लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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दुनिया का राजनीतिक चौधरी और ग्लोबल विलेज के महाजन की भूमिका निभाने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका में आए मंदी के तूफान ने जहां वैश्विक आर्थिक नीतियों का खोखलापन जगजाहिर कर दिया, वहीं दुनिया को वित्तीय प्रबंधन का पाठ पढ़ाने वाले अमेरिकी संस्थानों के वित्तीय अनुशासन की भी पोल खोल कर रख दी है। वित्तीय अनुशासन की बात तो दूर रही, इन संस्थानों ने तो पैसे कमाने के लिए बिना पुनर्भुगतान क्षमता की जांच किए जिस तरह से ऋण बांटे और जैसे-जैसे गुल खिलाए, उसमें तो कॉमनसेंस तक का अभाव दिखता है। इस मंदी ने न केवल वित्तीय प्रक्रिया के औचित्य पर सवाल खड़े कर दिए, बल्कि विकास की दिशा और उसके मानदंडों को भी विवादों के घेरे में ला दिया है। जिस पर पूरी दुनिया के बुद्धिजीवी सोचने को मजबूर हो गए हैं।

चिंता का विषय तो यह भी है कि, भारत देश जहां मंदी आई ही नहीं, वहां भी मंदी का बादल छाने का भ्रम मीडिया द्वारा खड़ा किया गया। ये काल्पनिक बादल भी कुछ लोगों के ऊपर अमृत की तरह बरसे तो बहुतेरों पर बिजलियां गिरा गयी। सिंतबर, 2008 से मार्च, 2009 तक हर दिन हमारे देश के अखबारों के प्रथम पृष्ठ की सुर्खियों के तौर पर मंदी छाई रही, तो चैनलों की हेडलाईन भी तय करती रही या यों कहें कि अखबार और चैनल मंदी का माहौल रचते रहे। सच तो यह है कि मंदी ने भारत को छुआ तक नहीं। ऐसे भी अर्थशास्त्रीय परिभाषा के तहत लगातार दो तिमाही में नकारात्मक विकास दर को मंदी कहा जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि हमारी विकास दर शून्य और उससे नीचे की बात तो दूर रही, कभी 6.8 प्रतिशत से भी नीचे नहीं गया। आपको आश्चर्य होगा कि दुनिया के सत्तर प्रतिशत देशों के वित्तमंत्री सात प्रतिशत विकास दर के लिए लालायित रहते हैं, और हमलोग इस विकास दर पर मंदी का विलाप कर रहे थे। इसमें किसी की नासमझी नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी योजना थी। जिसे बड़ी चतुराई से अंजाम दिया गया और उसकी लहर भी अमेरिका से ही चली। अमेरिका में मंदी की प्रतिक्रिया के तौर पर एक बहुत बड़ा पैकेज आ गया, उसके साथ ही यूरोप की सरकारों ने भी मंदी से बचाने के लिए उद्योगों को भारी-भरकम पैकेज दिया। यह शृंखला चीन तक पहुंची, तो चीन के पड़ोसी भारत के उद्योगपति कहां पीछे रहने वाले वाले थे। लगे हाथों, यहां भी पैकेज की मांग होने लगी और तबतक चुनाव आ गया, देश के राजनीतिक नेतृत्व को डर होने लगा कि पैकेज नहीं देने पर बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की छंटनी होगी, जिसका चुनाव पर गलत असर होगा। इसी डर के तहत यहां भी भारी-भरकम पैकेज देने की घोषणा की गई।

