लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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विगत् 24 मार्च को बांद्रा-वर्ली सी लिंक के दूसरे चरण के उद्धाटन समारोह के अवसर पर जब सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चाह्वाण एक मंच पर उपस्थित हुए तो कांग्रेसी इतने क्षुब्ध हुए कि उन्होंने आला कमान से इसकी शिकायत की। इस शिकायत और क्षोभ का आधार यह बताया जाता है कि अमिताभ बच्चन गुजरात के ब्रांड एम्बेसडर हैं और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी है। कांग्रेस के आला कमान सहित देश के सभी कांग्रेसियों को यह तो भली प्रकार ज्ञात होगा कि गुजरात भारत का एक राज्य है जहाँ भारतीय संविधान पूरी तरह लागू है और वहाँ भारत के ही चुनाव आयोग द्वारा विधान सभा का चुनाव संपन्न कराया जाता है जिसके आधार पर पूर्ण बहुमत प्राप्त भाजपा के सत्तारुढ़ होने पर विधायक दल के निर्वाचित नेता नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हुए। गुजरात के मुख्यमंत्री या वहाँ की सरकार ने महानायक अमिताभ बच्चन को वहाँ का ब्रांड एंबेसडर बना दिया, तो बच्चन इतने अस्पृश्य हो गये कि उनके साथ एक समारोह में रहने पर कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक चाह्वाण को अपने आला कमान को सफाई देनी पड़ी और अपने इस संकल्प की घोषणा करनी पड़ी कि आइंदा वे कभी उस मंच पर उपस्थित नहीं होंगे जिस पर अमिताभ बच्चन मौजूद होंगे। यह सरासर अमिताभ बच्चन का ही अपमान नहीं, वरन् पूरे कला जगत का अपमान है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री चाह्वाण ने अपनी यह घोषणा पुणे मेंं आयोजित मराठी साहित्य सम्मेलन के तीन दिवसीय आयोजन में अनुपस्थित रहकर पूरी की क्योंकि वहाँ अमिताभ बच्चन मौजूद थे। मजे की बात यह है कि बांद्रा-वर्ली सी लिंक के दूसरे चरण के उद्धाटन समारोह में महाराष्ट्र सरकार द्वारा अमिताभ बच्चन सादर आमंत्रित किये गये थे। उन्हें सार्वजनिक निर्माण मंत्री द्वारा निमंत्रण पत्र प्रेषित किया गया था। यह अवश्य है कि सार्वजनिक निर्माण मंत्री राकं्रापा कोटे से हैं किंतु लोकतंत्र में मंत्रिमंडल का सामूहिक उत्तरदायित्व होता है। अतः अमिताभ बच्चन को महाराष्ट्र सरकार द्वारा ही निमंत्रित माना जायगा। यह निमंत्रित महानायक का सरासर अपमान है। वैसे अमिताभ बच्चन पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी (अब दिवंगत) के बाल सखा हैं और गाँधी परिवार एवं बच्चन परिवार में लंबे अर्से तक घनिष्ठ पारिवारिक संबद्ध रहे हैं। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी अमिताभ बच्चन से 2002 के गुजरात दंगों के लिए पूरी क ांग्रेस की भर्त्सना करवाने के पूर्व क्या, 1984 के सिख नरसंहार के लिए पूरी कांग्रेस की भर्त्सना करवाना पसंद करेंगे? राजनीतिक शालीनता की सारी सीमायें तोड़ते हुए कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने 30 मार्च को गुजरात के अत्यंत कुशल एवं सफल मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना भगोड़े दाउद इब्राहीम से कर डाली। यह एक राष्ट्रीय पार्टी की असहिष्णुता की हद है। यह निष्कर्ष निकालना अनुचित न होगा कि अब इस देश के लोकतंत्र में सत्तारुढ़ दल के आलाकमान को विपक्षी दलों के नेताओं, स्वतंत्र कलाकारों, साहित्यकारों एवं मीडिया को अपमानित करने का अधिकार मिल गया है। इतना ही नहीं नितांत संवैधानिक तरीके से चुनी गयी विपक्ष की राज्य