लेखक परिचय

हिमांशु शेखर

हिमांशु शेखर

हिमांशु शेखर आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं. लेकिन वे सिर्फ पढ़ाई ही नहीं कर रहे बल्कि एक सक्रिय पत्रकार की तरह कई अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन भी कर रहे हैं. इतना ही नहीं पढ़ाई और लिखाई के साथ-साथ मीडिया में सार्थक हस्तक्षेप के लिए मीडिया स्कैन नामक मासिक का संपादन भी कर रहे हैं.

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देश के खेल संघों पर लंबे समय तक काबिज रहकर वहां जमींदारी चलाना कई नेताओं का शौक बन गया है. इसका नतीजा यह हो रहा है कि तकरीबन सवा अरब आबादी वाले देश का प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में अपेक्षा का अनुरुप नहीं होता. लंबे समय से खेल संघों में व्याप्त अराजकता को दूर करने की मांग उठती रही है. देश में खेलों की दशा और दिशा बदलने के मकसद से नया कानून लाने की कोशिश कर रहे केंद्रीय खेल मंत्री अजय माकन से हिमांशु शेखर और जननी गणेशन की बातचीत के खास अंशः

नया कानून खेलों के विकास को गति देने के लिए कितना जरूरी है?

देश में खेलों के विकास को गति देने के लिए तीन प्रमुख समस्याओं का समाधान करना पड़ेगा। पहला तो यह है कि देश में खेलों का दायरा बढ़ाया जाए और खेल की संस्कृति विकसित की जाए। इसके लिए खेलों को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए और फिटनेस को लेकर सजग बनना चाहिए। दूसरी बात प्रशिक्षण से जुड़ी हुई है। इसके लिए हमें अपना ढांचा और दुरुस्त करना होगा। तीसरी समस्या सबसे बड़ी वजह है और इस वजह से काॅरपोरेट जगत चाहकर भी पैसा खेलों में नहीं लगा पाता। क्योंकि ये इस बात को लेकर सशंकित रहते हैं कि पैसे का इस्तेमाल खेल के लिए होगा या फिर यह अधिकारियों की जेब में चला जाएगा। बहुत सारे खेल संगठन ऐसे हैं जहां लोग दशकों से कब्जा जमाकर बैठ गए हैं और वहां जमींदारी की तरह खेलों को चला रहे हैं। अब क्रिकेट का ही उदाहरण लें तो यहां कार्यक्षमता तो है लेकिन पारदर्शिता नहीं है। इन तीनों मोर्चों पर सुधार करके ही देश में खेलों का सही विकास हो सकता है। पारदर्शिता नहीं होने की वजह से कई अनैतिक चीजें खेल में घर कर गई हैं जैसे यौन उत्पीड़न, डोपिंग और उम्र को लेकर गड़बड़ी। इन्हीं गलत चीजों को दूर करने के लिए हम नया कानून लाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि खेलों की गाड़ी सही ढंग से आगे बढ़ सके। यह एक शुरुआत है और आने वाले दिनों में इसकी वजह से सकारात्मक बदलाव खुद-ब-खुद दिखेंगे। जैसे जो लोग अभी पारदर्शिता के अभाव में खेलों में पैसा लगाने से कतरा रहे हैं वे आगे आएंगे। हमने एक ऐसा विधेयक बनाया है जो आने वाले दिनों में हमारे देश के खेलों की तसवीर बदल देगा।

इन सुधारों की दिशा में काम शुरू करने में आखिर इतना वक्त लगने की वजह क्या है?

मुझसे पहले भी जो लोग खेल मंत्रालय में थे उन्होंने भी समय-समय पर सरकारी आदेशों के जरिए इन सुधारों को लागू करने की कोशिश की लेकिन उन्हें सीमित सफलता मिली। मुझसे पहले जो लोग यहां थे मैं उनके ही काम को आगे बढ़ा रहा हूं। हमें यह लगा कि जब तक हम इन बदलावों को बाकायदा एक कानून के जरिए नहीं लाते तब तक सफलता मिलना आसान नहीं है। 1989 में संविधान संशोधन विधेयक संसद में पेश किया गया था जिसमें यह कहा गया था कि खेलों को राज्य सूची से निकालकर समवर्ती सूची में लाना चाहिए ताकि खेलों को सही ढंग से चलाने का काम केंद्र सरकार कर सके। इसलिए यह कहना गलत होगा कि सुधार की कोशिश पहले नहीं की गई। 2007 में अटाॅर्नी जनरल ने यह राय दी है कि हम खेलों को समवर्ती सूची में लाए बगैर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व को आधार बनाकर राष्ट्रीय खेल संघों के लिए कानून बना सकते हैं। इसके बाद 1989 के प्रस्ताव को वापस लिया गया और उस समय से खेल मंत्रालय लगातार सुधारों को लेकर काम कर रहा है और इसका नतीजा अब आपको इस कानून के रूप में दिख रहा है।

आपने काॅरपोरेट फंडिंग की बात की लेकिन बीसीसीआई ने तो निजी क्षेत्र को काफी आकर्षित किया है।

ऐसा इसलिए कि उनके यहां उम्र और कार्यकाल को लेकर अपने स्तर पर ही अच्छे नियम हैं। लेकिन बीसीसीआई की समस्या है पारदर्शिता का अभाव। यही वजह है कि आईपीएल या क्रिकेट से संबंधित अन्य घोटालों की बात सामने आती रहती है। बीसीसीआई में पारदर्शिता की सबसे ज्यादा जरूरत है और अन्य खेल संघों में इसके साथ कार्यक्षमता विकसित करने की भी जरूरत है।

आप जो नया कानून लाने की कोशिश कर रहे हैं उसे कई ओर से विरोधों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में इसका क्या भविष्य है?

