लेखक परिचय

अशोक “प्रवृद्ध”

अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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kumbhअशोक “प्रवृद्ध”
पौराणिक मान्यतानुसार हिन्दुओं के महत्वपूर्ण पर्वों में से एक कुम्भ पर्व में करोड़ों श्रद्धालुओं के कुम्भ पर्व स्थलों पर स्नान कर सामूहिक धर्मचर्चा करने की परिपाटी प्रचलित हैं । ये कुम्भ पर्व स्थल चार स्थानों – हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक, में अवस्थित हैं , जहाँ समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत की बूंदें देव – दानवों के मध्य अमृत कलश को छीनने के लिए हुई संग्राम के कारण गिरी थी। इन चारों कुम्भ स्थलों पर प्रत्येक बारह वर्षों में कुम्भ पर्व का भव्य आयोजन किया जाता है । कुम्भ पर्व प्रत्येक तीन वर्षो के बाद नासिक, प्रयाग (इलाहाबाद), उज्जैन और हरिद्वार में बारी-बारी से क्रमशः मनाया जाता है। बारह वर्षों पर इन स्थलों पर कुम्भ पर्व अर्थात मेले के आयोजन के साथ ही हरिद्वार और प्रयाग में दो कुम्भ पर्वों के मध्य छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुम्भ का आयोजन भी होता है । अर्ध शब्द का अर्थ होता है आधा। यही कारण है कि बारह वर्षों के अंतराल में आयोजित होने वाले पूर्ण कुम्भ के बीच अर्थात पूर्ण कुम्भ के छ: वर्ष बाद अर्द्धकुम्भ आयोजित होता है। आम भारतीय इस कुम्भ पर्व पर हिन्दुओं के सामूहिक जमावड़े को देखकर इसे कुम्भ मेला के नाम से स्मरण करते हैं । भारतीय जनमानस की पर्व चेतना की विराटता का द्योतक कुम्भ पर्व एक अमृत स्नान और अमृतपान की बेला है। इस समय गंगा की पावन धारा में अमृत का सतत प्रवाह होता है। इसी समय कुम्भ स्नान का संयोग बनता है । तीर्थ नगरी हरिद्वार का कुम्भ तो महाकुम्भ कहा जाता है। भारतीय संस्कृति की जीवन्तता का प्रमाण प्रत्येक बारह वर्ष में यहाँ आयोजित होता है।
लोक मान्यतानुसार प्रयाग में संगम के तट पर आयोजित होने वाला कुम्भ सबसे भव्य , पवित्र , पुण्यदायी और मोक्षप्रदाता होता है। संगम के पवित्र जल में स्नान करने से आत्मा शुद्ध हो जाती है। इसी मान्यता के कारण इस मेले में करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु सम्मिलित होते है। इस स्थान को ब्रह्माण्ड का उद्गम और पृथ्वी का केंद्र माना जाता है। पौराणिक मान्यतानुसार ब्रह्माण्ड की रचना से पहले ब्रह्मा ने इसी स्थल पर अश्वमेध यज्ञ किया था। दशाश्वमेध घाट और ब्रह्मेश्वर मंदिर इस यज्ञ के प्रतीक स्वरुप अभी भी यहाँ मौजूद है। इस यज्ञ के कारण भी प्रयाग कुम्भ का विशेष महत्व है। भारत में बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के नासिक से अड़तीस किलोमीटर की दुरी पर स्थित त्र्यम्बकेश्वर नामक पवित्र शहर में स्थित है। गोदावरी नदी का उद्गम भी यहीं से हुआ। बारह वर्षों में एक बार सिंहस्थ कुम्भ मेला नासिक एवं त्रयम्बकेश्वर में आयोजित होता है। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार नासिक भी उन चार स्थानों में से एक है जहाँ अमृत कलश से अमृत की कुछ बूँदें गिरी थीं। कुम्भ मेले में सैंकड़ों श्रद्धालु गोदावरी के पावन जल में नहा कर अपनी आत्मा की शुद्धि एवं मोक्ष के लिए प्रार्थना करते हैं। उज्जैन में आयोजित होने वाले कुम्भ का भी विशेष महत्व है। उज्जैन का अर्थ है विजय की नगरी और यह मध्य प्रदेश की पश्चिमी सीमा पर स्थित है। इंदौर से लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पर क्षिप्रा नदी के तट पर बसा उज्जैन भारत के पवित्र एवं धार्मिक स्थलों में से एक है। ज्योतिष शास्‍त्र के अनुसार शून्य अंश (डिग्री) उज्जैन