लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

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भारत को लम्बे समय तक गुलाम बनाये रखने का उपाय करने के लिए ब्रिटेन के रणनीतिकारों में लम्बे समय तक बहस होती रही थी । हालाकि उस बहस का घोषित विषय यह नहीं था, बल्कि यह था कि भारतीय लोगों-बच्चों को क्या और कैसी तथा किस विधि से शिक्षा दी जाये ; किन्तु उस बहस के मूल में असल अघोषित प्रयोजन ब्रिटिश साम्राज्य का हित साधना ही था ।

दरअसल हुआ यह कि छल-छद्म से जैसे-तैसे भारत की समस्त राज-सत्ता पर कब्जा जमा बैठी ईस्ट इण्डिया कम्पनी की लूट-नीति के कारण समस्त शिक्षण संस्थानों के नष्ट हो जाने से व्याप्त अज्ञानता व निरक्षरता के परिणामस्वरुप बाद में अंग्रेजों को ही शासनिक-व्यापारिक कार्यों में परेशानी होने लगी थी ; क्योंकि उन कार्यों के लिए लाखों पढे-लिखे लोगों की लगातार जरूरत थी, जिसकी पूर्ति ब्रिटेन से कतई सम्भव नहीं थी । सो झख मार कर ब्रिटिश हुक्मरानों को शिक्षा व्यवस्था खडी करने का निर्णय लेना पडा , जिसके स्वरुप की बावत ब्रिटेन में उपरोक्त बहस छिडी थी । भिन्न-भिन्न ब्रिटिश भारतविदों , ब्रिटिश सांसदों , प्रशासकों , धर्मप्रचारक मिशनरियों ने शिक्षा की आवश्यकता महसूस करते हुए इसकी व्यवस्था और गुणवत्ता के बावत भिन्न-भिन्न तरह के उपाय सुझाये थे । उनमें से तीन तरह के उपायों पर मुख्य रुप से चर्चा हुई थी । पहला यह कि भारतवासियों को वहां की पुरानी परम्परागत शिक्षा-प्रणाली पुनर्जीवित कर उसी के माध्यम से भारतीय भाषा-साहित्य व ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा दी जाये । इस उपाय के प्रस्तावकों-समर्थकों को ‘ओरियण्टलिस्ट’ कहा जाता था ।

दूसरा उपाय बताने वाले ‘आक्सिडेण्टलिस्ट’ कहलाये ; जिनका विचार था कि भारतवासियों को वही और उसी तरह की शिक्षा दी जाये , जो और जैसी इंग्लैण्ड में दी जा रही है ; अर्थात अंग्रेजी भाषा-साहित्य व युरोपीय ज्ञान-विज्ञान की । इन दोनों तरह के उपायों के प्रस्तावकों-समर्थकों के बीच कई वर्षों तक बहस होते रहने के बाद सन १८३४ ई० में थामस विलिंगटन मैकाले ने इन दोनों से उलट एक तीसरा उपाय प्रस्तावित किया कि भारतवासियों को न भारतीय ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा दी जाये , न युरोपीय जागरण की ; बल्कि उन्हें अंग्रेजी माध्यम से सिर्फ इतनी और ऐसी शिक्षा दी जाये कि वे ब्रिटिश साम्राज्य की चाकरी-चमचागिरी कर सकें और अंग्रेज बनने के लिए लालायित हो उठें । पहले और दूसरे दोनों उपायों को ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य के लिए नुकसानदेह बताते हुए मैकाले ने तर्क दिया था कि भारतीयों को अगर भारतीय ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा दी जाएगी, तो उससे उनका बौद्धिक स्तर इतना उठ जाएगा कि उन्हें गुलाम बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा ।

