लेखक परिचय

सरिता अरगरे

सरिता अरगरे

१९८८ से अनवरत पत्रकारिता । इप्टा और प्रयोग के साथ जुडकर अभिनय का तजुर्बा । आकाशवाणी के युववाणी में कम्पियरिंग। नईदुनिया में उप संपादक के तौर पर प्रांतीय डेस्क का प्रभार संम्हाला। सांध्य दैनिक मध्य भारत में कलम घिसी, ये सफ़र भी ज़्यादा लंबा नहीं रहा। फ़िलहाल वर्ष २००० से दूरदर्शन भोपाल में केज़ुअल न्यूज़ रिपोर्टर और एडिटर के तौर पर काम जारी है। भोपाल से प्रकाशित नेशनल स्पोर्टस टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता अपनी कलम की धार को पैना करने की जुगत अब भी जारी है ।

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-सर‍िता अरगरे

सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान की ताजपोशी के पाँच साल निर्विघ्न पूरे होने की खुशी में भाजपा राजधानी में पूरे जोशोखरोश के साथ जश्न मनाने की तैयारियों में जुटी है । शिवराज सिंह प्रदेश की गैर काँग्रेसी सरकार के पहले ऎसे मुख्यमंत्री हैं , जो पाँच साल की लम्बी पारी खेलने में कामयाब रहे हैं । इससे पहले तक बीजेपी की सरकारों में आयाराम-गयाराम का दौर ही देखा गया है । ऎसे में बीजेपी का जश्न मनाना तो बनता है ! लेकिन बीजेपी शिवराजसिंह को जिस तरह से सिर माथे पर बिठाकर “गौरव दिवस” मनाने पर आमादा है,वो पार्टी नेतृत्व की सोच,समझ और क्षमताओं पर ही सवाल खड़े करता है । बीजेपी का “गौरव दिवस” मौका भी है सरकार की कार्यशैली की समीक्षा का । साथ ही पीछे मुड़कर यह देखने का कि शिवराजसिंह के नेतृत्व में प्रदेश ने क्या पाया और क्या खोया ।

शिवराज सिंह के अब तक के कामकाज,घोषणाओं, दौरों और वायदों के पिटारों को खोल कर देखा जाये , तो वे राजनीति की “राखी सावंत” से इतर नज़र नहीं आते । वही तेवर और वही लटके-झटके । क्वींस बैटन से लेकर ओबामा और स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मसलों पर त्वरित बयान देने की उनकी अदा पर मीडिया भी फ़िदा है । पिछले पाँच वर्षों में उनके द्वारा की गई घोषणाओं पर सरसरी निगाह डालें, तो चंद चाटुकार अधिकारियों की मदद से मीडिया को खरीद कर बनाई गई छबि पल भर में छिन्न-भिन्न होती दिखाई देती है । घोषणाओं के भूसे में योजनाओं की ज़मीनी हकीकत सुई की मानिंद हो चुकी है । मीठा-मीठा गप्प कर खामियों का ठीकरा केन्द्र के सिर फ़ोड़ने की राजनीति के चलते शिवराजसिंह लगातार केन्द्र के खिलाफ़ सत्याग्रह, धरने, प्रदर्शन कर जनता को भरमाने की कोशिश करते रहे हैं । दरअसल वे अब तक ना तो सूबे के मुखिया की भूमिका को ठीक तरह से समझ सके हैं और ना ही आत्मसात करने का प्रयास करते नज़र आते हैं । वे अब भी प्रदेश के विकास के लिये समग्र दृष्टिकोण विकसित कर सकारात्मक राजनीति को अपनाने में नाकाम हैं । वास्तव में शिवराज अपनी काबिलियत के बूते नहीं, बीजेपी की अँदरुनी कलह और शीर्ष नेतृत्व में मचे घमासान के बीच प्रदेश में “अँधों में काना राजा” की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं । दिल्ली में बैठे सूरमाओं की ताल पर थिरकते शिवराज सिंह प्रदेश में बीजेपी मजबूरी बन गये हैं ।

