लेखक परिचय

अरुण कान्त शुक्ला

अरुण कान्त शुक्ला

भारतीय जीवन बीमा निगम से सेवानिवृत्त। ट्रेड यूनियन में तीन दशक से अधिक कार्य करता रहा। अध्ययन व लेखन में रुचि। रायपुर से प्रकाशित स्थानीय दैनिक अख़बारों में नियमित लेखन। सामाजिक कार्यों में रुचि। सामाजिक एवं नागरिक संस्थाओं में कार्यरत। जागरण जंक्शन में दबंग आवाज़ के नाम से अपना स्वयं का ब्लॉग। कार्ल मार्क्स से प्रभावित। प्रिय कोट " नदी के बहाव के साथ तो शव भी दूर तक तेज़ी के साथ बह जाता है , इसका अर्थ यह तो नहीं होता कि शव एक अच्छा तैराक है।"

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-अरुण कान्त शुक्ला- Narendra_Modi ये छद्म युद्ध क्या होता है? क्या जो माहौल स्वयं प्रधानमंत्री ने बनाया था, उसमें पाकिस्तान के खिलाफ इस तरह के बयान की कोई फौरी जरूरत थी? क्या यह कहकर कि पाकिस्तान चूंकि परम्परागत युद्ध की क्षमता खो चुका है, इसलिए आतंकवाद को बढ़ावा देकर छद्म युद्ध में लगा है, प्रधानमंत्री पाकिस्तान को युद्ध छेड़ने के लिये उकसाना चाहते हैं? क्या उनका यह बयान दोनों देशों के रिश्ते सुधारने में कुछ भी सहायक है? ये ही नहीं, इस तरह के अनेक सवाल हैं जो प्रधानमंत्री के सीमा पर दिए गए बयान के बाद उठे हैं। उनका बयान भले ही उनकी हर बात पर ताली बजाने वालों से वाह-वाही लूटे पर सही यही है कि लेह में प्रधानमंत्री ने अनावश्यक छद्म युद्ध वाला बयान दिया है। प्रधानमंत्री का बयान उन्हीं की सरकार के गृहमंत्री के द्वारा दिए गए बयान का विरोधाभासी भी है। अभी कुछ दिन पहले ही भारत सरकार के गृहमंत्री और कल तक प्रधानमंत्री की ही पार्टी के अध्यक्ष रहे राजनाथ सिंह ने लोकसभा में कहा था कि सीमा पर छोटी मोटी वारदातें होती रहती हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि सीमा पर कोई भी बड़ी वारदात की कोई खबर भारत सरकार के पास नहीं है। जहां तक आतंकवाद का सवाल है, आतंकवाद राजनीति का ही एक रूप है, जिसे बहुसंख्यक जनता का, चाहे वह उस देश की हो जहां से आतंकवाद शुरू हो रहा है या पीड़ित देश की, समर्थन नहीं मिलता है। आतंकवाद बुमेरांग जैसा है जो लौटकर उस देश पर भी वार करता है, जिस देश से शुरू होता है।यह हम पाकिस्तान में भी देख रहे हैं और अमेरिका के साथ भी देखा है , जिसने अफगानिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा दिया और फिर खुद के घर में 9/11 को झेला। आज ईराक में भी अमेरिका वही झेल रहा है। अमेरिका और हमारे अन्दर फर्क यही है कि वह न केवल सैन्य रूप से बल्कि पैसे के मामले में भी धनवान है भारत एक अपेक्षाकृत कमजोर देश।हम आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका के समान युद्ध छेड़ कर नहीं लड़ सकते। प्रधानमंत्री ने शपथ लेने के साथ ही जिस कूटनीतिक कदम को उठाया था,पड़ोसियों के साथ अपने संबंध सुधारने का, उनके बयान ने उसमें पलीता लगाने का काम ही किया है। भाषाई शब्दजाल से बाहर आकर सोचें कि यह छद्म युद्ध आखिर होता क्या है? जैसे ही प्रधानमंत्री ने इस शब्दावली का इस्तेमाल किया , मुझे तुरंत ही पूर्व एनडीए सरकार के प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की याद आ गयी। कारगिल लड़ाई को उन्होंने ने एक बार नहीं अनेकों बार “युद्ध नहीं..युद्ध जैसा कुछ कहा था” और उसके बाद हुआ क्या? अमेरिका की एक घुड़की के बाद कारगिल की वह लड़ाई रुक गयी। पाकिस्तान को एक बार नहीं अनेकों बार भारत की तरफ से मुंह तोड़ जबाब दिया गया है। आखिर, बंगला देश का निर्माण पाकिस्तान के साथ युद्ध का ही नतीजा है। देश का विभाजन, आजादी के समय, किसी को पसंद हो या नहीं हो, अंग्रेजों के दबाव में हुआ हो या भारत पाकिस्तान के उस समय के नेताओं की पसंदगी से हुआ हो,स्वीकार करके ही हुआ था। पर, बांग्लादेश का निर्माण पाकिस्तान को सैनिक रूप से पराजित करके और शायद दूसरे विश्वयुद्ध की घटनाओं को छोड़ दें तो किसी भी देश के द्वारा किये गए सबसे बड़े सैन्य समर्पण के बाद हुआ है। इसकी टीस बाराम्बारों के युद्ध से नहीं मिटेगी| इस टीस को मिटाने के लिए प्यार की भाषा ही काम आयेगी। प्रधानमंत्री मोदी का सीमा पर दिया गया छद्म युद्ध वाला बयान बीजेपी की सुपरिचित अमेरिका के पिछलग्गू बनने की और सैन्यीकरण की बीजेपी की नीति के ही अनुसार है। