लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव-  upa

पांच राज्यों में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के बाद गठबंधन के गुणा-भाग में शेयर सूचकांक की तरह तेजी आ गई है। उत्तर प्रदेश और बिहार में वर्चस्व जमाए बैठे क्षेत्रीय क्षत्रप एका-एक सक्रिय हो गए हैं। राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव के जमानत में छूटने के बाद इस सक्रियता में और वृद्धि हुई है। इस घटनाक्रम से जहां लोक जनशक्ति पार्टी के मुखिया राम विलास पासवान की चिंता बढ़ी है, वहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजद का कांग्रेस से पुराना कुशासन का रिश्ता जोड़ने का तंज कसकर साफ कर दिया कि जदयू का कांग्रेस से गठबंधन नामुनकिन है। इधर रालोद के अजीत सिंह ने अपने पिता चौधरी चरण सिंह की पुण्यतिथि को संकल्प रैली के बहाने भुनाने की कोशिश करके पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लड़खड़ाए हालात को साधने की सफल कोशिश की है। इस रैली में जदयू के शरद यादव की उपस्थिति से नए समीकरणों की आस जागी है। क्योंकि अजीत के दृढ़ता को अवसरवाद बार-बार तोड़ता रहा है। उधर वमदलों ने साफ किया है कि जब तक राजद और लोजपा कांग्रेस के साथ है, तब तक इन दलों से कोई समझौता नहीं हो सकता। इसी बीच कांग्रेस को बड़ा झटका द्रमुक नेता करूणानिधि ने यह ऐलान करके दिया है कि वे अगले लोकसभा चुनाव में वे कांग्रेस के साथ गठजोड़ नहीं करेंगे।
देश के क्षेत्रीय दल स्थानीय नफा-नुकसान के मद्देनजर जिस तरह से परस्पर परेशानी का सबब बने हुए हैं, उससे लगता नहीं कि आम चुनाव के पूर्व कोई बड़ा गठबंधन सामने आएगा। अपने-अपने पूर्वग्रहों के चलते क्षेत्रीय क्षत्रप इतने आत्मकेंद्रित हो गए हैं कि कांग्रेस और भाजपा को दरकिनार कर तीसरा मोर्चा आम चुनाव के पहले वजूद में आ पाएगा? बल्कि जिस तरह से मोदी लहर के चलते भाजपा को चार राज्यों में अकल्पित सफलता मिली है, उसकी प्रतिच्छाया में लगता है कि तीसरा मोर्चा बनाम संधीय मोर्चा के रचनाकार कहीं, बहुत सीमित दायरे में सिमट का न रह जाएं ? क्योंकि देश के मतदाताओं का रूझान इन पांच राज्यों में जिस तरह से प्रकट हुआ है, उस परिप्रेक्ष्य में लगता है, मतदाता स्थिर, स्वच्छ और सुशासित अलंबरदारों को चाहने लगे हैं। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की अप्रत्याशित जीत ने उम्मीद की इस लौ को जलाए रखने के लिए दीया में घी डालने का काम किया है। इसलिए जो दल बंद कमरों में निजी हित-पूर्तियों के लिए बड़े दलों से शर्तों का अनुबंध करते रहे हैं, उनकी आम चुनाव में दाल गलना मुश्किल ही है, क्योंकि इनके भ्रष्टाचार और मनमनियों से जुड़े स्वार्थों को अब मतदाता भी ताड़ते़ हुए सबक सिखाने की मानसिकता में आ गया है।
द्रमुक नेता एम. करूणानिधि ने हाल ही में घोषणा की है कि वे अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। यहां याद रखने की जरूरत है कि 1996 से लेकर 2009 के दौरान जितने भी आम चुनाव हुए हैं, उनमें गठबंधन की केंद्र् में साकार उसी दल की बनी है, जिसे द्रमुक या अन्नाद्रमुक का समर्थन मिला है। इन दोनों ही दलों का वास्ता 39 लोकसभा सीटों वाले राज्य तमिलनाडू से है। जाहिर है द्रमुक के ऐलान को परंपरा से जोड़कर देखें तो लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार नहीं बनने जा रही है। यूं द्रमुक की कांग्रेस से खटास 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को लेकर शुरू हुई थी। तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा और करूणानिधि की सांसद