शिवराजसिंह की पाँच साल की इस निर्बाध पारी का श्रेय काफ़ी हद तक काँग्रेस के प्रादेशिक नेताओं को भी जाता है । जिन्होंने गंभीर मुद्दों को जनता के बीच नहीं ले जाकर एक तरह से मुख्यमंत्री का ही साथ दिया । जब-जब शिवराज की कुर्सी पर किन्हीं भी कारणों से संकट के बादल मँडराये,विपक्षी पार्टी ने हमेशा पर्दे के पीछे से अपना “मित्र धर्म” बखूबी निभाया ।

शिवराजसिंह ने कुर्सी सम्हालते ही अपनी विशिष्ट प्रवचनकारी शैली में जनता के बीच जाकर यह स्वीकार किया था कि प्रदेश में सात तरह के माफ़ियाओं का राज है और वे जनता को इससे मुक्ति दिलाकरही दम लेंगे । लेकिन राजधानी भोपाल से लेकर दूरदराज़ के इलाकों में हो रही आपराधिक घटनाएँ प्रदेश में फ़ैले गुंडाराज की कहानी खुद बयान करती है । आज आलम ये है कि भूमाफ़ियाओं के खिलाफ़ कार्रवाई की हुँकार भरने वाली सरकार ज़मीन के सौदागरों के फ़ायदों को ध्यान में रखकर ही नीतियाँ बना रही है ।

भय, भूख और भ्रष्टाचार से मुक्ति का नारा बुलंद करने वाली भाजपा आज खुद इन्हीं व्याधियों से बुरी तरह घिर चुकी है । बिजली, पानी और सड़क के मुद्दे पर सत्ता में आई भाजपा के सात साल के शासनकाल में ये बुनियादी सुविधाएँ “ढूँढ़ते रह जाओगे” के हालात में पहुँच गई हैं । केन्द्र से मिलने वाले कोयले को घटिया क्वालिटी का ठहराकर गाँधीजी की दाँडी यात्रा(नमक सत्याग्रह) की तर्ज़ पर कोयला सत्याग्रह का चोंचला कर सुर्खियाँ बटोरने वाली सरकार बिजली संकट से निपटने का कोई तोड़ नहीं ढूँढ पाई है । राष्ट्रीय राजमार्गों की दुर्दशा के लिये केन्द्र को कठघरे में खड़ा करने वाली सरकार शहरों की सड़कों की बदहाली के लिये किसे ज़िम्मेदार ठहराएगी ? प्रदेश में लोगों को पीने का पानी भले ही मय्यसर नहीं हो, मगर हर दस कदम पर शराब मिलना तय है । पूरे प्रदेश में भूजल स्तर में गिरावट की स्थिति आने वाले वक्त की भयावह तस्वीर पेश करती है,मगर टेंडर,करारनामों और सरकारी ज़मीनों की बँदरबाँट से “तर” सरकार आम जनता की परेशानियों से बेखबर है ।

पंचायत लगाने के शौकीन मुख्यमंत्री किस्म-किस्म की महापंचायतों के माध्यम से अब तक करीब एक दर्जन से ज़्यादा मर्तबा भोपाल में मजमा जुटा चुके हैं। सरकारी योजनाओं के मद की राशि से लगाई गई इन पंचायतों का शायद ही किसी को कोई फ़ायदा मिला हो । “आगे पाठ पीछे सपाट” के फ़ार्मूले पर अमल कर आगे बढ़ रहे शिवराजसिंह खुद भी भूल चुके हैं कि इन पंचायतों में की गई घोषणाओं पर अमल हुआ भी या नहीं ? पंचायत प्रेम के अलावा तरह-तरह की यात्राओं की शिगूफ़ेबाज़ी से भी जनता को बरगलाने में मुख्यमंत्री का कोई सानी नहीं है ।

