लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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-सूबेदार

आज के माओवादी लेनिन और माओ क़ा स्वप्न देख रहे हैं। वे यह अच्छी तरह जानते है कि मार्क्सवाद क़ा विचार आज लोकतान्त्रिक युग में प्रासंगिक नहीं रह गया है। रूस, चीन जैसे देश में यह प्रयोग फेल हो चुका है। रूस और चीन में भी करोडों की हत्या के पश्चात् सत्ता प्राप्त की और जो सब्जबाग जनता को दिखाए थे वैसा कुछ नहीं हुआ। हमें पता है की रूस के कई टुकड़े हो गए, चीन में कुछ लोगों ने सरकार को सुझाव देने क़ा प्रयत्न किया तो माओत्‍सेतुंग ने कहा कि हम देशहित में सुझाव क़ा स्वागत करेंगे। डरे हुए लोग बड़े उत्साह में आ गए और लगभग एक करोड सुझाव जनता ने दिया, माओत्‍सेतुंग ने देखा कि अभी लोग जागरूक है उन्होंने लोगों से सीधा संवाद की और कई स्थानों पर इकठ्ठा होने की बात की। जनता को लगा कि हमारा नया राजा हमारी बात सुनेगा ऐसा कुछ नहीं हुआ। इकठ्ठा हुए लगभग ९० लाख जोगो को गोलियों से भुन दिया गया। अभी १५ वर्ष पूरब बीजिंग में विद्यार्थियों क़ा एक प्रदर्शन हुआ जिसमे दसियों हजार के ऊपर बुलडोजर चढ़ा दिया गया।

इससे चीन की भुखमरी कम नहीं हुई। आज भी दुनिया की सबसे सस्ती लेबर चीन की है। सर्वाधिक भुखमरी चीन में है। सबसे डरा हुआ व्‍यक्ति चीन क़ा है। नेपाल में माओवादियों ने लगभग 40 हजार जनता की हत्या की और नौ महीने के शासन में जनता की समस्याओं को दरकिनार करके अपनी जेब भरने लगे। एक-एक नेताओ के पास 50-50 लाख की गाड़ी और करोडों क़ा मकान हो गया है, आखिर यह सब प्रचंड, बाबूराम या अन्य माओवादी नेताओं की पैतृक संपत्ति तो नहीं थी, जनता सब जान चुकी है। इन्हें सिर्फ सत्ता से ही बेदखल ही नहीं किया। आज नेपाल में इनका सर्मथन भी बहुत कम हुआ है। वर्षों से इन्हें ख्याली पुलाव पकाते जनता देख चुकी है इन्हें केवल सत्ता चाहिए न कि जनता व देश की चिंता। इससे सभी उब चुके है। इनके हड़ताल के विरुद्ध समाज खड़ा हो चुका है। इनकी पोल खुल गयी है। सब्जबाग दिखा कर जनता को मूर्ख समझना यह उल्टा पड गया, देश ने विद्रोह कर दिया। ऐसा नहीं कि एक दो स्थान पर हुआ बल्कि देश के सैकडों स्थानों पर जनता ने माओवादियों को रपटा-रपट कर मारना शुरू कर दिया, नुँकोट, लुम्जुम, जनकपुर, बीरगंज, बिराटनगर, पोखरा, नेपालगंज इत्यादि सैकड़ों स्थानों पर व्‍यापारी, समाजसेवी, विद्यार्थी, कर्मचारी सहित सभी राजनैतिक पार्टी के लोग माओवादियों के विरुद्ध सड़क पर उतर आये. अंत में मजबूर होकर माओवादियों को अपनी हड़ताल को वापस लेनी पड़ी। जहां-जहां माओवादियों क़ा प्रभाव है वह विकास नाम की कोई चीज नहीं, विकास न हो यही इनका प्रयत्न रहता है इस नाते जनता को भ्रम में रखना, यह माओवादियों क़ा काम रहता है, अंत में प्रचंड ने वही पुराना राग अलापा कि अतिवादी हिन्दुओं ने यह सब षड्यंत्र रचा है। माओवाद क़ा प्रमुख कार्य देश के इन्फ्रास्ट्रक्चर को समाप्त करना, लोकतंत्र के प्रति अविश्‍वास पैदा करना, सुरक्षा निकाय को नष्ट करना, देश के संविधान क़ा विरोध करना, जनता में भय व्‍याप्त करना, समांतर सरकार चलाना, समाज के अग्रगणी तथा अपने विरोधियों की बीभत्स रूप से हत्या करना और लेवी के नाम पर अकूत धन इकठ्ठा करना।

ठीक नेपाल की तरह छत्तीसगढ़ में माओवादी वर्षों से सब्जबाग दिखा रहे हैं। उनकी वहां की जनता में पैठ भी थी, लेकिन जनता ने जब देखा कि जब भी विकास की बात होती है माओवादी होने नहीं देते। विद्युत कार्यालय, स्कूल कालेज, स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्र सहित तमाम बुनियादी संस्‍थानों को बमों से उडा देना ही माओवादियों का दैनिक कार्य हो गया है।

उनके पास अकूत संपत्ति है। लेवी के नाम पर करोडों रूपये उनके पास है। जनता भूखे मर रही है। मजबूर जनता ने, उनसे लड़ना ही विकल्प है, ऐसा सोचा। उनसे तंग होकर अंत में लड़ना ही है उन्होंने सलवाजुडूम को माध्यम बनाया। वनवासियों क़ा यह स्वतःस्फूर्त विरोध जो ऐ.के.४७ क़ा जवाब धनुष तीर से देना शुरू किया। यह उन इलाकों में बस्तर, बीजापुर, नारायघ, दंतेवाडा इत्यादि वे स्थान है जहा माओवादियों क़ा सर्वाधिक प्रभाव था। अब उन्हें नक्सलवाद समझ में आ रहा है। इनकी असलियत जानने के बाद, आज पूरे छत्तीसगढ में माओवादियों की जमीन खिसक चुकी है। ये भभकते हुए दीपक के समान है। अपनी खीझ मिटाने हेतु हत्या कर रहे हैं। आम जनता इनके खिलाफ हो चुकी है। कुछ बुद्धिजीवी जो चीन द्वारा ख़रीदे हुए है उनके पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। यह उनकी बुद्धि क़ा दिवालियापन के अतिरिक्त और कुछ नहीं। वामपंथी विचार कभी भी देश हित में नहीं हो सकता है। स्कूल कालेज इत्यादि आधारभूत ढांचे को नष्ट करना, प्रत्येक किसान चाहे धनी हो या गरीब हो, सभी से लेवी उठाना यही उनका काम है। विकास और माओवाद क़ा कोई रिश्‍ता नहीं है। यह केवल वैचारिक तानाशाही के अतिरिक्त कुछ नहीं है, आज हमें लोकतंत्र में ही विकल्प खोजना होगा।

(लेखक हि. स्‍व. संघ, नेपाल के प्रांत प्रचारक रहे हैं। वर्तमान में आपके पास हिन्दू जागरण मंच का दायित्‍व है। आपका  केंद्र मुज्जफ्फरपुर, बिहार है।)

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1 Comment on "माओवाद से जनता ऊब चुकी है नेपाल हो या छत्तीसगढ़"

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पंकज झा
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अपना खयाल रखियेगा सूबेदार साहब. मुज्जफ्फरपुर तक तो ठीक है लेकिन कही नेपाल में आपको परेशानी ना हो जाय. खैर…ज्यादा चिंता भे नहीं करना चाहिए. सच ज़रूर कहिये किसी भी कीमत पर…..शुभकामना.

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