बेटी कनिमोझी की गिराफ्तारी के बाद यह खटास द्रमुक प्रतिनिधियों के मंत्रीमंडल से बाहर आ जाने की नाराज मजबूरी में बदल गई थी और अब समर्थन की गांठ खोनले का निश्चय इसलिए कर लिया, क्योंकि पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव- नतीजों ने कांग्रेस के खिलाफ मतदाताओं में गुस्से की पुष्टि कर दी। राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार ने भी बयान दे दिया कि केंद्र और कांग्रेस के कमजोर नेतृत्व के चलते ये परिणाम आए हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार में महंगाई जिस तरह से आसमान छूती चली गई और घपलों-घोटालों का सिलसिला भी जारी रहा, उससे कांग्रेस की साख को बट्टा लगा। नतीजतन चार राज्यों में उसे हार का मुंह देखना पड़ा। इन कारणों ने कांग्रेस में तो बैचेनी बढ़ाई ही, उसके घटक दल भी घबराए हुए हैं। गोया, डूबते जहाज से सहयोगी दलों के छलांग लगाने का सिलसिला शुरू होने लगा है।
इधर लालू के जेल से छूटने के बाद बिहार में नीतीश और रामविलास पासवान की परेशानी बढ़ गई है। लालू ने तो आते ही साफ कर दिया कि कांग्रेस से उनका तालमेल पूर्ववत बना रहेगा। लालू के रहते, जदयू कांग्रेस से तालमेल किसी भी हाल में नहीं बिठाएगी। इसलिए जब लालू ने सजा के लिए नीतीश को जिम्मेदार ठहराया तो नितीश ने कटाक्ष किया कि दिल्ली में यूपीए की सरकार है और जिस सीबीआई ने उन्हें जेल भेजा है, वे केंद्र सरकार के अधीन काम करती है। नीतीश ने यह कहकर और जले पर नमक छिड़क दिया कि यदि लालू के शासनकाल में बिहार में पैसा नहीं था तो राज्य के खजाने में सेंध लगाकर चारा धेटाला कैसे संभव हुआ? रही बात लोजपा कि तो राजद या जदयू उसे तवज्जो नहीं दे रहे हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में वह एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। तब से गंगा में पानी तो बहुत बह गया, लेकिन लोजपा एक सीट भी जीत ले, ऐसा जनाधार उसका दिखाई नहीं देता। ऐसे में बिहार में मोदी लहर चल निकली तो लोजपा का गंगा घाट पर पूरी तरह डूबना तय है।
मुजफफरनगर दंगों के बाद उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों के समीकरण इतनी तेजी से बदले हैं कि कई दलों की जमीन साफ हो जाएगी। सबसे ज्यादा संकट में अजीत सिंह और उनका रालोद है। जिस पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा भड़की, वही मैदान अजीत सिंह का कुरूक्षेत्र है। खास तौर से दंगे जिन जाट और मुस्लिमों के बीच हुए हैं, वही समीकरण अजीत सिंह के राजनीतिक वर्चस्व बनाए रखने का जनाधार है। हालांकि केंद्र सरकार से जाटों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का ऐलान कराकर अजीत ने इस समुदाय को साधने की कोशिश की है, लेकिन यह ऐलान अभी कानूनी रूप नहीं ले पाया है। संसद के आगामी सत्र में भी इस ऐलान पर अमल हो पाएगा, ऐसा मुश्किल ही लगता है? ऐसा नहीं हुआ तो इस नाराजी को भुनाने में भाजपा बाजी मार लेगी। उत्तर प्रदेश में मतदाता की बदलती मानसिकता को भांपने के बाद ही बसपा सुप्रीमो मायावती ने ऐलान कर दिया कि वह किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेंगी। जाहिर है, उत्तर प्रदेश में गठबंधन की असंभव होती स्थिति राजनीतिक चक्र को कुछ इस तरह घुमाने पर आमदा है कि भाजपा की अनुकूलता बढ़ जाए। सपा के कुशासन और अदूरदर्शिता ने चुनाव पूर्व गठबंधन के गुणा-भाग को असंभव सा बना दिया है। इस लिहाज से गठबंधनों की कोशिशों में तेजी भले ही आ गई हो कारगर नतीजा निकलने की उम्मीद कम नहीं है।

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