खुशी की बात यह है कि हम अब मंदी के अहसास से भी बाहर निकल चुके हैं और आर्थिक छलांग लगाने में दुनिया से होड़ लेने को बेताब दिख रहे हैं। इस उत्साह का राज 1991 के दशक में छिपा हुआ है। उस समय भी भारत एक मंदी का शिकार हुआ था जो बाकी दुनिया के लिए नहीं था। हमारा विदेशी मुद्रा भंडार शून्य हो गया था और देश दुनिया के सामने हाथ फैला रहा था। उस दौरान मजबूरी के तौर पर हमारे नीति-निर्माताओं द्वारा शुरू की गई उदारीकरण की प्रक्रिया ने मंदी के उस अभिशाप को भी वरदान में बदल डाला। हमारा अर्थ-चक्र आंधी की रफ्तार से गतिमान हो गया। इसके पीछे एक कारण जहां हमारी अर्थव्यवस्था के संचालन में आया सैध्दांतिक बदलाव था तो दूसरा कारण दुनिया में आई सूचना क्रांति का प्रभाव था। अर्थव्यवस्था में नव-प्रविष्ट उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (एलपीजी) की नीतियों ने अर्थव्यवस्था को लोकतांत्रिक बनाया, हां उनको जमीन पर उतारना अब भी बाकी है। एलपीजी में निहित संभावनाओं को देखकर ही चीन जैसे साम्यवादी देश ने भी भारत से तेरह साल पहले उसे अपनी अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग के तौर पर अंगीकार किया। हमारे यहां शुरुआती दौर में इसके संदर्भ में संशय स्थापित किया गया, लेकिन कुछ अपवादों को छोड़कर आज यह गरीबी के निवारण का महत्वपूर्ण उपकरण बन गया है।

नई आर्थिक नीति ने न केवल हमारी विकास दर में इजाफा किया या विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाया, बल्कि गरीबी रेखा से नीचे के लोगों का प्रतिशत घटाने में भी युगांतकारी भूमिका अदा की। जो इससे पहले सोचा भी नहीं जा सका था।

1991 के दशक में आए आर्थिक बदलाव की क्रांतिधर्मिता पर दृष्टिपात के लिए हमें पूर्ववर्ती नियोजन प्रक्रियाओं की दिशा और दशा पर भी दृष्टिपात करना होगा। 1951 में पंचवर्षीय विकास योजनाओं की शुरुआत करते हुए देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि हर दस साल के बाद देशवासियों का जीवनस्तर दुगुना हो जाएगा। जबकि 1951 से 1985 तक हमारी आर्थिक वृद्धि दर 3.5 प्रतिशत थी और जनसंख्या वृद्धि दर 2.2 प्रतिशत रही। इसका अर्थ यह हुआ कि देशवासियों के आय में केवल 3.5-2.2 यानी 1.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई। अगर इस दर से वृद्धि होती तो देशवासियों का जीवन-स्तर दोगुना होने में 59 साल लगते। जबकि चीन ने यह कमाल केवल तेरह सालों में कर दिखाया। आज भारत की विकास दर छह फीसदी से नौ फीसदी के बीच में दोलायमान है और आमजनों के जीवन-स्तर में हुई वृद्धि किसी आंकड़े की मुंहताज नहीं है। जिसके कारण आज हम चीन के बाद दूसरे सबसे तेज विकास करने वाले देश की श्रेणी में आ गए हैं। इसी का परिणाम है कि आज गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों का प्रतिशत 44 फीसदी से घटकर 23 फीसदी पर आ गया है। साथ ही विदेशी मुद्रा भंडार 300 ट्रीलियन डॉलर को पार कर चुका है और विदेशी मुद्रा भंडार की विशालता की दृष्टि से हम छठे नंबर पर हैं। हमने 1991 में लिया गया सारा कर्ज 1996 तक वापस कर दिया और अब दुनिया के दूसरे गरीब देशों के लिए भारत अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष को पिछले तीन साल से कर्ज दे रहा है।

उदारीकरण की पूरी तस्वीर केवल आशाजनक नहीं है, इसके डरावने पहलू भी हैं। हमारा विकास दर भले ही बढ़ गया है, लेकिन तदानुसार रोजगार सृजन दर में वृद्धि न होने के कारण अमीरी और गरीबी के बीच की खाई बढ़ती जा रही है, जिसपर जल्द ही काबू नहीं पाया गया तो सामाजिक स्थिरता के लिए खतरा पैदा हो सकता है। जिसकी बड़ी कीमत हमें चुकानी होगी और सारा विकास दर मिट्टी में मिल जाएगा। आज भी हमारे देश में 26-27 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं, इसका अर्थ है कि देश के पैंतीस करोड़ लोग दरिद्रता के शिकार हैं और दुनिया में गरीबों की सर्वाधिक संख्या भारत में है। उदारीकरण के दौर में खेती की उपेक्षा की विद्रूपता भरी तस्वीर दहलाने वाली है। 1997 से 2005 के बीच बड़ी संख्या में आई किसानों की आत्महत्या की खबरें विकास के आंकड़ों को मुंह चिढ़ाती दिख रही है।

