लेखक परिचय

गौतम चौधरी

गौतम चौधरी

लेखक युवा पत्रकार हैं एवं एक समाचार एजेंसी से जुडे हुए हैं।

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आंध्र प्रदेश की धटना आंख खोल देने वाली है। राजशेखर रेड्डी की मृत्यु को अब साजिश से जोड कर देखा जा रहा है। यह तो तथ्यों की मीमांसा के बाद ही पता चलेगा कि विगत दिनों राजशेखर की मृत्‍यु पर चैनल में चलने वाली खबर में कितनी सत्यता है, लेकिन राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद कुछ ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं जिससे चैनल में चली खबर को बल मिलता है। चैनल का समर्थन नहीं किया जाना चाहिए। आजकल समाचार चैनल वाले खबरों में सनसनी पैदा करने के लिए अनाप-शनाप दिखाते रहते हैं लेकिन जिस चैनल की खबर पर आन्ध्र और अन्य राज्यों में उत्पात मचाया गया है वह उस चैनल के संवावददाता की खबर नहीं है। चैनल ने तो मात्र इतना किया कि किसी अन्य समाचार स्रोत्रों से आ रही खबरों को लोगों के सामने परोस दिया।

समाचार-पत्रों से प्राप्त खबरों से इतना तो स्पष्ट हो गया है कि राजशेखर रेड्डी के साथ अम्बानी बंधुओं की ठनी हुई थी। फिर राजशेखर की मृत्यु के बाद आंध्र में मुख्यमंत्री का विवाद गहराया और कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व के व्यवहार से ऐसा कयास लगाया जाने लगा कि राजशेखर का केन्द्रीय नेतृत्व के साथ भी कोई अच्छा संबंध नहीं था। गोया इस तथ्य का खुलासा हुआ है कि कृष्णा- गोदावारी बेसिन में खनिज तेल की खुदाई में कई बडे पेंच हैं जिसका तार आंध्र में हो रही घटनाओं से जुडना स्वाभाविक है। खनिज तेल की खुदाई की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस मामले में दोनों भाई एक दूसरे पर देश के हितों के खिलाफ काम करने का आरोप लगा रहे हैं। हालंकि उस घटना को इससे जोड कर नही देखा जाना चाहिए लेकिन विगत दिनों जब अंबानी बंधुओं का आपसी संघर्ष चरम पर था तो किसी ने अनिल अंम्बानी के निजी हेलीकाप्टर के इंधन वाले टंकी में कुछ आपात्तिजनक चीज मिला दिया था। इसको अनिल के हत्या की साजिश से जोड कर देखा गया था। मामला रहस्यमय तब बन गया जब उस साजिश की जानकारी देने वाला आदमी दो दिनों के बाद मृत पाया गया। इधर राजशेखर की मौत की गुत्थी सुलझने के बजाय और उलझती जा रही है। इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि जो अधिकारी पूर्व मुख्यमंत्री के मौत की जांच कर रहे थे उनकी भी मौत रहस्मय तरीके से हुई है, साथ ही जो जांच महज कुछ दिनों में सम्पन्न होना चाहिए वह आज तक नहीं हो पाया है। इन तमामल घटनाओं को जोड कर देखने से ऐसा लगता है कि आंध्र प्रदेश में जो कुछ भी चल रहा है वह अप्रत्याशित नहीं है। साथ ही इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि इन तमाम घटनाओं का आपस में कोई संबंध है।

