लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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train (दिसइस द लास्ट ट्रेन ….)

कहीं पढ़ा था युद्ध कहीं भी हो मारी तो औरत ही जाती है|संयुक्त युगोस्लाविया का अंग क्रोअशिया –तेरह शताब्दियों का कबीलाई इतिहास लिए वर्षों से अपनी स्वायत्तता की मांग करता रहा |कभी वह आस्ट्रो-हंगरियन गंठजोड़ का अंग बना तो कभी अपनी संस्कृति ,भाषा की रक्षा के लिए लड़ता रहा, सपना एक ही था किसी दिन स्वतंत्र गणराज्य का दर्जा मिलेगा|मार्शल टिटो की मृत्यु के बाद उधर सोवियत युनिअन टूटा –बिखर गया ,व्यक्ति चेतना ने समूह चेतना पर विजय पायी |युगोस्लाविया के साथ भी यही हुआ –बोस्निया,मसिदोनिया,मान्तेग्रो,स्लोवेनिया सर्बिया ,क्रोअशिया में बंट गया |१९९१ में क्रोअशिया स्वतंत्र गणतंत्र घोषित हुआ|लेकिन यहाँ से गृहयुद्ध शुरू हुए .सर्बों के कब्ज़े से एक बड़े इलाके को छुड़ाना बाकी था |समाजवाद के दौर से निकलना आसान था ,नयी व्यवस्था कायम करना मुश्किल |तब तो किसी को भूखे सोने का डर न था ,खूब छुट्टियाँ,नौकरी जाने का कोई डर नहीं ,बच्चे राष्ट्र की संपत्ति|सर्ब-क्रोअती सब एक साथ रहते थे जैसे भारत विभाजन से पहले हिंदू मुसलमान |सर्ब क्रोअशिया की ज़मीन छोड़ने को तैयार नहीं ,बोस्निया के मुसलमानों से लेकर सर्बो के बड़े समूह से क्रोअशिया के सैनिक लड़े ,समझौते होते रहे –टूटते रहे.पांच साल लंबी लड़ाई में दोनों पक्षों के लोग भरी संख्या में मारे गए|अब कई वषों से शांति है |युद्ध के बाद की शांति ,आत्मीयो को खोने के बाद की शान्ति ,बर्फ गिरने के बाद की शांति |इस शांति का मूल्य चुकाया औरतों ने उन्ही में से एक है दुष्का सममार्झिया- स्मार्ट ,तेजतर्रार कई भाषाएँ बोल सकती है ,भाषा –संस्कृति के प्रति जागरूक लेकिन स्टोर में कोई अमेरिकी सामान खरीदने के सख्त

खिलाफ |मैदे से बनी पावरोटी को अमेरिकी कहती है ,हमेशा वही चीजे खरीदती है जो क्रोअसिया की ही बनी हों दूध से लेकर दारु तक |५७ साल की उम्र है ,देखने से युवा ऊर्जा से भरपूर ,मा बाप साथ रहते है एक १७ साल का बेटा |वीकेंड पर घर का सामान खरीदती है ,पूरा सप्ताह ट्रावेल ऐजेंसी की नौकरी में व्यस्त |यह धुर पश्चिम है ,जिसकी सीमा एडीआट्रीक समुद्र है ,समुद्र तट बेहद लुभावना ,शांत चित्त पर्यटकों की पसंद | खैर मैंने सोचा था आपको दुष्का की कहानी सुनाऊ ,जो अभी मिल कर गयी है मुझसे |आई थी भारी मन लिए मैं कह नहीं सकती जाते समय उसका मन हल्का हुआ की नहीं लेकिन मेरे मन में अजीब सा खट्टा मीठा स्वाद छोड गयी है|

