लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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मनोज कुमार
आमतौर पर मेरे और पत्नी के बीच खबरों को लेकर कोई चर्चा नहीं होती है लेकिन बच्चों से जुड़ी खबरों पर बातचीत हो ही जाती है. कल भी ऐसा ही हुआ. केन्द्र सरकार द्वारा जघन्य अपराध करने वाले 16 साल के नाबालिग बच्चों को वयस्क अपराधियों की तरह मुकदमा चलाये जाने के फैसले पर हम दोनों में चर्चा होने लगी. मन ही मन मैं इस तरह के फैसले का स्वागत कर रहा था लेकिन पत्नी के मन को टटोलना भी चाहता था कि आखिर उसकी राय इस बारे में क्या है? मैं कुछ पूछता, इसके पहले ही वह फट पड़ीं। ऐसे फैसले तो पहले ही हो जाना चाहिये था। इन मामलों में उम्र नहीं, नीयत देखी जाती है और जब नीयत बिगड़ जाये तो क्या बालिग और क्या नाबालिग? सजा के हकदार सभी होते हैं और सजा मिलना भी चाहिये. पत्नी के गुस्से को देखकर पहली बार शांति का अहसास हुआ. जैसा मैं सोच रहा था, वैसा वह भी सोचती हैं, यह बात तसल्ली देने वाली थी। यह सच है कि अपराध, अपराध होता है और वह नाबालिग है इसलिये बख्श दिया जाये, यह तर्क नहीं, कुतर्क है। बड़ा सवाल यह है कि अपराध करते समय उसने अपने उम्र से बड़े अपराध करने की सोच ली तो सजा भी उसे उसकी सोच की मिलेगी। नीयत की मिलेगी। यहां उम्र का फैक्टर काम नहीं करता है, यहां बदनीयती का सवाल है। बलात्कार, हत्या और ऐसे ही अपराध करते समय तो दिमाग वयस्कों को भी मात दे जाता है और जब सजा की बारी आती है तो उम्र की दुहाई दी जाती है जो कि बिलकुल गलत है, अनुचित है।

संगीन जुर्म के लिये नाबालिग की उम्र को कम कर दी गई है लेकिन क्या इतने से ही सुधार आ जाएगा? नाबालिग ऐसे जुर्म से परे ही रहें, इस बात की व्यवस्था करने की जरूरत है और जब इस सवाल को लेकर हम चर्चा करते हैं और नैतिकता के तराजू पर नापते हैं तो पता चलता है कि अनैतिकतता का पलड़ा भारी हो चला है। भौतिक सुखों और विज्ञापनों ने बच्चों को समय से बड़ा कर दिया है। जिस उम्र में उन्हें भविष्य के सपने देखने चाहिये, वे जिंदगी के सपने देखने लगते हैं। भविष्य के सपने देखते तो वे अपने वाले समय में देश के निर्माता होते लेकिन वे जिंदगी के सपने देखते हैं जिसमें वैभवशाली जीवन हो, सुंदर पत्नी और महंगी कार तथा मोबाइल हो। इस सुंदर सी जिंदगी उन्हें तब हासिल हो सकती है जब वे भविष्य के सपने बुने और उसे सच करने के लिये मेहनत करें लेकिन उनके पास इतना वक्त नहीं है। वे जल्दबाजी में है। सबकुछ समय से पहले पा लेना चाहते हैं और इसी भागमभाग में उन्हें वैभवशाली जिंदगी पाने के लिये शॉर्टकर्ट दिखता है अपराध का रास्ता। ऐसा भी नहीं है कि उन्हें इस बात का इल्म नहीं है कि वे जिस रास्ते पर चल रहे हैं, उन्हें जिंदगी नहीं, सजा मिलेगी लेकिन मन में नाबालिग हो जाने का मुगालता पाले वे तेजी से शॉर्टकर्ट के रास्ते पर चल पड़ते हैं। एक बात और यहां गौर करने लायक है कि ये शॉर्टकर्ट अपनाने वाले ज्यादतर बच्चे अमीर परिवारों से रिश्ता रखते हैं। उन्हें इस बात का भी भ्रम होता है कि उनके रईस बाप महंगे वकील कर उन्हें बचा ले जाएंगे। यह भी सच है कि उनके मन में भ्रम यूं ही नहीं बना हुआ है बल्कि उन्होंने अपने आसपास यह होते देखा है। बात साफ हो जाती है कि यहां उम्र नहीं, नीयत का मामला है।

सवाल यह भी है कि सरकार के इस फैसले से अपराधों में बच्चों की संलिप्तता कैसे खत्म होगी? इसके लिये जरूरी है कि सरकार टेलीविजन चैनलों के अपराधों की पृष्ठभूमि वाले कार्यक्रमों को बैन करे। एक चैनल तो लगभग पूरा समय ही अपराधों की पृष्ठभूमि वाले कार्यक्रम पर चल रहा है। क्राइम बेस्ड सीरियल से टेलीविजन चैनलों को भारी-भरकम कमाई होती है। इसकी टीआरपी सर्वाधिक होती है और इन कार्यक्रमों के अंत में संदेश दिया जाता है कि बुरे काम का बुरा नतीजा होता है लेकिन चैनलों को कौन समझाये कि 20-22 मिनट के कथाक्रम में आपने अपराध के उपक्रम से परिणाम तक पहुंचाने में जो विधि बताया है, वह लाखों और बल्कि करोड़ों कच्चे दिमाग में बस गया है कि बस, यही तरीका श्रेष्ठ है। किसे इतना वक्त है कि वह कथा के आखिरी में बुरे काम का बुरा नतीजा का संदेश सुने और उस पर अमल करे। अमल करने के लिये पहले ही आपने पूरा तरीका अपरोक्ष रूप से बता दिया है। ऐसे में अपराध रूकने के बजाय बढ़ रहे हैं, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है।

