लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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शुभचिंतक

शुभचिंतक

मेरी किसी भी बात से आप भले ही सहमत हों या न, पर मेरी इस बात से तो आप भी हंडरड परसेंट सहमत होंगे कि पहली श्रेणी के शुभचिंतकों का मिलना आज की तारीख में वैसे ही कठिन है जैसे आप शताब्दी की करंट बुकिंग के लिए पांच बजे भी सीट मिलने की उम्मीद में बदहवास दौड़े होते हैं, जबकि ट्रेन के छूटने का वक्त सवा पांच बजे का हो।

पर हां! दूसरे दर्जे के शुभचिंतक जरूर मिल जाते हैं। ये कुछ वैसे- वैसे शुभचिंतक होते हैं जो अच्छा न करें तो बुरा भी नहीं करते। जब इनके दिमाग में बुरा करने का खयाल आए तो ये उसे जैसे कैसे शुभचिंतक को फटकारते  दिमाग से बाहर कर ही देते हैं। इन दूसरे दर्जे के शुभचिंतकों की सबसे बड़ी खासियत यही होती है कि ये कम से कम जो अच्छा न कर सकंे तो बुरा भी नहीं करते। जो उन्हें लगे कि वे शुभचिंतक का कुछ बुरा करने के लिए उनका मन ललचा रहा है तो वे अपने मन के ललचाने के बाद भी  जैसे कैसे अपने बेकाबू मन पर काबू पा ही लेते हैं।

पर ये तीसरे दर्जे के शुभचिंतक जब तक अपने शुभचिंतक दाव हाथ लगते ही को नीचा न दिखा लें, तब तक इनकी आत्मा को शांति नहीं मिलती। ये किसीके सामने अपना कद ऊंचा करने के लिए कितना भी गिर सकते हैं। इनके गिरने की कोई हद नहीं होती।

वैसे तो मेरे आपकी तरह कहने को बहुत से शुभचिंतक हैं पर मेरे परमादरणीय भाई साहब रामजी लाल मेरे खास शुभचिंतक हैं। बेकायदे से भी जो उनका दर्जा तय करूं तो वे मेरे तीसरे दर्जे के शुभचिंतक से भी कहीं आगे के हैं। पर तीसरे के बाद शुभचिंतकों की श्रेणी खत्म हो जाती है इसलिए मेरी तरह आप भी उन्हें तीसरे दर्जे के ही कह सकते हैं। इससे नीचे जो मैं उनका दर्जा निर्धारित करूं तो उनकी आत्मा तो अति प्रफुल्लित होगी पर मेरी अंतर आत्मा मुझे कचोटेगी। मैं आत्मा की आवाज से बहुत डरता हूं ,और वे अपनी सहजता से।

अगर मैं तीसरे दर्जे में यात्रा न भी करना चाहूं तो भी वे असूहलियतों का पूरा ध्यान रख मेरी तीसरे दर्जे की यात्रा की टिकट हवा में लहराते में आगे नाचने का हर मौका तलाशते रहेंगे। और मौका मिलते ही मुझे फुटपाथ पर बिठा हवा हो लें। सच कहूं तो हैं तो वे मेरे शुभचिंतक हैं पर जो सुबह सुबह वे दिख जाएं तो सारा दिन मन यों रहता है कि मानों मन में नीम घुल गया हो।

मेरे इन परम आदरणीय मित्र में नीचता इस कदर कूट कूट कर भरी है कि वे अपने कद को ऊंचा दिखाने के चक्कर में अपने बाप तक को भी नीचा दिखाने से न चूकंे, उनके अंहकार को देख मैं ऐसा मानता हूं। अपने को बनाए रखने के लिए वे बाप की पगड़ी से भी हसंते हुए जाएं। उनका बस चले तो दूसरों की जेब से बड़े अदब से पैसे निकाल मोमबत्ती हाथ ले सूरज के आगे चैड़े हो अड़ जाएं।

इस दर्जे के शुभचिंतकों में हीनता का बोध इस कदर भरा होता है कि ये बेचारे अपने थूक को ऊंचाई देने के लिए चांद पर भी थूकने से गुरेज नहीं करते। इनके लिए हर जगह अपना कद महत्वपूर्ण होता है , मूल्य नहीं। अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए ये भगवान को भी अंडर इस्टीमेट करने से नहीं चूकते। ये भालू और दो शुभचिंतकों की कहानी से आगे के चरित्र होते हैं। इस श्रेणी के शुभचिंतक बहुधा जिस थाली में खाते हैं या तो खाने के बाद उस थाली को ही उठा कर ले जाते हैं या फिर….. जिस थाली में खाना उसी थाली में छेद पाने वाली कहावत इनके लिए आउट डेट होती है। इसलिए ऐसे भाई साहब अपना कद ऊंचा करने के लिए अपने नीचे औरों के नीचे की सीढ़ी सरकाने से तो परहेज करते ही नहीं ,मौका मिलते ही किसीके भी  कांधे पर छलांग मार बैठने के बाद उसके सिर के सफेद बाल तक नोचने से परहेज नहीं करते।

