लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार लखनऊ,उप्र

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मृत्युंजय दीक्षित

मई में सम्पन्न लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी को मिली भारी ऐतिहासिक पराजय के बाद व बाद में हुए उपचुनावों में मिली चुनावी संजीवनी के बाद आयोजित समाजवादी पार्टी का तीन दिवसीय सम्मेलन पूरी तरह से मोदी फोबिया के रंग में डूब गया। समाजवादी पार्टी का अधिवेशन एक ऐसे समय हुआ जब पूरा प्रदेश अराजकता के भंवर में जी रहा है। प्रदेश में भीषण बिजली संकट के चलते उद्योग कल कारखानों पर संकट के बादल छा गये हैं। प्रदेश में कानून- व्यवस्था का बुरा हाल है। हत्या, अपहरण, डकैती , महिलाओं के साथ छेडछाड़ व दुराचार आदि घटनाओं की बाढ़ आई हुई है। वहीं दूसरी ओर प्रदेश की पुलिस महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों की निष्पक्ष जांच में पूरी तरह से विफल हो रही है। प्रदेश की अफसरशाही पूरी तरह से बेलगाम हो चुकी है। आज प्रदेश के हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि किसी भी सरकारी कार्यालय में कोई भी अधिकारी जनता कही आवाज को सुनने के लिए तैयार नहीं है।

जब प्रदेश के युवा और सशक्त मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को प्रदेश की जनता ने सत्ता सौंपी थी तब उनसे एक आशा की किरण जगी थी कि अब प्रदेश में कुछ अच्छा होगा लेकिन सरकार जैसे- जैसे आगे बढ़ रही है जनता को सब समझ में आ गया है। समाजवाद का यह प्रयोग अब पूरी तरह से विफल हो गया है । सपामुखिया मुलायम सिंह यादव को यह अच्छी तरह से समझ में आ गया है कि फिलहाल अब केंद्र में प्रधानमंत्री बनने का सपना नहीं पूरे होने वाला है उनकी राजनीति का अंतिम चरण चल रहा है। यही कारण है कि वंशवाद की बेल पर खड़ी समाजवादी पार्टी का वर्तमान और भविष्य का चिंतन और चिंता केवल मोदी फोबिया पर ही टिक कर रह गया। कार्यकारिणी के मंच से हर नेता ने प्रधानमंत्री मोदी , सर्वोच्च न्यायालय और राज्यपाल पर सीधा और काफी तीखा हमला बोला गया। सपा नेताओं ने खुलकर और बेलगाम होकर केंद्र सरकार पर बेसिरपैर के आरोप मढ़े।

सपा नेताओं ने खुलकर मुस्लिम तुष्टीकरण का खेल खेला और भाजपा को साम्प्रदायिक शक्ति कहकर खूब गालियां भी दीं। सपा के सम्मेलन से यह बात साफ हो गयी है कि आगे आने वाले दिनों में केंद्र व राज्य सरकार के बीच खुला युद्ध छिड़ सकता है। यह हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद कभी भी हो सकता है। सम्मेलन के दौरान प्रदेश सरकार ने समाचार पत्रों में लाखों करोड़ों के विज्ञापन छपवाये तथा पूरा लखनऊ समाजवादी पोस्टरों से छाप दिया गया। यह सब केवल इसलिए किया गया कि किसी तरह से उनकी राष्ट्रीय मानयता किसी तरह से बरकरार रहे। सपा नेताओं ने सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ खूब जमकर जहर उगला । जिसे प्रदेश की जनता ने मन ही मन नापसंद भी किया है। बस उसे मौका मिलने की बात रह गयी है। समाजवादी पार्टी के नेताओं ने मुस्लिम- यादव गठजोड़ को सहेजने पर जोर दिया। मुस्लिम तुष्टीकरण में लिप्त नेता यही आरोप लगा रहे हैं कि प्रधानमंत्री मोदी बकरीद पर बधाई नहीं देते,रोजा इफ्तार नहीं कराते आदि -आदि। सपा सम्मेलन में नेताओं ने मीडिया पर आरोप लगाया कि वह प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा को महिमामंडित कर रहा है। सपा नेता आजम खां ने मुस्लिम तुष्टीकरण को और गहरा करते हुए कहाकि लव जेहाद का मुददा भाजपा के हाथों से छीन लिया जाये । स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन सहित तमाम नेताओं ने दावा किया कि अल्पसंख्यकों का हित सपा में ही सुरक्षित है।