सरकारों के प्रति उसका रवैया नितांत पक्षपाती, अनुदार एवं हठधर्मी से परिपूर्ण प्रतीत होता है। ले-देकर गुजरात सरकार एवं उसके मुख्यंमत्री नरेंद्र मोदी के प्रति पंथनिरपेक्षता से ग्रसित राजनीतिक दलों जिसमें कांग्रेस भी शामिल है, द्वारा विगत आठ वर्षों से 27 फरवरी, 2002 को गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन रोक कर 58-59 हिन्दू राम कार सेवकों को जीवित जला दिये जाने के बाद उसकी प्रतिक्रिया स्वरुप गुजरात व्यापी सांप्रदायिक दंगों में मारे गये लोगों में 790 मुस्लिमों एवं 254 हिन्दुओं की संख्या देखकर अत्यंत असहिष्णु प्रतिक्रिया व्यक्त की जाती रही है। हिन्दू या तो पुलिस की गोली से मारे गये थे अथवा दंगों में। देश के जितने पंथनिरपेक्षतावादी हैं उनमें से किसी की जुबान गोधरा स्टेशन पर हुए नरसंहार पर नहीं खुली। कम से कम भारत की स्थापित परंपरानुसार मृतकों के प्रति श्रध्दांजलि व्यक्त करते हुए दुख तो जाहिर किया ही जा सकता था। अब जरा 1984 के सिख नरमेध पर भी गौर किया जाय। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरागांधी की 31 अक्टूबर 1984 को उनके दो सुरक्षाकर्मियों द्वारा हत्या किये जाने पर राजधानी दिल्ली सहित केवल तीन दिन में ही सिखों का नरसंहार शुरू कर दिया गया था और केवल तीन दिनों में ही तीन हजार से अधिक निर्दोष सिख मौत की घाट उतार दिये गये थे जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी (दिवंगत इन्दिरा जी के पुत्र) ने यह सार्वजनिक घोषणा करके न्यायसंगत ठहराया था कि ‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है’ यहाँ यह उल्लेख करना अनुचित न होगा कि इस वीभत्स सिख नरसंहार का आयोजन कांग्रेस के अनेक नेताओं ने किया था। विगत् 25 वर्षों में इस नरसंहार के कितने दोषियों को दंडित करवाया जा सका? कांग्रेस आला कमान और उनके दरबारियों को गुजरात का अपमान बंद करना होगा। अन्यथा दूसरा पक्ष भी सिख नरसंहार का मुद्दा उठाकर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने से बाज नहीं आयेगा। यह एक कुतर्क से कम नहीं है कि 1984 में बड़े पैमाने पर सिख नरसंहार एक लोकप्रिय प्रधानमंत्री की सिख सुरक्षाकर्मियों द्वारा की गयी निर्मम हत्या की प्रतिक्रिया में हुआ था जबकि गुजरात व्यापी 2002 का सांप्रदायिक दंगा 58-59 हिन्दू रामसेवकों को जीवित जलाकर मार डालने की प्रतिक्रिया स्वरूप हिन्दुओं द्वारा प्रायोजित था। गोधरा स्टेशन पर की गयी यह सामूहिक हत्या ऐरे-गैरे लोगों की थी। उनके लिए इतनी प्रतिक्रिया अनुचित थी। यह निष्पक्ष मीडिया का उत्तर दायित्व है कि 1984 एवं 2002 के दंगों एवं हत्याकांडों का मूल्यांकन करके देश के समक्ष ऐसा साफ चित्र प्रस्तुत करें कि भविष्य में राजनेताओं द्वारा बार-बार वातावरण को विषाक्त बनाने का कुत्सित प्रयास करके राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश न की जाय। मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में गुजरात के चतुर्दिक विकास का जो महत्वपूर्ण कार्य हुआ है और आगे भी हो रहा है, उसकी मीडिया द्वारा भरपूर सराहना की जा रही है। अनेक उद्योगपति (टाटा, बिड़ला, अंबानी आदि) गुजरात में खुलकर निवेश कर रहे हैं। अब क्या केंद्र में सत्तारूढ दल उन सभी का बहिष्कार करेगा? बार-बार गुजरात के शासन-प्रशासन की मीडिया द्वारा की जा रही प्रशंसा के कारण केंद्र सरकार क्या उन पत्र-पत्रिकाआेंं के संपादकों का भी अपमान करेगी? अमिताभ बच्चन ने भी