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तनवीर जाफरी

तनवीर जाफरी

पत्र-पत्रिकाओं व वेब पत्रिकाओं में बहुत ही सक्रिय लेखन,

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pakistan and talibanतनवीर जाफ़री

पाकिस्तान के नव निर्वाचित प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़  भले ही आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए कोई विशेष रणनीति तैयार करने की बात क्यों न कह रहे हों परंतु वास्तविकता तो यह है कि चरमपंथी संगठनों ने पाकिस्तान में अपनी जड़ें इतनी गहरी कर ली हैं कि पाकिस्तान की निर्वाचित लोकतांत्रिक सरकार तो क्या अब सेना व आईएसआई भी यदि चाहें तो संभवत: इन चरमपंथी संगठनों की हिंसक गतिविधियों व इनकी मनमानी पर नियंत्रण नहीं कर सकती। साधारण नागरिकों की पाकिस्तान में होने वाली सामूहिक हत्याओं से लेकर फौजी ठिकानों,सैन्य प्रशिक्षण केंद्रों,हवाई ठिकानों तथा कई अत्यंत सुरक्षित व महत्वपूर्ण जगहों पर हमले कर यह चरमपंथी संगठन समय-समय पर पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों को अपनी ताकत व घुसपैठ का एहसास भी करा चुके हैं। खासतौर पर तहरीक-ए-तालिबान व अलक़ा यदा जैसे संगठन इस समय पाकिस्तान पर पूरी तरह हावी हो चुके हैं। इन हालात का जि़म्मेदार कोई और नहीं बल्कि स्वयं पाकिस्तान का शासक वर्ग ही है। हालांकि 2001 में अमेरिका पर हुए 9/11 के हमले के बाद जिस समय नाटो सेनाओं ने अमेरिका के नेतृत्व में अफगानिस्तान पर ओसामा बिन लादेन व मुल्ला मोहम्मद उमर की तलाश में आक्रमण किया था तथा तालिबान को अफगानिस्तान की सत्ता से बेदखल किया था उस समयस पाकिस्तान अमेरिका के सहयोगी देश के रूप में खड़ा नज़र आ रहा था। परंतु 2001 के तत्काल पहले की स्थिति भी यह थी कि उस समय न केवल तालिबान का प्रवक्ता पाकिस्तान में बैठकर पूरे विश्व को तालिबानी गतिविधियों तथा तालिबानी इरादों व योजनाओं की जानकारी मीडिया के माध्यम से दिया करता था। बल्कि इन्हीं तालिबानों ने जब राष्ट्रपति नजीब से खूनी क्रांति के बाद सत्ता छीनी तथा अफगानिस्तान की सरकार पर अपना नियंत्रण किया था उस समय भी पाकिस्तान ही अफगानिस्तान में तालिबान जैसे क्रूर शासकों की सरकार को मान्यता देने वाला दुनिया का पहला देश था।
बहरहाल, समय चक्र अब काफी आगे बढ़ चुका है। 2001 में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्लू बुश के जोश,जल्दबाज़ी तथा पूर्वाग्रह के परिणामस्वरूप जो अमेरिकी सेना 9/11 के अमेरिका पर हुए हमले का बदला लेने की गरज़ से अफगानिस्तान में दा$िखल हुई वही अमेरिकी सेना अब अमेरिकी नागरिकों के भारी दबाव के चलते अफगानिस्तान से वापस जाने को तैयार है। नाटो ने अफगानिस्तान में सुरक्षा की पूरी कमान अफगान सेना के हाथों में सौंप दी है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार अगले वर्ष तक नाटो सेनाएं पूरी तरह से अफगानिस्तान से वापस चली जाएंगी। इस समय अमेरिका तालिबानों की बढ़ती ताकत तथा उनके बुलंद हौसलों के समक्ष लगभग समर्पण करता हुआ अगानिस्तान से अपनी इज़्ज़त