इन नकारात्मक तस्वीरों के बावजूद मुझे भरोसा है कि भारत आर्थिक महासत्ता के रूप में आगे आएगा। जब मैंने 1994 में पुणे में यह भविष्यवाणी की तो लोगों ने मेरा मजाक उड़ाया। कई अर्थशास्त्री मित्र मेरे इस बयान की गंभीरता पर सवाल उठाते रहे। उनका तर्क था कि अभी तीन साल पहले आए आर्थिक संकट से हम उबरे भी नहीं हैं, तो आर्थिक महाशक्ति होने की बात करना दिवा-स्वप्न नहींVmo Am¡a Š`m h¡ Ÿ। सोलह साल बीत जाने के बावजूद भी मेरे लिए अपने भरोसे पर कायम रहने के पीछे कई कारण हैं। सर्वोपरि तो मेरी आशा का आधार देश की जनसांख्यिकी में युवाओं का अनुपात है। आज हमारी औसत उम्र 24 वर्ष है जो 2020 में 27 वर्ष होगी। जबकि 2020 में अमेरिका की औसत उम्र 37 वर्ष और जापानियों की औसत उम्र 44 साल होगी। लेकिन युवाशक्ति के इन आंकड़ों का अंकगणित देश को आर्थिक सुपरपावर नहीं बना सकता है। हमारे यहां अपने युवाओं के कौशल विकास के लिए कोई सुव्यवस्थित तंत्र नहीं है। अगर हमने इस पर शीघ्र ध्यान नहीं दिया तो आर्थिक महाशक्ति बनने के हमारे सपने बीच में ही दम तोड़ देंगे। स्थिति तो यह है कि 18 से 26 साल के युवक-युवतियों का सकल नामांकन अनुपात केवल 12.4 फीसदी है। इसके विपरीत दुनिया के दूसरे विकासशील देशों में इसका औसत अनुपात साठ से पैंसठ फीसदी के बीच है। कहीं-कहीं तो यह प्रतिशत 84 तक है और आर्थिक महाशक्ति बनने का स्वप्न देखने वाले हम भारतवासी 12 फीसदी पर ही चिपके हैं। इसका तात्पर्य है कि देश के 88 प्रतिशत युवकों को उच्चशिक्षा का अवसर प्राप्त नहीं है। इस क्षेत्र में खर्च के मामले में भी हम विकासशील देशों से काफी पीछे हैं। इस पर अगर जल्द ही निवेश नहीं बढ़ाया गया तो आज की तकनीकी दुनिया में हमारी युवा पीढ़ी के दिशाहीन होने का खतरा है और इसके परिणाम सोचकर ही रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं।

1966 में कोठारी आयोग ने सकल घरेलू उत्पाद का छह प्रतिशत शिक्षा पर निवेश करने की अनुशंसा की थी। इस आयोग की रिपोर्ट के आए हुए 44 साल बीत चुके हैं लेकिन अब तक हम कुल जीडीपी के 3.7 फीसदी से अधिक शिक्षा पर निवेश नहीं कर पा रहे हैं। यह बात अलग है कि आठ फीसदी से अधिक नौजवानों को जॉब के दौरान तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त हो जाता है। इन दोनों को अगर जोड़ा जाय तब भी आंकड़ा दस प्रतिशत से आगे नहीं जाता है, यानी नब्बे प्रतिशत नवयुवक-नवयुवतियां हमारी आर्थिक प्रक्रिया में भागीदारी के लिए कुशल नहीं हैं। जबकि साऊथ कोरिया में यह आंकड़ा 87 प्रतिशत के आस-पास है। हमें भी उच्च शिक्षा और कौशल विकास पर काफी ध्यान देने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे गंभीरता से लेते हुए 2022 तक पचास करोड़ लोगों को तकनीकी रूप से प्रशिक्षित करने की घोषणा की है। अगर यह लक्ष्य पूरा हो गया तो हम न केवल मानव संसाधन की दृष्टि से बहुत सक्षम होंगे बल्कि पूरी दुनिया को दक्ष श्रमशक्ति आपूर्ति करने की क्षमता हमारे पास होगी।

