूर हैं जो पंडाल के गिरने, उससे हुई मौतें या दर्जनों घायलों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार है लेकिन प्रधानमंत्री के समक्ष काला चश्मा लगाकर खड़े होने वाले आइएएस का गला नापने के लिए कई तैयार खड़े हैं।

 

स्कूल में बच्चों-टीचर के लिए ड्रेस कोड है, सेना में अफसर-सैनिकों के लिए है। न्यायालय में न्यायाधीश-वकीलों के लिए है। पुलिस में सभी के लिए है। अस्पताल में है I कार्पोरेट हाऊजेस में भी ड्रेस कोड लागू है। वहां पर सिवाय शनिवार के बाकी दिन आपको पेंट, शर्ट और टाई में दिखना होगा। इसी तरह प्रशासन में भी ड्रेस की आचार संहिता है। प्रशिक्षु आइएएस जब प्रशिक्षण ले रहे होते हैं, तभी से इसकी आदत डाल दी जाती है। इसके पीछे का एक मकसद समानता और अनुशासन का भाव स्थापित करना है। यहां तक कि बतौर आइएएस यदि आप न्यायाधीश के समक्ष हाजिर हो रहे हैं तो ड्रेस कोड जरूरी हो जाता है और ऐसी चूकें करने वालों को अदालतों ने फटकार भी लगाई है।

और ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं है। हमने देखा हैकि अमरीकी राष्ट्रपति से लेकर दुनियाभर के प्रधानमंत्री के साथ जो अफसर होते हैं, ड्रेस कोड में ही झलकते हैं। 1984 में रोनाल्ड रीगन जब अमरीका के राष्ट्रपति थे तो उनकी सुरक्षा में लगे एक अफसर को ऐन वक्त पर हवाई जहाज में चढ़ने से रोक दिया गया था क्योंकि उसके सूटकेश का रंग सुरक्षा जांच से मेल नहीं खाता था। प्रधानमंत्री मोदी जब बस्तर पहुंचे तो मुख्य सचिव से लेकर सीएम के सचिव अमन सिंह, अपर मुख्य सचिव बैजेन्द्र कुमार तथा पुलिस महानिदेशक तक सभी ड्रेस कोड में थे। तस्वीर देखने से स्पष्ट है कि खुद मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जैकेट और सफेद कुर्ता-पायजामा (नेताओं का ड्रेस कोड) पहनकर, प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत किया; खुद प्रधानमंत्री जी ड्रेस कोड को लेकर गंभीर रहते दीखते आये हैं।

याद कीजिये उस वाकये को जब मोदी सरकार के केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर एक सरकारी आयोजन में जींस टी शर्ट्स पहनकर पहुंचे थे जिसे पीएम ने उचित नहीं माना था। उसके बाद जावड़ेकर वापस गए और जीन्स के ऊपर ब्लेज़र डालकर आये थे। हांलांकि इसकी पुष्टि नहीं हो सकी थी लेकिन संकेत साफ़ हैं कि कुछ जगहों पर ड्रेस कोड अनिवारयतः लागू होना चाहिए। लेकिन कटारिया जो कि उस जिले के कलेक्टर यानि प्रशासन के मुखिया थे, ने इसे संभवत: हल्के में लिया। उन्होंने पीएम मोदी का स्वागत पैंट, शर्ट और आंखों में चश्मा डालकर किया इसलिए पहली नजर में वे ड्रेस की आचार संहिता का अपमान करने के दोषी तो दिखते ही हैं।

मगर सिर्फ कटारिया ही क्यों, छत्तीसगढ़ में ड्रेस कोड की धज्जियां तो कई बार उड़ाई गई हैं और वो भी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सामने। एक आइएएस राजनेताओं की तरह व्यवहार करने लगे, यह किस आचार संहिता में लिखा है? महीनों पूर्व सिविल लाइंस स्थित सर्किट हाऊस में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह एक सरकारी योजना का लोकार्पण करने पहुंचे थे तब तत्कालीन अपर मुख्य सचिव स्तर के वरिष्ठ आइएएस अफसर ने जींस के ऊपर कुर्ता ओढ़ रखा था। संयोग देखिए कि खुद मुख्यमंत्री भी कुर्ता और जैकेट में थे तब मैंने मजाकिया अंदाज में अफसर से पूछा था कि आज तो ड्रेस कोड से अलग दिख रहे हैं तब उन्होंने हंसते हुए इसे टाल दिया था। राज्य में ड्रेस कोड की धज्जियां अफसरों के इस कदर उड़ाई हैं कि ब्लेज़र की जगह अब नेहरू जैकेट ने ले ली है।

बात साफ है कि यदि प्रधानमंत्री के समक्ष कोई आइएएस पैंट, शर्ट या चश्मा पहनकर आने पर अनुशासनहीनता का दोषी हो सकता है तो मुख्यमंत्री के समक्ष जींस-कुर्ता पहने और चश्मा लगाकर खड़ा होना कैसे स्वीकार्य हो सकता है? लेकिन यह सब इसलिए चल रहा है या नजरअंदाज किया जा रहा है क्योंकि मखमली दिल वाले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने आंखें तरेरने का स्वभाव कभी रखा ही नहीं। बहस-मुबाहिसों के बीच फेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकार बरूणा सखाजी की  टिप्पणी पढ़ने को मिली कि हमें स्मार्ट सिटी और स्मार्ट फोन तो चाहिए मगर स्मार्ट अफसर नहीं।

आइएएस अमित कटारिया उन चुनिंदा अफसरों में शुमार हैं जिन्होंने अपने कार्य-व्यवहार से लोगों का दिल इस कदर जीता है कि रायपुर से जब उनका स्थानांतरण हुआ था तो इसके खिलाफ सैकड़ों लोग सड़कों पर उतर आए थे और हस्ताक्षर अभियान चलाया था। वे अकेले अफसर होंगे जो सेलेरी के तौर पर मात्र एक रूपया लेते रहे हैं। यह भी सच है कि प्रधानमंत्री के समक्ष यूं पेश होना, घण्टों तक उमसभरी तीखी धूप से बचने की एक कवायद भर रही होगी लेकिन यहां सवाल ड्रेस कोड की एकरूपता के साथ-साथ नियम और अनुशासन में बने रहने तथा प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का सम्मान ज्यादा अहम है।

गुजरे साल तत्कालीन केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री जयराम रमेश एक विश्वविद्यालय में थे जहां उन्हें बतौर मुख्य अतिथि स्नातक छात्रों को डिग्रियां बांटनी थी और अचानक उन्होंने अपने शरीर ओढ़ा लबादा उतारकर फेंक दिया था। उनका तर्क था कि अंग्रेजों की दी हुई यह परम्परा हम कब तक ढोएंगे? संभवत: कटारिया ने भी एक नया संदेश देने की कोशिश की है जिसे स्वीकार करने की दरियादिली हमें दिखानी होगी।

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