ये पश्चिम है जहाँ माता पिता १८ साल की उम्र के बच्चों को मित्र मानते हैं ,देख रही हूँ दिनोंदिन यह उम्र घटती ही जा रही है |१४ साल की नादिया को स्कूल का इतना तनाव है कि सिगरेट के बिना रह नहीं सकती ,गर्मियों के इम्तहानो में पास नहीं हो पाई |कहती है “आप क्या सोचती हैं कि सिर्फ बड़े लोग ही तनावग्रस्त होते हैं |मुझे पढ़ना घर में रहना बिलकुल पसंद नहीं ,सोचती हूँ कब बड़ी होकर संगीतकार बनू या फ़िल्म में कम करूँ |”उसकी माँ तानिया भारत को पसंद करती है ,बेटी के लिए चिंतित है ,लेकिन बेटी को सिगरेट छोड़ने की सलाह नहीं दे सकती ,वो खुद चेन स्मोकर है |५० की उम्र तक २ तलाक हो चुके है ,रिसेशन के दौर में सामजिक सम्बन्ध बड़े पैमाने पर टूटे हैं |६२ प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो अपने पिताओं के साथ रहना चाहते हैं ,रह नहीं पा रहे |नौकरियां छूटने या तनाव का प्रभाव दाम्पत्य संबंधों पर पडा है |यह भारत नहीं कि कुछ भी हो जाये तलाक नहीं होना चाहिए |नादिया जैसे अनेक किशोर दिशाहारा हैं ..आदर्श किसको मानें ?किसके जैसा बनाने की कोशिश करें |माँ से लेकर दादी नानी तक अपना अलग जीवन जी रही हैं |यहाँ भारतीय वानप्रस्थ की अवधारणा नहीं है , कहते हैं सिक्सटी इज नौटी |पूरा जीवन काम किया पैसे कमाने की ज़द्दोज़हद की ,अब वक़्त है खूब घूमने का मौज मनाने का ,विज्ञान और मेकप ने उम्र छिपाने के सैकड़ों तरीके इज़ाद कर के दे दिए हैं |ऐसे में नाती नतिनी ,पोता पोती की चिंता हम क्यों करें उसका जीवन है वो जाने |माँ को भी मालूम है कुछ दिन बाद पुरुष मित्र ,खासकर मालदार जुटने मैं मुश्किल होगी ,सो नादिया की फिक्र कौन करे ..चलो पहले अपनी जिंदगी जी लो..ओवो ये ज़द्म्ये वलाख… (दिसइस द लास्ट ट्रेन ….)

हाँ तो बात दुष्का की हो रही थी,वह अविवाहिता माँ है – युद्ध ने जिसके जीवन को ही एक युद्ध बना दिया |यद्यपि यहाँ संतान के नाम के साथ पिता का नाम दिया जाना सरकारी कागजों पर अनिवार्य नहीं ,फिर भी समाज की दृष्टि में ऐसी स्त्रियों के लिए कोई सम्मान नहीं |युद्ध छिड़ा सर्ब और क्रो़त कबीलों में ..मारे गए आम जन ,सदियों की शत्रुता की भेंट चढ़ गए सीमा के गाँव के गाँव |

सर्बों ने क्रोअतियों को मारा,उनके घर जला दिए बदले में क्रोअतियों ने पूरे क्रोअशिया से सर्बो को निर्ममता से कुचल दिया,लोग भाग गए या मारे गए |दुष्का के माँ बाप उस समय अपने गाँव में रह रहे थे,वे जान बचाकर किसी तरह बेलग्रेड पहुचे मगर बेटियों के पास ,जो उस समय जागरेब शहर के सियेतना सेस्ता(फूलो वाली गली )के मकान न बारह में पांचवी मजिल पर रह रही थीं ,पहुँचाना संभव नहीं हो पाया |समाजवादी व्यवस्था में सबको आवशयकता के हिसाब से रहने को घर दिए गए थे ,तब सर्ब और क्रोअती में सर्कार ने कोई फर्क नहीं किया ,बदले समय में दोनों बहनों से कोई पडोसी बात नहीं करता था |दुष्का को बिना नोटिस दिए नौकरी से निकल दिया गया –अब वह केवल सर्ब थी ,मनुष्य नहीं |जंग ज़ोरों पर थी अमेरिका की पौ बारह थी ,युद्ध विराम होते थे ,वाएदे किये जाते थे ,तुरंत वाएदे टूट भी जाते थे|राजधानी होने के नाते जागरेब शहर में व्यवस्था और अनुशासन ऊपरी तौर पर बना हुआ था ,लेकिन लोगों के दिलो दिमाग में ज़बरदस्त युद्ध चल ही रहा था |बसों में ,ट्रामों में लोग सर्ब को देखते ही वाही तबाही बकने लगते ,थूकते ,प्रहार भी करते .ट्रेनों से उतरने को कहते |दुष्का ने कई साल पहले से अपनी ट्रावेल एजेसी का सपना पाला था ,सोचा था निजीकरण अपने साथ अनंत संभावनाएं लेकर आएगा |इन सालों में दुनिया घूमी माँ बाप का सहारा बनी एकाध प्रेम भी किये ..लेकिन युद्ध ने दुनिया बदल दी |निजीकरण आया –कुछ अवसरवादियों को विकास के अनंत अवसर मिल गए –लोग रातोरात अमीर हो गए ,भगोड़े सर्बों की अचल संपत्ति अधिकृत कर ली गयी ,मंत्री आए नेता आए ,पिछलग्गुओं को मलाई मिली|यह नया यथार्थ था, जहाँ पैदा हुई पली- बढ़ी वहाँ वह अल्पसंख्यक थी| अब नौकरी तो मिली पर पहले वाला अधिकार भाव अब रहा नहीं |युद्ध के थमने और गर्भ ठहरने –दोनों की सूचना एकसाथ मिली |दौडी थी उसदिन वह त्रेयेशंवाचका