हम जब पहली बार इसे कैबिनेट में लेकर गए थे तो कुछ बातों पर लोगों को आपत्ति थी। हमने जो नया मसौदा तैयार किया है उनमें कुछ संशोधन किए हैं। हमें उम्मीद है कि अब जब हम नया मसौदा लेकर कैबिनेट में जाएंगे तो इसे वहां मंजूरी मिलेगी। हमने वे सारे प्रावधान इसमें से हटा दिए हैं जिसके जरिए लोगों को तनिक भी इस बात का संदेह हो कि इस कानून के जरिए सरकार खेल संघों पर कब्जा करना चाहती है। आरटीआई और एंटी डोपिंग के मामले में भी हमने खेल संघों को कुछ छूट दी है। ऐसा खिलाडि़यों के हितों को ध्यान में रखकर किया गया है। जैसे हमने खिलाडि़यों के फिटनेस और उनके चयन के आधार को आरटीआई से छूट देने का प्रावधान किया है। क्योंकि किसी खास परिस्थिति को ध्यान में रखकर किसी खास खिलाड़ी के चयन पर कई बार फैसला किया जाता है। जब पहले हमने इसे भी आरटीआई के दायरे में रखने का प्रावधान किया था तो खिलाडि़यों ने ही कहा था कि इन सूचनाओं से हमारी विरोधी टीमों को फायदा मिल सकता है। अब मुझे नहीं लगता कि किसी प्रावधान को लेकर किसी को कोई आपत्ति होनी चाहिए।

खेल संघों पर काबिज लोगों में किसी एक दल के नेता शामिल नहीं है बल्कि कई दलों के लोग शामिल हैं और वे विधेयक का विरोध भी कर रहे हैं। क्या आपके पास इससे पार पाने की कोई योजना है?

हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस विधेयक का विरोध किया है। वे इसे राज्य का विषय बताकर सुधारों का विरोध कर रहे हैं। इसलिए यह कहना ठीक नहीं है कि सिर्फ कैबिनेट के अंदर इसका विरोध हो रहा है। लेकिन हमें यकीन है कि हमें इस विधेयक को एक मुकाम तक पहुंचाने में कामयाब होंगे।

क्या उम्मीद की जाए कि संसद के शीतकालीन सत्र में यह विधेयक संसद में पारित हो जाएगा?

हम कैबिनेट से मंजूरी लेने की कोशिश करेंगे और अगर कैबिनेट से मंजूरी मिल जाती है तो हम इसे शीतकालीन सत्र में संसद में जरूर लेकर आना चाहेंगे।

आपने चयन के आधार को आरटीआई के दायरे से बाहर निकाल दिया लेकिन चयन प्रक्रिया पर कई बार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में क्या आपका यह कदम कानून को कमजोर नहीं करेगा?

जहां तक चयन प्रक्रिया पर सवाल उठने का मामला है तो अब तक ये बातें राष्ट्रीय स्तर पर बहुत कम आई हैं। ऐसी बातें राज्य के स्तर पर अधिक आती हैं। हम राष्ट्रीय खेल संघों के लिए तो कानून बना सकते हैं लेकिन राज्य खेल संघों के लिए नहीं। यह कानून हम उन खेल संघों के लिए बना रहे हैं जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली टीम चुनते हैं। मेरा मकसद इस विधेयक को कैबिनेट से पारित करवाना है इसलिए जो भी हल्के-फुल्के बदलाव हुए हैं उन्हें इस लक्ष्य से जोड़कर देखा जाना चाहिए।

इन बदलावों के बावजूद बीसीसीआई को अब भी इस विधेयक को लेकर आपत्ति है। इसे किस तरह देखते हैं?

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वे भारत सरकार द्वारा पंजीकृत भी नहीं होना चाहते और वे विरोध कर रहे हैं। हमने बीसीसीआई को एक पत्र लिखा था जिसके जवाब में हमे उन्होंने बताया कि हम आपकी किसी बात को नहीं मानेंगे। उन्होंने तो कार्यकारिणी में खिलाडि़यों की 25 फीसदी हिस्सेदारी के प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया। एक चैथाई भागीदारी का भी विरोध करना, यह तो मेरे लिए बेहद चैंकाने वाला है। ऐसी ही आरटीआई का विरोध करने का भी कोई मतलब नहीं है। अगर किसी के पास कुछ छिपाने के लिए नहीं है तो फिर आरटीआई का विरोध नहीं होना चाहिए। हमने ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश की है कि किसी भी खेल संघ को खेल मंत्रालय के प्रति जवाबदेह न रहना पड़े बल्कि वह स्पोर्टस ट्रिब्यूनल के प्रति जवाबदेह रहे। इस ट्रिब्यूनल का गठन वह समिति करेगी जिसकी अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश करेंगे।

दूसरे खेल संघों का क्या रुख है?

