लेखक परिचय

हिमकर श्‍याम

हिमकर श्‍याम

वाणिज्य एवं पत्रकारिता में स्नातक। प्रभात खबर और दैनिक जागरण में उपसंपादक के रूप में काम। विभिन्न विधाओं में लेख वगैरह प्रकाशित। कुछ वर्षों से कैंसर से जंग। फिलहाल इलाज के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से रचना कर्म। मैथिली का पहला ई पेपर समाद से संबद्ध भी।

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हिमकर श्याम

झारखंड में एकबार फिर जमीन का जिन्न बाहर निकल आया है। छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट (सीएनटी एक्ट) का गड़ा मुर्दा उखाड़कर अस्थिरता का माहौल पैदा करने की कोशिश की जा रही है। जमीन के नाम पर झारखंड के लोगों को बांटने की साजिश रची जा रही है। इसके पहले भी डोमेसाइल के नाम पर ऐसी कोशिश की जा चुकी है। डोमेसाइल का मुद्दा बाबूलाल के कार्यकाल में उठा था। सरकार की डोमिसाइल नीति ने यहाँ का सामाजिक ताना-बाना नष्ट कर दिया और समूचे प्रदेश को हिंसा की आग में झोंक दिया था। झारखंडी और गैर-झारखंडियों के बीच दूरी बढ़ गयी थी। उसका खामियाजा झारखंड के लोग आज भी भुगत रहे हैं।

डोमेसाइल की तरह सीएनटी एक्ट भी बहुत संवेदनशील मुद्दा है। पूरे राज्य में इसको लेकर उबाल है। संपूर्ण झारखंडी समाज दो वर्गों में साफ-साफ बंटा हुआ दिखाई दे रहा है। पहला वर्ग अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति व पिछड़े वर्ग का है तो दूसरा वर्ग उनका है, जिनके पास झारखंड में रहने को अपनी जमीन नहीं है। पहले वर्ग का एक धड़ा इसमें किसी भी तरह के बदलाव को खारिज कर रहा है तो दूसरा धड़ा इसे अपनी तरक्की का बाधक मान रहा है। सीएनटी एक्ट में स्थानीय निवासी को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। सीएनटी एक्ट में स्थानीय निवासी और स्थायी निवासी को लेकर भी भ्रम की स्थिति है। सीएनटी एक्ट झारखंड के दो तिहाई आबादी का कानूनी दस्तावेज है। तथ्यों से जाहिर है कि सीएनटी एक्ट का कितना दुरूपयोग हुआ है। यह प्रभावशाली ढंग से अमल में नहीं लाया जा रहा है। इस कानून का अनुपालन में सख्ती नहीं रहने के कारण इसका आज तक सरकार, नेता, मंत्री, सरकारी तंत्र, ठेकेदार, माफिया, बिल्डर, कारपोरेट घरानों द्वारा खुला उल्लंघन किया जाता रहा हैं। ऐसे लोग आदिवासी जमीन को गैर कानूनी तरीके से औन-पौने दामों पर, या हड़पकर उस जमीन पर बैंको से लोन लेकर व्यवसाय करते आये हैं। महत्वपूर्ण पदों पर बैठे कई आइएएस व राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों ने भी इस एक्ट का उल्लंघन कर जमीन की खरीद की है। उल्लंघन की वजह यह है कि इस पर अमल करनेवाली मशीनरी भ्रष्ट है।

सीएनटी एक्ट एक ऐसा कानून है आदिवासियों, दलितों और पिछड़ी जातियों की जमीन की सुरक्षा की गारंटी देता है। इस कानून को 11 नवंबर 1908 को लागू किया गया था। यह बंगाल काश्तकारी अधिनियम, 1885 से मिलता-जुलता है। अब तक इसमें 26 बदलाव किये गये हैं। सीएनटी एक्ट की धारा 46 (1) ए आदिवासियों की जमीन के अवैध स्थानांतरण को रोकता है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अत्यंत पिछड़े वर्ग के लोग अपनी जमीन अपनी ही जाति या वर्ग के लोगों को छोड़ कर दूसरे के नाम स्थानांतरित नहीं कर सकते। सीएनटी एक्ट की धारा 46 (1) ए के तहत अनुसूचित जनजाति की जमीन एक ही थाना क्षेत्र के अंतर्गत उसी जाति के लोगों को बेची या खरीदी जा सकती है। धारा 46 (1) बी के मुताबिक, एक ही जिले का निवासी होने पर अनुसूचित जाति व पिछड़ा वर्ग अपनी जाति के लोगों को भूमि का हस्तांतरण कर सकते हैं। नियमों के बावजूद सीएनटी एक्ट का धड़ल्ले से उल्लंघन हो रहा है। आदिवासियों को जमीन का पट्टा नहीं मिल पा रहा। उन्हें बैंक ऋण भी नहीं दे रहे हैं। ऐसे में इस कानून का औचित्य समझ में नहीं आता।