त्र्ग से यांकोमीर तक ,पैदल चलकर गयी सेवेसका तक |

कोई डाक्टर सर्ब को हाथ लगाने को तैयार न हुआ |अंत में एक बूढा पेंशनयाफ्ता डाक्टर, जिसकी बेटियों को पढाई के लिए कभी दुष्का ने अमेरिका जाने में मदद की थी ,अहसान उतारा |दुष्का ने उसे बताया कि वह अपने क्रोशियन मित्र के पास गयी तो उसने विवाह से इनकार कर दिया ,उससे बात तक न कि और सर्ब कहकर गाली दी |

डाक्टर ने जांच कर बताया कि फेलोपियन टुबे में अवरोध है |

“तो फिर यह बच्चा “?

ये इत्तेफाक ही है कि तुमने गर्भ धारण किया ,दरअसल मैं तुम्हारा अबार्शन तो कर सकता हूँ पर फिर तुम कभी माँ नहीं बन पाओगी ..

दुष्का लौट आई , प्रेमी से मिलने की हर कोशिश नाकामयाब रही |दुष्का लौट गयी डाक्टर के पास रोकर बोली –अबोर्शन कर डालिए और कोई रास्ता नहीं |

चिलमची में पानी गर्म था ….

डाक्टर ने आप्रेशन टेबल पर लिटाया –ममता से सर पर हाथ फेरा –चिंता मत करो |इश्वर तुम्हारे साथ है मदर मेरी को याद करो ….बट आई मस्ट् टेल यू दिस इस उर लास्ट ट्रेन …

यू मस्ट कैच ईट

उठ ही तो आई दुष्का आपरेसन टेबल से |पूरे समय अपनी खूब देखभाल की ,स्वस्थ सुंदर बच्चे को जन्म दिया –दिनो नाम रखा,जिसका मतलब है सूर्य |

आज दिनो क्रोअसिया फूटबाल टीम का खिलाडी है –न सर्ब है न क्रोशियन बस है एक जिंदादिल खिलन्दडा लड़का, जिसे देख दुष्का कहती है –लुक माई दिनो हेस ग्रोन अप |खूब मेहनत करती है ,उसने लास्ट ट्रेन पकड़ ली है |

गरिमा श्रीवास्तव

 

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1 Comment on "..ओवो ये ज़द्म्ये वलाख…"

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आर. सिंह
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यह एक स्त्री की साहस पूर्ण जीवन यात्रा है.एक माँ की ममता और दृढ़ता की गाथा है.काश स्त्रियाँ अपने जीवन को अपने ढंग से जीने के लिए स्वतन्त्र होतीं..ठीक है,समाज या पुरुष वर्ग ने उसके साथ अत्याचार किया,पर क्या यह उसका अधिकार नहीं,कि वह इससे ऊपर हट कर सोचे? आज हम उस मोड़ पर खड़े हैं,जहां इसकी आवश्यकता पहले से अधिक हो गयी है.नारी अगर यह साहस कर पाती है कि वह तथाकथित अवैध बच्चे को भी जन्म दे,तो पुरुष वर्ग को अपने दामन में झांकने को वाध्य होना पड़ेगा.अब तो दी.एन. ए टेस्ट से बच्चे के असली पिता का… Read more »
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