लेखक परिचय

अनिल विभाकर

अनिल विभाकर

श्री अनिल विभाकर जी जनसत्ता, रायपुर के स्थानीय सम्पादक एवं राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि हैं.

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congress-bjp-party-leadersमाओवादियों के खिलाफ केंद्र सरकार संयुक्त अभियान कब चलाएगी यह तो अभी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता मगर राजधानी एक्सप्रेस के अगवा होने के बाद इतना कहा जा सकता है कि नक्सलियों के हौसले बुलंद हैं और केंद्र की गर्जना का उनपर कोई असर नहीं दिखाई देता। माओवादी दरअसल विदेशी शक्तियों की मदद से एक तरह से भारत सरकार के खिलाफ युद्ध लड़ रहे हैं। इसके बावजूद देश के प्रधानमंत्री इस बात से इनकार करते हैं कि माओवादियों को विदेशी मदद मिल रही है। उनसे ठीक उलट केंद्रीय गृहमंत्री की राय है। अब आप खुद सोचें कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बात सही है, या देश के गृहमंत्री पी चिदंबरम की ? मनमोहन सिंह ने मुंबई में कहा था कि माओवादियों को विदेशों से कोई मदद नहीं मिल रही मगर देश के गृहमंत्री का कहना है कि माओवादियों को पड़ोसी देशों से हथियार मिल रहे हैं। प्रधानमंत्री एक तरफ तो माओवादियों को देश के लिए बड़ा खतरा मानते हैं मगर दूसरी तरफ हकीकत पर या तो पर्दा डालते हैं अथवा उन्हें वस्तुस्थिति की कोई जानकारी ही नहीं है। देश इस समय महंगाई के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है मगर प्रधानमंत्री ने मुंबई में बयान दे डाला कि महंगाई का सबसे बुरा दौर खत्म हो गया। उनके इसी बयान पर हमने बड़े ही कड़े शब्दों में लिखा था कि देश में इतना क्रूर प्रधानमंत्री कभी नहीं हुआ जिसे जले पर नमक छिड़कने में अपूर्व आनंद आता है। देश में महंगाई का इतना बुरा दौर कभी नहीं आया। सब कुछ रहने के बावजूद जमाखोरी और बेहिसाब मुनाफाखोरी की वजह से देश में नब्बे रुपए किलो दाल और 34 रुपए किलो चीनी बिका रही है। प्याज महंगा हो गया तथा अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के दाम सातवें आसमान पर हैं। इसके बाद भी देश का प्रधानमंत्री बोले कि महंगाई का सबसे बुरा दौर खत्म हो गया तो इसे क्रूरता की हद ही तो कहा जाएगा। कुछ देशका पीछे मुड़कर देखें तो उदाहरण मिल जाएगा कि सिर्फ प्याज महंगा होने पर इंदिरा गांधी ने केंद्र की सरकार पलट दी थी। उन्हीं इंदिरा गांधी की पार्टी के प्रधानमंत्री के शासन में सिर्फ प्याज ही नहीं बल्कि सभी चीजों के दाम बेहिसाब बढ़े हुए हैं मगर देश की जनता को क्या हो गया कि ऐसी सरकार कायम है और ऐसा क्रूर प्रधानमंत्री ऐसी दर्दनाक स्थिति में भी बेफिक्री से मुस्कुरा कर सफेद झूठ बोल रहा है।

 

