लेखक परिचय

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं।

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डॉ. आशीष वशिष्ठ

कोल गेट पर संसद से सडक़ तक घमासान मचा है बावजूद इसके प्रधानमंत्री का संसद में करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में हजारों जवाबों से अच्छी है खामोशी मेरी, न जाने कितने सवालों की आबरू रखे शेर सुनाना काफी कुछ सोचने को विवश करता है। यूपीए सरकार के आठ साल के कार्यकाल में जिस तरह एक के बाद एक घोटाला और कांड सामने आ रहे हैं वो इस सरकार को देश की भ्रष्टïतम सरकार साबित करने के लिए काफी हैं। तमाम घोटालों ने भ्रष्टाचार के पिछले सारे रिकार्ड तोड़ डाले हैं और देश की अर्थव्यवस्था को भारी-भरकम चोट पहुंचाई है। भ्रष्टाचार ने देश के आम आदमी को उसके वाजिब हक से दूर किया है और देश में मंहगाई, गरीबी, अशिक्षा और गरीब-अमीर के बीच की खाई को बढ़ाया है लेकिन इन विषम हालातों और स्थितियों पर विचार करने या माकूल कदम उठाने की बजाए प्रधानमंत्री का खामोशी भरी शायरी देश को अंधे कुएं में धकेलने के सिवाए कुछ और नहीं है अर्थात रोम जल रहा है और नीरो बंसी बजा रहा है।

कुछ माह पूर्व जब कोयला खदानों के आवंटन पर कैग रिपोर्ट का खुलासा हुआ था तब कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने इस रिपोर्ट को काल्पनिक और निराधार बताकर खारिज कर दिया था। शुरू में प्रधानमंत्री हमलों से बचते रहे, किंतु अचानक वह उठ खड़े हुए। उन्होंने भी रिपोर्ट को बिना तथ्यों वाला आरोप बताकर खारिज कर दिया। अब जब कैग रिपोर्ट को संसद में पेश किया जा चुका है और कथित बिना तथ्यों वाले आरोप एक संवैधानिक संस्था का प्रमाणित दृष्टिकोण बन चुका है तो सरकार लीपापोती में जुट गई है। कोयले की खदानों पर कैग रिपोर्ट सरकार को कठघरे में खड़ा करती है। महालेखाकार का कहना है कि सरकार ने अपारदर्शी आवंटन प्रक्रिया अपनाई, जिस कारण कंपनियों को 1.86 लाख करोड़ रूपये का अनुचित लाभ हुआ। कैग के निष्कर्षों ने कोलगेट को भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला बना दिया है, पर सरकार के मुखिया का इस बारे में क्या कहना है? वह कहते हैं कि चुप्पी हजारों जवाबों से बेहतर है। वह गलत हैं।

भारत में लोकतंत्र है और सरकार का प्रमुख होने के नाते प्रधानमंत्री को यह बताना होगा और इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी कि सरकार ने जो किया वह क्यों किया? इस अपारदर्शी रवैये को अपनाने के दौरान कुछ वर्षों तक प्रधानमंत्री के पास ही कोयला मंत्रालय का भी प्रभार था। इसी दौरान प्रतिस्पर्धी नीलामी के बिना ही निजी कंपनियों को मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन सौंप दिए गए। इस साल के शुरू में मसौदा रिपोर्ट लीक होने के बाद टीम अन्ना ने कोयला खदानों के आवंटन की स्वतंत्र जांच की मांग की थी। चूंकि 2006-09 के बीच कोयला मंत्रालय का प्रभार सीधे प्रधानमंत्री के पास था, इसलिए अन्ना एंड कंपनी ने निजी पार्टियों को लाभ पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री पर पद के दुरूपयोग का आरोप लगाया था। इसके साथ ही बड़े जतन से संवारी गई मिस्टर क्लीन की छवि को पहली बार गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ा। पिछले सप्ताह जब रिपोर्ट संसद के पटल पर रखी गई, वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने सरकार की पहली औपचारिक प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि कैग रिपोर्ट के अनुमानित नुकसान में खामियां हैं। उन्होंने सफाई दी कि अगर कोयले को निकाला नहीं गया है, अगर यह धरती के गर्भ में ही है, तो नुकसान कहां हुआ। नुकसान तभी होगा जब कोयले का खनन हो जाए और यह अस्वीकार्य कीमत या मूल्य पर बेचा जाए। क्या इसका यह मतलब नहीं हुआ कि कोयला खदानों के आवंटन से सरकारी खजाने को कोई नुकसान नहीं हुआ। हालांकि जब शून्य नुकसान का उनका सिद्धांत हंसी का विषय बन गया तो उन्होंने दावा किया कि उनके इस बयान का यह मतलब नहीं था कि इससे सरकारी खजाने को शून्य नुकसान हुआ है। उन्होंने बयान को तोड़मरोड़ कर पेश करने के लिए मीडिया पर दोष मढ़ दिया। प्रधानमंत्री भी तथ्यों को उलझाने का प्रयास कर रहे हैं। कैग ने सरकार को प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया न अपनाने का दोषी ठहराया है।