कभी साइकल, तो कभी मोटरसाइकल की सवारी कर आम जनता से नाता जोड़ने की कवायद के बाद शिवराज ने “स्वर्णिम मध्यप्रदेश” का शोशा छोड़ा । १ नवम्बर १९५६ को गठित मध्यप्रदेश के विभाजन को भी एक दशक गुज़र चुका है लेकिन मुख्यमंत्री ने “आओ बनायें अपना मध्यप्रदेश” की मुहिम छेड़ रखी है । मध्यप्रदेश कितना और कैसा बना कह पाना मुश्किल है मगर प्रादेशिक अखबार, न्यूज़ चैनल और विज्ञापन एजेंसियों के साथ अधिकारियों और नेताओं की ज़रुर बन आई है । मंत्रियों से लेकर छुटभैये नेताओं की शानोशौकत देखकर एक बारगी यकीन करने को जी चाहता है कि वाकई मध्यप्रदेश “स्वर्णिम” बन रहा है । जनता कुछ समझ पाती इसके पहले ही वे इन दिनों वनवासी सम्मान यात्रा के बहाने जगह-जगह स्वयं का सम्मान कराते घूम रहे हैं ।

बच्चों के बीच पंडित जवाहरलाल नेहरु की “चाचाजी” वाली लोकप्रिय छबि से प्रेरित शिवराज “मामाजी” के तौर पर मकबूल होने की हर मुमकिन कोशिश में जुटे हैं । मगर पौराणिक गाथाओं की मानें और भारतीय संस्कृति पर गौर करें तो मामाओं का घर-परिवार में ज़्यादा दखल कभी भी सुखद नहीं माना गया है । नरेन्द्र मोदी, सुषमा स्वराज जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ खुद को प्रधानमंत्री पद का प्रबल दावेदार साबित करने की जुगत में जुटे तेज़ रफ़्तार शिवराज ने हाल ही में बाल दिवस पर भोपाल के मॉडल स्कूल में आयोजित समारोह में बच्चों से “प्रधानमंत्री कब बनोगे” सवाल पुछवा कर अपनी दावेदारी ठोक दी है । उनकी आसमान छूती परवाज़ और मंज़िल तक पहुँचने की जल्दबाज़ी देखकर तो यही लगता है कि आने वाले सालों में मौका मिलने पर वे विश्व की चौधराहट का दावा पेश करने से भी नहीं चूकेंगे ।

छोटे किसान के घर से मुख्यमंत्री निवास तक पहुँचने के सफ़र में शिवराज सिंह चौहान का एक ही सपना था कि प्रदेश का किसान खुशहाल हो। सत्ता हाथ में आते ही उन्हें कुछ बड़े घरानों ने अपने मोहपाश में ऐसा फांस लिया है कि वे उन पर जरूरत से ज्यादा मेहरबान हैं। एक तरफ सरकार वन भूमि को कुछ बड़े घरानों को विकास के नाम पर बाँट रही है, वहीं पूँजीपतियों को उपकृत करने की खातिर संरक्षित वन्य क्षेत्रों और अभयारण्यों से जुड़े तमाम नियम-कायदों को ताक पर रख दिया गया है । जिस सरकार पर राज्य की संपत्ति बचाने और बढ़ाने की जिम्मेदारी है, वही राज्य की संपत्ति लुटाने में जुटी है। प्रदेश भर की सैकड़ों एकड़ बेशकीमती जमीन के मुकदमे हार कर भी सरकार बेफ़िक्र है । वोट बैंक की खातिर विभिन्न सामाजिक संगठनों को खुले हाथों से सरकारी ज़मीन लुटाने में भी कोई गुरेज़ नहीं है । राजधानी भोपाल की ऎतिहासिक इमारत मिंटो हॉल सहित प्रदेश की कई ऎतिहासिक धरोहरों को औने-पौने में व्यापारिक घरानों को देने की पहल भी सरकार के मंसूबों को साफ़ करती है । किसान खाद,पानी,बिजली और बीज के लिये परेशान है और खेती को लाभ का धंधा बनाने का नारा देने वाली सरकार हर खामी का दोष केन्द्र सरकार के सिर मढ़कर अपनी ही धुन में मदमस्त है । अवैध खनन के ज़रिये प्राकृतिक संसाधनों की लूट करने वालों की तो जैसे पौ-बारह हो गई है । वन मंत्री ने हाल ही में बयान दिया था कि मुख्यमंत्री के गृह ज़िले सीहोर और बुधनी में सागौन की अवैध कटाई तथा रेत खनन का काम तेज़ी से फ़लफ़ूल रहा है ।