बचाकर निकलने के बहाने तलाश कर रहा है। और इन्हीं बहाने में सबसे मुनासिब बहाना जो अमेरिका ने तलाश किया है वह है तालिबानों में अच्छे तालिबानों की पहचान कर अफगानिस्तान की सत्ता में उन्हें भागीदार बनाकर स्थानीय लोगों के हाथों में सत्ता सौंप कर नाटो द्वारा लगभग खंडहर बना दिए गए इस देश को छोडक़र वापस चले जाना। यह और बात है कि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई अमेरिका की इस नीति से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। स्वयं तालिबान भी करज़ई सरकार को यह कहकर अहमियत नहीं दे रहे कि वर्तमान करज़ई सरकार अमेरिका की कठपुतली सरकार है।
एक ओर अफ़गानिस्तान में जहां अमेरिका द्वारा अफगान सत्ता में उदार तालिबानों को तलाश करने व उन्हें सत्ता में भागीदार बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं वहीं तालिबान का एक बड़ा आक्रामक वर्ग जोकि केवल हिंसा द्वारा अफगानिस्तान की सत्ता पर नियंत्रण करना चाहता है वह अफगानिस्तान में अपनी हिंसक गतिविधियों को जारी रखे हुए है। यहां तक कि गत् 25 जून को राष्ट्रपति हामिद करज़ई के निवास पर भी तालिबानों ने ज़ोरदार हमला कर अपने इरादों से आगाह करा दिया है। उधर अमेरिका व तालिबानों के मध्य राष्ट्रपति करज़ई को विश्वास में लिए बिना बातचीत का सिलसिला काफी आगे बढ़ गया है। यहां तक कि तालिबानों ने कतर की राजधानी दोहा में अपना पहला विदेशी कार्यालय भी खोल दिया है। अमेरिका व तथाकथित अच्छे तालिबानों के मध्य दोहा में बातचीत का दौर भी शुरु हो चुका है। परंतु राष्ट्रपति करज़ई इस प्रक्रिया से खुश नहीं हैं । उनका कहना है कि तालिबानों के साथ इस प्रकार की वार्ता जोकि अफगान सरकार के नेतृत्व में नहीं हो रही है यह बेहद चिंताजनक है। क्योंकि अफ़गान सरकार व तालिबान के मध्य विश्वास नहीं है। उधर अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि तालिबानों के साथ बातचीत तो अवश्य की जा रही है परंतु यह प्रकिया तो बहुत लंबी है तथा इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि यह बातचीत सफल होगी भी या नहीं।
गौरतलब है कि अमेरिका ने तालिबानों के साथ बातचीत से पूर्व जो प्रमुख शर्तें रखी हैं वे इस प्रकार हैं। एक तो यह कि तालिबान हिंसा का रास्ता छोड़ेगा। दूसरी शर्त यह कि तालिबान अलकायदा से अपने संबंध खत्म करेगा। अफगानिस्तान के संविधान का आदर करेगा तथा महिलाओं व अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करेगा।परंतु जिस प्रकार तालिबान अमेरिका से बातचीत शुरु करने के दौरान भी हिंसा के मार्ग को नहीं छोड़ रहे हैं उसे देखकर यही लगता है कि संभवत: तालिबानों को न तो अमेरिका की शर्तों की कोई परवाह है न ही वे नाटो की ताकत से घबराने वाले हैं। इसी बीच अफ़गा निस्तान के सेना प्रमुख जनरल शेर मोहम्मद करीमी ने यह कहकर एक बार फिर दुनिया के समक्ष पाकिस्तान द्वारा तालिबानों को दिए जा रहे संरक्षण की पोल खेलते हुए बड़े ही आत्मविश्वास के साथ यह बात कही है कि यदि पाकिस्तान चाहे तो मात्र एक सप्ताह के भीतर तालिबान अफगानिस्तान में लड़ाई व हिंसा बंद कर सकते हैं। जनरल करीमी के अनुसार तालिबान के नेताओं पर पाकिस्तान का पूरा नियंत्रण है तथा पाकिस्तान उन्हें अपने यहां शरण देता आ रहा है। 