भगवान करे कि मैं गलत साबित होऊं लेकिन जो मैं समझ रहा हूं कि इन दिनों यानि निर्भया कांड के बाद से जैसे देश में बलात्कार के अपराधों का सिलसिला बढ़ गया है। इसके कारण में जाने के बाद जो कुछ तथ्य और तर्क सामने आते हंै, उसमें मीडिया एक बड़े कारण के रूप में आता है। जिस तरह पहले मैंने जिक्र किया कि क्राइम बेस्ड धारावाहिक अपराधों में किस तरह मददगार हो रहे हैं, उसी तरह खबरों की भी अपनी भूमिका है। दो खबरों का जिक्र करना चाहूंगा कि जिसमें एक हालिया खबर भोपाल से है। मां ने अपने बेटे को पुलिस के हवाले इसलिये कर दिया कि वह बेरोजगार था और उसे संदेह था कि चोरी के पैसों से वह मजे के दिन गुजार रहा है। बाद में पता चला कि वह मंदिर में चोरी करता था। मां के इस साहस को सलाम करना चाहिये और हर अखबार और हर चैनल की प्रमुख खबर होनी चाहिये थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसी तरह कोई दो साल पहले एक ट्रेन को दुर्घटना से बचाने के लिये ड्रायवर स्वयं रेल इंजिन के सामने आकर ट्रेन को न केवल दुर्घटना से बचाया बल्कि अनेक लोगों की जान भी बची। उस रेल इंजन के ड्रायवर की मौत के बाद उसके परिजनों का क्या हुआ, यह जानने की फुर्सत मीडिया को नहीं है। ऐसे अनेक प्रकरण है जो समाज का मन बदलने की ताकत रखते हैं लेकिन मीडिया सकरात्मक खबरों से परे होता जा रहा है। सनसनी और टीआरपी देने वाली खबरों के चलते उसे सामाजिक सरोकार की चिंता ही नहीं है, इस सच से दिल्ली से देहात तक की पत्रकारिता करने वाला कोई भी शख्स इंकार नहीं कर सकेगा।

अपराधी बनाने के लिये उम्र 16 साल तय करने से ही समस्या का हल नहीं है और न ही यह राजनीति का मुद्दा है। इस मामले को दलगत राजनीति से परे ले जाकर समाज के मंच पर देखा जाना चाहिये। बच्चों के लिये काम कर रही संस्थाओं को भी प्रयास करना चाहिये कि बच्चे अपराध से विरक्त कैसे हों? टेलीविजन के पर्दे पर आने वाले विज्ञापनों पर तो जैसे नियंत्रण समाप्त हो चला है, ऐसा प्रतीत होता है। मुझे याद है कि कॉलेज के आरंभिक दिनों में पता चला था कि रजस्वला क्या होता है लेकिन आज पांच साल के बच्चे को पूरी खबर है। सेनटरी नेपकिन के विज्ञापन ने उन्हें सबक सिखा दिया है। इन दिनों इससे भी आगे बढक़र एक विज्ञापन आ रहा है जिसमें सैनेटरी नेपकीन पहनी मॉडल को जिस्मानी तौर पर घुमा-फिराकर दिखाया जा रहा है कि वह कितनी कम्फर्ट है लेकिन विज्ञापनप्रदाता यह भूल गया है कि समाज स्वयं को कम्र्फट फिल नहीं कर रहा है। इस बेहूदा विज्ञापन पर किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया क्योंकि ऐसा लगता है कि सबने इसे जिंदगी का हिस्सा मान लिया है।

मुझे लगता है कि संविधान में नाबालिग की जो व्याख्या की गई है, वह ऐेसे छोटे-मोटे अपराधों के लिये है कि किसी के बगीचे से आम तोड़ कर चोरी से खा लेना, किसी को गुस्से में पत्थर फेंक देना, किसी को मासूमियत के साथ परेशान करना। तब शायद कानून को भी उम्मीद नहीं थी कि जिन्हें वह नाबालिग कह कर व्याख्या कर रहा है, वह बालिगों से अधिक दुस्साही और अपराधी प्रवृत्ति का होगा। अब किसी नाबालिग के पास आम तोडऩे कर चोरी से खाने का वक्त नहीं, अब वह गुस्से में पानी का घड़ा नहीं तोड़ता है बल्कि चाकू से हमला करता है और मासूमियत को मोबाइल, टेलीविजन और इंटरनेट की नजर लग गयी है। इस नजर ने उम्र को पीछे धकेल दिया है और बचपन की आंखों में नीयत नहीं, बदनीयती बस चली है।

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