उनके बौद्धिक विकास के कारण ब्रिटेन का माल भी भारत के बाजार में नहीं टिक पाएगा । उसने अपने उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए कहा था “ हमें भारत में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना चाहिए जो हमारे और उन करोडों भारतवासियों के बीच , जिन पर शासन करते हैं उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके ; जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों किन्तु रुचि , भाषा व भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों ”। इसी मैकाले द्वारा सुझाये गए उपाय पर स्वीकृति की मुहर लगाते हुए तत्कालीन ईस्ट इण्डिया कम्पनी के गवर्नर जनरल विलियम वेंटिक ने ०७ मार्च १८३५ को आदेश जारी किया कि शिक्षा पर मंजूर किए गए धन का सबसे अच्छा उपयोग यही होगा कि उसे केवल ‘अंग्रेजी शिक्षा’ पर ही खर्च किया जाए । मैकाले और बेंटिक परस्पर बडे घनिष्ठ मित्र थे , इस कारण यह उपाय बडी तेजी से क्रियान्वित किया जाने लगा , जिसे बाद में लोग मैकाले-शिक्षापद्धति कहने लगे । इस उपाय की सराहना करते हुए ब्रिटिश इतिहासकार- डा० डफ ने अपनी पुस्तक “ लौर्ड्स कमिटिज-सेकण्ड रिपोर्ट आन इण्डियन टेरिट्रिज- १८५३” के पृष्ठ- ४०९ पर लिखा है – “ मैं यह विचार प्रकट करने का साहस करता हूं कि भारत में अंग्रेजी भाषा व साहित्य को फैलाने तथा उसे उन्नत करने का विलियम बेंटिक का कानून भारत के भीतर अंग्रेजी राज के अब तक के इतिहास में कुशल राजनीति की सबसे जबर्दस्त चाल मानी जायेगी ” ।

स्पष्ट है कि ब्रिटिश हुक्मरानों ने एक खास राजनीतिक उद्देश्य के तहत ही भारत में शिक्षा विभाग कायम किया और अपनी कुटिल मंशा को अंजाम देने के लिए तदनुसार उसकी मैकाले-पद्धति लागू की थी । उस मैकाले-पद्धति के अन्तर्गत उनने ज्ञान को अपने हिसाब से परिभाषित किया और ज्ञान का जो रूप उनके औपनिवेशिक शासन के लिए लाभकारी था , उसे ही उनने स्वीकार किया तथा जो लाभकारी नहीं था , उसे उनने सिरे से खारिज ही नहीं कर दिया , बल्कि नष्ट करने का भी यत्न किया । शिक्षा के भारतीय प्रतिमानों को ही नहीं , बल्कि चिकित्सा के आयुर्वेदिक ज्ञान व न्याय के पंचायती विधान को भी उनने पूरी तरह नकार दिया ।

कृषि-उद्योग-उत्पादन-पशुपालन-शिल्प-निर्माण आदि सभी क्षेत्रों में हमारी परम्परागत रीति से हमारे बच्चों को मिलते रहने वाले ज्ञान को उनने ज्ञान मानने से ही इंकार कर दिया । ऐसा इस कारण क्योंकि भारतीय ज्ञान के उन्नयन से अंग्रेजी ज्ञान-जनित माल का भारत के बाजार में विपणन और अंग्रेजी आतंक-अत्याचार का हमारे समाज में न्यायीकरण बहुत मुश्किल था । और तो और , हमारी भाषा-संस्कृति को भी उनने सभ्य समाज की भाषा-संस्कृति मानने से इंकार कर दिया और हमें तथाकथित सभ्य बनाने के लिए साम्राज्यवादी उपनिवेशोन्मुख ज्ञान तथा अंग्रेजी भाषा. व अंग्रेजी आचार-विचार-विधि-विधान सिखाया-पढाया जाने लगा ।

