लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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-निर्मल रानी

गत् दो दशकों से तकनीकी शिक्षा विशेषकर आयुर्विज्ञान अथवा चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में जैसा आर्थिक उछाल देखा जा रहा था उसकी कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। आमतौर पर यह बात प्रचलित हो चुकी थी कि मेडिकल शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों को मेडिकल कॉलेज की प्रतिष्ठा तथा प्रसिध्दि के अनुरूप कम से कम दस लाख रुपये से लेकर चालीस लाख रुपये तक का भुगतान करना ही पड़ेगा। चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में आए इस ‘आर्थिक बूम’ के परिणास्वरूप इतनी बड़ी रक़ म न भर पाने वाले अभिभावक अपने बच्चों को या तो मेडिकल शिक्षा हेतु विदेशों में भेजने लगे थे या फिर इतनी बड़ी रंकम देकर यदि वे अपने बच्चों को देश के ही किसी मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरी की शिक्षा दिलवाते भी तो उन्हें शिक्षा पर ख़र्च की गई अपनी रक़म भारी भरकम फीस के बहाने मरीजों से वापस लेने का गोया अधिकार पत्र प्राप्त हो जाता था। देश में फिसड्डी एवं अज्ञानी डॉक्टरों की भरमार का राज भी अब कहीं जाकर खुला जबकि गत् दो दशकों से भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् अर्थात मेडिकल कौंसिल आंफ इंडिया (एम.सी. आई)के अध्यक्ष पद पर तैनात केतन देसाई नामक एक महाभ्रष्ट व्यक्ति की काली करतूतों का सी बी आई द्वारा भंडाफोड़ किया गया।

केतन देसाई ने देश में सैकड़ों ऐसे मेडिकल कॉलेज को मान्यता दे डाली है जो अपने आप में मेडिकल कॉलेज बनने की संपूर्ण आर्हता नहीं रखते थे। किसी मरीज की देखभाल, उसकी जांच-पड़ताल, मेडिकल शिक्षा संबंधी जरूरी मापदंड कहीं हों या न हों परंतु यदि कॉलेज के संचालक ने केतन देसाई की मुट्ठी गर्म कर दी है तो उस संचालक को मेडिकल कॉलेज की मान्यता अवश्य मिल जाती थी। इतना ही नहीं एम सी आई के इस महाभ्रष्ट प्रमुख ने कुछ ऐसे अयोग्यतम व्यक्तियों को मेडिकल प्रेक्टिस किए जाने के प्रमाण पत्र जारी कर दिये थे जिन्होंने कभी विज्ञान की कक्षा में दाख़िला तक नहीं लिया था। कला तथा संस्कृत जैसे विषयों के कई छात्र केतन देसाई की रिश्वतपूर्ण ‘कृपा दृष्टि’ से डॉक्टर बन चुके हैं और यही नक़ली डॉक्टर भारत में अब तक न जाने कितने भोले-भाले मरीजों की जानों से खिलवाड़ कर चुके हैं। केतन की जलालत की हद यहीं ख़त्म नहीं होती बल्कि उसने तो कई ऐसे बंगलादेशी नागरिकों को भी भारतीय डॉक्टर होने का प्रमाण पत्र जारी कर दिया जो स्वयं भारत के नागरिक होने का फर्जी प्रमाण पत्र लिए लुके-छुपे इधर-उधर फिरा करते थे। केतन देसाई को किसी को डॉक्टर बनाने में अथवा किसी संचालक को मेडिकल कॉलेज का मालिक बनाने में कोई आपत्ति नहीं होती थी बशर्ते कि वह इस एम सी आई प्रमुख की जेबें भरपूर तरींके से गर्म कर दे।