से ही शुरू होता है। महाभारत के अरण्य पर्व के अनुसार उज्जैन सात पवित्र मोक्ष पुरी या सप्त पुरी में से एक है। उज्जैन के अतिरिक्त शेष हैं अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांचीपुरम और द्वारका। पौराणिक मान्यतानुसार भगवान शिव ने त्रिपुरा राक्षस का वध उज्जैन में ही किया था। इसीलिए इस स्थान पर आयोजित होने वाले कुम्भ का अपना अलग महत्व है , जो यहाँ कुम्भ में आने वाली भीड़ और उसके जय जयकार के उद्घोष से उद्घाटित होता है । कुम्भ के अवसर पर सम्पूर्ण भारत के साधु-सन्न्यासी, बड़े बड़े मठों के महंत और पीठाधीश और दर्शन शास्त्र के अध्येता विद्वान कुम्भ स्थलों में एकत्र होते हैं। इस पावन अवसर पर समाज के सभी वर्गों के छोटे बड़े, अमीर ग़रीब, बड़े बूढ़े, स्त्री पुरुष समस्त जनमानस की ऐसी विशालता और विविधता को देखकर ही महाकुम्भ को अमृत साधना का महापर्व माना जाता है। हालाँकि ऐतिहासिक ग्रन्थों के अध्ययन से इस सत्य का सत्यापन होता है कि कश्मीर के एक राजा मेघवाहन हुए हैं , जिन्होंने भारत में बाहर वर्षीय कुम्भों के समारोह की प्रथा आरम्भ की थी। फिर भी मान्यतानुसार भारत की सांस्कृतिक चेतना और एकता को जाग्रत व सुदृढ़ करने की दृष्टि से भारत के चार स्थानों गोदावरी, क्षिप्रा, गंगा और संगम के पवित्र तट पर शुभ पावन पुण्य राशियोग पर स्नान के निमित्त मेले की परम्परा प्रारंभ करने का श्रेय भी आदि शंकराचार्य को ही दिया जाता है। आदि शंकराचार्य ने भारत के चार कोनों पर चार धामों की स्थापना की, जिसके कारण चार धाम की तीर्थयात्रा का प्रचलन हुआ। उन्होंने ही भारत की सन्त-शक्ति को गिरी, पुरी, भारती, तीर्थ, वन, अरण्य, पर्वत, आश्रम, सागर तथा सरस्वती नामक दस वर्णों में गठित किया और भारतीय समाज के प्रत्येक वर्ग में धर्म-चेतना जगाने का दायित्व उन्हें सौंपा।
भारतीय सभ्यता में विशेष महत्व रखने वाले कुम्भ का शाब्दिक अर्थ कलश होता है। ज्योतिष शास्त्र में कुम्भ राशि का भी यही चिह्न है। कुम्भ का पर्याय पवित्र कलश से होता है। कलश के मुख को भगवान विष्णु, गर्दन को रुद्र, आधार को ब्रह्मा, बीच के भाग को समस्त देवियों और अंदर के जल को संपूर्ण सागर का प्रतीक माना जाता है। समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु का कूर्म अवतार होने की बात भी पौराणिक ग्रंथों में अंकित है। भारतीय सभ्यता की जीवन्तता का अद्वितीय संगम कुम्भ को चारों वेदों का संगम माना जाता है। है। कुम्भ आत्मजागृति का प्रतीक और मानवता का अनंत प्रवाह है। प्रकृति और मानवता का अद्भुत संगम कुम्भ ऊर्जा का स्त्रोत है और यह मानव-जाति को पाप, पुण्य और प्रकाश, अंधकार से परिचित कराता है। मानव शरीर पंचतत्वों यथा अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश से निर्मित है और नदी जीवन रूपी जल के अनंत प्रवाह को दर्शाती है।
कुम्भ पर्व के आयोजन के सम्बन्ध में कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं जिनमें से सर्वाधिक मान्यता प्राप्त कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृतकुम्भ से अमृत बूँदें गिरने को लेकर है। कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण जब इंद्र और अन्य देवता कमजोर हो गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया। तब सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हे सारा वृतान्त कह सुनाया। तब विष्णु ने उन्हे दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। विष्णु के ऐसा कहने पर सभी देवता दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने के यत्न में लग गए। अमृत कुम्भ के निकलते