लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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अशोक गौतम

विपक्ष के आरोप पर चुनाव आयोग ने हर चौक पर विराजमान को ढकने के आदेश किए तो हाथियों के संगठन के प्रधान ने देश के तमाम हाथियों को संबोधित करते कहा,‘ हे मेरे देश के तमाम हाथियो! जरा चुनाव आयोग से पूछो कि हमारा चुनाव से क्या लेना देना! हम तो बस हाथी हैं। चुनाव के समय भी खाते हैं और चुनाव के बाद भी खाते हैं । हम तो इस देश में बस आए ही खाने के लिए हैं। खाने के सिवाय और कुछ करते हों तो हमारा वंश खत्म हो जाए। हम न तो किसीको चुनाव में लाभ देते हैं न किसीका नुकसान करते हैं। बस, निर्लिप्त भाव से जैसा भी मिले जो भी मिले, विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी जान हथेली पर रख, खाने में जुटे रहते हैं। चाहे सरकार किसी को हो, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता! न हम किसी के दोस्त होते हैं न दुश्मन। हमें तो अपने पेट से आगे बस कुछ दिखता ही नहीं! अरे भैया! जब हाथी ही हैं तो खाएंगे नहीं तो और क्या करेंगे! अब जब व्यवस्था ने मौका दे ही रखा है तो हम भी क्या करें! हम न तीन में न तेरह में। कल तो विपक्ष ये भी कहेगा कि गीदड़ों की मूर्तियों को भी ढक दिया जाए। विपक्ष जो मन में आए कहता रहे और चुनाव आयोग मानता रहे तो देश में चुनाव लड़ेगा कौन! हम विपक्ष के आगे चुनाव आयोग को झुकने नहीं देंगे,’ आनन फानन में अखिल भारतीय हाथी संघ की कार्यकारिणी ने तय किया कि वह चुनाव आयोग से मिल कर कहेगी कि हाथियों की मूर्तियों को न ढका जाए। यह सभी तरह के हाथियों का अपमान होगा। अगर आयोग ने यह चोट उनके सम्मान तक पहुंचने से पहले वापस नहीं ली तो उनके सम्मान पर हुई हर चोट देश के थोड़े बहुत बचे बजट पर कील का काम करेगी।

उधर उन्होंने अपने पत्थर के हाथियों में जान फूँकते कहा,‘ हे जनता के पैसे से मेरे राज में पले बढ़े हर चौक पर मौज करते पत्थरी हाथियो! तुम्हें यह जानकर दुख होगा कि विपक्ष ने मेरी और तुम्हारी मूर्तियों पर आपत्ति जताते हुए चुनाव आयोग से अपील की है कि चुनाव में जनता को तुम्हारे दिखने से हमें राजनीतिक लाभ मिलेगा। इसलिए अब वक्त आ गया है कि मेरे हित में पुरानी बातें भुला सारे हाथी एक हो जाएं। तभी मेरा तुम्हारा अस्तित्व बना रहेगा। मैं हूं तो तुम हो!मेरे अस्त्तिव में ही तुम्हारा अस्तित्व निहित है। मैं चुनाव आयोग से पूछती हूं, विपक्ष से पूछती हूं कि कल जब ये ये सत्ता में थे तो हमने तो किसी के हाथियों को ढकने की अपील आयोग से की थी? क्योंकि हम जानते हैं कि हाथी रखना सबकी मजबूरी है। हाथियों के सहयोग के बिना किसी की सरकार चली हो तो बताए!

हे चुनाव आयोग जी ! मैंने तो हर चौक पर हाथियों को इसलिए फिक्स किया था कि कम से कम गणेश स्वरूप ये हाथी तो जनता के विघ्न हरते रहें। मेरी सरकार तो कुछ कर पाएगी नहीं। अब आपने मूर्ति पूजा के खिलाफ होते हुए हमारी मूर्तियों को ढकने के आदेश दे देश की जनता की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। जनता इसे कदापि बर्दाश्त नहीं करेगी । लाख हाथियों को ढक दिया जाए, हाथी तो इस राज्य के, देश के कण कण में विराजमान हैं। जब तक सृश्टि रहेगी, विराजमान रहेंगे। आप उन्हें कितना ही ढकने के आदेश दीजिए! वे यत्र तत्र सर्वत्र चिंघाड़ते ही रहेंगे।

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