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि अमेरिका में 9/11 होने के बाद यदि भारत पहला नहीं तो कम से कम उन पहले देशों में से एक था, जिसने अमेरिका की धमकी कि “या तो हमारे साथ या हमारे खिलाफ आतंकवादियों के साथ” के बाद अमेरिका को तुरंत समर्थन दिया था। वहीं से दशकों पुरानी भारत की विदेश नीति कि भारत किसी भी शक्ति के साथ उसके गुट में शामिल नहीं होगा, से अलगाव शुरू हुआ था। यह भारत की गुटनिरपेक्ष नीति और स्वतन्त्र विदेश नीति को तिलांजली देकर भारतीय हितों को अमेरिकी युद्ध योजनाओं के साथ जोड़ने की शुरुवात थी। तात्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने उस समय दावा किया था कि भारत और अमेरिका स्वाभाविक सहयोगी हैं याने दो बड़े लोकतंत्र के बीच में यह स्वाभाविक जुड़ाव है। पर, भारत और अमेरिका के बीच में उस समय स्वाभाविक क्या था? स्वाभाविक यह था कि अमेरिका को उस समय बुश की ईजाद नयी सैन्य नीति कि अमेरिका संदेह होने पर ही अपनी रक्षा के लिए किसी के भी ऊपर हमला कर सकता है, के लिए भारत की बीजेपी सरकार में, बीजेपी के फासीवादी/सैन्य रुझान में एक स्वाभाविक साथी दिखा। किसी भी देश में आतंकवाद को यदि स्थानीय प्रश्रय मिलता है तो फिर यह निश्चित है कि उस देश के घरेलु वातावरण में और सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक नीतियों में कहीं न कहीं कोई ऐसी गड़बड़ी जरूर है जो नागरिकों के समूहों को व्यथित और बेचैन किये है। यह आतंरिक और बाह्य दोनों तरह के आतंकवाद पर समान रूप से लागू होता है। आज आधा भारत घरेलु आतंकवाद से ग्रस्त है। जिसके लिए देश में आजादी के बाद से लेकर अभी तक अपनाई गईं सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक नीतियाँ जिम्मेदार हैं, जिनके चलते देश के संसाधनों पर कुछ लोगों का कब्जा होते गया और एक आर्थिक आतंकवाद जनता के उपर थोपा गया और अब हम उसका प्रतिकार माओवाद और नक्सलवाद के रूप में देख रहे हैं। इस आतंकवाद में हम कुछ लोगों के द्वारा थोपा जा रहा साम्प्रदायिक आतंकवाद और फिर उसका प्रतिकार भी जोड़ लें तो आज पूरा भारत आतंकवाद की चपेट में है और इसके लिए शासक राजनीति ही जिम्मेदार है। प्रधानमंत्री की ही भाषा में कहें तो देश में चल रहे इस छद्म युद्ध के लिए तो शासक दल होने के नाते स्वयं सरकार और प्रधानमंत्री ही जिम्मेदार हैं। युद्ध को किसी भी समस्या का विकल्प नहीं मानने वाले शांतिकामी लोगों ने महसूस किया कि अभी हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में भी चुनाव प्रचार के दौरान सेना को असंतुष्ट करने वाले और पड़ौसी देशों को सैन्य रूप से धमकाने वाले वक्तव्यों का प्रयोग बहुतायत में किया गया। एक बात है जो हमेशा याद रखनी होगी कि युद्ध ‘छद्म’ हो या ‘युद्ध’ ही हो, इसकी देशवासियों और विशेषकर देश के किसानों और कामगारों को भारी कीमत चुकानी होती है| यह कीमत बढ़े हुए टेक्स, महंगाई के रूप में ही नहीं होती,नागरिक होने के तमाम अधिकार खोने और कारपोरेट तथा मंझोले और बड़े व्यापारियों के द्वारा की जाने वाली लूट के रूप में भी होती है| युद्ध में जानें गवाने वाले सिपाही हमारे अपने ही होते हैं और उनके रिश्तेदारों और बाल-बच्चों की अपार पीड़ा भी हमारी ही होती है| यह आज की सच्चाई है कि भारत ने अपने सभी पड़ोसी देशों के मध्य अपनी रणनीतिक हैसियत खोई है|यह गुटनिरपेक्ष नीति से भटकाव का ही परिणाम है कि भारत अपने पड़ोसी देशों के नेता होने के रुआब को भी खोता गया है। विडंबना यह है कि एनडीए के बाद आई कांग्रेस ने भी गुटनिरपेक्ष नीति को पुष्ट करने के बजाय अमेरिका के पिछलग्गू होने की नीतियों को ही बढ़ावा दिया, जिसका परिणाम लम्बे समय में देश की आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है। बेहतर हो कि प्रधानमंत्री युद्ध की भाषा का उपयोग करने के बजाय इस बात पर ध्यान लगाएं कि देश के विभाजन ने समाज में धर्म, पंथ, समुदायों के बीच घृणा, हिंसा, पृथकता और साम्प्रदायिकता के बीज बोये हैं और देश में कुछ ताकते हैं जो उसे कम करने के बजाय पुष्ट करने में लगी हैं, उन पर कैसे रोक लगे और देश में भाईचारे और समन्वय के बीज पड़ें ताकि किसी भी प्रकार के आतंकवाद को देश में प्रश्रय नहीं मिले।

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