लेखक परिचय

गौतम चौधरी

गौतम चौधरी

लेखक युवा पत्रकार हैं एवं एक समाचार एजेंसी से जुडे हुए हैं।

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-गौतम चौधरी

बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को मिली सफलता कोई अप्रत्याशित नहीं है। इस जीत के पीछे निस्‍संदेह नितिश कुमार की सकारात्मक विकास की राजनीति का हाथ है, लेकिन चुनाव में दो बातें अप्रत्याशित भी है। एक भारतीय जनता पार्टी की सीटों का बढ़ना एवं भाजपा के धुर विरोधी दलों का सफाया। यहां मैं एक घटना का उल्लेख करना चाहूंगा। मुझे याद है यह घटना सन 2002 की है। उस समय मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् का गया विभाग संगठन मंत्री हुआ करता था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दक्षिण बिहार प्रांत प्रचारक सरद खांडेलकर थे और गया विभाग के विभाग प्रचारक अनिल ठाकुर थे। अनिल जी के साथ मेरी अच्छी बनती थी। गया में संघ का कोई बडा कार्याक्रम होने वाला था। शहर के पूर्वी छोर पर एक निजी विद्यालय में कार्यक्रम रखा गया था। कार्यक्रम तीन दिनों का था और कार्यक्रम में उत्तर बिहार, दक्षिण बिहार एवं झारखंड के जिला कार्यवाह स्तर के कार्यकर्ता आने वाले थे। हमलोग सभी कार्यक्रम की तैयारी में लगे थे। जैसा कि बिहार आदि प्रांतों में संघ या अन्य संघ विचार परिवार के कार्यक्रमों में होता है, पहली शाम, घरों से बना-बनाया भोजन मांग कर लाया जाता है। कुछ कार्यकर्ता भोजन पैकेट एकत्रित करने चले गये थे। कुछ कार्यकर्ता अन्य व्यवस्था खड़ी करने में लगे थे। अनिल जी के साथ भाजपा के क्षितिजमोहन सिंह, विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ता भोला पटेल, सुभाष वर्मा, अखौरी गोपाल नारायण सिन्हा, फिर स्व0 बबुआ जी के लड़के छोटे बाबू आदि कार्यक्रम में अपने अपने तरीके से सक्रिय थे। मेरी जिम्मेबारी दूरभाष पर लगायी गयी थी। कार्यक्रम से पहले एक पत्रकार वार्ता रखने की योजना थी लेकिन किसी कारण उसे निरस्त कर दिया गया और मुझे कहा गया कि आप एक प्रेस नोट बनाकर सभी समाचार माध्यमों को भेज दें। सो मैंने किया। जिस दिन कार्यक्रम की शुरूआत होने वाली थी उस शाम को प्रांत प्रचार सरद जी का दूरभाष आया। दूरभाष मैंने ही उठाया। उन्होंने कहा कि अनिल जी से अभी बात कराओ। मैंने कहा कि कोई काम है तो बताईए क्योंकि अनिल जी को खोजना कठिन है। उन्होंने डांटते हुए कहा जितना कहता हूं उतना ही करो। फिर मैंने अनिल जी को ढूंढकर उन्‍हें सूचना दी। उन्‍होंने तुरंत सरद जी से संपर्क किया तो पता चला कि प्रशासन ने संघ के आसन्न कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगा दिया है। शाम हो रही थी, क्षेत्र प्रचारक सुरामन्ना जी, उस समय के तत्कालीन सरकार्यवाह मोहनराव जी आदि कई अधिकारी आ चुके थे। यही नहीं पूरे झारखंड, बिहार से अधिकतर कार्यकर्ता कार्यक्रम स्थल पर पहुंच गये थे। अब क्या हो। फिर अनिल जी कार्यक्रम करने देने की अनुमति लेने के लिए कुछ विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ताओं के साथ गया के जिलाधिकारी एवं आरक्षी अधीक्षक से जाकर मिले, लेकिन उनके निवेदन को जिलाधिकारी ने नकार दिया। तत्कालीन आरक्षी अधीक्षक रविन्द्र शंकरन ने तो यहां तक कहा कि हम आपके ऊपर कृपा कर रहे हैं इसलिए आपलोगों की अभी तक गिरफ्तारी नहीं हुई है। हमें शासन से आदेश है कि न केवल मोहनराव को गिरफ्तार किया जाये अपितु अनिल ठाकुर, सुरामन्ना एवं सरद खांडेलकर को भी पकड़कर अंदर किया जाये। ठंढ का समय था और रात काफी हो गयी थी। प्रशासन ने कार्यक्रम स्थल से संघ के कार्यकर्ताओं को गाडि़यों पर जबर्दस्‍ती बैठाकर जहां तहां छोड़ अयी। उस दिन की तुलना जब आज के दिन से करता हूं तो अजीब सा लगता है। यही नहीं थोड़ा आश्‍चर्य भी होता है। मुझे पूरा याद है, कल होकर मोहनजी की एक छोटी बैठक गया कार्यालय पर आयोजित की गयी थी। अपने छोटे से संबोधन में मोहनराव ने कहा था कि संघ के कार्यकर्ता इस अपमान का बदला वर्तमान सरकार को हटाकर लेंगे। मोहन जी की बात मुझे आज भी याद है। यह घटना सन 2002 की है और अगला चुनाव जब हुआ तो राबड़ी देवी की सरकार चली गयी। इस बार संयोग से वह व्यक्ति भी हार गया जो उस घटना के लिए जिम्मेबार था। गया के उस कार्यक्रम से आज के राजग की जीत का कुछ लेना देना नहीं है लेकिन मोहन जी की वह बात, गया ही नहीं पूरे झारखंड और बिहार के कार्यकर्ताओं ने गांठ बांध ली थी। न कहीं आन्दोलन हुआ और न ही कही धरना प्रदर्शन, लेकिन बिहार में भाजपा का ग्राफ दिन ब दिन बढता जा रहा है। वही बिहार में जिन लोगों ने राष्ट्रवादी चिंतन को ठेंगा दिखाया उसकी स्थिति खराब होती जा रही है। बिहार का वर्तमान परिवर्तन साधारण परिवर्तन नहीं है। इस चुनाव में नितिश की पार्टी को निस्‍संदेह ज्यादा सीटें मिली है लेकिन भाजपा जिस प्रकार मजबूत हुई है उसका संकेत साफ है कि नितिश साबधान हो जाएं और भाजपा से गठबंधन तोडने की सोचें भी नहीं। अगर वे ऐसा करने का मन बनाएं तो बिहार की जनता नितिश को भी नहीं छोडने बाली है। हालांकि नितिश के पीछे ही नहीं भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं के पीछे भी ईसाई एवं माओवादी हाथ धोकर पड़े हैं लेकिन बिहार में वे तबतक कुछ नहीं कर पाएंगे जबतक बिहार की जनता जागरूक रहेगी।