अंगे्रजों के शोषण के खिलाफ 1855 में संथाल परगना में सिदो-कान्हों ने संथाल विद्रोह तथा 1895 में छोटानागपुर में बिरसा मुंडा ने उलगुलान किया, इन आंदोलनों का मकसद आदिवासी समुदाय को संगठित कर जंगल पर पुनः एकाधिपत्य प्राप्त करना था। उलगुलान की तीव्रता कम करने के लिए अंगे्रजों ने कई कदम उठाए। छोटानागपुर में सीएनटी और संथालपरगना में एसपीटी एक्ट लागू किया गया। भू अभिलेखों की खेदजनक स्थिति के कारण आदिवासियों को अपनी ही भूमि पर वैधानिक अधिकारों से वंचित होना पड़ा। आदिवासी जमीन पर गैर आदिवासियों का कब्जा बढ़ता चला गया। भू-कानूनों की खामियों और सरकार एवं अन्य संस्थाओं द्वारा भूमि के अधिग्रहण के कारण अधिकांश आदिवासी जमीन से बेदखल हुए। जल, जंगल, जमीन पर स्थानीय लोगों की हकों की सरकार लगातार अनदेखी करती रही है। कई जनसंगठन इसके खिलाफ लगातार संघर्षरत हैं। गलत तरीके से अनुसूचित जनजातियों की जमीन के ट्रांसफर, बिक्री, लीज अथवा गिफ्ट दिये जाने के मामले को देखने के लिए एसआर कोर्ट का गठन किया गया है। एसआर कोर्ट में कुल 12739 मामले लंबित हैं। इनमें सबसे अधिक मामले रांची, धनबाद, गुमला, सिमडेगा और खूंटी जिले में दर्ज हैं।

अंग्रेजों के जमाने में बने छोटानागपुर और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम में बदलाव का चिंतन वक्त की मांग है। 1908 और 2012 में बहुत अंतर है। उस समय के झारखंड क्षेत्र और आज के झारखंड राज्य में अप्रत्याशित बदलाव आया है। बिहार सरकार ने 40 वर्ष पूर्व ही कोर्ट के आदेश से इस प्रतिबंध को हटा दिया था और झारखंड में राज्य गठन के बाद भी व्यवहारतः यह लागू नहीं था। यदि झारखंड में यह लागू हो जाए तो विकास का पहिया पूरी तरह थम जाएगा, क्योंकि तब कुछ ही जमीन ही खरीद बिक्री के योग्य बच जाएगी। आदिवासी इलाकों में आजतक विकास नहीं होने में सीएनटी एक्ट की खामियां भी जिम्मेवार हैं। राज्य में कई ऐसे आदिवासी हैं, जिनके पास जमीन तो काफी है, पर उनकी आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब है। इसका मुख्य कारण है कि उनकी जमीन का उचित मूल्य उन्हें नहीं मिलना।

झारखण्ड विधानसभा का बज़ट सत्र शुरू हो गया है। सीएनटी के मुद्दे पर सरकार को घेरने की पूरी तैयारी है। इस बार सरकार को विपक्ष के अलावा सत्ता पक्ष के लोगों से भी परेशानी है। यह काफी संवेदनशील मुद्दा है, इसलिए इस पर राजनीति करने के बजाये इसके कानूनी और व्यावहारिक पक्ष को समझते हुए सभी को मिल-बैठकर समाधान कर रास्ता निकालना चाहिए। राजनीति से इस समस्या का समाधान कदापि संभव नहीं है।

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