लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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suresh prabhuप्रमोद भार्गव

2016 का रेल बजट सीघे-सीधे आम आदमी को ख्याल में रखकर तैयार किया बजट है। वह इसलिए,क्योंकि आने वाले महीनों में पश्चिम-बंगाल,असम, केरल, पुड्डुचेरी और 2017 की शुरूआत में उत्तरप्रदेश, में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसलिए इसमें सुविधा,सुरक्षा और स्वच्छता पर जोर देने के साथ बुजुर्ग,स्त्री-पुरुषों को निचली शायिकाओं की संख्या हरेक रेल में 120 सुनिश्चित की गई है। महिला यात्रियों को 24 घंटे हेल्पलाइन सेवा रखने के साथ नवजात शिशुओं के लिए गर्म दूध और जरूरी दवा की उपलब्धता प्रमुख स्टेशनों पर करने की बात कही है। शायद यह पहला रेल बजट है,जिसमें शिशुओं के लिए दूध की जरूरत की चिंता जताई है। लोक को लुभाने वाला यह बजट इसलिए भी है,क्योंकि इसमें यात्री किराए में बढ़ोत्तरी तो की ही नहीं गई है,माल-भाड़े में किराए की वृद्धि को भी यथावत रखा गया है। साथ ही अनारक्षित श्रेणी में अंत्योदय एक्सप्रेस चलाने की बात करने के साथ आरक्षित व अनारक्षित रेलों में दीन-दयालु सवारी डिब्बे जोड़ने की घोषणा की है। यानी इस घोषणा में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रणेता रहे दीनदयाल उपध्याय के सपनों को आकार देने की पहल की गई है। इस कड़ी में आने वाले कुछ वर्षों में यह व्यवस्था निश्चित होगी कि यात्री को टिकट खरीदने के बावजूद यात्रा की अनिश्चितता न रहे। यानी जो टिकट मिलेगा वह सीट के नंबर की पुष्टि के साथ मिलेगा। यह बजट इसलिए भी लोक का बजट है,क्योंकि इसमें केवल कुलीन वर्ग को सुविधाएं देने वाली बुलेट,हाईस्पीड रेल और रेल को डिजीटल बना देने की बाते कम हैं।

इसे लोक-लुभावन या चुनावी बजट कहने की पुष्टि हम इस तथ्य से कर सकते हैं,क्योंकि बजट के आते ही रेलवे सेवा आधारित शेयरों में गिरावट देखने में आई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे जन-हितकारी और दूरगामी विकास का बजट बताया है। आम-आदमी के हितों को साधने की कोशिश बजट में इसलिए भी है,क्योंकि बिहार में भाजपा व उसके सहयोगी संगठनों की करारी हार ने उसे आईना दिखाने का काम किया है। लोकप्रिय उपायों को आधार बनाने के बावजूद इसमें रेलवे के विकास और आधुनीकिरण की सभी संभावनाएं मौजूद हैं।

संसाधनों की कमी से जूझ रही रेलवे में किसी भी तरह के किराए में इजाफा न होना इस आशंका का पैदा होना लाजिमी है कि राजस्व घाटे की पूर्ति,विकास परियोजनाओं को धन और सातवें वेतन आयोग की सिफ़ारिशें लागू कैसे होंगी ? ये शर्तें अपनी जगह वाजिब हैं। अलबत्ता हमें नहीं भूलना चाहिए कि रेलवे बीते नबंवर में ही प्रथम श्रेणी किराए में चार फीसदी की बढ़ोत्तरी कर चुका है। यही नहीं रेलवे ने चतुराई बरतते हुए तत्काल टिकटों की मात्रा 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत कर दी है। फिर तत्काल टिकट की दर भी बढ़ा दी गई। टिकट निरस्ती की दर दोगुनी कर दी गई। साथ ही अनेक ऐसी रियायतों को खत्म कर दिया गया,जो अर्से से मिल रही थीं। यानी बजट पूर्व ही रेलवे ने राजस्व वसूली के उपाय बिना किसी सार्वजनिक घोषणा के कर लिए हैं। साफ है,प्रत्यक्ष यात्री और मालभाड़े किराए में वृद्धि की भरपाई पहले ही कर ली गई है। यह बढ़ोत्तरी अब तक 11 बार हो चुकी है। राजग सरकार के साथ सोने में सुहागे की बात यह भी रही है कि डीजल के दाम पिछले एक साल निचले स्तर पर बने रहे हैं। रेलवे में कर्मचारियों के वेतन,भत्ते व पेंषन के बाद सबसे बड़ा जो खर्च है,वह ईंधन के रूप में डीजल खरीदने में होता है। देश में आइल कंपनियों से डीजल खरीदने का सबसे बड़ा ग्राहक रेलवे ही है। मसलन रेलवे यदि इस सब के बावजूद किराए में बढ़ोत्तरी करती तो यह जनता के साथ ज्यादती होती।

