लेखक परिचय

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं।

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– डॉ. आशीष वशिष्ठ

अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है दीपावली। लेकिन देश के राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक हालात इस कदर बिगड़े हुए हैं कि दूर-दूर तक अंधेरा ही अंधेरा दिखाई दे रहा है। मंहगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, बाल वेश्यावृत्ति, पर्यावरण प्रदूषण, बाल विवाह, बढ़ती जनसंख्या और वोट बैंक की राजनीति के भूत ने व्यवस्था और तंत्र को अपने शिकंजे में ले रखा है। ऊपर से नीचे तक सारी व्यवस्था भ्रष्टचार की गंगोत्री में गोते लगा रही है और आम आदमी दो जून की रोटी जुटा पाने में असमर्थ है। लोकतंत्र के चारों खंभे विधायिका, न्यायापालिका, कार्यपालिका और प्रेस सभी भ्रष्टाचार के कीचड़ में सने हैं। मंहगाई के बम ने आम आदमी का जीना मुहाल कर रखा है, सोना, चांदी तो दूर की बात है आम आदमी खील-खिलौने खरीदने में भी खुद को असमर्थ पा रहा है। स्वतंत्रता के 65 वर्षों में देश के आम नागरिक को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हुई हैं। आम आदमी दो जून की रोटी के जुगाड़ के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल पा रहा है। राजनीति जन सेवा की बजाय व्यापार बनी हुई है। राजनेता व राजनीतिक दल हठधर्मिता और बेशर्मी पर उतारू हैं। राजनीति, कारपोरेट और माफियाओं के गठजोड़ ने देश के साधनों व संसाधनों के लिए खुली लूट मचा रखी है। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस शक के कटघरे में खड़े हैं और लोकतंत्र लूटतंत्र में तब्दील हो चुका है। व्यवस्था व तंत्र काले अंधेरे में डूबा है और आम आमदी को यह समझ नहीं आ रहा है कि वो किस मार्ग का चुनाव करे अर्थात चारों ओर अंधेरा ही दिखाई दे रहा है।

आजादी की लड़ाई के बाद सबसा बड़ा जन आंदोलन देश में भ्रष्टचार के भूत भगाने के लिए ही अन्ना, रामदेव और केजरीवाल के नेतृत्व में हुआ है। लेकिन अहम् प्रश्न यह है कि जनता विश्वास किस पर करे। सभी राजनीतिक दलों के नेता हम्माम में नंगे ही नजर आ रहे हैं। केजरीवाल ने कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के नेताओं की पोल जनता के सामने खोली है। केजरीवाल खुद राजनीति के मैदान में उतर चुके हैं, फिलवक्त उनका दामन बेदाग है लेकिन जनता उन पर कैसे विश्वास करे। जनता चुप और सहमी हुई है, वो चुपचाप सारा ड्रामा देख रही है। इतिहास इसका साक्षी है जितने भी सामाजिक आंदोलन व्यवस्था के विरूद्घ खड़े हुए अंत में वो राजनीति के गंदे नाले में ही समा गए या धूल में कहीं खो गए। वहीं प्रश्न यह भी खास है कि सबसे अधिक भ्रष्टïाचार विकासशील देशों में देखने को मिलता है। तो क्या विकास को भ्रष्टïाचार का जनक कहा जाए या फिर विकास और भ्रष्टाचार एक सिक्के के दो पहलू हैं। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से देश के मध्य वर्ग में बहुत ही ज्यादा उत्साह जगा था और लगने लगा था कि भ्रष्टाचार पर आम आदमी की नजर है, वह ऊब चुका है और अब निर्णायक प्रहार की मुद्रा में है। आम आदमी जब तक मैदान नहीं लेता, न तो उसका भविष्य बदलता है और न ही उसके देश या राष्ट्र का कल्याण होता है।