दोबारा सत्ता में आते ही पचमढ़ी में कॉर्पोरेट कल्चर की सीख का असर मंत्रियों पर कुछ ऎसा तारी हुआ कि कमोबेश सभी ने औद्योगिक घरानों के रंग-ढ़ंग अपनाना शुरु कर दिया । अब प्रदेश के ज़्यादातर महकमों के मंत्री और नौकरशाह किसी व्यापारिक घराने से कमतर नहीं हैं । हाल के सालों में बच्चों की शिक्षा,स्वास्थ्य, पोषण, दलितों और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दे गौण हो चुके हैं । आँकड़ों की ज़ुबान समझने वालों का कहना है कि विकास के पैमाने पर प्रदेश की हालत उत्तरप्रदेश और बिहार से भी बदतर हो चली है, जबकि दलित अत्याचार, महिला उत्पीड़न, अपहरण, हत्या, लूट, चोरी, डकैती, फ़िरौती जैसी आपराधिक गतिविधियों का ग्राफ़ लगातार कुलाँचे मार रहा है । प्रदेश में बने अराजकता के माहौल में उच्च शिक्षा का हाल भी बुरा है । ज़्यादातर विश्वविद्यालय राजनीति का अखाड़ा बन गये हैं और अधिकांश कुलपतियों को लेकर कैंपस में घमासान मचा है । बेरोज़गारी का ग्राफ़ रफ़्तार पकड़ रहा है,मगर इन्वेस्टर मीटस की रेलमपेल के बीच आत्ममुग्ध मुख्यमंत्री करारनामों पर हस्ताक्षरों को ही सफ़लता का पैमाना मान बैठे हैं । इन सबके बीच रातोंरात कंपनियाँ बनाकर सस्ती ज़मीन हथियाने और एमओयू के नाम पर बैंकों से कर्ज़ लेकर दूसरे धंधों में लगाने का कारोबार ज़ोरों पर है ।

तीन करोड़ रुपये की होली जलाकर अक्टूबर में खजुराहो में की गई ग्लोबल इन्वेस्टर मीट में हुए अरबों रुपयों के करारनामों की हकीकत तो गुज़रते वक्त के साथ ही सामने आ सकेगी । बहरहाल विधानसभा में उद्योगमंत्री द्वारा दिये गये आँकड़े अब तक के सरकारी प्रयासों की कलई खोलने के लिये काफ़ी हैं । बीते पांच वर्षो में चार विदेश यात्राएं, 20 करारनामों (एमओयू) पर हस्ताक्षर, नौ करारनामों का क्रियान्वयन नहीं, करार करने वाली एक कंपनी की परियोजना में रुचि ही नहीं, सिर्फ दो पर काम शुरू। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा पिछले पांच वर्षो में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए किए गए प्रयासों के ये नतीजे सामने आए हैं। कांग्रेस विधायक गोविंद सिंह द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने बताया कि मुख्यमंत्री ने वर्ष 2005 में दो, 2007 एवं 2008 में एक-एक विदेश यात्रा की । इन यात्राओं के दौरान विदेशी कारोबारियों के साथ कुल 20 करारनामों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें से 2005 में ग्यारह, 2007 में चार और 2008 में पांच करारनामों पर मध्य प्रदेश सरकार तथा विदेशी कंपनियों के बीच हस्ताक्षर हुए थे।