अंग्रेजी भाषा अपनाने के प्रति हमारा दृष्टिकोण चाहे कितना भी उदार क्यों हो और उससे होने वाली क्षति को हम चाहे कितना भी कम क्यों न आंकते रहें , किन्तु वास्तविकता अत्यन्त चिन्ताजानक है । उसी डा० डफ ने आगे लिखा हुआ है कि भाषा का प्रभाव इतना जबर्दस्त होता है कि जिस समय तक भारत के सभी देशी राजाओं-रजवाडों के साथ अंग्रेजों का पत्र-व्यवहार फारसी भाषा में होता रहेगा , उस समय तक भारतवासियों की भक्ति दिल्ली के बादशाह की ओर बनी रहेगी ”। इस तथ्य के मद्देनजर ब्रिटिश सत्ता के प्रति भक्ति पैदा करने के लिए ब्रिटेन की भाषा में कार्य-व्यवहार किये जाने के महत्व को समझते हुए कम्पनी के गवर्नर विलियम बेंटिक ने फारसी की जगह अंग्रेजी लागू कर दी । डा० डफ का अनुमान बिल्कुल सही निकला- अंग्रेजी लागू होते ही भारत के उन देशी राजाओं-रजवाडों और अन्य शिक्षित लोगों की राजनीतिक निष्ठा बदलनी शुरू हो गई ।

अंग्रेजी-मैकाले-शिक्षापद्धति की वकालत करते हुए मैकाले के बहनोई- चार्ल्स ट्रेवेलियन ने एक बार ब्रिटिश पार्लियामेण्ट की एक समिति के समक्ष ‘ भारत की भिन्न-भिन्न शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न राजनीतिक परिणाम’ शीर्षक से एक लेख प्रस्तुत किया था, जिसका एक अंश उल्लेखनीय है- “ अंग्रेजी भाषा-साहित्य का प्रभाव अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता ……. हमारे पास उपाय केवल यही है कि हम भारतवासियों को युरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें …..इससे हमारे लिए भारत पर अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत आसान और असन्दिग्द्ध हो जाएगा ”। किन्तु उस उपाय का परिणाम यही और इतना ही नहीं हुआ , बल्कि और भी बहुत कुछ हुआ । सिर्फ हुआ ही नहीं , हो भी रहा है अभी । अंग्रेजी-मैकाले-शिक्षापद्धति के विरूद्ध प्राचीन भारतीय गुरुकुलीय शिक्षापद्धति की स्थापना का आन्दोलन चला रहे उत्तमभाई जवानमल शाह बिल्कुल सही कहते हैं कि अंग्रेजों के शासनकाल में हमारी भारतीय भाषाओं का कमोबेस विकास ही हो रहा था- हिन्दी तो अंग्रेजी-शासनकाल में ही राष्ट्रभाषा बन सकी थी , किन्तु आज वो हिंग्रेजी के रूप में अंग्रेजी की दासी बन चुकी है । अन्य भारतीय भाषाओं की हालत भी लगभग यही है । भाषा ही नहीं , हमारी सभ्यता-संस्कृति , रीति-नीति , बोल-चाल , रहन-सहन , खान-पान , खेल-कूद , सोच-विचार , कार्य-व्यापार तक का जिस कदर अंग्रेजीकरण होता जा रहा है , उसे देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि हमें गुलाम बनाये रखने का अंग्रेजों ने जो उपाय किया हुआ था , सो उनके लक्ष्य से बहुत ज्यादा सफल हो कर आगे भी हमें अपनी जद में लेता जा र्हा है । उनका लक्ष्य तो सिर्फ इतना ही था कि उनकी सरकार और उनके व्यापार के विरूद्ध कोई बगावत न हो, बल्कि उन्हें तदनुसार भारतीय सहयोगी मिलते रहें । किन्तु गुलामी के उस उपाय का इतना गहरा असर हमारे ऊपर पडा कि हमारी आजादी भी बे-असर होती जा रही है ; क्योंकि अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी आजाद भारत की हमारी सरकार हमें गुलाम बनाए रखने वाले ‘अंग्रेजी-उपाय’ को ही क्रियान्वित करने में लगी हुई है , अर्थात वही अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति आज भी हमारे देश की शिक्षा-नीति बनी हुई है । • मनोज ज्वाला

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