लेखक परिचय

अमलेन्दु उपाध्याय

अमलेन्दु उपाध्याय

लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और 'दि संडे पोस्ट' में सह संपादक हैं। संपर्क: एस सी टी लिमिटेड सी-15, मेरठ रोड इण्डस्ट्रियल एरिया गाजियाबाद मो 9953007626

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lalu-ramvilas-mulayamआखिरकार यूपीए बिखर ही गया और मोर्चे बनने के दौर में एक और मोर्चा बन ही गया। उ0प्र0 में कांग्रेस से हनीमून खत्म होने के बाद मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी, लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनता दल और रामविलास पासवान के नेतृत्व वाली लोकजनशक्ति पार्टी ने एक मंच पर आकर यूपीए से इतर अपना मोर्चा बनाने की घोषणा की है। यूं तो चुनावी मौसम में रोज ही मोर्चे बन बिगड़ रहे हैं लेकिन उ0 प्र0-बिहार की क्रान्तिधर्मी धरती पर इस मोर्चे का अपना अलग ही महत्व है। हालांकि इस मोर्चे का शुध्द मकसद चुनाव बाद बनने वाले समीकरणों के मद्देनजर अवसरवादी राजनीति और उससे भी ज्यादा व्यक्तिगत असुरक्षा की भावना है।इस मोर्चे की धोषणा के साथ ही जो पहला संदेश गया है वह एकदम साफ है कि यूपीए नाम का गठबंधन बिखर गया है और अगर रह गया है तो उसका मतलब सिर्फ सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली कांग्रेस से रह गया है, जिसके प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार फिलहाल 16 मई 2009 तक मनमोहन सिंह हैं, बाद में समय तय करेगा कि कौन प्रधानमंत्री पद की दौड़ में है। दूसरा संदेश जिसकी गूंज साफ सुनाई दे रही है, यह है कि कांग्रेस हिन्दी पट्टी में मृत दल है जिसके पास अब चुनाव लड़ने के लिए 120 उम्मीदवार नहीं हैं।

जाहिर है कि जब यह चौथा मोर्चा देश भर में कुल जमा 120 सीटों पर ही चुनाव लड़ रहा है और लालू मुलायम दोनो ही कह चुके हैं कि वे प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में शामिल नहीं हैं तब इस मोर्चे का मकसद देश में सरकार बनाना तो नहीं है! फिर इसका उद्देश्य क्या है?

चौथे मोर्चे का पहला लक्ष्य जो समझ में आ रहा है, उससे साफ लगता है कि यह गठबंधन चुनाव के बाद बनने वाले समीकरणों में स्वतंत्र रास्ता बचा कर चलने का प्रयास है और तीसरे मोर्चे की बनने वाली संभावित सरकार में शामिल होने का विकल्प खुला रखने का प्रयास है। हालांकि इस मोर्चे के बनने से कांग्रेस काफी असहज स्थिति का सामना कर रही है और उसका सारा गणित बिगड़ गया है। भले ही अमर सिंह और अभिषेक मनु सिंघवी लाख दावा करें कि यह मोर्चा यूपीए का ही हिस्सा है लेकिन देखने वाले साफ देख रहे हैं कि यह मोर्चा यूपीए की कब्र खोदने के लिए ही बना है।

कांग्रेस के साथ जाने पर उ0प्र0 में मुलायम सिंह काफी नुकसान उठा चुके हैं और परमाणु करार पर उनकी कांग्रेस से दोस्ती का खमियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है। दूसरा मुलायम सिंह देश की राजनीति से ज्यादा उ0प्र0 की राजनीति करते हैं और वहां उनका मुकाबला उनकी जानी दुश्मन मायावती के नेतृत्व वाली बसपा से है जिन्हें मुलायम की हरकतों से नाराज उनके पुराने मित्र, वामपंथियों ने प्रधानमंत्री पद का रातों रात दावेदार बना दिया था। मुलायम सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती न भाजपा को रोकना है और न कांग्रेस को , उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती मायावती हैं। उ0प्र0 में राजनीति सिध्दांतों पर नहीं बल्कि व्यक्तिगत दुश्मनी पर चल रही है जहां मुलायम और मायावती एक दूसरे को एक सेकण्ड के लिए भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं।