मानव संसाधन के अलावा भारत दूसरी सबसे बड़ी ताकत है, यहां के निवासियों की मल्टीटास्किंग योग्यता। अमेरिका में नौ साल बीताने के दौरान मैंने महसूस किया कि एक औसत अमेरिकी व्यक्ति में एक बार में दो काम करने की क्षमता नहीं होती। जबकि आप भारत के किसी गांव में चले जाएं तो वहां का दुकानदार एक ग्राहक को कीमत बोलता मिलेगा, तो दूसरे के लिए पुड़िया बांध रहा होगा और बीच-बीच में घर के अंदर झांककर पत्नी को घरेलू काम के लिए निर्देश दे रहा होगा। भारतीय भाषाओं में एक शब्द है अष्टावधानी। जिसका मतलब है आठ बातों पर एक साथ ध्यान रखना। भारतीयों का ‘अष्टावधानी’ होना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है जो हमें आर्थिक महाशक्ति होने की आशा जगाता है।

ऐसा नहीं है कि भारत भविष्य में आर्थिक महाशक्ति बनने वाला है। अगर एक अमेरिकी अर्थशास्त्री के शोध निष्कर्षों पर विश्वास करें तो हम अतीत में भी आर्थिक महाशक्ति रह चुके हैं। आंगस मेडिसन नामक अर्थशास्त्री ने ईस्वी सन् एक से लेकर ईस्वी सन् एक हजार तक की जीडीपी निकालने की कोशिश की है। मेडिसन के निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं। उस अर्थशास्त्री के अनुसार ईस्वी सन् एक से लेकर एक हजार तक भारत और चीन एक के बाद एक लगातार आर्थिक महाशक्ति बने रहे। ईस्वी सन् एक में उसने भारत के सकल घरेलू उत्पाद की गणना करने पर इसे दुनिया का 31.5 प्रतिशत पाया। अर्थात् दुनिया का एक तिहाई उत्पादन अकेले भारत में होता था। वहीं 1991 में यह जीडीपी तीन फीसदी पर आ गिरा। इसके कारणों की पड़ताल करने पर लोग अत्यंत भावनात्मक रूप से जवाब देते हैं कि अंग्रेजों के कारण भारत की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल हुई। लेकिन तथ्य सर्वथा विपरीत हैं, सच्चाई बिल्कुल भिन्न है।

हमारी अर्थव्यवस्था के शिखर से गर्त में गिरने के कारण बिलकुल देसी हैं- और वह है भारत की जाति-व्यवस्था। भारतीय समाज की सामाजिक समस्या से भी बढ़कर इस मनोवैज्ञानिक समस्या ने देश का चतुर्दिक अहित किया है। जिस समाज में केवल चार प्रतिशत लोगों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार हो और 96 प्रतिशत लोग जीवन के मूलभूत अधिकारों से वंचित किए जाते हों, उन्हें अपना कॅरियर और पेशा चुनने की स्वतंत्रता नहीं हो, यहां तक कि माता-पिता का पेशा चुनने को ही मजबूर किए जाते हों, उस समाज को पतन से भला कौन रोक सकता है। इन 96 फीसदी लोगों में कितने आइंस्टीन हो गए होंगे, कितनी प्रतिभाएं हो गई होंगी लेकिन समाज उनके योगदान से वंचित रह गया। इस क्षति की भरपाई नहीं हो सकती लेकिन इस गलती से सबक जरूर सीख सकते हैं।

हजारों सालों तक समाज के हाशिए पर रहे उस वंचित वर्ग ने आज मुख्यधारा में शिरकत करना शुरू कर दिया है जिसके कारण हमारी अर्थव्यवस्था एक बार फिर से छलांग लगाने लगी है। हम अगर देश को आर्थिक महाशक्ति बनाना चाहते हैं तो उस वंचित तबके की समग्र भागीदारी के बिना यह असंभव होगा। आज पूरी दुनिया में चल रहे सर्वसमावेशी विकास की बहस भारत के संदर्भ में अर्थशास्त्रियों के साथ-साथ समाजशास्त्रियों और राजनीतिज्ञों के लिए भी चिंता का विषय होना चाहिए। अगर हम देश की आबादी और प्रतिभाओं की समान भागीदारी और उनके प्रबंधन की योजना नहीं बनाएंगे, तो आर्थिक महाशक्ति बनने का ख्वाब संजोना छोड़ दें।

-लेखक, भारत सरकार के योजना आयोग में सदस्य, प्रख्यात अर्थशास्त्री तथा स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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