लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

Posted On by &filed under विधि-कानून, विविधा.


शैलेन्द्र चौहान
इन दिनों पठानकोट एयरबेस पर चरमपंथी हमले के लिए सोशल मीडिया पर ही नहीं बल्कि तमाम जिम्मेदार लोगों द्वारा पंजाब पुलिस की भूमिका की खासी आलोचना हो रही है। कुछ हथियारंबद लोगों ने पठानकोट एयर बेस पर हमला किया था। कई घंटों तक चली कार्रवाई में सुरक्षा बलों के सात जवानों की मौत हो गई थी। वायुसेना अड्डे पर हुए हमले की जांच कर रही राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) गुरुदासपुर के पुलिस प्रमुख सलविंदर सिंह को पूछताछ के लिए किसी अज्ञात स्थान पर ले गई। सलविंदर का कहना था कि हथियारबंद लोगों ने उन लोगों के हाथ पैर बांधकर छोड़ दिया था और उनकी एसयूवी छीनकर फरार हो गए थे। यह बयान थोड़ा अचरज भरा है। कहा जा रहा है कि पंजाब की पुलिस का बहुत ज़्यादा राजनीतिकरण हो चुका है, पर वह तो हमेशा से ही रहा है। जैल सिंह, तलवाड़ा सिंह के ज़माने में भी पुलिस बल में अलग-अलग धड़े थे। और फिर अकेले पंजाब में ही क्यों भारत के समस्त राज्यों में कमोबेश यही हाल है। पंजाब पुलिस के पूर्व महानिदेशक केपीएस गिल का मानना है कि जब पुलिस का राजनीतिकरण हो जाता है, तो उनका ध्यान भी इसी के दांव पेच में उलझ जाता है। वैसे तो भारत में पुलिस के राजनीतिकरण, पुलिस सुधार जैसे मुद्दों पर सालों से बात होती रही है, पर कोई क़दम नहीं उठाया गया है। राष्ट्रीय पुलिस आयोग ने पुलिस सुधार के लिए 30 साल पहले रिपोर्ट दी थी, जिसे अब तक लागू नहीं किया गया। पुलिस के आचरण में कोई बदलाव नहीं दिखता है। गांवों से लेकर महानगरों तक में पुलिस के तानाशाही रवैए से लोग दो-चार हो रहे हैं। पुलिस सुधार की तमाम बातें अभी तक हवा-हवाई ही साबित हुई हैं। हमारे देश में पिछले कुछ सालों से कार्यपालिका संस्थानों के स्तर में बहुत गिरावट आई है। राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते इतने सारे वरिष्ठ पद सृजित किये गए हैं कि इनकी गुणवत्ता भी गिर गई है। बहरहाल, एक अहम सवाल यह है कि लोगों की रक्षा का भार वहन करने वाली पुलिस भक्षक की भूमिका में आखिर क्यों नजर आती है? ध्यान देने की बात यह है कि 1861 में बने औपनिवेशिक समय के पुलिस अधिनियम के मुताबिक ही देश के अधिकांश राज्यों की पुलिस आज भी काम करती है। दरअसल, इसे समझा जाना जरूरी है। भारत में आजादी की पहली लड़ाई के तौर पर 1857 के विद्रोह को याद किया जाता है। जब विद्रोह हो गया और किसी तरह से अंग्रेजों ने इस पर काबू पा लिया तो यह बात उठी की भविष्य में ऐसे विद्रोह नहीं हो पाएं, इसके लिए आवश्यक बंदोबस्त किए जाएं। इसी के परिणामस्वरूप 1861 का पुलिस अधिनियम बना। इसके जरिए अंग्रेजों की यह कोशिश थी कि सरकार के खिलाफ कहीं से भी कोई विरोध का स्वर नहीं उठ पाए और सरकार के हर सही-गलत फरमान पर अमल किया जा सके। पुलिस अग्रेजों की इच्छा के अनुरुप परिणाम भी देती रही। पर इन सबके बावजूद भारत 1947 में आजाद हो गया। कहने के लिए देश का अपना संविधान भी बन गया। लेकिन नियम-कानून अंग्रेजों के जमाने वाले ही रहे। आजाद भारत के इतने साल गुजरने के बावजूद भी व्यवस्था जस की तस बनी हुई है। पुलिस का खौफनाक रवैया भी यथावत है। हालांकि, कुछ राज्यों ने नए अधिनियम के तहत पुलिस को संचालित करने की कोशिश की है। लेकिन सच यह है कि नए और पुराने अधिनियम में कोई खास फर्क नहीं है। महाराष्ट्र और गुजरात में आज भी 1951 का बंबई पुलिस अधिनियम लागू है। कर्नाटक में 1963 में और दिल्ली में 1978 में नया पुलिस अधिनियम बनाकर पुलिस को नियंत्रित करने की कोशिश की गई। पर नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही निकला है। इन राज्यों की पुलिस का चरित्र भी दूसरे राज्यों की पुलिस से बहुत अलग नहीं है। इन राज्यों की पुलिस भी मुठभेड़ के नाम पर हत्याएं करती है और नया अधिनियम इनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता। पुलिस के रवैए को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि पुलिस सुधार की तमाम कोशिशें अब तक नाकाम ही साबित हुई हैं। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद पुलिस सुधार के खातिर राष्ट्रीय पुलिस आयोग का गठन 1979 में किया गया था। इस आयोग ने रिपोर्ट देने की शुरुआत 1981 से की। इसने कुल आठ रपटें दीं। इसके बाद 1998 में बनी रेबेरो कमेटी ने भी पुलिस सुधार से जुड़ी अपनी रपट सरकार को दे दी। लेकिन ये सब रिपोर्ट ठंढे बस्ते में पड़ी हैं और पुलिस सुधार के लिए कोई ठोस कदम अभी तक नहीं उठाया जा सका है। पुलिस के बुरे बर्ताव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आम लोग पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने में भी हिचकिचाते हैं। आजकल हालत तो यह हो गई लोग पुलिस के पास अपनी शिकायत लेकर जाने की बजाए मीडिया के पास पहुंच रहे हैं। मीडिया ट्रायल के बढ़ते चलने के लिए कहीं न कहीं पुलिस भी जिम्मेवार है। पिछले कुछ सालों से ऐसा देखने में आया है कि पुलिस का प्रयोग समय-समय पर सरकारें अपने विरोध को कुचलने के लिए भी करती रही हैं। धरना-प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज हो जाना बेहद आम हो गया है। ऐसा करके एक तरह से लोगों के हाथ से शांतिपूर्ण विरोध करने का औजार छिना जा रहा है और परोक्ष तौर पर ही सही उन्हें हिंसात्मक विरोध करने के रास्ते पर आगे बढ़ाया जा रहा है। जब से देश में नई आर्थिक व्यवस्था लागू हुई है तब से सरकार के इशारे पर पुलिस पूंजिपतियों की हितों की रक्षा की खातिर लोगों पर कहर ढा रही है।

