लेखक परिचय

बी एन गोयल

बी एन गोयल

लगभग 40 वर्ष भारत सरकार के विभिन्न पदों पर रक्षा मंत्रालय, सूचना प्रसारण मंत्रालय तथा विदेश मंत्रालय में कार्य कर चुके हैं। सन् 2001 में आकाशवाणी महानिदेशालय के कार्यक्रम निदेशक पद से सेवा निवृत्त हुए। भारत में और विदेश में विस्तृत यात्राएं की हैं। भारतीय दूतावास में शिक्षा और सांस्कृतिक सचिव के पद पर कार्य कर चुके हैं। शैक्षणिक तौर पर विभिन्न विश्व विद्यालयों से पांच विभिन्न विषयों में स्नातकोत्तर किए। प्राइवेट प्रकाशनों के अतिरिक्त भारत सरकार के प्रकाशन संस्थान, नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए पुस्तकें लिखीं। पढ़ने की बहुत अधिक रूचि है और हर विषय पर पढ़ते हैं। अपने निजी पुस्तकालय में विभिन्न विषयों की पुस्तकें मिलेंगी। कला और संस्कृति पर स्वतंत्र लेख लिखने के साथ राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक विषयों पर नियमित रूप से भारत और कनाडा के समाचार पत्रों में विश्लेषणात्मक टिप्पणियां लिखते रहे हैं।

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-बी एन गोयल-

हाल ही में संपन्न लोकसभा के चुनाव के बारें में चर्चा हो रही थी। इन चुनाव ने भारत के सामाजिक और आर्थिक पटल पर कुछ नयी उपलब्धियों दर्ज की हैं। कितने प्रत्याशी जीते, कितने हारे- इस पर चर्चा हर नुक्कड़ पर हो रही है लेकिन यह कोई विशेष बात नहीं है। कौन-कौन दिग्गज लुढ़के और कौन-कौन सत्ताधीश बने- यह भी महत्वपूर्ण नहीं है। एक मित्र बोले- मालूम है 72 मंत्री धराशायी हो गए। हमने कहा 9 जीत भी तो गए। मित्र ने दहला मारा कि 9 जीतने वाले तो छूटभैये हैं- हारने वालों में देखो कपिल सिब्बल, श्रीप्रकाश जायसवाल, ग़ुलाम नबी आज़ाद, मीरा कुमार जैसी महान हस्तियां हैं। हमने कहा चलो तुम्हारी बात मान लेते हैं| और कुछ नयी बात हो तो बताओ। मित्र ने कहा इन चुनाव की एक बड़ी उपलब्धि है–
पुराने दिग्गज नेता नारायण दत्त तिवारी का पाणिग्रहण संस्कार। बेचारी दुल्हिन उज्ज्वल शर्मा जी इसी प्रतीक्षा में 67 की हो गयी। हमने कहा- ठीक कहा भाई आप ने, अब हम भी क्या करें। अपने हाथ की बात तो थी नहीं- आखिर तिवारी जी को भी 89 वर्ष तक राह देखनी पड़ी। कहावत मशहूर है जोड़ियां तो ऊपर ही बन जाती हैं, केवल औपचारिकता इस धरती पर संपन्न होती है। हमारी सहानुभूति रोहित शेखर के साथ हैं जिसे अपने पिता से मिलने के लिए 40 से अधिक वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने पड़े सो अलग। कितना सामयिक था तिवारी जी का विवाह समारोह कि विवाह की चकाचौंध और चुनाव के परिणामों की चकाचौंध एकाकार हो गए थे।

हमारे ये मित्र महोदय विवाह समारोह से ही आये थे। उन्होंने बताया की विवाह पूरी तरह से विधिपूर्वक हुआ। दुल्हा दुल्हिन को मेहंदी भी लगी, लेडीज़ संगीत भी हुआ, भंवरें भी पड़ी, गठबंधन हुआ, फेरे भी हुए, पंडित जी ने दोनों को कसमें भी दिलवाई और नव दम्पति ने सब का आशीर्वाद लिया। और तो और- पहले एक संस्कार होता था- सीठनों के गाने का। वह भी हुआ। आजकल तो ये कहीं सुनायी नहीं पड़ते- लेकिन तिवारी जी के विवाह में पूरी तन्मयता से सीठने गाये जा रहे थे। अगर किसी को नहीं मालूम तो हम बता दे की पहले यह एक आवश्यक संस्कार था कि दुल्हन के घर की बड़ी बूढ़ी महिलाएं फेरों के समय दूल्हा के घर के लोगों का स्वागत मीठी-मीठी गालियों से करती थी। दूल्हे के घर के लोग इन का प्रेमपूर्वक आनंद उठाते थे। खैर- तिवारी जी के विवाह में यह होना भी चाहिए था। आखिर वे भी तो पूरे परम्परावादी हैं। हमें ऐसा लग रहा था की तिवारी जी अपने विवाह से जितने प्रसन्न होंगे, उनसे अधिक प्रसन्न हमारे मित्रवर थे। चलते समय उन्हें मिठाई का डिब्बा जो मिला था।