दूसरी बात यह है कि बिहार में समाजवादियों को तीन बार संघियों ने सहयोग कर सत्ता दिलाई। पहली बार जनसंघ के समर्थन से कर्पूरी जी ने बिहार में सरकार बनायी। उस सरकार ने जनसंघ को परेशान किया। दूसरी बार लालू जी ने भाजपा के समर्थन से सरकार बनायी उन्होंने भी भाजपा को परेशान किया और तीसरी बार नितिश कुमार को भाजपा के सहयोग से बिहार की कुर्सी मिली। दो बार तो समाजवादी संघियों को दगा दिये लेकिन तीसरी बार चाहे जो भी कारण रहा हो नितिश भाजपा को अलग नहीं कर सके। इस चुनाव में नितिश को बिहार की जनता ने यह भी संकेत दिया है कि अगर वे भाजपा के साथ गठबंधन तोड़े तो उनको बड़ी कीमत चुकानी होगी। इसका दूसरा पहलू भी है। अगर नितिश राष्ट्रवादी शक्तियों के साथ सामजस्य बनाकर रहे तो आने वाले समय में जो स्थिति बन रही है उसमें उन्हें राजग के नेता के रूप में भी प्रस्तुत किया जा सकता है।

इन दिनों कांग्रेस, साम्यवादी और अन्य संघ विरोधी शक्तियों ने भाजपा और जनता दल युनाईटेड में झगड़ा लगाने की पूरी कोशिश में लगी है, लेकिन नितिश को इस बात का अंदाज है कि बिहार में उडीसा वाली स्थिति नहीं है। साथ ही बिहार और झारखंड में जमीनी स्तर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का काम बहुत बढि़या है। यही नहीं गुजरात की तरह भाजपा एवं संघ में अंतरद्वद्व भी वहां नहीं है। नितिश ही नहीं नितिश के कूटनीतिक रणनीतिकारों ने भी इस गठबंधन को बनाये रखने में ही अपनी भलाई समझी और यही कारण है कि आज बिहार के समिकरण को पूरे देश में लागू करने की बात राजग नेतृत्व सोचने लगी है। दूसरी ओर कांग्रेस और साम्यवादियों की जबरदस्त पराजय ने यह साबित कर दिया कि बिहार में संघ विरोध की राजनीति करने वालों को जनता किसी कीमत पर बर्दाश्‍त नहीं कर सकती है। राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी के गठबंधन की हार उतना मायने नहीं रखता है क्योंकि इन दोनों ने न केवल अव्यवस्थित ढंग से गठबंधन किया, अपितु अपने साथ ऐसे लोगों को जोडा जिसकी छवि जनता के सामने अच्छी नहीं है। इस बार कांग्रेस को 04 सीटें मिली है। जबकि साम्यवादियों को एक भी सीट नहीं मिली। साम्यवादी बिहार में अच्छी स्थिति में थे लेकिन इस बार वे मात्र एक स्थान से ही जीत पाये हैं। जानकारी में रहे कि इस चुनाव में सभी साम्यवादी दल एक साथ मिलकर चुनाव लड़े लेकिन हार का मुह देखना पडा। बिहार में मुस्लिम को मुख्यमंत्री बनाने का नारा देने वाले रामविलास जी पहले तो स्वयं लोकसभा में हार गये फिर उनकी पार्टी विधानसभा में धुलधुसरित हो गयी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बराबर टिप्पणी करने वाले लालू जी की स्थिति भी दयनीय है। उनकी पत्नी न केवल सोनपुर से हार गयी अपितु राघोपुर विधानसभा जहां उनका गढ़ माना जाता था, वहां से भी हार गयी। अब इसको चाहे दुनिया जिस रूप में देखे लेकिन राजग की जीत को हिन्दुत्व की जीत से जोड़कर भी देखा जाना चाहिए।