हमने सभी खेल संघों को पत्र भेजा था। इनमें से बीसीसीआई और आईओए ने नकारात्मक जवाब भेजे हैं। अन्य खेल संघों ने हमें नकारात्मक जवाब नहीं भेजा है इसलिए हम मानकर चल रहे हैं कि वे बदलावों को लेकर नकारात्मक रुख नहीं रखते।

विधेयक में इस बात का प्रावधान है कि कार्यकारिणी में खिलाडि़यों को 25 फीसदी हिस्सेदारी मिलेगी। क्या इससे खेलों के विकास को गति मिलेगी?

खेलों के विकास के मकसद से ही खिलाडि़यों की भागीदारी बढ़ाने का प्रावधान हमने किया है। हमने न सिर्फ 25 फीसदी हिस्सेदारी का प्रावधान किया है बल्कि उन्हें वोटिंग का अधिकार भी दिया है। ऐसा प्रावधान पहले किसी दिशानिर्देश में नहीं था पहली बार हमने इसका प्रावधान किया है। जिस खेल के बारे में फैसला लिया जा रहा है उस फैसले में अगर एक चैथाई भी उस खेल को खेलने वाले खिलाड़ी शामिल नहीं होंगे तो आखिर कैसे सही निर्णय लिया जाएगा। उम्मीद है कि हमने जो प्रावधान किया है उसके अच्छे परिणाम आएंगे।

नए विधेयक में स्पोर्टस ट्रिब्यूनल के गठन की बात की गई है। क्या इसके पास यह अधिकार होगा कि यह स्वतः संज्ञान लेकर किसी मामले की जांच शुरू कर सके?

बिल्कुल, ट्रिब्यूनल के पास ऐसा अधिकार होगा। हमने यह प्रावधान भी किया है कि खिलाड़ी या खेल से प्रेम करने वाला कोई भी व्यक्ति अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है और उसकी जांच की जाएगी। खिलाडि़यों की अगर कोई समस्या होगी तो वे भी इसके समाधान के लिए ट्रिब्यूनल के पास जा सकते हैं। हम देखते हैं कि कई खेल संघों का आपसी झगड़ा होता है तो इनका निपटारा भी ट्रिब्यूनल में हो सकेगा।

इस विधेयक में यह प्रावधान है कि अध्यक्ष को लगातार तीन कार्यकाल मिल सकता है लेकिन दूसरे पदाधिकारियों को लगातार कार्यकाल नहीं मिल सकता। यह अंतर आखिर क्यों?

हमने इंटरनैशनल ओलंपिक कमिटि के नियमों के हिसाब से यह प्रावधान किया है। हमने उम्र और कार्यकाल को लेकर इसलिए इस तरह के प्रावधान किए हैं कि अगर आईओसी इन नियमों का पालन कर सकती है तो फिर उससे संबद्ध दूसरे खेल संघ ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं।

अगर इस तरह का कानून पहले से होता तो क्या आईपीएल और राष्ट्रमंडल खेलों से संबंधित घोटाला टल सकता था?

अगर इस तरह का कानून पहले से होता तो कम से कम राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में जो घोटाला हुआ वह नहीं होता। क्योंकि इन खेलों के आयोजन समिति के अध्यक्ष और खजांची जो जेल में हैं और जिनके खिलाफ सीबीआई के मुकदमे चल रहे हैं, वे दोनों आईओए के पदाधिकारी नहीं बन पाते। इसलिए मुझे लगता है कि इस कानून की बहुत ज्यादा जरूरत है। क्योंकि कोई भी व्यक्ति एक निश्चित समय से अधिक किसी खेल संघ का पदाधिकारी रहता है तो निहित स्वार्थ विकसित हो जाते हैं।

कुछ खेल संघों के लोग यह कह रहे हैं कि जब सांसदों और दूसरे जनप्रतिनिधियों के लिए कोई उम्र सीमा नहीं है तो फिर हमारे लिए क्यों?

जनप्रतिनिधियों के चुनाव में 18 से अधिक उम्र के हर व्यक्ति की भागीदारी होती है। लेकिन इन खेल संगठनों में वोट देने वाले पहले से चुने हुए होते हैं। यहां हर कोई वोट नहीं दे सकता। अगर 18 से अधिक उम्र वाले ज्यादातर लोगों को यह लगता है कि 80 साल का आदमी अच्छा प्रधानमंत्री साबित हो सकता है तो उसके निर्वाचन में क्या बुराई है। जबकि खेल संघों में तो पहले से ही चुने गए लोगों को वोट देने का अधिकार हासिल है। ज्यादातर खेल संघों के आंतरिक चुनाव तो हाथ खड़े करके हो जा रहे हैं। वे तो बैलेट का भी इस्तेमाल नहीं कर रहे।

 

 

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