1994 में तालिबान के उदय से लेकर 2001 में उनके अफगान सत्ता में रहने तक पाकिस्तान तालिबान का मुख्य सहयोगी व समर्थक था। जनरल करीमी के अनुसार अब भी अधिकांश तालिबान नेता भागकर पाकिस्तान में शरण लेने पहुंच चुके हैं। उनके अनुसार तालिबान पाक के नियंत्रण में है और वह पाकिस्तान के कई संगठनों पर निर्भर हैं।
गौरतलब है कि इसी वर्ष अप्रैल माह में नाटो की एक रिपोर्ट भी सार्वजनिक हुई थी जिसमें इस बात का जि़क्र था कि पाकिस्तान को यह जानकारी थी कि तालिबान लड़ाके पाकिस्तान की सीमा में शरण ले रहे हैं। स्टेट ऑफ तालिबान नामक इस रिपोर्ट में तालिबान के प्रमुख नेता नसीरूद्दीन हक्क़ानी के बारे में यह कहा गया था कि हक्क़ानी जैसा शीर्ष नेता पाकिस्तान में आईएसआई के मुख्य कार्यालय के समीप सुरक्षित रह रहा है। लगभग 27 हज़ार गिरफ्तार किए गए तालिबान लड़ाके, अलकायदा के आतंकियों तथा विदेशी लड़ाकों एवं स्थानीय नागरिकों से पूछताछ के आधार पर तैयार की गई इस रिपोर्ट में और भी तमाम ऐसे रहस्योद्घाटन किए गए थे जिनसे यह प्रमाणित हो रहा था कि तालिबान का सबसे बड़ा समर्थक पाकिस्तान है तथा पाकिस्तान ही तालिबान की सबसे सुरक्षित आरामगाह है। यह और बात है कि पाकिस्तान अपने ऊपर लगने वाले इन सभी आरोपों तथा तथ्यों से हमेशा इंकार करता रहा है। परंतु जिस प्राकर अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में ही बरामद किया गया, नाटो की रिपोर्ट में जिस तरह हक्कानी कि पाकिस्तान में रहने का स्पष्ट प्रमाण है, भारत जिस प्रकार अपने कई मोस्ट वांटेड अपराधियों के पाकिस्तान में पनाह लेने के प्रमाण देता रहता है, जैश-ए-मोहम्मद व लश्करे तैयबा व जमात-उद-दावा जैसे संगठनों के हाफज़ सईद जैसे सरगना जिस प्रकार पाकिस्तान में सरेआम अपनी गतिविधियां संचालित करते देखे जा रहे हैं, पाकिस्तान में आए दिन होने वाली बर्बर सामूहिक हत्याएं तथा अल्पसंख्यकों को निशाना बनाए जाने की सुनियोजित मुहिम जिस प्रकार अंजाम दी जा रही है उसे देखकर इस नतीजे पर आसानी से पहुंचा जा सकता है कि पाकिस्तान के आतंकवादी संगठनों विशेष कर तालिबानों से संबंध इतने गहरे हो चुके हैं कि शायद अब पाक शासकों यहां तक कि सेना व आईएसआई के लिए भी अब अपने यह कदम पीछे खींच पाना संभव नहीं है। ऐसे में पाकिस्तान व तालिबान की जुगलबंदी पाकिस्तान को किस स्थिति में ले जाएगी इस बात का सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

तनवीर जाफ़री

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1 Comment on "बहुत गहरे हैं पाकिस्तान व तालिबान के रिश्ते"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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Taalibaan ko saport krnevaala paakistaan नही jaanta ke aisa krne से usko dushmno की बाहर से ज़रुरत नही होघोगी.

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