इसके साथ ही रेलवे अपनी योजनाओं को साकार रूप देने के लिए पीपीपी यानी निजी सार्वजनिक सहभागिता को बढ़ावा देने की फिराक में भी है। हालांकि आमदनी की गारंटी की संदिग्धता के चलते पूंजी निवेश के लिए उद्योगपति सामने नहीं आ रहे हैं। इसलिए रेलवे नए विकल्पों की तलाश में लग गया है। इस हेतु भारत सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों की पूंजी को रेलवे में लगाने के उपाय किए जा रहे हैं। रेल मंत्री सुरेश प्रभु की कोशिश है कि अगले वित्त वर्ष में 1.20 लाख करोड़ रुपए का निवेश संभव हो जाए। इसके लिए 1.5 लाख करोड़ निवेश के लिए भारतीय जीवन बीमा निगम को तैयार किया गया है। साथ ही एनटीपीसी,स्टील अथाॅरिटी आॅफ इंडिया और कोयला मंत्रालय को भी पूंजीगत निवेश के लिए तैयार किया जा रहा है। साथ ही रेलवे की कोशिश है कि सांसद-निधि भी यात्री सुविधाएं बढ़ाने के लिए रेलवे में इस्तेमाल हो। इस नजरिए से 125 सांसद तैयार भी हो गए हैं। यह एक अच्छी पहल है। इससे संसदीय क्षेत्रों में बुनियादी जरूरतों को बल मिलेगा। रेलवे स्टेशनों पर इस राशि से बड़ी संख्या में उपरगामी पैदल पथ बनाए जा सकते हैं। तय है,सांसदों की इस भागीदारी से विकास को गति मिलेगी।

रेलवे एक अच्छा प्रयोग राज्य सरकारों की आर्थिक मदद से भी करने जा रही है। इस योजना के तहत रेलवे और राज्य सरकार बराबर की भागीदारी करते हुए 50-50 करोड़ रुपए मिलाकर 100 करोड़ की एक परियोजना को अंजाम देंगे। इस संयुक्त परियोजना से  दूर-दराज के इलाकों में रेलवे आधारभूत सरंचना विकसित करेगी। फिलहाल इस नितांत मौलिक पहल के अंतर्गत 5300 किमी नई पटरियां बिछाने के लिए 44 संयुक्त प्रयासों को जमीन पर उतारने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इनमें 92 हजार करोड़ से अधिक धनराशि खर्च होगी। ये परियोजनाएं यदि सफल परियोजना के रूप में सामने आती हैं तो तय है,इस अभिनव पहल से रेलवे के आधारभूत ढाचें को विकसित करने में बहुत तेजी आएगी।