2005 में गुड़गांव में हीरो होंडा के कर्मचारियों पर बेरहमी से डंडे बरसाती पुलिस को सारी दुनिया ने टेलीविजन के जरिए देखा था। ऐसे कई मामले गाहे-बगाहे सामने आते रहते हैं। फर्जी मुठभेड़ से जुड़े कई मामले अब तक उजागर हो चुके हैं। इनमें से कुछ में तो पुलिसवालों को सजा भी मिली है। ऐसा ही एक मामला है 1997 का। उस साल कनाट प्लेस में हुआ मुठभेड़ बेहद चर्चा में रहा था। दिल्ली पुलिस के आयुक्त निखिल कुमार को त्यागपत्र देना पड़ा था। इस कांड के दस साल बाद यानी 2007 में इस मामले में पुलिसकर्मियों को अदालत द्वारा दोषी ठहराया गया। गुजरात दंगों और 1984 के दंगों में भी पुलिस का रवैया शर्मनाक रहा है। देश की पुलिस व्यवस्था में भ्रष्टाचार की जड़ें भी बेहद गहरी हैं। हर छोटे-बड़े काम के लिए पुलिस द्वारा पैसा वसूला जाना आम बात है। रेहड़ी पटरी वालों से लेकर रेलगाड़ियों में सामान बेचने वाले वेंडरों तक से वसूली करने में पुलिस बाज़ नहीं आती है। ऐसे में अहम सवाल यह है कि जिस देश की पुलिस का चरित्र ऐसा हो तो वहां से भय और असुरक्षा का माहौल आखिर कैसे दूर हो सकता है? पुलिस को मानवीय चेहरा और चरित्र कैसे प्रदान किया जाए? पुलिस का गठन रक्षा करने के लिए हुआ है न कि अराजकता को हवा देने या आम लोगों के साथ तानाशाह जैसा बरताव करने के लिए। पुलिस के व्यवहार में सुधार करने के लिए सबसे पहले तो अंग्रेजों के जमाने के पुलिस अधिनियम में बदलाव की दरकार है। क्योंकि गाइडलाइन को बदले बगैर व्यवस्था को बदलना असंभव सरीखा है। जिस जमाने में यह पुलिस अधिनियम बना था उस वक्त की चुनौतियां आज से काफी अलग थीं। इसलिए मौजूदा दौर की मुश्किलों से निपटने के लिए नए नियमों और कानूनों की जरूरत है। पुलिस की भूमिका और जिम्मेदारियों में भी काफी बदलाव आ गया है। पुलिस के राजनीतिक प्रयोग पर भी लगाम लगाया जाना बेहद जरूरी है। सत्ताधीश अपनी सियासी रोटी सेंकने के फेर में कई बार रक्षक को भक्षक की भूमिका में तब्दील कर देते हैं। पुलिस के चरित्र में सुधार के लिए एक ऐसी व्यवस्था कायम होनी चाहिए जिसमें पुलिस के खिलाफ होने वाली शिकायतों का निपटारा जल्दी से जल्दी और निष्पक्ष तरीके से हो सके। कुछेक मामलों को छोड़ दें तो अभी हालत यह है कि पुलिस के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने में लोगों के हाड़ कांपते है। क्योंकि ऐसा कर देने पर पुलिस संबंधित पक्ष को प्रताड़ित करने के लिए नई-नई तरकीब तलाश लेती है। दूसरी ओर भारत में बस पुलिस का चरित्र ही बहस का विषय बन जाता है! सिपाहियों को हमेशा यह रंज रहता है कि जब भी वे कुछ अच्छा करते हैं, सारा श्रेय राजनेता ले जाते हैं और कहीं गड़बड़ हुई तो गाज उनके सर पर गिरती है। इस कारण वे सत्ता की राजनीति के साथ खड़े रहते हैं और सत्ताधीशों के अनुरूप ही अपना दायित्व निर्वाह करते हैं। आज सबसे ज्यादा जरूरी है पुलिस बल में स्वायत्तता कायम करना और उसकी मानसिकता में बदलाव लाना। राजनितिक इच्छाशक्ति के आभाव में जो नहीं हो पा रहा है। यह निश्चित तौर पर पूरी व्यवस्था की सेहत के लिए काफी नुकसानदेह है।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz