लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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राकेश कुमार आर्य

आज की दुनिया में नोबेल पुरस्कार सबसे बड़ा पुरस्कार है। इसे प्राप्त  करना हर किसी के लिए संभव नहीं है। बड़े भागीरथ प्रयासों से ही किसी सौभाग्यशाली को यह पुरस्कार मिलता है। इस पुरस्कार को पाने की जितनी इच्छा लोगों में रहती है उतनी ही इच्छा इसके विषय में ये जानकारी लेने की होती है कि आखिर इस पुरस्कार की कहानी क्या है? यह क्यों दिया जाता है और किसके नाम से दिया जाता है? सचमुच यह बात हम सबके लिए ही जानने योग्य है। वास्तव में नोबेल पुरस्कार एक महान वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल के नाम से दिया जाता है। अल्फ्रेड नोबेल का जन्म 1833 में स्वीडन की राजधानी स्टाकहोम में हुआ था। वह अपने जीवन के प्रारंभ से ही खोजी स्वभाव का था। अल्फे्रड पढऩे लिखने में अधिक रूचि नहीं लेता था, लेकिन उसे नई खोज करने का बेहद शौक था। अल्फे्रड के पिता विस्फोटकों के जाने माने विशेषज्ञ थे। उनका पुश्तैनी गांव नोविलोव था।अल्फे्रड के पिता एक प्रसिद्घ व्यापारी थे। एक बार उन्हें अपने व्यापार में घाटा आ गया। तब वह स्वीडन को छोडक़र रूस चले गये। वहां जाने पर उनका व्यापार पुन: चल निकला और वह वहीं बस गये। लेकिन उनकी कई संतानों में से एक बेटा अल्फे्रड नोबेल रूस छोडक़र पुन: स्वीडन आ गया। यहां आकर उसने भी अपना बिजनैस किया जिससे वे बहुत बड़े व्यापारी बन गये। अल्फ्रेड व्यापारी के साथ साथ एक अच्छे वैज्ञानिक भी थे। उनके साथ यह अद्भुत संयोग था कि वह व्यापारी भी थे और वैज्ञानिक भी। अन्यथा लक्ष्मी और सरस्वती का मेल दुर्लभ है। अल्फे्रड नोबेल ने अपने खोजी दिमाग से एक ज्वलनशील पदार्थ इग्नाहूटर की खोज की जिससे उनका नाम दूर दूर तक फैल गया। बाद में उन्होंने पहाड़ों को तोडऩे वाले विस्फोटक पदार्थ डायनामाइट की खोज की और भरपूर प्रसिद्धि प्राप्त की। अल्फे्रड को घूमने फिरने में बड़ा आनंद और सुख मिलता था। यूरोप में उन्हें प्रकृति प्रेमी और सबसे बड़े धनी के रूप में लोग जानते थे। उन्होंने प्रकृति के दृश्यों को अपनी नजरों में कैद करने के लिए दूर दूर की यात्राएं कीं। अल्फ्रेड नोबेल आजीवन अविवाहित रहे थे। प्रतिभा उनके सिर चढक़र बोल रही थी और नियति उनसे कोई अनोखा और अद्भुत कार्य कराने के लिए दबाव बना रही थी। इसलिए उन्होंने अपनी अथाह संपत्ति के सुनियोजन के लिए अपने जीवन काल में एक वसीयत लिखी। जिसमें उन्होंने अपनी संपत्ति के निपटारे का उल्लेख किया। वसीयत में उन्होंने लिखा कि उनकी संपत्ति की देखभाल एक ट्रस्ट करेगा। वह  ट्रस्ट इस धन को व्यापार में लगाएगा, और उससे प्राप्त आय को विश्व के उन व्यक्तियों को पुरस्कार स्वरूप प्रदान करेगा जो भौतिकी, रसायन, चिकित्सा, साहित्य और विश्वशांति के क्षेत्र में सर्वोत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं।  उनकी मृत्यु के उपरांत उनकी इच्छा के अनुसार एक फाउंडेशन का गठन किया गया। जिसने 29 जून 1900 से अपना कार्य करना आरंभ किया। अल्फे्रड नोबेल के परोपकारी और गौरवमयी जीवन का अंत दस दिसंबर 1896 को इटली के सानरेमो नगर में हो गया था। जाने से पहले उन्होंने अपनी अन्त:प्रेरणा से संसार के लिए एक ज्योति जलाई और लोगों को प्रेरित किया कि यदि आप विश्व शांति के लिए या उपरोक्त वर्णित अन्य क्षेत्रों में विशेष कार्य करेंगे तो आप भी मेरी संपत्ति के निश्चित अंश के मेरे बाद मालिक होंगे। एक तरह से नोबेल की यह वसीयत अनन्तकाल तक के लिए है। यह विश्व की अनोखी वसीयत है जिसका दावेदार दुनिया का हर आदमी हो सकता है। यही कारण है कि लोग पुरस्कार की चाह में सर्वोत्कृष्ट मानवीय कार्य करने का प्रयास करते रहते हैं। लोगों का प्रयास होता है कि कुछ न कुछ ऐसा किया जाए जो मानवता के हित में हो और जो उसे नोबेल पुरस्कार का पात्र बना दे।अल्फे्रड नोबेल की संपत्ति का मूल्यांकन जून 1900 में 3.1 करोड़ क्रोनर था। एक क्रोनर 50 रूपये का था। भारतीय मुद्रा में नोबेल पुरस्कार भी राशि पांच करोड रूपये है। अभी तक 650 से अधिक लोग नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। अल्फे्रड नोबेल की पुण्यतिथि पर प्रतिवर्ष दस दिसंबर को स्वीडन व नार्वे दोनों देशों में यह पुरस्कार दिया जाता है। 1969 से इस पुरस्कारमें आर्थिक क्षेत्र में की गयी विशेष सेवाओं वाले व्यक्तियों को भी सम्मिलित कर लिया गया है। इस पुरस्कार से सम्मानित विभूतियां सचमुच मानवता की धरोहर होती हैं। अल्फे्रड नोबेल को इस पुरस्कार के इस प्रकार संचालन की जो अंत: प्रेरणा हुई वह दैवीय प्रेरणा थी, क्योंकि दैविक प्रेरणा से ही इस प्रकार के पुण्य कार्य हुआ करते हैं। सारी मानवता अल्फे्रड नोबेल के इस नोबेल डीड से कृतकृत्य हो उसे हर वर्ष अपनी मौन श्रद्घांजलि देती है।

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1 Comment on "नोबेल पुरस्कार की कहानी"

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RAMESH SACHDEVA
Guest

EXCELLENT AND INFORMATIVE

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