आंध्र प्रदेश में राजशेखर की ताजपोशी के बाद राज्य की राजनीति में दो राष्ट्र विरोधी ताकतों का हस्तक्षेप प्रारंभ हो गया था। आंध्र की राजनीति में न केवल ईसाई मिशनरियों ने अपितु माओवादियों ने भी अपनी ताकत झोंकी। इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता है कि आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के बूते नहीं अपितु ईसाई मिशनरी और माओवादी गठबंधन के कारण कांग्रेस सत्ता में लौटी और राजशेखर मुख्यमंत्री बने। इस आशंका को तब बल मिला जब आंध्र चुनाव के बाद संप्रग सरकार ने माओवादियों के प्रति लचीला रवैया अपनाना प्रारंभ किया। उस समय तत्कालीन गृहमंत्री ने तो यहां तक बयान दिया कि माओवादी हमारे बंधु हैं जिसे ताकत से नहीं बात चित के जरिये रास्ते पर लाये जाने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गयी है। हालांकि पूंजीपरस्त मीडिया के एक वर्ग ने इस लचीलेपन को साम्यवादी दबाव के रूप में प्रस्तुत किया लेकिन इसके पीछे की राजनीति ईसाई माओवादी गठबंधन को ही माना जाना चाहिए। भारत में ईसाई मिशनरियों का एक मात्र लक्ष्य भारत को टुकडों में विभाजित कर ईसाई उपमहाद्वीप के रूप में विकसित करना है। दक्षिण एशिया में सक्रिय चरम साम्यवादियों का लक्ष्य भी भारत को टुकडों में विभाजित कर सत्ता हथियाना है। इन दो बडी शक्ति का लक्ष्य एक होने के कारण आपस का समझौता स्वाभाविक है। इधर के दिनों में माओवादियों को कुछ बडे कॉर्पोरेट समूह से भी आर्थिक सहयोग मिलने की बात बतायी जा रही है। हालांकि इसका कोई स्पष्ट प्रमाण तो नही मिला है लेकिन माओवादी जिस प्रकार आपने स्वरूप और संगठन का विस्तार कर रहे हैं उससे यह साबित होता है कि उनको संगठित व्यापारिक समूहों का समर्थन प्राप्त है। आंध्र की घटना के पीछे इस दो संगठित राष्ट्र विरोधी तत्वों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है क्योंकि राजशेखर सरकार इन दोनों ही तत्वों की ताकत पर ही सत्ता हथियाने में कामयाब हुए थे। अब सवाल यह उठता है कि अखिर अपने प्यादे को इस प्रकार की शक्तियां क्यों खत्म करना चाहेगी? लेकिन जब ऐसे तत्वों को यह लगने लगता है कि विसात का प्यादा उसके काम का नहीं रहा तो उसके स्थान पर वह और सक्षम प्यादे को लाने की योजना बनाता है। इधर राजशेखर को अपनी ताकत का आभास होने लगा था। साथ ही राजशेखर माओवादी एवं ईसाई षड्यंत्र को भापने लगे थे। हालांकि राजशेखर की मौत पर जांच जारी है लेकिन जो तथ्य आ रहे हैं उससे इस आशंका को बल मिलने लगा है कि राजशेखर की मौत महज दुर्घटना नहीं थी वह एक साजिस का हिस्स था। जिसका दूसरा पक्ष उसके बेटे को मुख्यमंत्री बना कर पूरा होना था परंतु कांग्रेस के अंदर राष्ट्रवादी गुटों ने इसका विरोध कर दिया और आंध्र की ईसाई माओवादी षड्यंत्र पर पानी फिर गया। अब आंध्र प्रदेश में इस नापाक गठबंधन ने दूसरा खेल खेलना प्रारंभ किया है। जब तक आंध्र की राजनीति में से राजशेखर के समय से सक्रिय माओवादी मिशनरी सकर्थकों को चिंहित कर हटाया नहीं जाएगा तबतक आंध्र प्रदेश में शांति की कल्पना नहीं की जा सकती है। साथ ही उन कॉरपोरेट समूहों को भी चिन्हित किया जाना चाहिए जो अपने क्षणिक स्वार्थ के लिए राष्ट्र विरोधी ताकतों का उपयोग कर रहे हैं।

कांग्रेस जब से दूसरी बार केन्द्र की सत्ता सम्हाली है जब से इस विषय पर ध्यान दिया जाने लगा है। लेकिन कांग्रेस के द्वारा की गयी गलतियों का खमियाजा तो लोगों को भुगतना ही पडेगा। आंध्र में जो भी हो रहा है वह कांग्रेस की गलतियों का प्रतिफल है। प्रथम चरण में बिहार के राजनीति में भी ऐसी ताकतों का उपयोग किया गया था लेकिन बिहारी राजनेताओं ने सतर्कता से काम लिया। फिर बिहार में खनिज संपदा का अभाव होने के कारण माओवादी झारखंड की ओर शिफ्ट कर गये। लेकिन उडीसा, छत्तीसगढ और झारखण्ड में आज वही खेल हो रहा है। इन राज्यों के कुछ राजनेता, व्यापारी समूह और कुछ सरकारी अधिकारी आपने हितों के लिए माओवादी और मिशनरियों का उपयोग कर रहे है जो कालांतर में उन्हे तो धोखा देगा ही प्रकारांतर में देश और समाज को भी घाटा पहुंचायेगा। ऐसे में सतर्कता जरूरी है। कांग्रेस पार्टी ने असम और आंध्र प्रदेश में राष्ट्र विरोधी तत्वों के साथ समझौता किया। असम की लडाई कहां से कहां पहुंच गयी यह किसी से छुपा नहीं है। अब आंध्र प्रदेश की बारी है। विगत दिनों आंध्र प्रदेश में ऐसी कुछ घटनाएं घटी जिससे ऐसा लगने लगा है कि प्रदेश में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। राजशेखर की मौत, रोसर्डया की ताजपोशी पर अडगा, तेलंगाना आन्दोलन और अब रिलांयस पर प्रत्यक्ष आक्रमण। इससे देश के राजनेता व्यापारी और नौकर शाहों को सीख लेनी चाहिए कि चरमपंथी चाहे वह किसी भी चिंतन का हो अंततोगत्वा वह विनाश और विध्वंश को ही जन्म देता है। इसका सहयोग मौत और विनाश का आंमत्रण है। मिशनरी एवं माओवाद दोनों इसी प्रकार की शक्ति है, जिसका सहयोग खतरे से खाली नहीं है। आज उसी का खमियाजा झारखण्ड, उडीसा, छत्तीसगढ, मघ्यप्रदेश और आंध्रप्रदेश भुगत रहा है। आंध्र की घटना पर देश के नीति नियंताओं को सज्ञान लेते हुए सतर्क हो जाना चाहिए अन्यथा ये शक्तियां और घाटा पहुंचाने में सक्षम हो जाएगी।

-गौतम चौधरी

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1 Comment on "आंध्र की अस्थिरता के पीछे माओवादी-मिशनरी षड्यंत्र"

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alok nandan
Guest

बेहतरीन विश्लेषण…..

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