उद्योग मंत्री के मुताबिक वर्ष 2005 से 2009 के बीच हुईं विदेश यात्राओं पर कुल दो करोड़ चार लाख रुपये खर्च हुए हैं। मध्य प्रदेश में निवेश के लिए विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने सहित अन्य मसलों को लेकर मुख्यमत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में 19 सदस्यीय दल ने 13 से 23 जून 2010 तक जर्मनी, नीदरलैण्ड और इटली की यात्रा की, जिस पर 1 करोड़ 30 लाख रुपए खर्च हुए। श्री विजयवर्गीय के अनुसार इस यात्रा का मकसद सिर्फ विदेशी निवेशकों को पूंजी निवेश के लिए आकर्षित करना ही नहीं था, बल्कि प्रौद्योगिकी अवलोकन और हस्तांतरण, व्यावसायिक सहयोग, प्रदेश की ब्रांडिंग तथा विदेश से निवेशकों को खजुराहो ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट 2010 के लिये आमंत्रित करना भी था।

प्रदेश में गरीबी मिटाने के सरकार चाहे जितने दावे करे, लेकिन हकीकत कुछ और है। गरीबी यहाँ तेजी से पैर पसार रही है। इसके गवाह आठ जिलों के लोग हैं, जिनकी प्रतिदिन आय मात्र 27 रुपये है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भिंड, श्योपुर कलां, शिवपुरी, टीकमगढ़, रीवा, पन्ना, बड़वानी और मंडला वे जिले हैं, जहां प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय 10 हजार रुपये से भी कम है। इन इलाकों के लोगों की औसत आय प्रतिमाह 833 रुपये है। हालांकि, सरकार गरीबी दूर करने के लिए कई योजनाएं चला रही है, लेकिन गरीबी कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है। गरीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओ में व्याप्त भ्रष्टाचार प्रदेश में गरीबी बढ़ने की मूल वजह है। वहीं प्रदेश और केंद्र सरकार के बीच लड़ाई में भी गरीब पिस रहे हैं। कर्मचारियों को छठे वेतनमान देने के मुद्दे पर पैसे की तंगी का रोना रोने वाली राज्य सरकार विधायकों और मंत्रियों के ऎशो आराम पर दिल खोलकर खर्च रही है ।

भाजपा के पुरोधा और पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी जैसी सर्वमान्य छबि गढ़ने के फ़ेर में शिवराजसिंह इन दिनों मुख्यमंत्री निवास को धार्मिक समारोहों का आयोजन स्थल बनाने पर तुले हैं । एक दौर वो भी था जब शिवराज सार्वजनिक मंचों पर कैलाश विजयवर्गीय के सुर में सुर मिलाकर पुराने नगमे गुनगुनाया करते थे । लेकिन “लागा चुनरी में दाग” गाकर महफ़िल लूटने वाले कैलाश विजयवर्गीय से दामन छुड़ाकर अब वे रंजना बघेल, गोपाल भार्गव और लक्ष्मीकांत शर्मा की मंडली के साथ ज़िलों के दौरों के वक्त भजन-कीर्तन करते नज़र आने लगे हैं । वैसे विजय शाह के साथ गले में ढ़ोल लटका कर लोकधुनों पर झूमने का शौक भी इन दिनों परवान चढ़ रहा है । पेंशन और ज़मीन घोटाले के आरोप में फ़ँसे कैलाश विजयवर्गीय की राह में काँटे बोकर शिवराज एक मशहूर वाशिंग पाउडर के विज्ञापन “तो दाग अच्छे हैं” की तरह अपने दामन पर लगे “डंपर कांड” के दाग को भी “जस्टिफ़ाई” कर रहे हैं ।