मेडिकल शिक्षा मांफिया डॉन केतन देसाई ने अपने इस लूट-खसोट के महाषडयंत्र को अंजाम देने के लिए अपने कुछ विशेष व भरोसेमंद व्यक्तियों की एक मंडली बनाई हुई थी। इसी मंडली के मात्र दसवीं कक्षा पास व्यक्ति एस एस राही को देसाई ने एम सी आई का सचिव नियुक्त किया हुआ था। और यही व्यक्ति एम सी आई के रजिस्ट्रेशन विभाग का भी प्रमुख था। जरा गौर फरमाईए कि देसाई के नेतृत्व में चल रही एम सी आई द्वारा मेडिकल कालेज की मान्यता देने तथा डाक्टरों को रजिस्ट्रेशन प्रदान करने, व उसकी स्क्रीनिंग करने का जिम्मा एक लगभग अशिक्षित सा व्यक्ति संभाले हुए था। बड़े आश्चर्यपूर्ण ढंग से गत् दो दशकों से लूट-खसोट का यह सारा तांडव सरेआम चलता रहा। परंतु आख़िरकार 20 वर्षों तक स्वयं को ‘सिकंदर महान’ समझने वाले इस भ्रष्टाचारी को आख़िरकार पंजाब के एक मेडिकल कालेज से दो करोड़ रुपये की रिश्वत के इलजाम में सीबीआई ने चोर तथा महाभ्रष्ट महसूस हुए गिरफ्तार कर लिया। ख़बरें आ रही हैं कि केतन देसाई आज अकूत धन संपत्ति का मालिक बन चुका है। समाचार प्राप्त हो रहे हैं कि उसके पास दर्जनों के हिसाब से आलीशान भवन, क्विटल के हिसाब से सोना तथा सैकड़ों करोड़ रुपयों के हिसाब से नगदी की बरामदगी हो रही है।

अपनी गिरफ्तारी के बाद केतन देसाई ने चूंकि त्यागपत्र दे दिया था इसलिए केंद्र सरकार की संस्तुति पर राष्ट्रपति ने एम सी आई को भंग करने की सिफारिश भी कर दी है। अब राष्ट्रपति द्वारा देश के 6 प्रतिष्ठित चिकित्सकों का एक पैनल बनाया गया है जो एम सी आई के कार्यों की अस्थाई रूप से निगरानी करेगा। केतन देसाई इस समय कानून के शिकंजे में है तथा अभी कई दिनों तक उससे और कई राज खुलने तथा उसके द्वारा दोनों हाथों से लूटी गई संपति का और अधिक खुलासा होने की उम्मीद की जा रही है। भारतीय यांत्रिकी शिक्षा संस्थान परिषद् तथा भारतीय आर्किटेक्ट शिक्षा संस्थान परिषद् में भी इसी प्रकार के घोटाले पहले उजागर हो चुके हैं। गोया हम यह कह सकते हैं कि रोजगारोन्मुख समझा जाने वाला तकनीकी शिक्षण का क्षेत्र इस समय लगभग पूरी तरह भ्रष्टाचार की पकड़ में है। ऐसे संगीन ‘हादसे’ आख़िर हमें क्या सोचने पर मजबूर करते हैं। देश के किस प्राईवेट मेडिकल कॉलेज पर हम विश्वास करें और किस पर न करें? देश का कौन सा डॉक्टर वास्तव में आयुर्विज्ञान की शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात तकनीक व योग्यता के अनुसार डॉक्टर बना है और कौन डाक्टर संस्कृत, कला या संगीत का विद्यार्थी होने के बावजूद डाक्टर की डिग्री लिए घूम रहा है? गत् 20 वर्षों में ऐसे घोटालों व भ्रष्टाचारों के परिणामस्वरूम कितने मरीज इन जैसे अनाड़ी डाक्टरों के हाथों मौत के मुंह में जा चुके हैं। आख़िर इन सवालों का जवाब कौन देगा तथा इनके लिए जिम्मेदार कौन है?

ऐसे भ्रष्टाचारों के उजागर होने के बाद एक सवाल और यह उठता है कि हमारे देश के सुप्रसिध्द ‘लचीले कानून’ के परिणामस्वरूप केतन देसाई जैसे खुली लूट-खसोट करने वाले तथा हजारों मरीजों की जान से खिलवाड़ करने का अधिकार पत्र बेचने वाले इस महापापी एवं महान मुजरिम को आख़िर कब और क्या सजा मिलती है। जरा कल्पना कीजिए कि इसी भ्रष्टाचार का प्रतीक बने केतन देसाई की रिश्वतखोरी के चलते ही डॉक्टर की पढ़ाई पढ़ने के इच्छुक लाखों होनहार छात्र मात्र इसीलिए डॉक्टर ही नहीं बन सके क्योंकि उनके अभिभावक दस-बीस और तीस लाख रुपये ख़र्च कर अपने बच्चे को मेडिकल शिक्षा दिलवा पाने की हैसियत नहीं रखते थे। दूसरी ओर तमाम धनाढयों की अयोग्य संतानें मात्र अपने धन के बलबूते पर डॉक्टरी का प्रमाण पत्र लिए पूरे देश मे घूमते फिर रही हैं तथा अपना निजी नर्सिंग होम अथवा दवाख़ाना चलाकर मरीजों से अपनी ख़र्च की गई रकम बेदर्दी से वसूलने पर तुली हुई हैं। लाखों मरीजों की जान से खिलवाड़ करने का तथा लाखों गरीब छात्रों के भविष्य के साथ अन्याय करने का दोषी केतन देसाई जैसा व्यक्ति क्या फांसी की सजा पाने से कम का हंकदार है?