1857 में इस देश के आम आदमी ने अंग्रेजों की हुकूमत के खिलाफ लडऩे के मन बनाया था। उस लड़ाई में सभी तो नहीं शामिल हुए थे लेकिन मानसिक रूप से देश की अवाम अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने के लिए तैयार थी। महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले 25 साल के संघर्ष के बार अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने हार मान ली और देश आज़ाद हो गया। उस राजनीतिक घटना के साठ साल बाद आज फिर इस देश का आम आदमी आर्थिक भ्रष्टाचार के आतंक के नीचे दब गया है। वह आर्थिक भ्रष्टाचार के निरंकुश तंत्र से आजादी चाहता है। आज देश में भ्रष्टाचार का आतंक ऐसा है कि चारों तरफ त्राहि त्राहि मची हुई है, देश के गांवों में और शहरों के गली कूचों में लोग भ्रष्टाचार की गर्मी में झुलस रहे हैं। शायद इसीलिए जब भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे ने आवाज बुलंद की तो पूरे देश में लोग उनकी हां में हां मिला बैठे। सूचना क्रान्ति के चलते पूरे देश में अन्ना की मुहिम का सन्देश पंहुच गया। भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मसीहा मिल गया था। लगभग पूरा मध्यवर्ग अन्ना के साथ था। अब यह शंका पैदा होने लगी है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई शायद अब आगे नहीं चल पायेगी।

राजनीति के हम्माम में तमाम दल नंगे है यह बात साबित हो चुकी है। अपने ऊपर लगे भ्रष्ट्राचार के आरोपों का राजनीतिक दल और नेता जिस अंदाज में जवाब और प्रतिक्रिया दे रहे हैं उससे उनकी सामंतवादी प्रवृत्ति का सहज अंदाजा हो जाता है। राजनीतिक दलों ने अपने फायदे के लिए धर्म, जाति, भाषा, संप्रदाय के फंदे में उलझा रखा है। आम आदमी राजनीतिक दलों का वोट बैंक बनकर रह गया है। नेता अखण्डता, भाईचारे, धर्म निरपेक्षता के लंबे-चौड़े भाषण तो जरूर देते हैं वहीं देश की अखण्डता, भाईचारे और धर्म निरपेक्षता को आज सबसे अधिक खतरा राजनीति और नेताओं से ही है। न्यायपालिका की दीवारे भी पैसा मांगने लगी है और कार्यपालिका ने तो भ्रष्टïाचार के सारे रिकार्ड तोड़ डाले हैं। प्रेस भी संदेह के कटघरे में है। मल्टीनेशनल कंपनियां देश की अर्थव्यवस्था से लेकर सामाजिक ताने-बाने का संचालन और दखलअंदाजी करने लगी है। भ्रष्टï नेता, व्यापारी और माफिया देश के आम आदमी के हिस्से और विकास का पैसा स्विस बैंकों की तिजोरियां में भर रहे हैं और आम आदमी सडक़, पानी, बिजली और मकान के फेर में ही छह दशक गुजार चुकी है।

देश की जनता मुसीबतों और परेशानियों के बोझ तले दबी है। मंहगाई ने तीज-त्योहारों का मजा किरकिरा कर रखा है, वहीं भ्रष्टाचार ने आक्टोपस की तरह सबको जकड़ रखा है। पूरी व्यवस्था और वातावरण पर भ्रष्टïाचार का घना अंधेरा छाया है और आम आमदी हद दर्जे तक दुखी और परेशान है ऐसे में त्योहार केवल रस्म भर बनकर रह गए हैं जब देश में आम आदमी, किसान, मजदूर, महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे खुशहाल होंगे और भ्रष्टïाचार मुक्त व्यवस्था, धर्म, जाति और वोट बैंक की गंदी और ओछी राजनीति खत्म हो जाएगी, जब देश में एक भी आदमी भूखे नहीं सोएगा, कोई बच्चा काम पर जाने की जगह स्कूल जाएगा, जब किसी बहन, बेटी और औरत की इज्जत सरेराह उछाल नहीं जाएगी, किसान आत्महत्या नहीं करेगा, जिस दिन कोई लडक़ी या औरत किसी चंद पैसेां के लिए अपना जिस्म बेचने को मजबूर नहीं होगी, अशिक्षा और अनपढ़ता का अंधेरा जिस दिन छंट जाएगा, मजदूर को उसके हक की मजदूरी मिलेगी शायद उसी दिन देश का आम आदमी दीपावली मना पाएगा।

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