ही देवताओं के इशारे से इंद्रपुत्र जयंत अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। उसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा। तत्पश्चात अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा। इस परस्पर लड़ाई के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों यथा, प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक पर कलश से अमृत बूँदें गिरी । उस समय चंद्रमा ने घट से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने घट फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से एवं शनि ने देवेन्द्र के भय से घट की रक्षा की। कलह शांत करने के लिए विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर यथाधिकार सबको अमृत बाँटकर पिला दिया। इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत किया गया। कहीं – कहीं यह लड़ाई गरुड़ और दानवों के मध्य होने की बात कही गई है। इस कथा के अनुसार विष्णु ने अमृत कलश को गरुड़ को पारित कर दिया और गरुड़ कलश को लेकर उड़ चला। तत्पश्चात गरुड़ का पीछा दानवों ने किया और उसे घेर कर अमृत छीनने के लिए गरुड़ और दानवों के मध्य छिड़ी संग्राम में अमृत की बूंदें चारो कुम्भ स्थलों पर गिरी।
पौराणिक मान्यतानुसार अमृत प्राप्ति के लिए देव-दानवों में परस्पर बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ था। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के तुल्य होते हैं। अतः कुम्भ भी बारह होते हैं, जिनमें से चार कुम्भ पृथ्वी पर और शेष आठ कुम्भ देवलोक में होते हैं, जिन्हें देवगण ही प्राप्त कर सकते हैं, मनुष्यों की वहाँ पहुँच नहीं है।
ज्योतिष के अनुसार जिस समय में चंद्रादिकों ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, उस समय कुंभ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहाँ-जहाँ अमृत बूँद गिरी थी, वहाँ-वहाँ कुंभ पर्व होता है।

खगोलिक गणनाओं के अनुसार कुम्भ मेला मकर संक्रांति के दिन प्रारम्भ होता है, जब सूर्य और चन्द्रमा, वृश्चिक राशि में और वृहस्पति, मेष राशि में प्रवेश करते हैं। मकर संक्रांति पर होने वाले इस योग को कुम्भ स्नान-योग कहा जाता है । और इस दिन को विशेष मांगलिक माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार खुलते हैं इसलिए इस दिन स्नान करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति सहजता से हो जाती है। कुम्भ स्थल पर स्नान करना साक्षात स्वर्ग दर्शन माना जाता है। ज्योतिषियों के अनुसार कुम्भ का असाधारण महत्व बृहस्पति के कुम्भ राशि में प्रवेश तथा सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ जुड़ा हुआ है। ग्रहों की स्थिति हरिद्वार से बहती गंगा के किनारे पर स्थित हर की पौड़ी स्थान पर गंगा जल को औषधिकृत करती है तथा उन दिनों यह अमृतमय हो जाती है। यही कारण है ‍कि अपनी अंतरात्मा की शुद्धि हेतु पवित्र स्नान करने लाखों श्रद्धालु यहाँ आते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से अर्ध कुम्भ के काल मे ग्रहों की स्थिति एकाग्रता तथा ध्यान साधना के लिए उत्कृष्ट होती है।