हमने मित्रवर को बधाई दी और उन से अगले कार्यक्रम के बारे में पूछा। यहां इतना कहना आवश्यक है कि हमारे इन मित्र की राजनैतिक हल्कों में अच्छी खासी पैठ है। उनके सन्समरण किसी न किसी राजनेताओँ से जुडे होते हैँ। मित्रवर ने ख़ुशी से झूमते हुए कहा कि अब तो बस दिग्विजय सिंह जी के विवाह के निमंत्रण की प्रतीक्षा है। बेचारी अमृता रॉय जी भी प्रतीक्षा कर रही हैं अपने तलाक के निपटारे का। जो एक औपचारिकता मात्र ही है।

मान लिया, लेकिन हमारा प्रश्न बरक़रार था- आखिर इस विवाह का चुनाव से क्या लेना देना था। मित्र ने बताया- दोनों का बड़ा गहरा सम्बन्ध है। चुनाव के दौरान ही अखबार में खबर छपी थी कि मिजोराम में एक व्यक्ति हैं- जान्दीका चाना। उन की आयु है मात्र 70 वर्ष। जब वे अपना वोट डालने गए तो उन के साथ उन के घर के व्यक्तियों का एक लम्बा जुलूस था। इस जुलूस में थी उन की 39 पत्नियां और उन के 127 बच्चे, पोते और पोतियां। अब किस को रश्क नहीं होगा चाना जी को देखकर। एक नहीं दो नहीं, 39 पत्नियां और सब उन के साथ। तिवारी जी को लगा होगा कि वे व्यर्थ ही समय गंवा रहे हैं, खामख्वाह शर्म में मरे जा रहे हैं, 89 के तो हो गए और उज्जवला जी भी 67 की हो गयी- कब तक एक दूसरे की राह में पलक पांवड़े बिछाए बैठे रहेंगे। कुछ साल तो इसी सोच में निकाल दिए कि कौन पहल करे। वो बात अलग कि बेटा रोहित शेखर को भी 45 वर्ष तक पिताश्री के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ी। खैर भला हो इन चुनाव का जो क्रि चाना के बारे में पता चला और उन्होंने निर्णय लेने में मदद की। अब दिग्गी बाबू के लिए तो इन्होंने रास्ता खोल दिया।

चुनाव में दुहाई Buy one Get One सूत्र की
तिवारी जी को बेटा मिला साथ में मिली एक बीवी
दिग्गी जी को एक में ही दोनों मिले- बेटी जैसी बीवी
ज़ोर से बोलो- जय चुनाव आयोग महान की|

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1 Comment on "लोक सभा चुनाव की अनूठी उपलब्धि"

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शिवेंद्र मोहन सिंह
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शिवेंद्र मोहन सिंह
​हा हा हा गोयल साहब आपने बड़ा सुन्दर किस्सा ए साफगोई लिखा, प्रधान जी राजधानी की प्रधानी में केजरी जी के साथ राय मांगते रह गए और घर की राय कोई और ले गया। इन दोनों विषयों पर बहुत से हास्य क्षणिकाएँ वेब पे घूमती मिलीं। और एक अच्छा प्रहसन तैयार हो गया। और चुनाव के समय इन दोनों घटनाओं ने कांग्रेस की नैतिकता पर बहुत करारी चोट पंहुचाई। राय प्रकरण ने तो दिग्गी राजा को एकदम चुप करा कर घर बिठा दिया, नहीं तो चुनावी अवसर पर वो बहुत खतरनाक से स्टेटमेंट देते हैं। खैर छोड़िये आपने हास्य की… Read more »
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