वास्तव में सूबे के मुखिया के तौर पर शिवराजसिंह का कार्यकाल अब तक के सभी मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल पर भारी पड़ रहा है । उनकी पाँच साल की गौरवगाथा का बखान करने में कई साल लग सकते हैं । बहरहाल इस अनंतकथा को कम शब्दों में बखान करने के लिये फ़िलहाल इतना कहना ही काफ़ी होगा -“हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता, बहु बिधि कहहिं सुनहिं सब सन्ता ।”

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5 Comments on "“आगे पाठ पीछे सपाट” के फ़ार्मूले पर चल रहे हैं शिवराजसिंह चौहान"

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श्रीराम तिवारी
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सरिता जी को सच बयानी के लिए धन्यवाद ….मध्यप्रदेश को ,आजादी के बाद पहली बार आशा जगी थी की अब गाँव -गाँव में शिक्षा -स्वास्थ्य -पोलिस -सड़क और बिजली की व्यवस्था होगी ,किन्तु विगत ६ साल में सब कुछ सत्यानाश हो चला है ….कोई डम्पर काण्ड में फंसा है …कोई नोट गिनने की मशीन खरीद रहा है …ट्रांसपोर्ट बालों से करोड़ों वसूल करने के बाद भी उनकी तकलीफों को कम करने के बजाय उनसे कहा जा रहा है की गौरव दिवस पर भोपाल में अपनी बसें और अन्य वाहन फ्री फ़ोकट में आदमी भर भर कर भेजो .केंद्र सरकार की… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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तीन: विनय जी ठीक कहते हैं।पर निम्न जोडता हूं। जनतंत्र में आपका दो नंबर वाला, तभी नहीं गिरेगा, जब उसकी सही छवि जनता के सामने प्रस्तुत हो।यह प्रसिद्धि होनी ही चाहिए। जंगलमें मोर नाचके नहीं चलेगा। और, यह काम मिडिया का है। पता नहीं, कि किस उद्देश्यसे, या किस स्वार्थी(?) प्रेरणासे, सरिता जी ने यह लेख लिखा है? स्वच्छ, स्पष्ट, निरपेक्ष लेख होने चाहिए।सही मूल्यांकन स्वीकार्य है।पर? प्रवक्ता कहीं ऐसा खुलापन ना दिखाएं, जैसा अंग्रेज़ीकी कहावत है, =”इफ यू कीप युअर माइंड सफिशंटलि ओपन पिपल विल थ्रो गारबेज इन इट”= प्रवक्ता “अपना मस्तिष्क इतना खुला ना रखे कि लोग उसमें… Read more »
sunil patel
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सुश्री सरिता जी ने अच्छा लिखा है.
श्री शिवराज सिंह जी बहुत अच्छा कार्य कर रहे है. मुल्यांकन तो दुसरे मुख्मंत्रियो से तुलना करने पर ही होगा. श्री शिव राज जी हर तुलना में दुसरे मुख्मंत्रियो से उज्जवल, साफ़ सुथरी, स्पस्ट छवि के मने जाते है. हाँ अगर गगरी की पेंदी में छेद हो तो गगरी से पानी बह जाता है.
जरुरत है श्रीमान शिवराज सिंह जी को भ्रष्टाचार, लाल फीताशाही पर लगाम लगाने की. निश्चित ही प्रदेश का और ज्यादा विकास होगा.

शैलेन्‍द्र कुमार
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शैलेन्द्र कुमार

अपने तो थका दिया ऐसी भी शिवराज से क्या दुश्मनी है

Vinay Dewan
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राजनीती दो प्रकार से होती है

एक – मीडिया की सुर्खियाँ पाने के लिए किये गए विकास से
(मीडिया के सामने खीसें निपोरने हुए फोटो खिचाने वाले नेता से जनता बेहद चिड्ती है )

दो – जनता की परेशानी दूर करने के लिए किये गए विकास से
(ये काम नीतीश कुमार ने किया है)

एक नंबर वाला दोड़ेगा जरूर लेकिन जल्दी गिर जायेगा….
दो नंबर वाला दोड़ेगा भी और कभी नहीं गिरेगा.

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