समाजवादी पार्टी के सम्मेलन में इस बात का जोरदार चिंतन हुआ कि पार्टी का किस प्रकार से विस्तार किया जाये ताकि उसे राष्ट्रीय मान्यता मिल सके। सपा के सम्मेलन में जिस प्रकार से राजनैतिक प्रस्तावों को पास किया गया है उससे यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि वे लकीर के फकीर ही बने रहना चाहते हैं। सपा के राजनैतिक व आर्थिक प्रस्ताव से यह साफ संकेत मिल रहा है कि वह अपने पापों व विफलताओं का सारा का सारा ठीकरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी सरकार पर डालकर जनता को बेवकूफ बना रहे हैं। आम जनता यह अच्छी तरह से जानती है कि समाजवादी पार्टी की सरकार ने विगत दस वर्षो तक पूर्ववर्ती यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दिया था। सामजवादी पार्टी की सरकार व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बिजली संकट पर प्रदेश की जनता को खुलेआम गुमराह कर रहे हैं। बिजली संकट पर राजनीति हो रही है। आखिर 16 मइ्र को चुनाव परिणामों के बाद ही प्रदेश का बिजली संकट क्यो गंभीर हो गया।

सपा का कहना है कि भाजपा ने छल कपट से केंद्रीय सत्ता पर कब्जा किया है। जबकि वास्तविकता यह है कि भ्रष्टाचार, घोटालों और वंशवादी नेताओं के कपटजाल से मुक्ति पाने के लिए देश की जनता ने प्रधानंमत्री मोदी को देश की सत्ता सौंपी है। यह देश केवल समाजवादियों और कुछ वंशवादी नेतागिरि करने वाले राजनैतिक दलों की बपौती नहीं है। अपने राजनैतिक प्रस्ताव सपा ने केंद्र सरकार पर सौतेला व्यवहार करने का अरोप लगाया है। समाजवादी पार्टी के नेता झूठ पर झूठ बोल रहे हैे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार नहीं अनेक बार अपनी नीतियों को स्पष्ट कर चुके हैं। वह सबका साथ चाहते हैं सबका विकास चाहते हैें। वे कह चुके हैं कि केंद्र व राज्य टीम इंडिया की तर्ज पर विकास करेंगे। लेकिन बिजली संकट हो या चीनी मिले चलवाने का मामला हो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हो या फिर प्रदेश सरकार का कोई और नुमाइंदा किसी ने अभी तक केंद्र सरकार से सीधा संवाद नहीं स्थापित किया है। इससे साफ पता चल रहा है कि समाजवादी पार्टी के नेता बाहुबल के बल पर केवल प्रदेश में आगामी 2017 के विधानसभा चुनावों में अपना अस्तित्व बचाना चाह रहे हैं।

समाजवादी नेताओे ने इसके लिए बिहारी नेता शरद यादव को भी बुलाया जिन्होनें लालू नीतीश का महा गठबंधन बनाकर भाजपा विरोधी राजनीति को एक नया स्वरूप प्रदान करने का प्रयास किया है। मुलायम के मंच पर शरद यादव ने भी शब्दों के तीखे तीर चलाये। लेकिन उनके शब्दों का प्रदेश की जनता पर कितना असर होगा यह तो अगले दो वर्षां की राजनीति के बाद ही पता चल सकेगा।

हाल फिलहाल समाजवादी पार्टी के समक्ष कई चुनौतियां एक साथ आ खड़ी हुई हैं। एक ओर जहां प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पास सरकार के कामकाज के माध्यम से जनता का खोया हुआ विश्वास फिर से जीतना है वहीं विकास की पटरी तेज गतिसे चले इसके लिए उन्हें केंद्र सरकार के साथ मधुर सम्बंध भी बनाने पड़ेंगे। वहीं सपा मुखिया मुलायम सिंह के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के गद्दरों व कामचोर मंत्रियों पर कड़ी कार्यवाही करने की भी होगी।इस समय सपा के पास भविष्य का कोई युवा चेहरा भी नही हैं। घिसे पिटे वंशवाद की बेल पर युवा तुर्क पनप रहे हैं। इन युवा तुर्को के सहारे सपा की नैया पार हो सकेगी इसमें संदेह है। यह बात भी बिलकुल सही है कि आने वाले वर्षो में मोदी सरकार ने जनता से किये गये वायदों को कुछ सीमा तक भी पूरा कर दिया व जनता में खेाया हुआ विश्वास जगा दिया तो समाजवादी राजनीति का तो अंत हो ही जायेगा। इसीलिए समाजवादी पार्टी के सम्मेलन में भविष्य की चिंताओं के बीच मोदीफोबिया सिर चढ़कर बोलने लगा।

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