जरा हमारे देश का दुर्भाग्य देखिए कि आज चारों ओर की सीमाओं पर असुरक्षा के साए में जीने वाला यह देश, आतंकवादियों की बेधड़क घुसपैठ का सामना करने वाला हमारा भारतवर्ष, देश के भीतर सांप्रदायिकता व जातिवाद का हर समय मुंकाबला करते रहने वाला हमारा देश और अब नक्सलियों के हाथों फैलाई जाने वाली अराजकता तथा राजनैतिक और अंफसरशाही के क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के मुद्दे और इन सब के बीच केतन देसाई जैसे मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में उजागर होने वाले शिक्षा माफिया डॉन के काले कारनामे। यह बातें हमें इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए विवश करती हैं कि हमारे देश को दरअसल बाहर की तांकतों से उतना ख़तरा नहीं है जितना कि अपने देश के भीतर संफे दपोश बने बैठे इन केतन देसाई रूपी दीमकों से है।

जहां इस देश में केतन देसाई जैसे भ्रष्ट एवं लुटेरे अधिकारी एवं डॉक्टर सक्रिय हैं वहीं इसी देश में डॉक्टर एस एम नवाब तथा डा. वेणु गोपाल जैसे चरित्रवान डाक्टर भी रहे हैं तथा आज भी हजारों ऐसे चरित्रवान डाक्टर मौजूद हैं जो अपने पेशे को ही अपनी पूजा व इबादत समझते हैं तथा अपने मरीज के स्वस्थ होने पर मिलने वाली अपनी सफलता व संतुष्टि को ही अपनी सबसे बड़ी पूंजी व संपत्ति महसूस करते हैं। दरअसल हमारा यह विशाल देश ऐसे ही उच्च विचार रखने वाले तथा धर्मात्मा सरीखे डॉक्टरों व ऐसे अन्य तमाम ईमानदार पेशेवर लोगों के सिर पर ही चल रहा है। अन्यथा देसाई जैसे लोगों को देखकर तो कभी-कभी ऐसा प्रतीत होने लगता है कि शायद अब वे दिन भी दूर नहीं जब देसाई से प्रेरणा लेने वाले चिकित्सक अपने मरीजों की लाशों के भी सौदे उन्हीं के परिजनों से न करने लग जाएं।

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2 Comments on "फिर चोर निकला एक और ‘सिकंदर’"

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onkarlal menaria
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इतना बड़ा घोटाला पिछले बीस सालों से चलता रहा एवं किसी को कोई भनक नहीं लगी – आश्चर्य. सेंकडों करोड़ों एवं क्विन्त्लों सोने के महा गोत्ताले को भी मीडिया में ज्यादा जगह नहीं मिली एवं न ही सताधारी तथा विपक्षी दलों के नेताओं ने इसके विरुद्ध जोरदार आवाज उठाई. कही ऐसा तो नहीं है की इन तथा कथित प्राइवेट चिकित्सा महाविद्यालयों में इन नेताओं की भी भागीदारी रही हो जिस पर सभी चुप है.

sunil patel
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केतन देसाई बीस सालो से इस गोराख्धंदे में लिप्त था और सरकार को पता नहीं, वाली शर्म के बात है. करोड़ो अरबो के गबन करने वाले केतन का कुछ नहीं होगा. कुछ करोड़ देकर तारीख दर दरिख बढती रहेगी. जब न्याय होगा तब तक वह अपनी पूरी जिन्दगी जी चूका होगा.

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