कोयला घोटाला सामने आने के बाद यूपीए सरकार को जनता बक्शेगी या नहीं यह तो समय बतायेगा, लेकिन 1.86 लाख करोड़ की हेराफेरी उजागर होने के बाद से विपक्षी दलों ने मनमोहन सिंह से इस्तीफे की मांग की है और साथ ही यूपीए सरकार को भंग करने व तत्काल चुनाव करने की मांग की है। जाहिर है विपक्षी दल 100 फीसदी सही बात कर रहे हैं, क्योंकि देश कब तक घोटालों की चोटें सहन करता रहेगा। आजादकी के बाद से अब तक हुए तमाम घोटालों का हिसाब जोड़ा जाए तो अधिकतर घोटालों कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के कार्यकाल और संरक्षण में ही हुए हैं। अगर इन घोटालों का हिसाब जोड़ा जाए तो वो कई देशों की कुल अर्थव्यवस्था से भी अधिक निकलेगा। बीमा घोटाला, टेलीकॉम घोटाला जो सुखराम ने किया, एचडीडब्ल्यू सबमैरीन घोटाला, बिटूमैन घोटाला, तनसी भूमि घोटाला, सुरक्षा घोटाला, जेएमएम घूस कांड, सेंट किट्स मामला, यूरिया घोटाला, सीआरबी घोटाला, अनंतनाग ट्रांसपोर्ट घोटाला, 1971 नागरवाला घोटाला, चारा घोटाला, चुरहाट लॉटरी घोटाला, बोफोर्स घोटाला (1990), पशुपालन घोटाला (1990), बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज फ्रॉड, हवाला कांड (1993),बैंगलोर-मैसूर कॉरिडॉर (1995), सुखराम घोटाला (1996), बिहार में चारा घोटाला (1996), केरल एसएनसी लावालिन पावर घोटाला (1997), होम ट्रेड घोटाला, केतन पारेख घोटाला, बैरक मिसाइल डील घोटाला, तहलका घोटाला (2001), यूटीआई घोटाला, ताज कॉरिडॉर मामला (2002-2003), तेलगी घोटाला (2003), डीएसक्यू सॉफ्टवेयर घोटाला, आईपीओ घोटाला-करवी, ऑयल फॉर फूड प्रोग्राम घोटाला (नटवर सिंह 2005), ह्यूमन ट्रैफिकिंग स्कैम (बाबूभाई कटारा), वोट के बदले नोट, सत्यम घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला- 2008 (75 हजार करोड़), मधु कोडा, लॉन्डरिंग मनी (4000 करोड़), नरेगा घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, आदर्श घोटाला, कोयला घोटाला (1.86 लाख करोड़) की लंबी और अंतहीन फेहरिस्त है। देश के आम आदमी के हिस्सा हड़पने के बाद भी प्रधानमंत्री की खामोशी और राजनीतिक दलों को प्रत्येक मुद्दे पर राजनीति करना देश की जनता के साथ धोखे के सिवाए कुछ और नहीं है। संसद में प्रधानंत्री ने कैग रिपोर्ट पर 32 पैराग्राफ का लंबा-चौड़ा जवाब देते हैं और फिर यह अहंकारी उद्घोषणा भी करते हैं कि हजारों जवाबों से अच्छी है खामोशी मेरी। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री सवालों पर चुप्पी नहीं साध सकता और न ही उसे यह शोभा देता है।

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