पौराणिक ग्रन्थों के अध्ययन से इस सत्य का सत्यापन होता है कि कुम्भ पर्व की मूल चेतना समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत घट के लिए हुए देवासुर संग्राम से जुड़ा है। पौराणिक मान्यतानुसार गंगा, क्षिप्रा, गोदावरी और प्रयाग के तटों पर सम्पन्न होने वाले कुम्भ महापर्वों ने भारत के भौगोलिक एवं सामाजिक एकता को सुदृढ़ता व प्रगाढ़ता प्रदान की है। ज्योतिषियों के अनुसार इस महापर्व का संबध सीधे तौर पर खगोलीय घटना पर आधारित है। सौर मंडल के विशिष्ट ग्रहों के विशेष राशियों में प्रवेश करने से बने खगोलीय संयोग इस पर्व का आधार हैं। इनमें कुम्भ की रक्षा करने वाले चार सूत्रधार सूर्य, चंद्रमा, गुरु एवं शनि का योग इन दिनों में किसी न किसी रूप में बनता है। यही विशिष्ट बात इस सनातन लोकपर्व के प्रति भारतीय जनमानस की आस्था का दृढ़तम आधार है। और यही कारण है कि सदियों से चला आ रहा यह पर्व आज संसार के विशालतम धार्मिक मेले का रूप ले चुका है। कुम्भ के पावन अवसर पर घटने वाली खगोलीय स्थिति का उल्लेख कई पुराणों व ज्योतिषीय ग्रंथों में किया गया है ।
स्कंद पुराण में कहा गया है कि सूर्य जब मेष राशि में आये और बृहस्पति ग्रह कुम्भ राशि में हो तब गंगाद्वार अर्थात हरिद्वार में कुम्भ का उत्तम योग होता है।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से समुद्र मंथन की कथा के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि कुम्भ पर्व का सीधा सम्बन्ध तारों से है। अमृत कलश को स्वर्ग लोक तक ले जाने में इंद्र के पुत्र जयंत को बारह दिन लगे। देवों का एक दिन मनुष्यों के एक वर्ष के बराबर होता है इसीलिए तारों के क्रम के अनुसार हर बारहवें वर्ष कुम्भ पर्व विभिन्न तीर्थ स्थानों पर आयोजित किया जाता है। पौराणिक विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि कुम्भ पर्व एवं गंगा नदी का आपस में अन्योन्याश्रय सम्बंध हैं। गंगा प्रयाग में बहती हैं परन्तु नासिक में बहने वाली गोदावरी को भी गंगा कहा जाता है, इसे हम गोमती गंगा के नाम से भी पुकारते हैं। क्षिप्रा नदी को काशी की उत्तरी गंगा से पहचाना जाता है। यहाँ पर गंगा गंगेश्वर की आराधना की जाती है। ब्रह्म पुराण एवं स्कंद पुराण के दो श्लोकों से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है –
विन्ध्यस्य दक्षिणे गंगा गौतमी सा निगद्यते उत्‍तरे सापि विन्ध्यस्य भगीरत्यभिधीयते ।
एव मुक्‍त्वा गता गंगा कलया वन संस्थिता गंगेश्‍वरं तु यः पश्येत स्नात्वा शिप्राम्भासि प्रिये।

ज्योतिष के अनुसार कुम्भ बारह-बारह वर्ष के अन्तर से चार मुख्य तीर्थों प्रयाग, हरिद्वार, नासिक-पंचवटी और अवन्तिका (उज्जैन) में लगने वाला स्नान-दान का ग्रहयोग है और कुम्भ का पर्व चार प्रकार से आयोजित किया जाता है । ब्रह्म पुराण एवं स्कंद पुराण के अनुसार कुम्भ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुम्भ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है। मेष राशि के चक्र में बृहस्पति एवं सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन कुम्भ का पर्व प्रयाग में आयोजित किया जाता है। एक अन्य गणना के अनुसार मकर राशि में सूर्य का एवं वृष राशि में बृहस्पति का प्रवेश होनें पर कुम्भ पर्व प्रयाग में आयोजित होता है। सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुम्भ पर्व गोदावरी के तट पर नासिक में होता है।
और सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है। पौराणिक ग्रंथों जैसे नारदीय पुराण 2/66/44 , शिव पुराण 1/12/22/-23 एवं वराह पुराण 1/71/47/48 और ब्रह्मपुराण आदि में भी कुम्भ एवं अर्द्ध कुम्भ के आयोजन को लेकर ज्योतिषीय विश्लेषण उपलब्ध है। कुम्भ पर्व हर तीन साल के अंतराल पर हरिद्वार से शुरू होता है। हरिद्वार के बाद कुम्भ पर्व प्रयाग, नासिक और उज्जैन में मनाया जाता है। प्रयाग और हरिद्वार में मनाये जाने वाले कुम्भ पर्व में एवं प्रयाग और नासिक में मनाये जाने वाले कुम्भ पर्व के बीच में तीन वर्षों का अंतर होता है।

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