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8 Comments on "बिहार में राजग की जीत को हिन्दुत्व की जीत से जोड़ कर देखें"

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B K Sinha
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बिहार में राजग की जीत को हिंदुत्व की जीत के रूप में देखने वालों से मै यह पूछना चाहता हूँ कि हिंदुत्व के माने क्या है यह क्या सिर्फ हिन्दू धर्म अनुयायी कि जीत है बी जे पी अगर हिन्दुओं कि पार्टी है तो उनके प्रवक्ता शःनाव्जाज खान और मुख़्तार नकवी जैसे लोग जो मुस्लिम्धर्म के अनुयायी है पार्टी में किस प्रकार है ? जिस दिन इस तथाकथित हिंदुत्व कि जीत हो गयी तो इस देश पाकिस्तान या इरान बनने में देर नहीं लगेगी यह हिंदुस्तान उन हिन्दुओं की चेतना की वजह से पाकिस्तान या इरान नहीं बन सका क्यों… Read more »
Jeet Bhargava
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बिलकुल सटीक विश्लेषण. भाजपा की जीत का ज्यादा प्रतिशत लेखाका की बात को सही ठहराता है. खैर अब दोनों को मिलकर ही बिहार को विकास की राह पर ले जाना होगा. क्योंकि लालू-पासवान-कोंग्रेस-कम्युनिस्ट की जमात को जनता नकार चुकी है. क्योंकि ये जमात सिर्फ राग-सेकुलर गाकर ही सत्ता हथियाना जानती है. इस सेकुलर जमात का ना तो सुशासन से कोइ वास्ता है और ना ही विकास या शान्ति से. उसने तो बस राग-सेकुलर का शोर्ट कट अपनाकर सत्ता पाना और बड़े-बड़े घोटालो के जरिए देश को लूटना ही आता है.

Abdul Rashid(Journalist)
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Abdul Rashid(Journalist)

अब जब लोग विकाश की बात करने लगे हैं ऐसे में इस नायब सोच को ख्याली पुलाव बना कर जयका बिगारना कहाँ तक ठीक होगा. क्या हम अपने सोंच को बदलकर नहीं देख सकते या हम अपनी सोंच बदलना ही नहीं चाहते.क्या यह रूढ़ीवाद नहीं है.स्वयं नितीश ने कहा है की यह विकाश की जीत है और नितीश ही इस जीत के निर्विवाद नेता है ऐसे और कुछ कहना जयका बिगारना ही लगता है.

आर. सिंह
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देखिये.देखने में हर्ज ही क्या है?ऐसे इन्ही पन्नों में किसी आलेख में दर्शाया गया है की भारतीय जनता पार्टी के जीत का प्रतिशत ज्यादा होने का क्या कारण है. मुझे उस लेखक के तर्क में भी दम लगता है.

Anil Sehgal
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बिहार में राजग की जीत को हिन्दुत्व की जीत से जोड़ कर देखें – by – गौतम चौधरी

गौतम चौधरी जी, कौन किसके कारण सफल हुआ ?

मीडिया तो यह धारणा प्रसार करने में लगा है कि यह सफलता इस कारण संभव हुई :
(1) नरेन्द्र मोदी जी को प्रचार करने के लिए बिहार आने के लिए रोका गया
(2) भाजपा नितीश जी के कंधे पर बैठी थी

गौतम चौधरी जी, भाजपा के कारण गठबंधन की विजय हुई इसके लिए कुछ एक दम वर्तमान के सर्व विदित कारण बताने होंगे.

If the wishes were horses the beggars would ride

– अनिल सहगल –

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