लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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-विजय कुमार

जम्मू-कश्मीर में गत 20 सितम्बर को सांसदों का जो सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल गया था, उसके कुछ सदस्यों ने उन्हीं भूलों को दोहराया है, जिससे यह फोड़ा नासूर बना है। इनसे मिलने अनेक दलों और वर्गों के प्रतिनिधि आये थे; पर देशद्रोही नेताओं ने वहां आना उचित नहीं समझा।

अच्छा तो यह होता कि इन्हें बिलकुल दुत्कार दिया जाता; पर कई सांसदों और उनके दलों के लिए देश से अधिक मुस्लिम वोटों का महत्व है। इसलिए माकपा नेता सीताराम येचुरी के नेतृत्व में कुछ सांसद अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी से मिलने उनके घर गये। भाकपा सांसद गुरुदास दासगुप्ता के साथ कुछ सांसद हुर्रियत नेता मीरवायज उमर फारुक से मिले और रामविलास पासवान जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता यासीन मलिक के घर गये। यह अच्छा ही हुआ कि भाजपा और कांग्रेस के सांसदों ने स्वयं को इस बेहूदी कवायद से दूर रखा।

इन तीनों देशद्रोही नेताओं ने मीडिया का पूरा लाभ उठाया। सांसदों का सम्मान करने वालों से तो वार्ता कमरे में हुई; पर उनका अपमान करने वालों से मीडिया के सामने। स्पष्ट है कि इस मामले में भारत सरकार उल्लू ही बनी है। यद्यपि 100 करोड़ रु0 की सहायता और आठ सूत्री कार्यक्रमों की घोषणा कर अब शासन अपनी पीठ थपथपा रहा है; पर यह कवायद अंततः विफल ही सिद्ध होगी।

हो सकता है कि बाजार और विद्यालयों के खुलने तथा कर्फ्यू के हटने से देशवासी समस्या को समाप्त मान लें; पर यह कुछ दिन की शांति है। पत्थरबाजों की रिहाई, सुरक्षाकर्मियों पर हमला करते हुए उनकी गोली से मरने वालों के परिजनों को पांच लाख रु0 की सहायता तथा पत्थर, डंडे और गाली खाकर भी चुप रहने वाले, इलाज करा रहे सुरक्षाकर्मियों को आठ-दस हजार रु0 का पुरस्कार यह बताता है कि सरकार मुस्लिम तुष्टीकरण की उसी नीति पर चल रही है, जिसने देश की सदा हानि की है।

स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास के अनुसार देश विभाजन का अपराधी मोहम्मद अली जिन्ना पहले देशभक्त ही था। उसने 1925 में सेंट्रल असेंबली में कहा था कि मैं भारतीय हूं, पहले भी, बाद में भी और अंत में भी। वह मुसलमानों का गोखले जैसा नरमपंथी नेता बनना चाहता था। उसने खिलाफत आंदोलन को गांधी का पाखंड कहा। उसने मुसलमानों के अलग मतदान और निर्वाचन क्षेत्रों का विरोध किया। उसने राजनीति में मजहबी मिलावट के गांधी, मोहम्मद अली और आगा खान के प्रयासों का विरोध किया। उसने तिलक के अपमान पर वायसराय विलिंगटन का मुंबई में रहना दूभर कर दिया।

उसने ‘रंगीला रसूल’ के प्रकाशक महाशय राजपाल के हत्यारे अब्दुल कयूम की फांसी का समर्थन किया तथा लाहौर के शहीदगंज गुरुद्वारे के विवाद में सिखों की भरपूर सहायता की। 1933 में उसने लंदन के रिट्ज होटल में पाकिस्तान शब्द के निर्माता चौधरी रहमत अली की हंसी उड़ाकर उसके भोज का बहिष्कार किया तथा कट्टरवादी मुल्लाओं को ‘कातिल ए आजम’ और ‘काफिर ए आजम’ कहा।

1934 में उसने मुंबई के चुनाव में साफ कहा था कि मैं भारतीय पहले हूं, मुसलमान बाद में। जलियांवाला बाग कांड के बाद वह असेम्बली में गांधी और नेहरू से अधिक प्रखरता से बोला था। रोलेट एक्ट के विरोध में उसकी भूमिका से प्रभावित होकर गांधी ने उसे कायदे आजम (महान नेता) कहा और मुंबई में जिन्ना हाल बनवाया, जिसमें मुंबई कांग्रेस का मुख्यालय है; पर यही जिन्ना देशद्रोही कैसे बना, इसकी कहानी भी बड़ी रोचक है।

इसके लिए भारत के मुसलमान, गांधी जी और कांग्रेस की मानसिकता पर विचार करना होगा।

मुसलमानों ने पांचों समय के नमाजी मौलाना आजाद के बदले अलगाव की भाषा बोलने वाले मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली को सदा अपना नेता माना। कांग्रेस के काकीनाड़ा अधिवेशन में उद्घाटन के समय हुए वन्दे मातरम् पर अध्यक्षता कर रहे मौहम्मद अली मंच से नीचे उतर गये थे। उनकी इस बदतमीजी को गांधी और कांग्रेस ने बर्दाश्त किया। इससे जिन्ना समझ गया कि यदि मुसलमानों का नेता बनना है, तो अलगाव की भाषा ही बोलनी होगी। उसने ऐसा किया और फिर वह मुसलमानों का एकछत्र नेता बन गया।