खुलकर मोर्चा खोल दिया है। अपने ब्लॉग में लिखने के साथ ही सार्वजनिक मंचों से उन्होंने खुली चुनौतीपूर्ण घोषणा की है कि देश के जो राज्य उन्हें अपना ब्राण्ड एम्बेसडर बनाना चाहेंगे वे खुशी-खुशी स्वीकार करेंगे। उन्होंने यह भी कहा है कि उन्हें जो कोेई सादर आमंत्रित करेगा, वे समय होने पर वहाँ सहर्ष उपस्थित होंगे। यह स्मरणीय है कि अमिताभ बच्चन इस किसी भी राजनीतिक दल के सदस्य नहीं है। वे मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में उत्तर प्रदेश के भी ब्रांड एंबेसडर रह चुके हैं। उस समय वे यह विज्ञापन दिया करते थे कि ‘उत्तर प्रदेश में है दम, क्योंकि वहाँ अपराध है कम।’

अमिताभ बच्चन विश्व भर में एक कलाकार के रुप में सम्मानित हैं। वे किस राज्य के ब्रांड एंबेसडर हों इसके लिए कांग्रेस आलाकमान की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। इस देश में कानून और संविधान का शासन है। यह देश किसी भी राजनीतिक दल की बपौती नहीं है।

अमिताभ से कांग्रेस आलाकमान की एलर्जी का खामियाजा अब उनके पुत्र अभिषेक बच्चन को भी भुगतना पड़ रहा है। विगत् दस मार्च को दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की मौजूदगी में अभिषेक बच्चन को अर्थ आवर अभियान का ब्रांड एंबेसडर घोषित किया गया था और विभिन्न स्थानों पर उनके पोस्टर लगाने गये थे। यह नितांत आश्चर्य जनक विडंबना है कि गत् 27 मार्च को इंडिया गेट पर आयोजित अर्थ आवर शो से अभिषेक बच्चन के पोस्टर हटा दिये गये। जब मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से पत्रकारों ने इसका कारण पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया कि आयोजन के प्रबंधों के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है। पिता-पुत्र बच्चन द्वय सोशल नेटवर्किंग वेवसाइट के जरिए इसका जवाब मांग रहे हैं, किन्तु कांग्रेस नेताओं के पास कोई जवाब नहीं है। अधिकारी बेचारे तो सरकारी नौकर हैं। उन्हें तो बस अपने आका के हुकुम का पालन करना है। इस संबन्ध में कार्यक्रम की आयोजक संस्था वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड ऑफ इंडिया के पास भी अभिषेक बच्चन जैसे ब्रांड एंबेसडर के पोस्टर हटाये जाने का कोई समुचित कारण कहने के लिए नहीं है। एक ताजा घटनाक्रम में 28 मार्च को आयोजित गुजरात राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश मा. के.जी. बालाकृष्णन और जिम्बाब्बे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मा. ए. एम. इब्राहिम को गुजरात के दंगा पीड़ितों ने नरेंद्र मोदी के साथ मंच साझा करने से रोकने का अनुरोध किया था, किन्तु दोनों न्यायाधीशों ने उनका अनुरोध ठुकरा दिया। यह और आश्चर्य की बात है कि गुजरात कांग्रेस ने भी ऐसा ही अनुरोध किया था। उनकी मांग भी न्यायाधीशों ने एस आई. टी. द्वारा की गयी पूछताछ के बाद पत्रकारों के समक्ष कहा कि भारत का नागरिक होने और एक प्रदेश का मुख्यमंत्री होने के कारण वे संविधान एवं कानून का सम्मान करते हैं। अब अगर 1984 के सिख नरसंहार को मुद्दा बनाकर पंजाब के मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमण्डलीय सहयोगी कांग्रेस आलाकमान और केंद्र के कांग्रेसी मंत्रियों के कार्यक्रमों का बहिष्कार करें, तो कैसा अनुभव होगा? यह अध्याय बन्द होना चाहिए।

-लेखक, समाजसेवी, पूर्व सहायक बिक्री कर अधिकारी तथा स्वतंत्र टिप्पड़ीकार हैं।

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