इसी प्रकार बिहार में राजनीति लालू बनाम नीतीश के इर्द-गिर्द धूम रही है और वहां भी लालू अभी नुकसान में थे। माकपा महासचिव सीताराम येचुरी की शरद यादव से मुलाकात के बाद लालू के कान खड़े हो गए और उन्होंने भी भांप लिया कि एनडीए लड़ाई से बाहर है और भाजपा थके हारे सिपाहियों की फौज है, यूपीए भी नुकसान में है, ऐसे में अगर वामपंथी दल अपनी कोशिशों में कामयाब हो गए तो तीसरे मोर्चे की सरकार बनने की स्थिति में नीतीश एनडीए से नाता तोड़कर तीसरे मोर्चे के साथ जा सकते हैं। इसी डर ने लालू मुलायम को एक होने और कांग्रेस से नाता तोड़ने के लिए मजबूर कर दिया है। चर्चा है कि लालू ने वामपंथियों से कहा है कि हमने आपका क्या बिगाड़ा है?

लालू मुलायम का दांव यह है कि किसी भी तरह मायावती और नीतीश को अगली सरकार में शामिल होने से रोका जाए। चूंकि उ0प्र0 में विधानसभा चुनाव होने में अभी तीन साल बाकी हैं और अगर मायावती केन्द्र में भी सत्ताा में शरीक हो गईं तो मुलायम सिंह के लिए काफी मुश्किल हो जाएगी, चूंकि तब मायावती के जुल्म मुलायम के परिवार और उनके कार्यकत्तर्ााओं पर बेइंतिहा बढ़ जाएंगे। इसी लिए मुलायम किसी भी तरह उ0प्र0 में जंग जीतना चाहते हैं और उसके लिए किसी से भी हाथ मिलाने को तैयार हैं। इसी तरह लालू के सामने समस्या यह है कि नीतीश ने बेशक बिहार में पटरी से उतरी कानून व्यवस्था पर काफी हद तक अंकुश लगाया है और विकास की तरफ भी ध्यान दिया है जिसे लालू ने अपने राज में तबाह और बर्बाद कर दिया था। मगर लालू के लिए सुकून अभी तक यह था कि उनके सारे कलंक पर उनका रेल मंत्रालय का कार्यकाल भारी पड़ गया। अब अगर नीतीश ने लालू को केन्द्र में आने से रोक दिया तो लालू की बिहार से हमेशा के लिए छुट्टी हो जाएगी।

इसी घबराहट का नतीजा है कि पासवान को एक क्षण के लिए भी बर्दाश्त न कर पाने वाले लालू ने उनसे हाथ मिला लिया है, और लालू मुलायम की हरचंद कोशिश यह है कि किसी भी तरह उनके मोर्चे की सीटें मायावती और नीतीश से ज्यादा आएं, ताकि जब मायावती का नाम प्रधानमंत्री के लिए चले तब चौथे मोर्चे की तरफ से रामविलास पासवान का नाम आगे बढ़ाया जा सके और मायावती व नीतीश को सरकार में शामिल होने से रोका जा सके। ऐसी स्थिति में कांग्रेस भी पासवान को नाम पर सहमत हो जाएगी क्योंकि मायावती के आगे बढ़ने से उसे देशभर में नुकसान होगा जबकि पासवान से यह खतरा नहीं होगा।

ऐसी स्थिति बनने पर वामपंथी भी तमाम कड़वाहट के बावजूद लालू मुलायम को ही तरजीह देना पसन्द करेंगे क्योंकि मायावती की अशिष्टता को बर्दाश्त करना किसी भी सभ्य आदमी के लिए मुश्किल है। अब देखना यह है कि क्या लालू मुलायम की जुगलबन्दी से रामविलास पासवान का नसीब जागेगा???

 

amalendus-photoअमलेन्दु उपाध्याय
द्वारा-एससीटी लिमिटेड
सी-15, मेरठ रोड इण्डस्ट्रियल एरिया
गाजियाबाद
मो0- 9953007626
(लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ के संपादकीय विभाग में हैं।)

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1 Comment on "चौथे मोर्चे का मकसद… – अमलेन्दु उपाध्याय"

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PROF TIWARY
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THIK KAHA HAI KISI NE BHARAT VARSHA KA BHAGWAN HI MALIK HAI
PROF TIWARY

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