अभी-अभी देश के तीन राज्यों हरियाणा , महाराष्ट्र और अरुणाचल में विधान सभा के चुनाव हुए और तीनों प्रदेशों में कांग्रेस इतनी बुरी स्थिति के बाद भी फिर सत्ता में वापस आ गई। कांग्रेस और मनमोहन सिंह तो कहेंगे कि उनकी सरकार के अच्छे कामों की वजह से जनता ने उन्हें फिर जिताया। ऐसा वे निश्चित तौर पर कहेंगे मगर यह हकीकत नहीं हैं। सरकार में पुनर्वापसी की वजह यह कतई नहीं कि कांग्रेस सरकार ने अच्छे काम किए बल्कि इसकी वजह यह है कि देश में विपक्षी दलों की हालत खस्ता है, विपक्ष की विश्वसनीयता खत्म होती जा रही है और जनता के सामने विक्ल्पहीनता की स्थिति है। भाजपा का हाल तो इतना बुरा है कि अगर उसने अपने को सुधारा – संभाला नहीं तो अगले कुछ वर्षों तक वह आडवाणी की जेब की पार्टी ही बनी रहेगी और केंद्र में सत्ता पाना उसका दिवास्वप्न ही साबित होगा। दरअसल भाजपा की हालत इस समय उस बंदर जैसी है जिसने उस्तरा हाथ लगने पर दाढ़ी बनाने के चक्कर में अपना ही चेहरा जख्मी कर लिया। भाजपा ने केंद्र की सत्ता में काबिज होने पर मध्यमवर्ग और गरीबों की अनदेखी की, जमीनी नेताओं को पार्टी से निकाल – बाहर कर अपने हाईटेक नेताओं पर भरोसा किया। उसकी यह जो हाईटेक मंडली थी उसमें प्रमोद महाजन, अरुण जेटली, वेंकैया नायडू और सुषमा स्वराज शामिल थे। इस हाईटेक मंडली को उद्योगपतियों की तो चिंता थी, मध्यवर्ग और गरीबों की फिक्र नहीं थी। उसे उद्यमियों की मुस्कान पूरे देश की मुस्कान लगती थी। आत्मविश्वास से लबरेज भाजपा ने इसीलिए इंडिया शाइनिंग का नारा देकर समय से पहले लोकसभा का चुनाव करा दिया। नतीजा यह हुआ कि सत्ता हाथ से निकल गई। सिर्फ उद्यमियों की मुस्कान पूरे देश की मुस्कान नहीं हो सकती। भाजपा की हाईटेक मंडली ने यही भूल की थी। उसने गरीबों ओर मध्यवर्ग की पीड़ा का बिल्कुल ही ख्याल नहीं रखा। जहां तक प्रमोद महाजन की छवि की बात है तो इसमें कहने में कोई हिचक अब भी नहीं है कि उनकी छवि कोई बहुत साफ- सुथरी नहीं थी। विस्मय की बात तो यह है कि सत्ता हाथ से निकलने के बाद भी भाजपा के रवैए में कोई सुधार नहीं आया। पार्टी के अंदर वैसे नेताओं की कद्र नहीं जिनका व्यापक जनाधार है। वैसे नेताओं को तो चुन-चुन कर निकाला गया। अब भी पार्टी के अंदर इतनी गुटबाजी है जिसे किसी भी दल के लिए अच्छा नहीं माना जाता। इसकी वजह से आम जनता के बीच भाजपा की विश्वसनीयता खत्म हो रही है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना के साथ तालमेल गैरमराठियों को क्यों पसंद आएगा? जिस शिवसेना ने वहां गैरमराठियों पर कहर बरपाया, जिसने महाराष्ट्र में मराठी मानुष का नारा देकर वहां इंटरव्यू देने गए गैरमराठी बेरोजगारों को खदेड़- खदेड़ कर पीटा, जिस दल ने महाराष्ट्र में इस तरह का जहर घोला, उस दल के साथ भाजपा का तालमेल गैरमराठी क्यों बर्दाश्त करेंगे? बाल ठाकरे भी वंशवाद कर रहे हैं और कांग्रेस में भी वंशवाद हो रहा है। भाजपा को भी प्रमोद महाजन की बेटी को टिकट देने में कोई हिचक नहीं। फिर भाजपा, शिवसेना और कांग्रेस में क्या फर्क? कांग्रेस की अर्थनीति भी उद्यमियों और पूंजीपतियों के हक में है और भाजपा की भी। फिर जनता भाजपा को वोट क्यों दे? देश में महंगाई का सबसे बुरा दौर जारी है मगर भाजपा ने इसके खिलाफ न तो कोई अभियान चलाया और न ही आंदोलन। फिर देश का मध्यवर्ग और गरीब भाजपा को वोट क्यों देगा? गुजरात को छोड़कर जिन राज्यों में भाजपा सत्ता में है वहां उसके भी मंत्री भ्रष्टाचार के पनाले में डुबिकियां लगा रहे हैं। बिहार और छत्तीसगढ़ में तो यह बात किसी से छिपी नहीं है। बिहार में तो हालत यह है कि विधानसभा चुनाव होने पर जदयू और मजबूत होकर उभरेगी और भाजपा कोटे के अधिकतर मंत्री शायद ही विधान सभा का मुंह देख पाएंगे। भाजपाई मंत्री वहां इतने बदनाम हो चुके हैं कि वे किसी भ्रष्ट कांग्रेसी से अलग नहीं दिखते। वैसे मंत्रियों को भाजपा हाईकमान का भरपूर संरक्षण मिला हुआ है। इसकी वजह से बिहार भाजपा में भारी आक्रोश है। इतनी बुरी स्थिति है देश में भाजपा की। मतलब यह कि इस समय विपक्ष नाम की चीज देश में नहीं रह गई है। मतदाताओं के सामने विक्ल्पहीनता है। इसीलिए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस सत्ता में फिर वापस आ रही है। भला यह सोचने की बात है कि इतनी महंगाई और बेरोजगारी के बाद भी कांग्रेस चुनाव क्यों जीत रही है? इतने क्रूर प्रधानमंत्री को जनता क्यों झेल रही है? इसका जवाब है देश में भरोसेमंद विपक्ष का न होना। आखिर उड़ीसा में वहां की जनता ने नवीन पटनायक पर क्यों भरोसा किया? हरियाणा में सरकार से असंतुष्ट जनता ने भाजपा को छोड़ ओमप्रकाश चौटाला को क्यों पसंद किया? राजस्थान में भाजपा के हाथ से सत्ता की बागडोर क्यों फिसल गई? दरअसल आडवाणी ने भाजपा को अपनी जेब की पार्टी बना दिया। इसकी वजह से यह पार्टी पांडुरोग से ग्रस्त हो गई। जहां तक कांग्रेस की बात है, उसे तो इसी विक्ल्पहीनता का फायदा मिल ही रहा है। न तो इसकी विदेश नीति सही है, नही इसे महंगाई रोकने की कोई चिंता है। इसे चिंता है तो सिर्फ उद्योग जगत की। माओवादियों से भी यह ताल ठोंक कर लड़ने की इच्छा नहीं रखती। तभी तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह माओवादियों और चीन की हरकतों पर परदा डालते हैं। ऐसी जनविरोधी सरकार को जनता आखिर कितने दिनों तका बर्दाश्त करेगी? जनता की मजबूरी है कि वह ऐसी सरकार को झेल रही है। विपक्ष की खराब सेहत का फायदा कांग्रेस को मिल रहा है। चुनावों में इसके कारण उसे मिली सफलता से कांग्रेस के चेहरे पर कुटिल मुस्कान देखी जा सकती है मगर आम आदमी कितना मायूस है यह आम आदमी ही महसूस कर सकता है।

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