यह भी सत्य है कि अंग्रेजों ने षड्यन्त्रपूर्वक जिन्ना को इस मार्ग पर लगाया, चूंकि वे गांधी के विरुद्ध किसी को अपने पक्ष में खड़ा करना चाहते थे। नमाज न जानने वाला, गाय और सुअर का मांस खाने तथा दारू पीने वाला जिन्ना उनका सहज मित्र बन गया। अंग्रेजों ने उसकेे माध्यम से शासन और कांग्रेस के सामने मांगों का पुलिंदा रखवाना शुरू किया। शासन को उसकी मांग मानने में तो कोई आपत्ति नहीं थी, चूंकि पर्दे के पीछे वे ही तो यह करा रहे थे; पर आश्चर्य तो तब हुआ, जब गांधी जी भी उनके आगे झुकते चले गये।

1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की विफलता और मुसलमानों के उसमें असहयोग से अधिकांश कांग्रेसियों का मोह उससे भंग हो गया; पर गांधी जी उस सांप रूपी रस्सी को थामे रहे। मई 1944 में उन्होंने जेल से मुक्त होकर जिन्ना को एक पत्र लिखा, जिसमें उसे भाई कहकर उससे भेंट की अभिलाषा व्यक्त की।

इस भेंट के लिए मुस्लिम लीग की स्वीकृति लेकर जिन्ना ने शर्त रखी कि वार्ता के लिए गांधी को मेरे घर आना होगा। वहां 9 से 27 सितम्बर तक दोनों की असफल वार्ता हुई। जिन्ना इसके द्वारा गांधी, कांग्रेस और हिन्दुओं को अपमानित करना चाहता था, और वह इसमें पूरी तरह सफल रहा।

अब क्या था; मुसलमानों ने गांधी को अपमानित करने वाले को अपना निर्विवाद नेता मान लिया। अनेक देशभक्त नेताओं ने इस वार्ता का विरोध किया था; पर गांधी जी की आंखें नहीं खुलीं। देसाई-लियाकत समझौते और वैवल योजना के रूप में दो और असफल प्रयास हुए। पत्रकार दुर्गादास के प्रश्न के उत्तर में शातिर जिन्ना ने हंसते हुए कहा – क्या मैं मूर्ख हूं, जो इसे मान लूं। मुझे तो थाल में सजा कर पाकिस्तान दिया जा रहा है। स्पष्ट है कि जिन्ना की निगाह अपने अंतिम लक्ष्य पाकिस्तान पर थी।

इतिहास कितना भी कटु हो; पर उसे नकारा नहीं जा सकता। जो भूल गांधी जी ने की, क्या वही भूल उन सांसदों ने नहीं की, जो इन देशद्रोहियों के घर जा पहुंचे ?

इसी से मिलती-जुलती, पर इसका दूसरा पक्ष दिखाने वाली घटना भी भारत के इतिहास में उपलब्ध है।

1947 में देश स्वाधीन होने के बाद जो दो-चार रजवाड़े भारत में विलय पर मुंह तिरछा कर रहे थे, उनमें से एक हैदराबाद का निजाम भी था। वह पाकिस्तान में मिलना चाहता था, यद्यपि वहां की 88 प्रतिशत प्रजा हिन्दू थी। नेहरू जी उसे समझाने के लिए गये; पर बीमारी का बहाना बनाकर वह मिलने नहीं आया।

जब यह बात सरदार पटेल को पता लगी, तो वे बौखला उठे। उन्होंने कहा कि यह नेहरू का नहीं, देश का अपमान है। अब वे स्वयं हैदराबाद गये और निजाम को बुलाया। वहां से फिर वही उत्तर आया। इस पर पटेल ने कहा कि उसे बताओ कि भारत के उपप्रधानमंत्री आये हैं। यदि वह बहुत बीमार है, तो स्टेचर पर आए। इसका परिणाम यह हुआ कि थोड़ी ही देर में धूर्त निजाम भीगी बिल्ली बना, हाथ जोड़ता हुआ वहां आ गया। फिर सरदार पटेल ने उस रियासत को भारत में कैसे मिलाया, यह भी इतिहास के पृष्ठों पर लिखा है।

यह दो घटनाएं बताती हैं कि देशद्रोहियों से कैसा व्यवहार होना चाहिए ? आज हमें गांधी या नेहरू जैसे दाढ़ी सहलाने वाले नहीं, पटेल जैसे दाढ़ी नोचने वाले हाथ चाहिए। दुर्भाग्यवश वर्तमान शासन तंत्र इसमें बिल्कुल नाकारा सिद्ध हुआ है।

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2 Comments on "फिर दाढ़ी में हाथ"

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Ravindra Nath
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सत्य वचन, हमारे नेताओं को राजनीति सीखना चाहिए पहले, और उन्हे समझना चाहिए कि देश सर्वोपरि है। पर इन सबको तो बडे लक्ष्य समझ ही नही आते है और सभी सिर्फ और सिर्फ तात्कालिक समाधान और अपना उल्लू सीधा करने मे लगे रहते हैं।

amarjeet singh chhabra
Guest

विजय जी आपकी बात सोलह आने सत्य है परन्तु आप दाढ़ी जैसे सब्द की जगह कुछ और शब्द उपयोग करते तो ज्यादा उचित होता क्योकि दाढ़ी सिर्फ मुसलमानों की नहीं होती दाढ़ी हिन्दू साधू सन्यासियों की भी होती है सबसे ज्यादा लगाव दाढ़ी से सिक्ख रखते जिनके धर्म का प्रमुख आधार ही दाढ़ी है अतइव यदि हम किसी के बारे में डाइरेक्ट कुछ न बोलकर सब्दो के माध्यम से इशारों से कुछ कह रहे है तो हमारा इशारा भी स्पस्ट होना चाहिए नहीं तो उस इशारे के शिकार अन्य लोग भी हो सकते है

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