पर मैं फिर भी हर बार  ऐसे शातिर शुभचिंतकों को चांस दे देता रहता हूं, उन्हें अपने कांधे पर बिठा अपने सिर के सफेद बाल नुचवाने का, पता नहीं क्यों? हर बार अपने तीसरे दर्जे के शुभचिंतकों की बदतमीजी को भुनाने का नैसर्गिक अवगुण मुझमें पता नहीं क्यों हैं मेरे खुदा। जबकि मैं यह भी जानता हूं कि आदमी सबकुछ बदल सकता है पर शुभचिंतकी के संदर्भों में अपनी औकात नहीं।

इन्हें देख कर कई बार तो लगता है कि इनमें जरूर कोई हीनता इतनी गहरे तक है कि मत पूछो। और मैं उसे निकालने में हर बार असमर्थ हो जाता हूं। अपनी इस असफलता पर हे मेरे तीसरे दर्जे के शुभचिंतक मैं तुमसे क्षमा मांगता हूं, दोनों हाथ जोड़।

इनकी एक विषेशता यह भी होती है कि पहले तो ये आपके सामने सगर्व मिमियाते हैं,फिर मौका पाकर आपके बाप बन बैठते हैं। इनको अपने शुभचिंतकों का अपमान करने में वह आनंद मिलता है जैसा बड़े-बड़े तपस्वियों को भगवान को पाने  के बाद भी क्या ही मिलता होगा।

तीसरे दर्जे के इन सम्मानियों को हम आस्तीन का वह सांप कह सकते हैं कि जिसे हम पता नहीं क्यों संवदेनशील होकर अपनी आस्तीन में लिए फिरते रहते हैं, और एक ये होते हैं कि दाव मिलते ही  हमारी कमर में डंक मार हमारा शुभचिंतक होने के परम धर्म को निभाते हैं,पूरी ईमानदारी से।

पहली श्रेणी के शुभचिंतकों के साथ सबसे बड़ी तंगी ये होती है कि ये शुभचिंतकी का दिखावा कभी नहीं करते। आपको इन्हें सहायता करने को कहने की भी जरूरत नहीं होती। ये अपने आप ही आपको परेशानी में देख आपकी सहायता करने चले आएंगे, हाथ का कौर हाथ में और थाली का कौर थाली में छोड़।

पर ये जो आपके तीसरे दर्जे के शुभचिंतक होते हैं इनके बारे में आप तो क्या,  भगवान तक कोई भी सटीक तो छोडि़ए भविष्यवाणी तक नहीं कर सकते। इन्हें बस पता चलना चाहिए कि इनके शुभचिंतक कहीं दिक्कत में हैं। फिर देखिए इनका प्यार, कि ये किस तरह आपको गले लगाते हैं। किस तरह अपने जूते तक खोल आप पर मंद मंद हंसी हंस बरसाते हैं। आपके हर किए उपकार  के बदले नमक हरामी का एक और नया उदाहरण स्थापित कर गदराते हैं। भले ही बाद में अपने पांव में कांटे चुभ जाएं तो कोई गम नहीं। ये अपने को स्थापित करने के लिए अपने बाप तक को भी विस्थापित करने से नहीं हिचकिचाते।

असल में ये उस लेवल के शुभचिंतक होते हैं जो किसी भी कद के सामने अपने को उससे ऊंचा दिखाने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देते। इन्हें अपने अहंकारी कद के आगे हिमालय तक  चींटी दिखे तो मोक्ष प्राप्त हो।

इनके लिए मित्रता की नहीं, केवल अपने कद की चिंता होती है। ये किसीके साथ शुभचिंतकी तब तक ही रखते हैं जब तक इनके  अहं के कद पर कोई आंच न आए। जैसे ही इन्हें लगे कि इनके सामने इनसे अधिक कद्दावर आ गया है तो ये  सबकुछ हाशिए पर डाल सड़े दिमाग से आरी  निकाल उसके कद को तहस नहस करने में पूरी शिद्दत से जुट जाते हैं अपने को लहूलुहान करते।

पहली श्रेणी और इस तीसरे दर्जे के शुभचिंतक में बेसिक अंतर यह होता है कि पहली श्रेणी का शुभचिंतक  आपके कद के साथ ईमानदारी से अपने कद को बढ़ाने की कोशिश करता है। और ये तीसरे दर्जे के शुभचिंतक इस फिराक में रहते हैं कि कब जैसे आपके कद को गिरा तथाकथित मित्रता के धर्म को निभा कृतार्थ हों। जब तक इस दर्जे के मित्र किसीको किसी रोज नीचा नहीं दिखा लेते, इनको खाना हजम नहीं होता। इसलिए मेरी  आपसे दोनों हाथ जोड़ विनती है कि अपने इन तीसरे दर्जे के मित्रों के पेट का खयाल मेरी तरह आप भी रखिए। अपने लिए न सही तो न सही,पर इनकी जिंदगी के लिए ये सब बेहद जरूरी है। इनके झूठे, लिजलिजे अहं की हर हाल में रक्षा कीजिए। भले ही आपकी इज्जत का फलूदा हो जाए तो हो जाए। इनका पेट खराब हो गया तो समझो इनके साथ के संबंधों में सौ और बीमारियों ने जन्म लिया।

तो आओ, अपनी पीड़ा भूल इनसे एक फासला बनाए अपने को जलील करवाते इन अबोध जीवों को शांत रखने का संकल्प लें। इनके झूठे अहं शांति में ही अपनी सुरक्षा है।
अशोक गौतम,

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