इन्हीं वजहों से रेलवे का यह बजट लोक-लुभावन या चुनावी होने के बावजूद विकास को नई दृष्टि व गति देने वाला है। इन संभावनाओं के चलते ही रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने बजट भाषण के बीच-बीच में रेलवे की प्रगति,सरंचना रणनीति और लक्ष्य से जुड़े नए मंत्रों का प्रयोग किया है। प्रभु ने रेलवे को नया आदर्श वाक्य,यात्री की गरिमा,रेल की गति और देश की प्रगति‘ दिया है। नए लक्ष्य पुनर्सगंठन,पुनर्गठन और पुनर्जीवन होंगे। नई रणनीति, ‘नव अर्जन ;नए संसाधन, नव मानक ;नए नियम और नव सरंचना‘ के रूपों में पेश आएगी। नया नारा भी उछाला गया है, ‘चलो मिलकर कुछ नया करें।‘मसलन आशा और उम्मीदों से लबरेज सुरेश प्रभु चहुंओर से रेलवे के सशक्तिकरण के प्रयास में जुटे दिखाई दे रहे हैं।

रेलवे को भारत सरकार के उपक्रमों,सांसद निधि और राज्य सरकारों की सहभागिता की ओर इसलिए दृष्टि गढ़ानी पड़ी है,क्योंकि पीपीपी माॅडल के तहत रेलवे में पूंजी निवेश के लिए देशी-विदेशी निवेशक आगे नहीं आए हैं। दरअसल व्यवसाय में जब लाभ की बजाय नुकसान की शंका ज्यादा हो तो निजी क्षेत्र के उद्यमी क्यों पूंजी लगाने लगे ? पिछला बजट प्रस्तुत करते हुए इन्हीं सुरेश प्रभु ने 400 रेलवे स्टेशनों को पीपीपी परियोजनाओं के अंतर्गत विकसित करने की घोषणा की थी। ये वे स्टेशन थे,जिनसे 10 हजार करोड़ रुपए की सालाना आमदनी होती है। बावजूद कंपनियों ने ज्यादा जिज्ञासा नहीं दिखाई। हालांकि भोपाल का हबीबगंज स्टेशन इसी माॅडल के तहत विकसित हो रहा है। दावा तो यह भी किया जा रहा है कि यह स्टेशन देश का सबसे सुंदर,स्वच्छ और आधुनिक सुविधाओं वाला स्टेशन होगा। लेकिन यह दावा कितना सच है,यह पता पुनर्विकास का काम पूरा होने पर ही चलेगा। चार अन्य स्टेशनों के पुनरूद्धार के लिए भी बोली की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। अगले वित्तीय वर्ष में कुछ बड़े व मझोले स्टेशनों के भवनों को नया रूप देने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा।

बजट में सीधे-सीधे नई रेल चलाने की घोषणा तो नहीं की गई है,लेकिन चार नई प्रकार की गड़ियां जरूर पटरी पर उतारने की बात कही गई है। ये रेलें हमसफर,तेजस,उदय और अंत्योदय होंगी। लंबी दूरी की अंत्योदय पूरी तरह अनारक्षित एक्प्रेस होगी। हकीकत में हमें आभिजात्य वर्ग के लिए वातानुकूलित रेलों की संख्या बढ़ाने की बजाय अंत्योदय जैसी एक्सप्रेस रेलें बड़ी संख्या में एक छोर से दूसरे छोर तक चलाने की जरूरत हैं। साथ ही राजधानी,षताब्दी,दूरंतों और अन्य रेलों में अनारक्षित डिब्बे लगाने की जरूरत है,जिससे सीमित और मध्यम आय वाले व्यक्ति को भी तेज गति की रेलों से गंतव्य पर पहुंचने में आसानी हो। वैसे भी दुरंतों रेलों की जो जानकारी सामने आई है,उसके अनुसार इसमें हर साल 30 से 70 हजार तक सीटें खाली पड़ी रहती हैं। इस कारण 2010 से 2015 के बीच रेलवे को 600 करोड़ की हानि हुई है। देश में 33 दूरंतों रेलें चलती हैं। कालांतर में ये घाटे में न चलें,इसके लिए इन्हें,अंत्योदय रेलों में बदला जा सकता है। बहरहाल यह बजट आम आदमी के करीब इसलिए दिख रहा है,क्योंकि इसमें बिहार की हार से सबक लिया गया है और आगामी चुनाव समीकरणों का ध्यान में रखा गया है। देश को ऐसे ही बजट प्रावधानों की जरूरत है।

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